हर स्मृति मधुर नहीं होती – विनय प्रकाश तिर्की

‘द सिविल सर्पेंट्स’ के बाद ‘फ़ाइलों के नीचे दबा सत्य’ के रूप में लेखक विनय प्रकाश तिर्की अपना नवीन संस्मरण संग्रह लेकर पाठकों के समक्ष प्रस्तुत हुए हैं। ‘हर स्मृति मधुर नहीं होती’ ‘फ़ाइलों के नीचे दबा सत्य’ की प्रस्तावना के रूप में लिखा गया लेख है। यह लेख न केवल लेखक के बचपन के दिनों की एक झलक प्रस्तुत करता है बल्कि साथ में यह भी इंगित करता है कि पाठक प्रस्तुत पुस्तक से क्या उम्मीद कर सकता है। आप भी पढ़ें:


हिंदी और उर्दू के महान कथाकार प्रेमचंद ने कहीं लिखा है— “बचपन कितना ही कठोर क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं।” शायद अधिकतर लोगों के लिए यह बात सच भी है, क्योंकि समय की धूल बीते दुखों को ढँक देती है, और स्मृति अपने आप मिठास का पराग ले आती है, पर मेरे साथ ऐसा नहीं है। मेरे बचपन की कुछ स्मृतियाँ आज भी मीठी नहीं हैं। वे नुकीली हैं, जैसे किसी बिच्छू का डंक, जिनकी चुभन समय के साथ मद्धिम नहीं पड़ी, बल्कि जीवन के हर मोड़ पर फिर से महसूस होती रही है।

मुझे याद आता है, तब मैं तीसरी कक्षा में पढ़ता था। गाँव छोटा था, खेत-खलिहान जीवन का केंद्र थे। जब बाकी बच्चे छुट्टी के दिन पेड़ों पर चढ़ते, कंचे खेलते, लट्टू खेलते, या तालाब में कूद-कूदकर शोर मचाते थे, तब हम दो भाई अपने पिता की कठोर दिनचर्या में उलझे रहते। पिताजी का स्वभाव तेज़ और अनुशासनप्रिय था। उनके प्रेम में भी आदेश की कठोरता घुली रहती थी। जीवन भर उन्होंने अपने बच्चों को बेटा-बेटी कहकर नहीं पुकारा। उनके लिए ज़िम्मेदारी ही स्नेह का रूप थी और शायद स्नेह के प्रदर्शन को वे कमज़ोरी समझते थे।

छुट्टी के एक दिन उन्होंने मुझे मवेशियों को चराने भेज दिया। यह कोई नयी बात नहीं थी, पर उस दिन की हवा में कुछ अलग था। खेत में जहाँ कुछ दिन पहले उड़द की फसल उखाड़ी गई थी, वहाँ अब सूखी और हरी घास का एक मैदान सा पसरा था। सूरज ढलान पर था, हवा में मिट्टी और गोबर की मिली-जुली गंध थी। एक ऐसी गंध जो गाँव के जीवन की पहचान होती है। मवेशियाँ धीरे-धीरे चर रही थीं। पास ही कुछ अन्य बच्चे थे, जो मवेशियों की रखवाली के बहाने खेल में व्यस्त थे।

तभी एक कोने में मेरी नज़र ज़मीन में बने एक छोटे से बिल पर पड़ी। बचपन की जिज्ञासा तो जैसे मिट्टी की नसों में भी बहती है। मुझे याद आया, पहले भी हमने चुहियों के नन्हे बच्चों को पकड़ा था। वे छोटे-छोटे जीव, जिनकी आँखें तक नहीं खुली होती थीं, पूँछ पकड़कर हम खेलते थे, जैसे वे खिलौने हों। तब हमें यह नहीं पता था कि वे भी किसी माँ की गोद से छूटे मासूम हैं, जो शायद हमारी तरह ही किसी सुरक्षा की तलाश में थे।
हमारे पास हमेशा एक छोटी टंगिया रहती थी, खेती के काम की साथी, और बाल मन की खोज का औज़ार। मैंने उसी से धीरे-धीरे बिल की मिट्टी हटानी शुरू की। हर बार की तरह मैं भीतर छिपे किसी जीव की हलचल महसूस कर रहा था। पर इस बार मिट्टी के नीचे से जीवन नहीं, विष निकला।

अचानक मेरे दाएँ हाथ की तर्जनी में तीखी, जलती हुई पीड़ा उठी, जैसे किसी ने काट लिया हो।

मैंने देखा— एक भूरे रंग का बिच्छू अपने डंक को फैलाए बाहर निकल रहा था। वह बिच्छू बड़ा और ख़तरनाक था; गाँव के लोग कहा करते थे कि भूरे रंग का बिच्छू सबसे ज़्यादा ज़हरीला होता है। कुछ ही सेकंड में मेरी उँगली नीली पड़ गयी, और नसों में ऊपर तक सूजन फैलने लगी। मेरी नसों में जैसे आग दौड़ने लगी।

मेरे साथी बच्चे डर गये, पर कोई कुछ समझ नहीं पा रहा था। मैं काँपते हुए खेत के पास वाली कुआँ-बारी की ओर चल पड़ा, जहाँ पिताजी और उनकी नई पत्नी मतलब मेरी सौतेली माँ आलू खोद रहे थे। माँ को गुज़रे को तीन साल हो चुके थे, और अब यह नयी सौतेली ‘माँ’ घर में थी। वे हमारे लिए बस एक नाममात्र का साया थीं— न स्वर में गर्मी, न अपनापन। उनका चेहरा हमेशा भावहीन रहता, और हमारे लिए उनमें कोई माँ जैसा भाव कभी नहीं उपजा।

मैं डरते-डरते किसी तरह उनके पास पहुँचा, और मैंने लगभग रोते हुए कहा, “पिताजी, मुझे बिच्छू ने काट लिया…”

पिताजी ने मेरी ओर देखा तक नहीं। उन्होंने बस हाथ से मिट्टी झाड़ते हुए कहा, “तो मैं क्या करूँ?”

उनकी पत्नी, जो मेरी सौतेली माँ थीं, यह सुनकर ज़ोर से हँस पड़ीं— एक तेज़, ठंडी हँसी, जो मेरे भीतर कहीं गहरे उतरती चली गयी।

उस क्षण समय जैसे रुक गया था।

मैं कुछ बोल नहीं सका। मैंने सिर झुका लिया। मुझे लगा जैसे मैंने कोई अपराध किया हो— जैसे बिच्छू ने नहीं, मैंने खुद ही खुद को काटा हो।

कुछ देर बाद पिताजी ने कहा, “गाँव के बूढ़े रेएं के पास चले जाओ, वो दवाई दे देगा।”

बस इतना ही।

मैं भारी पाँवों से गाँव के उस बूढ़े आदमी के पास चला आया। वह एक अनुभवी किसान था, जिसके पास देसी इलाजों का ज्ञान था। गाँव के लोग उस बूढ़े आदमी के बारे में तरह-तरह की बातें करते थे। कोई कहता, वह झाड़-फूँक जानता है; कोई फुसफुसाकर बताता कि वह टोना‑टोटका करता है। उसकी झुर्रियों भरी आँखों में एक रहस्यमयी चमक थी, जिससे बच्चे सहम जाते थे और रास्ते में उसे देखते ही भाग खड़े होते। बच्चों के लिए वह किसी परीकथा के खलनायक जैसा था। झुर्रियों से भरा चेहरा, धँसी हुई आँखें और एक लंगोट में लिपटा शरीर। बच्चे तो क्या, कुछ बड़े-बूढ़े भी उससे भय खाते थे, मगर मेरे पास उसके पास जाने के सिवा कोई और चारा नहीं था। भय, जिज्ञासा और किसी गहरी विवशता के मिश्रण में, मैं उस दिन उसके टूटे हुए दरवाज़े के सामने जा पहुँचा, जहाँ सन्नाटा जैसे उसकी चौखट पर पहरा दे रहा था। उसने घर से सेमी के बीज निकाले, और उन्हें बीच से फाड़कर मेरे डंक वाले हिस्से पर चिपका दिया। कुछ देर में जलन कम हो गयी। दर्द धीरे-धीरे उतर गया। पर वह वाक्य— “तो मैं क्या करूँ?” उस दिन मेरे भीतर उतर गया था, जैसे ज़हर नसों में नहीं, मन में फैल गया हो।

आज पिताजी नहीं हैं, न ही वह स्त्री, जिसे लोग मेरी माँ कहते थे, पर वह दिन, वह खेत, वह डंक, और उससे भी ज़्यादा पिता की वह वाणी— “तो मैं क्या करूँ?” अब भी मेरे भीतर ज़िंदा है।

कभी-कभी शरीर का दर्द चला जाता है, पर रिश्तों का डंक नहीं जाता।

वह चुभन, वह अस्वीकार, वह संवेदना की अनुपस्थिति, वह जीवन का पहला सबक था कि पीड़ा का कोई भी श्रोता नहीं होता।

वर्षों बाद जब जीवन ने मुझे सरकारी गलियारों की चौखट पर पहुँचा दिया, तब समझ में आया कि उस बचपन की घटना और इस व्यवस्था में कोई बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं है। सरकारी तंत्र में भी वही ठंडापन है, वही उदासीनता है। यहाँ भी जब कोई निर्दोष व्यक्ति अपनी पीड़ा लेकर आता है— यह उम्मीद करते हुए कि कोई उसे समझेगा, न्याय देगा, तो उसे लगभग वही उत्तर मिलता है— “तो हम क्या करें?”

यह उत्तर किसी एक व्यक्ति का नहीं, पूरी व्यवस्था का चरित्र बन चुका है।

फाइलों के बीच दबी संवेदनाएँ, ठंडे चेहरों वाले बाबू, औपचारिक जवाबों के नीचे छिपी निष्ठुरता, सब मिलकर उसी स्वर को दोहराते हैं, जो मैंने कभी बचपन में अपने खेत में सुना था।

पिताजी का स्वभाव जैसे पत्थर सा था— कठोर, स्पष्ट और अडिग। उसमें न तो कोमलता के लिए जगह थी, न ही किसी प्रकार की ढील के लिए ही थी। शायद जीवन ने उन्हें ऐसा बना दिया था, या शायद परिस्थितियों ने उनके भीतर की संवेदनाओं को धीरे-धीरे पत्थर में बदल दिया था। हमारी माँ बहुत पहले ही इस दुनिया से विदा ले चुकी थीं। उनकी अनुपस्थिति हमारे जीवन में केवल एक खाली जगह नहीं थी, बल्कि एक स्थायी सन्नाटा था, जिसे कोई भी भर नहीं पाया— यहाँ तक कि पिताजी की दूसरी शादी भी नहीं।

हम तीनों— मैं, मेरा बड़ा भाई और हमारी बड़ी बहन एक ही कमरे में रहते, सोते, और अपने छोटे-से संसार को समेटे हुए थे। वह घर भी जैसे हमारे जीवन का ही प्रतिबिम्ब था— कच्चा, साधारण, और हर मौसम की मार को सहने के लिए अभिशप्त, पर यह स्थिति केवल हमारी नहीं थी। गाँव के सभी मकान कच्चे ही थे। मिट्टी का फर्श, जिस पर चटाई बिछाकर हम सोते थे, हमें ठंडक भी देता था और एक अजीब-सी असुरक्षा का अहसास भी बराबर देता रहता था। रात होते ही घर केवल अँधेरे में नहीं डूबता था, बल्कि अनदेखे खतरों के साये में भी घिर जाता था। साँप और बिच्छू हमारे लिए कहानियों के जीव नहीं थे, बल्कि रोजमर्रा की आशंका थे। हम दरवाज़े को भीतर से बंद करते, और उसके नीचे जो छोटा-सा छेद होता, उसमें कपड़े या लकड़ी का टुकड़ा ठूँस देते। एक तरह से उस छोटे से उपाय से हम अपने भय को भी बंद कर देते।

पिताजी की एक आदत थी— अचानक नींद खुलते ही वे दूसरे कमरे से जोर से पुकारते, “विनय… कलदियुस…!”

उनकी आवाज़ में एक ऐसा आदेश होता, जिसे टाला नहीं जा सकता था। मेरा बड़ा भाई कभी-कभी अनसुना कर देता, कुछ पल के लिए अपने बचपन को बचाने की कोशिश करता, लेकिन जैसे ही मेरा नाम लिया जाता, मैं झट से ‘हाँ’ कहते हुए उठ बैठता, मानो मेरे भीतर कोई अदृश्य अनुशासन पहले से ही स्थापित हो।

कभी-कभी ऐसा भी होता कि पिताजी की नींद नहीं खुलती, और तब उनकी वह परिचित पुकार भी नहीं सुनाई देती। उन दिनों एक अज़ीब‑सा भय भीतर सरक आता था, मानो उनकी आवाज़ के बिना सुबह अधूरी हो। कई बार तो डर के मारे मेरी नींद अपने-आप खुल जाती, और कभी यदि देर हो जाती, तो मन और भी सशंकित हो उठता।

ऐसी ही कई सुबह, मैं चुपके से बड़े भैया को जगाता। हम दोनों बिना कोई आहट किए, दबे पाँव बैलों की कोठी की ओर बढ़ते। वहाँ पहुँचकर मैं सावधानी से दरवाज़े में अटका हुआ बाँस हटाता, और फिर बहुत ही धीरे से बैलों को हल्का-सा धक्का देकर बाहर निकालता— जैसे किसी गुप्त काम को अंजाम दे रहे हों। हमारी पूरी कोशिश होती थी कि पिताजी को भनक तक न लगे कि आज हम देर से उठे हैं। फिर हम दोनों, बिना कुछ कहे, बैलों को हाँकते हुए खलिहान की ओर चल पड़ते— उस सुबह की निस्तब्धता में, अपने छोटे-से भय और ज़िम्मेदारी को साथ लिए हुए।

सुबह का अँधेरा पूरी तरह छँटा भी नहीं होता था कि हमें बैलों को लेकर खलिहान जाना होता। यह जिम्मेदारी उन बच्चों की नहीं थी, जिनकी उम्र अभी खेल और नींद के बीच झूलती हो, पर हमारे हिस्से में वही आयी थी। हम बैलों को बाड़े से निकालते और उन्हें लगभग डेढ़ किलोमीटर दूर खलिहान तक ले जाते। गाँव के अन्य बच्चे उस समय गहरी नींद में होते या अपने सपनों में खोए रहते, लेकिन हमारे दिन की शुरुआत श्रम से होती थी।

पुआल खिलाने के बाद हम हल पकड़ते, छोटे-छोटे हाथों में एक बड़ा दायित्व था। मिट्टी को चीरते हुए हम अपने बचपन को भी जैसे कहीं पीछे छोड़ते जाते। लगभग एक या डेढ़ घंटे तक खेत में काम करने के बाद, हम सब कुछ अधूरा छोड़कर स्कूल की ओर दौड़ पड़ते। पाँच किलोमीटर दूर स्थित स्कूल तक पहुँचना अपने आप में एक संघर्ष था। रास्ते में दूसरे बच्चे हमसे आगे निकल चुके होते, पर हम दौड़ते हुए उन्हें पकड़ लेते, जैसे जीवन की दौड़ में भी पीछे न छूटने का कोई अदृश्य संकल्प हमारे भीतर था।

छोटानागपुर की धरती पर खेती केवल आजीविका का साधन नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ मनुष्य के गहरे संवाद की एक जीवित परम्परा है। यहाँ की मिट्टी, यहाँ का पानी और यहाँ के लोगों का अनुभव तीनों मिलकर एक ऐसी कृषि-संस्कृति रचते हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही है। इन्हीं परम्पराओं में गीले खेतों में गर्मियों के दिनों में ही धान की बुवाई कर देने एक विशेष परम्परा रही है। गर्मियों की तपती दोपहरी में जब अधिकांश खेत सूखेपन की ओर बढ़ते प्रतीत होते हैं, तब छोटानागपुर के कुछ खेत ऐसे भी होते हैं, जिनमें नमी बनी रहती है, मानो धरती ने भीतर ही भीतर जल को संजो रखा हो। इन्हीं ‘गीली’ या ‘निचली’ भूमि वाले खेतों में किसान समय से पहले धान की बुवाई कर देते हैं। यह केवल एक तकनीक नहीं, बल्कि अनुभव और विश्वास का संगम है। लोकमान्यता है कि यदि बरसात आने से पहले ही इन खेतों में धान बो दिया जाए, तो पौधे को बढ़ने के लिए अधिक समय मिलता है। परिणामस्वरूप, उसकी डालियाँ अधिक निकलती हैं, और जब बालियाँ आती हैं, तो वे भी घनी और भरपूर होती हैं। यह विश्वास केवल अंधश्रद्धा नहीं, बल्कि वर्षों के निरीक्षण और परिणामों से उपजा एक व्यावहारिक ज्ञान है, जिसे किसानों ने अपनी आँखों से परखा है। इसके पीछे एक और यथार्थ भी छिपा है, कि बरसात के मौसम में ऐसे खेतों में काम करना आसान नहीं होता। पानी से लबालब भरे, कीचड़ से सने ये खेत श्रम को कई गुना बढ़ा देते हैं। रोपाई करना तो दूर, खेत में खड़ा रहना भी एक चुनौती बन जाता है। ऐसे में किसान पहले ही, गर्मी के दिनों में, जब पानी नियंत्रित और श्रम अपेक्षाकृत सहज होता है, धान बो देना बेहतर समझते हैं। यह निर्णय केवल परंपरा का पालन नहीं, बल्कि परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाने की एक सूझबूझ भरी रणनीति है।

इस तरह बरसात के पहले दिनों में हमारे हिस्से में धान की रखवाली की एक और ज़िम्मेदारी आती। हमारा एक खेत दूसरे गाँव में था, लगभग पाँच किलोमीटर दूर। उस खेत के बीच एक डबरी थी, जिसमें साल भर पानी भरा रहता। वही पानी गाँव के मवेशियों की प्यास बुझाता, और वहीं पर लोग अपनी दैनिक निस्तारी की ज़रूरतें भी पूरी करते। पिताजी भी उस खेत में गर्मी के दिनों में ही धान बो देते थे। उस गीली मिट्टी में उगती फसल को बचाने के लिए पहरा देना ज़रूरी था, लेकिन उस पहरेदारी में केवल ज़िम्मेदारी नहीं थी— वह भय से भरा एक अकेलापन था।

हमारे गाँव से दो किलोमीटर दूर एक छोटी-सी नदी पड़ती थी, जिसे झरिया कहा जाता था। उसके पास एक सरना स्थल था— आदिवासियों का पवित्र उपवन, जहाँ पूर्वजों की आत्माओं का निवास माना जाता था। उस स्थान से गुज़रते हुए कदम अपने आप धीमे पड़ जाते। हवा की सरसराहट, पत्तों का गिरना, या किसी छोटे जीव की हलचल— सब कुछ एक अदृश्य भय में बदल जाता। कभी-कभी मैं वहीं ठिठक जाता। दिल की धड़कनें इतनी तेज़ हो जातीं कि लगता, मानो वे भी किसी को सुनाई दे जाएँगी। फिर अचानक साहस जुटाकर मैं उस जगह से भाग निकलता— जैसे अपने ही डर से पीछा छुड़ा रहा हूँ। शाम को लौटते समय वह भय और गहरा हो जाता। अँधेरा धीरे-धीरे धरती को निगलता, और हर छाया एक शक्ल लेने लगती। हम जल्दी घर पहुँचना चाहते थे, लेकिन जल्दी पहुँचना भी एक नयी मुसीबत को न्योता देना था जो पिताजी के गुस्से के रूप में वहाँ पर विद्यमान होती थी। इसलिए हम गाँव की सीमा पर ही रुक जाते। हम थोड़ा और अँधेरे के गहराने का इंतजार करते, और फिर घर लौटते— डर के दो पाटों के बीच पिसते हुए से।

एक दिन की घटना आज भी मेरी स्मृतियों में जैसे उकेरी हुई है। उस सुबह पिताजी ने मुझे अकेले ही खेत की रखवाली के लिए भेजा। अभी चारों ओर अँधेरा पसरा था। मैं डरते-डरते आगे बढ़ रहा था कि अचानक एक तीखी फुफकार ने मेरे कदम रोक दिए। वह आवाज़ इतनी पास थी कि लगा, जैसे मृत्यु ने मेरे कान में चेतावनी दी हो। मैं बिलकुल स्थिर खड़ा रह गया। साँसें थम-सी गयीं। मुझे अहसास हो गया था कि मेरे आसपास कोई नाग है— बस एक कदम और, और शायद मेरा जीवन वहीं समाप्त हो जाता। कुछ क्षणों के बाद, मैंने पूरी ताकत से वहाँ से दौड़ लगा दी। वह दौड़ केवल शरीर की नहीं थी, बल्कि वह जीवन जीने की ओर दौड़ थी।

उस घटना के कुछ ही दिनों बाद हमारे गाँव में ही एक व्यक्ति की साँप के काटने से मृत्यु हो गयी। उस समय समझ में आया कि हम हर दिन किस ख़तरे के बीच जी रहे थे।
समय बीत गया है। जीवन ने कई मोड़ लिए हैं, पर जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो पिताजी की कठोरता एक सवाल की तरह सामने खड़ी हो जाती है। वह कठोरता कभी-कभी भीतर तक हिला देती है। पर उसी के साथ यह अहसास भी आता है कि शायद उन्हीं कठिनाइयों ने हमें गढ़ा है। और अंततः, एक विचार मन में ठहर जाता है कि उस कठिन बचपन से इस मुकाम तक पहुँचना केवल हमारे प्रयास का परिणाम नहीं था; कहीं न कहीं, यह हमारे अनुशासन का ही परिणाम था जिसे हमारे पिता ने सिखाया था, क्योंकि बिना माँ के बच्चों का जीवन कैसा होता है, यह कोई किताब नहीं बता सकती, इसे केवल वही समझ सकता है, जिसने उसे जिया हो।

पितृत्व और व्यवस्था, दोनों में एक समानता है। दोनों ही अपने आप को जवाबदेह नहीं मानते। वे शक्ति के स्थान पर खड़े होते हैं, और पीड़ा को ‘कमज़ोरी’ समझते हैं।

पिता अपने बेटे की पीड़ा में कमज़ोरी देखता है, और तंत्र निर्दोष की विनती में अपराध।
कभी-कभी सोचता हूँ, बचपन में जो बिच्छू ने काटा था, वह मात्र एक शारीरिक डंक था, पर सरकारी तंत्र ने जिस तरह निर्दोष को अपराधी बना दिया, वह मानसिक और सामाजिक डंक था। एक ने उँगली सुजा दी तो दूसरे ने मन। एक के ज़हर का इलाज था, दूसरे का नहीं। जब मैंने खुद को एक निर्दोष अभियुक्त के रूप में देखा, तब मेरे भीतर वही तीसरी कक्षा का बच्चा जाग उठा, जिसके पिता ने कहा था, “तो मैं क्या करूँ?” और अब वही शब्द न्याय के महलों से सुनाई दे रहे थे— “तो हम क्या करें?”

कानून के जाल में फँसे निर्दोष व्यक्ति की पीड़ा किसी बिच्छू के डंक से कम नहीं होती। वह भीतर ही भीतर जलाता है, पर बाहर से सब कुछ शांत दिखता है। वह व्यक्ति चीख नहीं सकता, क्योंकि उसकी हर चीख को ‘बयान’ कहा जाता है, और हर बयान को ‘सबूत’ में तौला जाता है। वह व्यक्ति रो नहीं सकता, क्योंकि व्यवस्था आँसू की भाषा नहीं समझती। वह चुप रह जाता है, ठीक वैसे ही जैसे मैं उस खेत में चुप रह गया था।

सरकारी तंत्र में भी हर किसी के हिस्से का एक ‘पिता’ होता है, जो अपने अधिकार के अहंकार में संवेदना से दूर हो चुका होता है। वह कहता है, “नियम यही है।” वह कहता है, “हम कुछ नहीं कर सकते।” और अंततः उसका हर उत्तर उसी एक वाक्य में सिमट जाता है— “तो हम क्या करें?”

कानून, दफ़्तर और अदालत— ये तीनों जगहें मिलकर उस बिच्छू के बिल की तरह हैं, जिनमें कोई देख नहीं पाता कि अंदर क्या छिपा है। जो भी पास जाता है, किसी न किसी रूप में डंक खाता है। फ़र्क बस इतना है कि बचपन के बिच्छू ने मुझे सचेत किया, और यह तंत्र बार‑बार यह एहसास दिलाता रहा कि निर्दोष होना भी अपराध हो सकता है।

आज जब मैं पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो पाता हूँ कि बचपन की वह घटना केवल एक निजी स्मृति नहीं थी, बल्कि एक प्रतीक थी— संवेदना और सत्ता के बीच की गहरी खाई का प्रतीक।

पिता का “तो मैं क्या करूँ” व्यवस्था के “तो हम क्या करें” में बदल गया है, और उस बीच, कहीं एक निर्दोष व्यक्ति अपनी मासूमियत का प्रमाण देने में जीवन के सबसे सुंदर वर्ष खो देता है।

शायद इसलिए यह पुस्तक ‘फाइलों के नीचे दबा सत्य’ केवल कानूनी संघर्ष की कथा नहीं है, यह मनुष्य की उस यात्रा की कहानी है, जिसमें बचपन का डंक और वयस्कता का अन्याय एक ही पीड़ा में मिल जाते हैं।

यह पुस्तक मेरे लिए आत्मकथा नहीं, आत्मालोचन है, जहाँ मैं यह समझने की कोशिश करता हूँ कि पीड़ा से बड़ा अपराध क्या है? मेरा खयाल है कि दूसरे की पीड़ा को न समझना ही सबसे बड़ा अपराध है। कभी-कभी मैं सोचता हूँ— अगर उस दिन पिता मेरे पास दौड़कर आते, मेरी उँगली पर मरहम लगाते, तो शायद मैं दुनिया को किसी और नज़र से देखता, पर उन्होंने नहीं किया, और शायद इसी कारण, जब मैंने सरकारी तंत्र की ठंडी दीवारों को छुआ, तो मुझे कोई अजनबीपन नहीं लगा, क्योंकि उस असंवेदनशीलता से मेरा पहला परिचय तो बचपन में ही हो चुका था।

आज भी जब किसी निर्दोष व्यक्ति को कानून की भूलभुलैया में उलझते देखता हूँ, तो मुझे वही खेत, वही बिल, वही बिच्छू याद आता है और भीतर से एक आवाज़ उठती है कि शायद हम सब किसी न किसी रूप में उस डंक के शिकार हैं। बस फ़र्क इतना है कि किसी के लिए वह बचपन की स्मृति है, और किसी के लिए जीवन का वर्तमान। किसी के लिए भी जीवन का वर्तमान तब सबसे कठिन हो जाता है, जब वह निर्दोष होते हुए भी व्यवस्था की निष्ठुरता का अभियुक्त बन जाता है। यह स्थिति केवल एक कानूनी संकट नहीं, बल्कि आत्मा को झकझोर देने वाला अनुभव होती है, जहाँ सत्य मौन रह जाता है और अन्याय मुखर हो उठता है। ऐसे समय में व्यक्ति केवल अपने निर्दोष होने का नहीं, बल्कि अपने अस्तित्व के अर्थ का भी प्रमाण देने को विवश हो जाता है।


किताब परिचय
हर स्मृति मधुर नहीं होती - विनय प्रकाश तिर्की | फ़ाइलों के नीचे दबा सत्य | संस्मरण

फाइलें जो दिखती तो काग़ज़ की हैं, पर असल में वे जीवन, संघर्ष और सच्चाइयों की कब्रगाह भी हो सकती हैं। ‘फाइलों के नीचे दबा सत्य’ उस दुनिया का पर्दाफाश करती है जहाँ न्याय का रास्ता काग़ज़ों के वजन से मापा जाता है, और एक साधारण मनुष्य की आवाज़ ‘अभी विचाराधीन’, ‘अगली कार्यवाही अपेक्षित’, जैसे शब्दों में गुम हो जाती है।

यह पुस्तक सिर्फ़ प्रशासनिक ढाँचे की कहानी नहीं है, बल्कि यह मनुष्यों की चुप्पियों, डर, प्रतिशोध, टूटे हुए विश्वासों और कभी न हार मानने वाले संघर्ष की दास्तान है।

लेखक ने उन सच्चाइयों को सामने रखा है जिन्हें अक्सर दफ़्तर की अलमारियों और फाइलों की धूल के नीचे जानबूझकर छिपा दिया जाता है।

यह किताब पढ़ते हुए पाठक महसूस करता है कि कभी-कभी सबसे बड़ा अपराध सत्य को न बताना नहीं, बल्कि उसे दबा देना होता है।

पुस्तक लिंक: अमेज़न

लेखक परिचय
विनय प्रकाश तिर्की

श्री विनय प्रकाश तिर्की, छत्तीसगढ़ में वरिष्ठ शासकीय अधिकारी हैं। श्री तिर्की समसामयिक विषयों में गहरी पकड़ रखते हैं। देश-विदेश घूम कर संस्कृतियों के गहन अध्ययन, उनकी सामाजिक सोच, राजनैतिक स्थितियों, उनकी परम्पराएँ और उनके पीछे की वजहों को जानने की उत्कंठा से प्रेरित श्री तिर्की, साल के दो माह, अपनी छुट्टियों में यायावर हो जाते हैं। अपनी इसी यायावरी प्रवृत्ति से संचालित श्री तिर्की ने 20 से अधिक देशों की यात्राएँ की हैं और अपने यात्रा संस्मरणों में इन्हें शामिल किया है।

छत्तीसगढ़ के आदिवासी बहुल जशपुर जिले के सुदूरवर्ती क्षेत्र से ताल्लुक रखने वाले श्री तिर्की ने जीवन में लम्बा सफर तय किया है, कड़े संघर्षों से तपकर उन्होंने वर्तमान सामाजिक स्वीकारोक्ति प्राप्त की है। श्री तिर्की ने शासकीय अधिकारी के रूप में लम्बे कार्यकाल में जो देखा, अपने आस-पास घटते घटनाक्रम से जो समझा, उन्हीं को शब्दों का रूप देने का प्रयास करते रहे, प्रारम्भ में शौकिया तौर पर किये जाने वाले इस कार्य को गम्भीरता तब मिली जब 1994 में उनके द्वारा भेजा लेख ‘डोडो की तरह विलुप्त होती बिरहोर जनजाति’ दैनिक नव भारत में प्रकाशित हुआ । इसके बाद तो श्री तिर्की लगातार देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते ही रहे। उनके इन्हीं लेखों का संग्रह ‘तलाश’ के नाम से प्रकाशित है। अपनी नवीनतम पुस्तक ‘द सिविल सर्पेंट्स’ में उन्होंने अपने प्रशासकीय जीवन के अनुभव के आधार पर नौकरशाही के वास्तविक चरित्र को उजागर किया है।


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