संस्मरण: क्रिकेट मैच – आलोक सिंह खालौरी

संस्मरण: क्रिकेट मैच - आलोक सिंह खालौरी

साल था 1989 का और महीना था मई का। शरीर को जला डालने वाली गर्मी पड़ रही थी। मैं अपने सभी मित्रो से हाथ जोड़ कर निवेदन कर चुका था कि कोई भी हाल फ़िलहाल शादी न करे फिर भी अगर कर ही रहा है तो मुझे निमंत्रण ना दे और सामाजिकता का निर्वहन करने के लिए निमंत्रित करे भी तो मुझसे बारात में चलने की आशा ना रखे।

उस साल सड़ी गर्मी पड़ रही थी और आज के विपरीत उस समय में अधिकांशतः कारे एयरकंडीशंड नहीं होती थी और ना ही घरों में आज की तरह एसी ठुके पड़े थे, लिहाजा गर्मी से बचने का एकमात्र उपाय चुपचाप घर में कूलर चला कर पड़े रहना ही था। हम भी उस साल इसी उपाय को अपना रहे थे अलबत्ता सुबह छह से दस के बीच क्रिकेट मैच अवश्य खेल लेते थे। क्रिकेट मैच को तो खैर हम दोपहर में भी खेल सकते थे, उन दिनों क्रिकेट मेरे लिए कुछ अलग ही मायने रखता था।

उन्हीं दिनों में से किसी दिन दोपहर के तीन बजे मेरे चाचा का लड़का शैलेश चंडीगढ़ से आया। छह फिट चार इंच का क़द और 115 किलो वजन वाला शैलेश वैसे तो बहुत तगड़ा ही था पर उस दिन मुझे कुछ ज्यादा ही तगड़ा लगा।

“क्या बात! बहुत तगड़ी बॉडी बना ली,” मैंने हँसकर कहा।

वो मुस्कुराया और मेज पर रखी दो लीटर वाली पानी की भरी बोतल उठाकर मुँह से लगाई और खाली कर दी।

“बहुत गर्मी है आज,” मैंने उसे ऐसे पानी पीते देखकर कहा।

शैलेश कुछ बोला तो नहीं पर अपनी कमीज उतारने लगा।

“कमीज उतार कर कूलर के आगे बैठ जा,” मैं बोला।

शैलेश ने कमीज तो उतार दी पर ऊपरी जिस्म अनावृत ना हुआ। मैंने आश्चर्य से उसकी तरफ देखा। कमीज के अंदर एक और कमीज पहन रखी थी उसने।

उसने दूसरी कमीज उतारी तो अंदर से तीसरी कमीज प्रगट हुई। तीसरी उतारी तो एक हाफ बाजू का स्वेटर दिखा। स्वेटर उतारा तो चौथी कमीज प्रगट हुई। उसने चौथी कमीज भी उतारी तो पाँचवी कमीज नुमाया हुई।

उसने पाँचवी कमीज उतारने का कोई प्रयास ना किया मतलब पाँचवी कमीज अंतिम थी। मेरा हैरत से बुरा हाल था इस सड़ी गर्मी में पाँच कमीज और एक स्वेटर?

पर अभी कुछ और होना था। कमीज उतारनी बंद हुई तो उसने पैंट उतारनी शुरू की। एक के बाद एक उसने चार पैंट उतार दी। बैड पर कपड़ो का ढेर लग चुका था।

“ इस सड़ी गर्मी में इतने कपड़े पहनने का क्या मतलब?” मैंने पूछ ही लिया।

“अरे अब चंडीगढ़ से यहाँ तक बैग लादे लादे घूमता? इससे बढ़िया मैंने एक के ऊपर एक कपड़े पहन लिए और मज़े से खाली हाथ हिलाता आ गया,” वो लापरवाही से बोला।

“मज़े से आ गया? इतने कपड़े पहन कर पूरी दोपहरी निकालने को तू मज़ा कह रहा है और वो भी बस की घिचपिच वाली भीड़ में?” मुझे यकीन नहीं आ रहा था उसकी बात पर।

“कुछ भी हो खाली हाथ चलने का मज़ा ही सबसे अलग है।”

“खैर, जो भी है अब आ गया तो सुबह विक्टोरिया पार्क में मैच खिला कर लाता हूँ, बढ़िया टूर्नामेंट चल रहा है।”

“सही है, चलूँगा खेलने,” वो सहमत हो गया।


अगले दिन सुबह छह बजे हम क्रिकेट ग्राउंड में पहुँच गये, किस टीम से हमारा मैच था उसके बारे में इतना कुछ तो याद नहीं अब पर इतना याद है टीम अच्छी थी वो।

मैंने शैलेश को टीम में रखने का प्रस्ताव रखा और एक खिलाड़ी को छोड़ सभी खिलाड़ी सहमत भी हो गये। असहमत होने वाला खिलाड़ी भी मात्र इस कारण असहमत था क्योंकि उसे पता था कि कोई भी नया खिलाड़ी आये जगह उसी को हटा कर बनेगी।

बहरहाल टॉस हुआ, टॉस हम जीते और हमने बल्लेबाजी पहले करने का फैसला लिया।

मैं कप्तान तो ना था टीम का पर मेरी चलती ठीकठाक थी टीम में। क्यों चलती थी ये अब याद ना है पर चलती थी ये याद है। हमारी टीम में एक बाएँ हाथ का तेज़ गेंदबाज़ था। उम्र तो उसकी उन्नीस बीस साल ही थी पर शानदार गेंदबाज था इसमें कोई शक नहीं। नाम तो उसका दीपक था पर बाएँ हत्था गेंदबाज होने से उसका नाम हब्बू ही पड़ गया था।

यहाँ कहने में अतिश्योक्ति नहीं है पर वो वास्तव में वसीम अकरम का भारतीय संस्करण था। हालाँकि कुछ वर्षो बाद दीपक उर्फ़ हब्बू राजस्थान में पुलिस एनकाउंटर में मारा गया। कैसे एक प्रतिभाशाली खिलाड़ी और मृदुल स्वाभाव का लड़का इनामी बदमाश बन गया ये एक अलग कहानी है, पर फ़िलहाल वो तेज़ गेंदबाज़ की भूमिका में था और टीम में अपनी भूमिका का अच्छे से निर्वहन कर रहा था।

मेरा शुरू से मानना रहा है कि कैसी भी विकेट या परिस्थिति हो टॉस जीत कर आँख मींच कर बल्लेबाजी करनी चाहिए। पहले खेलना सदा पीछा करने से बेहतर होता है। विकेट ख़राब है तो समय के साथ और ख़राब होगा और अच्छा है तो फिर तो बल्लेबाजी करनी ही है। बहरहाल इसमें तर्क कितने भी दिए जाये पर हकीकत ये है कि बल्लेबाजी के प्रति एक स्वाभाविक लोभ रहता ही है। सामने वाली टीम पहले खेल कर कम स्कोर पर आउट हो जाए तो सही से बल्लेबाजी नहीं मिल पाती है। मुझे कभी टॉस जीत कर पहले गेंदबाजी चुनने की या पारी डिक्लेयर करने की बात समझ ही नहीं आयी। मैंने तो विपक्षी टीम को जी भर कर पिदाने को ही जीत माना।

ये भी बल्लेबाजी का लोभ ही था जिसने मुझे सलामी बल्लेबाज बनने को प्रेरित किया। क्या फायदा मध्यक्रम का बल्लेबाज बनकर अपने ही ड्रगआउट में बैठकर अपनी ही टीम के बल्लेबाजों के आउट होने की दुआ माँगते रहने से।

बहरहाल हमारी बल्लेबाजी शुरू हुई। मेरे आठ रनो के सहयोग से हमने पंद्रह ओवर में सात विकेट के नुकसान पर पेंसठ रन बना लिए। शैलेश को बस तीन गेंद खेलने को मिली। तीनों पर उसने भयंकर गति से बल्ला घुमाया। अगर गेंदबाज ने एक फुट भी गेंद बल्ले की तरफ कर दी होती तो अट्ठारह रन और बन सकते थे।

बहरहाल हमारी गेंदबाजी आयी। पहला ओवर हब्बू ने डाला। ओवर की सभी छह गेंद बल्ले का किनारा चूमने से चूक गयी। बहुत बढ़िया ओवर था पर विकेट ना मिला। दूसरा ओवर मैं ही करता था पर मैंने शैलेश को गेंद थमवा दी।

बल्लेबाज कोई सवा पांच फिट का नाजुक सी तंदुरस्ती का अट्ठारह बीस साल का लड़का था। हालाँकि मैंने उसे पहले खेलते हुए देखा था। बहुत ठोस बल्लेबाज था, थोड़ा धीमा था पर बहुत ठोस डिफेंस था उसका।

बल्लेबाज ने अनिश्चित भाव से शैलेश की तरफ देखा। उसकी हथेली में गेंद ऐसे लग रही थी जैसे हमारी हथेली में टेबल टेनिस की गेंद लगती।

शैलेश रनअप के नाम पर करीब करीब बॉउंड्री लाइन पर ही पहुँच गया।
अब बल्लेबाज की आँखों में भ्रम और भय एक साथ दिखने लगा था। उसे अपनी बल्लेबाजी पर यकीन रहा होगा पर जो उसकी आँखे देख रही थी उसे देखकर भय होना स्वाभाविक था। ये भय उस समय और बढ़ गया जब शैलेश ने रनअप पर दौड़ने से पहले टार्जन की तरह दोनों हाथों से अपने छाती पीटी और तीव्र सिंघनाद किया।

यहाँ मैंने बल्लेबाज की टाँगों में स्पष्ट कँपन देखा।

शैलेश पूर्ण गति से दौड़ा आ रहा था पर उसके दौड़ने में एक लय न होकर एक विक्षिप्तता सी थी और यही विक्षिप्तता बल्लेबाज को भयभीत कर रही थी।

जाने क्यों मुझे बल्लेबाज भाग जाने को आतुर लगा। शैलेश के हर कदम के साथ उसके पैर धीरे धीरे लेग स्टम्प के बाहर को जा रहे थे।

शैलेश स्टम्प पर पहुँचा और एक तेज चीख मारते हुए भयँकर उछाल मारी और ऊटपटाँग तरीके से भट्टा मार दिया। गेंद पाँचवी स्लिप की तरफ गयी और बमुश्किल थर्डमैन द्वारा रोकी गयी।

गेंद भट्टा थी और गति में 150 से कैसे भी कम नहीं थी। बल्लेबाज इतना भयभीत हो गया था कि वो भट्टा भी न देख पाया, अम्पायर से करीब पाँच फिट ऊपर से गेंद आई थी और वो खड़ा भी बिलकुल स्टम्प पर था लिहाजा देख वो भी ना पाया लेकिन बॉउंड्री लाइन पर बैठे विपक्षी टीम के खिलाड़ियों ने शोर मचा दिया।

बहरहाल अगली गेंद से पहले अम्पायर थोड़ा पीछे खड़ा हुआ, जिससे वो गेंदबाज के एक्शन को सही से देख सके। शैलेश ने दूसरी गेंद फेंकी जो हाथ के हाथ नो बॉल करार दे दी गयी। हमारे कप्तान ने भी भलीभाँति एक्शन देख लिया था लिहाजा शैलेश को गेंदबाजी से हटा दिया गया और उसका क्रिकेट कैरियर दो गेंदों पर सिमट गया।

बेशक उसने गेंदबाजी नहीं की पर उसने भय का वो वातावरण बना दिया था कि जीत अंततः हमारी ही हुई।

बतौर गेंदबाज शैलेश का कैरियर छोटा था पर प्रभावशाली था। काश वो हाथ पूरा घुमा पाता तो मैत्रीदत्त की बागी क्रिकेट टीम को अजेय भी बना सकता था।

समाप्त


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Author

  • आलोक सिंह खालौरी

    1 जुलाई 1967 को मेरठ के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्म। पिता न्यायाधीश थे। लिहाजा शिक्षा बड़ी घुमंतू किस्म से पायी। पिता के तबादलों के साथ-स्कूल भी बदलता रहा। राजा बलवंत सिंह कॉलेज, आगरा से स्नातक की उपाधि लेने के पश्चात मेरठ वापसी। पिता कानूनदाँ थे तो मेरठ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री लेकर स्वयं वकालत के रास्ते चले। पढ़ने का शौक कॉलेज के समय से ही रहा। कानून के अतिरिक्त हर विधा की किताबें पढ़ें का शौक है। पत्नी, बेटे और दो बेटियों के साथ मेरठ में ही निवास।

    उनसे alok68800@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

    अब तक दस से ऊपर उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उपन्यास अमेज़न, शब्दगाथा और साहित्य विमर्श की वेबसाईट  पर उपलब्ध।

    पुस्तक लिंक: अमेज़न | शब्दगाथा | साहित्य विमर्श

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