लघु-कथा: महारानी चंद्रिका और भारतवर्ष का तारा - महावीर प्रसाद द्विवेदी

लघु-कथा: महारानी चंद्रिका और भारतवर्ष का तारा – महावीर प्रसाद द्विवेदी

‘महारानी चंद्रिका और भारतवर्ष का तारा’ आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी की लघु-कथा है। अपनी इस लघु-कथा के माध्यम से वह अपने समय के भारतीय समाज में स्त्री की बदलती दशा पर टिप्पणी करते दिखते हैं। आप भी पढ़ें:

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भूतिया मास्साब - प्रांजल सक्सेना | फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस

पुस्तक टिप्पणी: भूतिया मास्साब – प्रांजल सक्सेना

‘भूतिया मस्साब’ लेखक प्रांजल सक्सेना का लिखा उपन्यास है। यह उनका चौथा उपन्यास है। उपन्यास फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस द्वारा प्रकाशित किया गया है। पढ़ें पुस्तक पर लिखी यह टिप्पणी:

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कहानी: गवाह - अभय कुमार भारती

कहानी: गवाह – अभय कुमार भारती

रामदीन ने गवाह बनने का फैसला ले लिया था। पर क्या वो अपने इस फैसले पर कायम रह पाया? एक बुक जर्नल पर पढ़ें लेखक अभय कुमार भारती की कहानी ‘गवाह’:

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कहानी: देर आये दुरुस्त आये - सुधा आदेश

कहानी: देर आये दुरुस्त आये – सुधा आदेश

मेघना के घर उसकी चचेरी बहन दीपिका आयी तो बातों के दौरान उसकी पुरानी यादों की पोटली भी खुलती चली गयी। इसके साथ‑साथ मेघना को ये भी अहसास हुआ कि कुछ कार्य ऐसे होते हैं जिन्हें करने में देर नहीं करनी चाहिए। यह कार्य क्या थे? दीपिका मेघना के घर क्यों आयी थी?

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लघु-कथा: बेड़ी - जयशंकर प्रसाद

लघु-कथा: बेड़ी – जयशंकर प्रसाद

वह नौ दस वर्ष का लड़का था जो कि अपने अंधे पिता के साथ घूमा करता था और भीख माँगने में उनकी मदद किया करता था। कथावाचक ने देखा कि उसके पिता ने उस लड़के पैरों में बेड़ी डाली हुई थी। आखिर ये बेड़ी क्यों डाली गयी थी? पढ़ें जयशंकर प्रसाद की लघु-कथा ‘बेड़ी’:

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लघु-कथा: त्याग - सियारामशरण गुप्त

लघु-कथा: त्याग – सियारामशरण गुप्त

गांधीजी की गिरफ़्तारी के विरोध में बाज़ार बंद था। ऐसे में कथावाचक के पुत्र जयदेव ने छोटी दाख (किशमिश) खाने की ज़िद की। क्या इस ज़िद को कथावाचक ने पूरा किया। पढ़ें सियारामशरण गुप्त की यह लघु-कथा ‘त्याग’:

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कहानी: सुलह - आचार्य चतुरसेन शास्त्री

कहानी: सुलह – आचार्य चतुरसेन शास्त्री

वहाँ कभी हिंदू कॉलेज हुआ करता था पर अब उधर कचहरी बन चुकी थी। कथावाचक कॉलेज के समय से उस इलाके में आता था क्योंकि उसे वहाँ के छात्रों के बीच रहना पसंद था। अब उधर कचहरी बन जाने पर कथावाचक वहाँ का वातावरण देखने आ पहुँचा। उसने कचहरी पहुँचकर क्या देखा?

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कहानी: भक्षक-रक्षक - विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’

कहानी: भक्षक-रक्षक – विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’

प. चंद्रकांत रंगीले स्वभाव के व्यापारी थे। स्त्रियों की तरफ उनका विशेष आकर्षण था। ऐसे में जब उनके दोस्त, जिसे वो रजनीगंधा कहते थे, ने लखनऊ जाने का प्रस्ताव रखा तो उन्होंने सहज ही स्वीकार कर दिया। उन्हें लखनऊ में व्यापार से जुड़ा काम भी था। लखनऊ में क्या हुआ?

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कहानी: माँ - प्रेमचंद

कहानी: माँ – प्रेमचंद

आदित्य ने अपने आप को समाजसेवा के लिए न्यौछावर कर दिया था। इसका उसे कोई पछतावा भी नहीं था। वह चाहता था कि उसका बेटा भी उसी की राह पर चले। लोगों की निस्वार्थ भलाई करे। उसकी पत्नी अरुणा की भी यही इच्छा थी। आदित्य को पूरा विश्वास था कि अरुणा उनके बेटे प्रकाश को ऐसी परवरिश देगी जो उनके सपनों को साकार करने में मदद करेगी। क्या आदित्य और अरुणा का स्वप्न पूरा हुआ?

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अरुंधति रॉय की किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ का हिन्दी संस्करण ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ शीर्षक से प्रकाशित

अरुंधति रॉय की किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ का हिंदी संस्करण ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ शीर्षक से प्रकाशित

अरुंधति रॉय की बहुप्रशंसित किताब ‘मदर मैरी कम्स टू मी’ का हिंदी संस्करण ‘मेरी माँ मेरी गैंगस्टर’ शीर्षक से राजकमल प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया जा रहा है। इसका हिंदी अनुवाद प्रभात सिंह ने किया है।

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लघु-कथा: काकी - सियारामशरण गुप्त

लघु-कथा: काकी – सियारामशरण गुप्त

श्यामू की काकी चली गयी थी। लोग कहते थे वो रामजी के पास गयी थी। श्यामू ने सोच लिया था वो काकी को बुलाकर रहेगा। उसके पास एक तरकीब जो थी।

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कहानी: काई - रांगेय राघव

कहानी: काई – रांगेय राघव

डॉ लक्ष्मण की बातों से सुधा प्रभावित थी। वहीं हरिशचंद्र को वह अपने दोस्त की तरह देखती थी। यह तीनों ही आपस में कई मुद्दों पर बातचीत किया करते थे। यह मुद्दे क्या था? इन बातों का क्या नतीजा निकलता था? जानने के लिए पढ़ें रांगेय राघव की यह कहानी ‘काई’:

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