कहानी: माटी का प्यार – सुधा गोयल

कहानी: माटी का प्यार - सुधा गोयल

फोन की घंटी की आवाज़ सुनकर मिथिला ने हाथ का काम छोड़कर चोगा कान से लगाया। मम्मा शब्द सुनते ही समझ गयीं कि भूमि का फोन है। वे कुछ प्यार से कुछ खीज से बोलीं, “हाँ बता अब और क्या चाहिए?”

“मम्मा, पहले हालचाल तो पूछ लिया करो। इतनी दूर से फोन कर रही हूँ। आपकी आवाज़ सुनने की इच्छा थी। आप घंटी की आवाज़ सुनते ही मेरे मन की बात समझ जाती हो। कितनी अच्छी मम्मा हो आप।”

“अब मक्खनबाजी छोड़, मतलब की बात बता।”

“मम्मा, ललित के यहाँ से थोड़ी मूँगफली मँगवा लेना।” कहकर भूमि ने फोन काट दिया।

मिथिला ने अपने माथे पर हाथ मारा। सामने होती तो कान खींच कर एक चपत जरुर लगा देतीं। यह लड़की फ्लाइट पकड़ते-पकड़ते भी फरमाइश खत्म नहीं करेगी। फरमाइश करते समय भूल जाती है कि माँ की उम्र क्या है। माँ तो बस अलादीन का चिराग है, जो चाहे माँग लो।भैया भाभी दोनों नौकरी करते हैं। कोई और बाज़ार दौड़ नहीं सकता। अकेली माँ कहाँ-कहाँ दौड़े?

गोकुल की गजक, प्यारे का सोहन हलवा, सिकंदराबाद के कड़ाके, जवे ,कचरी, कूटू का आटा, मंगोड़ी, पापड़, कटहल का अचार और अब मूँगफली भी। कभी पूछेगी, “मम्मा,आप अभी भी बाजरे की गुड़वाली खिचड़ी बनाती हैं?”

सुनकर उनकी आँखें भर आती हैं। “तू अभी तक स्वाद नहीं भूली?”

“मम्मा जिस दिन स्वाद भूल जाऊँगी उस दिन अपनी मम्मा को और अपने देश को भूल जाऊँगी। ये यादें ही तो मेरा जीवन है,” भूमि कहती।

“ठीक है ज़्यादा भावुक मत बन। अब आऊँगी तो बाजरा गुड़ भी साथ लेती आऊँगी। वहीं बनाकर खिला दूँगी।” और उन्होंने आधा किलो बाजरा भी कूट छानकर पैक कर लिया है।

कितनी बार रेवड़ी गजक खाते समय भूमि ख्यालों में सामने आ खड़ी होती, “मम्मा सब कुछ अकेले‑अकेले खाओगी। मुझे नहीं खिलाओगी?”

“हाँ हाँ क्यों नहीं, ले पहले तू खाले,” और हाथ में पकड़ी गजक हाथ में ही रह जाती। ख़यालों से बाहर निकलती तो स्वंय को अकेले पातीं।झट भूमि को फोन लगातीं, “भूमि, तू हमेशा मेरे ख़यालों में रहती है और तेरी यादों में मैं। बहुत हो चुका बेटी। अब अपने देश लौट आ। तेरी बूढ़ी माँ कब तक तेरे पास आती रहेगी” कहते-कहते वे सुबकने लगीं।

“मम्मा, आप जानती हैं कि मैं वहाँ नहीं आ सकती। फिर क्यों याद दिला कर अपने साथ मुझे भी दुखी करती हैं?”

“अच्छा बाबा,अब नहीं कहूँगी। ले कान पकड़ती हूँ।अब अपने आँसू पोंछ लें।”

“मम्मा आपको मेरी आँखें दिखाई दीं?”

“बेटी के आँसू ही माँ की आँखों में आते हैं। तेरी आवाज़ सब कह देती है।”

“मम्मा आँसू पोंछ लिए मैंने। लेकिन इस बार जब तुम आओगी तो जाने नहीं दूँगी। यहीं मेरे पास रहना। बहुत रह लीं वहाँ।”

“ठीक है, पर तेरे देश की सौगातें तुझे कैसे मिलेंगी?”

“हाँ, यह तो सोचना पड़ेगा। अब आपको तंग होना नहीं पड़ेगा। हम भारत से ऑनलाइन शॉपिंग करेंगे। थोड़ा मंहगा ज़रुर पड़ेगा, पर कोई बात नहीं। आपकी बेटी कमा किसके लिए रही है। पता है मम्मा, यहाँ एक इंडियन रेस्तरां है करीब एक सौ पचास किलोमीटर दूर। जिस दिन भारतीय खाने का मन होता है वहाँ चली जाती हूँ। वहीं एक भारतीय शॉप से महीने भर का सामान भी ले आती हूँ।”

बेटी की बातें सुनकर मिथिला की आँखें भर आयीं। उन्हें लगा कि बिटिया भारतीय व्यंजनों के लिए कितनी तरसती है। पिज्जा बर्गर की संस्कृति में उसे आलू मूली के परांठे याद आते हैं। काश वे उसके पास रह पातीं और रोज़ बना बनाकर खिला पातीं।

पाँच साल हो गए यहाँ से गये हुए। लौटकर नहीं आयी। वे स्वंय दो बार हो आयी हैं। और अब फिर जा रही है। भूमि के विदेश जाने में वे स्वंय को ही दोषी मानती हैं। भूमि के विवाह को लेकर इतनी जल्दबाजी न मचातीं तो ये सब न होता। भूमि ने दबे स्वर में कहा भी था कि मम्मा थोड़ा सोचने का समय दो।

तब वे उबल पड़ी थीं, “तू सोचती रहना। वक्त हाथ से निकल जाएगा। सोचते-सोचते तेरे पापा चले गए, मैं भी चली जाऊँगी। अब नौकरी करते भी दो साल निकल गए। रिश्ता खुद चलकर आया है। लड़का सॉफ्टवेयर इंजीनियर है। तुम दोनों पढ़ाई में समान हो और परिवार भी ठीक-ठाक है। अब और क्या चाहिए?”

उत्तर में माँ की इच्छा के आगे भूमि ने हथियार डाल दिए क्योंकि वे हमेशा यही कहती थीं कि तूने किसी को पसंद कर रखा है तो बता, हम वहीं बात चलाते हैं । भूमि बार बार यही कहती कि माँ ऐसा कुछ भी नहीं है। आप जहाँ कहोगी चुपचाप शादी कर लूँगी।

भूमि ने माँ की इच्छा को सिर आँखों पर रखा। जो दरवाज़ा दिखाया उसी में प्रवेश कर गयी, लेकिन विवाह को अभी ठीक से दो महीने भी नहीं गुज़रे थे कि भूमि पर नौकरी छोड़कर घर बैठने का दबाव बनने लगा और जब भूमि ने नौकरी छोड़ने से इंकार कर दिया तो उसका चारित्रिक हनन कर मानसिक रुप से प्रताड़ित करना शुरु कर दिया।

छह महीने मुश्किल से निकल पाए। भूमि ने शादी को बचाए रखने की बहुत कोशिश की, पर नहीं बचा सकी। इसी बीच कम्पनी की ओर से छह माह के लिए टोरंटो (कनाडा) जाने का अवसर मिला। वह टोरंटो क्या गयी बस वहीं की होकर रह गयी और उसने तलाक के पेपर साइन करके भेज दिए।

“मम्मा, अब कोई प्रयास मत करना। इस मरे हुए रिश्ते को व्यर्थ ढोने से उतार कर एक तरफ़ रख देना ज्यादा ठीक लगा। बहुत जग हँसाई हो ली। मैं यहाँ आराम से हूँ। सारा दिन काम में व्यस्त रहकर रात को बिस्तर पर पड़कर होश ही नहीं रहता। मैंने सब कुछ एक दुस्वप्न की तरह भुला दिया है। आप भी भूल जाओ” भूमि ने कहा था।

वे बेटी से कुछ नहीं कह पाईं क्योंकि उसकी मानसिक यंत्रणा की वे स्वंय गवाह थीं। सोचा कि थोड़े दिन बाद घाव भर जाएँगे, फिर सब कुछ ठीक हो जाएगा। इसी उम्मीद को लेकर वे दो बार भूमि के पास गयीं। प्यार से समझाया भी, “सभी मर्द एक से नहीं होते बेटी। अपनी पसंद का कोई यहाँ देख ले। ऐसा जिससे अपना सुख‑दुख बाँट सकें। यहाँ विदेश में तू अकेली पड़ी है। मुझे हरदम तेरी चिंता लगी रहती है।”

“मम्मा, अब मुझे इस रिश्ते से घृणा हो गयी है। आप मुझे इस बारे में कुछ न कहें।”

विचारों को झटक कर मिथिला ने घड़ी की ओर देखा। छह बजने वाले हैं। कल की फ्लाइट है। पैकिंग थोड़ी देर बाद कर लेंगी। घर को बाहर से ताला लगा और झट रिक्शा पकड़ कर ललित की दुकान से एक किलो मूँगफली, मूँगफली की गजक, गुड़धानी और गोल गप्पे का मसाला भी पैक करा लायी।

बहू और विनय को आने में अभी एक घंटा बाकी है। तब तक रसोई में जा सब्ज़ी काटकर आटा भी गूँथ दिया। थकान होने लगी। मन हुआ पहले एक कप चाय बनाकर पीलें। फिर ध्यान आया कि बहू और विनय ये सामान देखेंगे तो हँसेंगे। पहले उस सामान को बैग में सबसे नीचे रख लें। चाय उन दोनो के साथ पी लेंगी।

बहू बेटा खा-पीकर सो गये। उनकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। वे बेटी के लिए ले जाने वाले सामान को रखने लगीं। ज़्यादातर सामान उन्होंने किलो-आधा किलो के पारदर्शी प्लास्टिक बैगों में पैक कराए हैं। ताकि कस्टम में परेशानी न हो और वे आराम से सामान चैक करा सकें। भूमि के लिए कुछ ड्रेसें और आर्टीफिशियल ज्वैलरी भी खरीदी है। उसे बड़ा शौक है।

सारा सामान दो बैगों में आया। अपना सूटकेस अलग। मन में संकोच हुआ कि विनय और बहू क्या कहेंगे। इतना सारा सामान कैसे जाएगा।जब से आतंकवादियों ने धमकी दी है चैकिंग भी सघन हो गयी है। भूमि ने कह दिया है कि मम्मा चिंता मत करना। अतिरिक्त भार का पेमेंट कर देना। और यदि खोलकर देखा तो…

उनकी इस सोच को अचानक ब्रेक लगा जब विनय ने पूछा, “मम्मा, आपकी पैकिंग पूरी है, कुछ छूटा तो नहीं? वीज़ा टिकट फॉरेन करेंसी सब सँभालकर रख ली।”

संकोच वंश नीची निगाह किये उन्होंने गर्दन हिलायी। अगले दिन गाड़ी में सामान रखकर पाँच बजे ही एअरपोर्ट की ओर चल पड़े। रात आठ बजे की फ्लाइट है। एक घंटा एअरपोर्ट पहुँचने में लग जाएगा। काफी समय सामान की चैकिंग और औपचारिकताएँ पूरी करने में निकल जाता है। इसी से दो घंटे पहले जाना पड़ता है। मिथिला रास्ते भर दुआ करती रही कि उसकी सघन चैकिंग न हो।

लेकिन सोचने के अनुसार सब कुछ कहाँ होता है। वही हुआ जिसका मिथिला को डर था। बैग खोले गये और रेवड़ी, गज्जक व दलिये के पैकेट देखकर कस्टम अधिकारी ने पूछा, “मैडम यह सब क्या है?”

अचानक मिथिला के मुँह से निकला, “ये जो आप देख रहे हैं यह इस देश का प्यार है, यादें हैं, सौगातें हैं। कोई इनके बिना विदेश में कैसे जी सकता है। मेरी बेटी पाँच साल में भी इनका स्वाद नहीं भूली है। यदि मेरे सामान का वजन ज्यादा है तो आप कस्टम ड्यूटी ले सकते हैं।”

मिथिला का उत्तर सुनकर कस्टम अधिकारी ने आँखों से इशारा किया और वह अपने बैगों को लेकर बाहर निकलने लगी। तभी मन में विचार कौंधा कि कस्टम अधिकारी भी मेरी बेटी की तरह अपने देश को प्यार करता है। तभी मुझे यों जाने दिया।

हालाँकि न तो भार अधिक था और न उनके पास ऐसा कोई आपत्तिजनक सामान था जिस पर कस्टम अधिकारी को एतराज़ होता। उन्होंने सारा सामान माप के अनुसार पैक किया था। बैग खोलकर एक रेवड़ी का पैकेट निकाला और दरवाज़े से ही अंदर मुड़ीं। बोलीं, “सर,एक माँ का प्यार आपके लिए भी। इंकार मत करिएगा।” यह कहते हुए मिथिला ने पैकेट कस्टम अधिकारी की ओर बढ़ा दिया।

“थैंक यू मैडम,” कहकर अधिकारी ने पैकेट पकड़ा, आँखों से लगाया और चूम लिया। मिथिला मुस्करा पड़ी।


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Author

  • सुधा गोयल

    जन्म: 8 अप्रैल 1948

    लेखिका सुधा गोयल की चालीस से ऊपर किताबें प्रकाशित हैं। उपन्यास, कहानी, व्यंग्य, कविता, बालगीत उन्होंने लिखे हैं। वह बुलंदशहर में रहते हुए साहित्य सृजन कर रही हैं।

    प्रकाशित रचनाएँ:
    कविता संग्रह: '
    रिश्तों का सफर'
    उपन्यास: '
    स्मृतिपर्व', 'सॉरी सुदर्शना', 'प्रश्नों की नागफनियाँ', 'भ्रण्मयी', 'पटाक्षेप', 'आभाव', 'माँ', 'खंडित विश्वास', 'भूमिजा' (पौराणिक)
    कहानी संग्रह: '
    वनवासिनी', 'रुक जाओ माँ', 'सच तो बस यही है' (पौराणिक), 'मुट्ठी भर प्यार', 'निन्नी तुम कहाँ हो', 'अपने हिस्से का सच', 'तुम्हारा गुनाहगार', 'संवासी और कहानियाँ', 'थैंक यू दादी माँ', 'ये लम्हे वे लम्हे'
    व्यंग्य संग्रह: '
    लक्ष्मी उवाच', 'नौ सौ चूहे खाय...'

    संपर्क:
    पता: २९०-ए, कृष्णा नगर,डा.दत्ता लेन , बुलंदशहर-२०३००१
    ई-मेल: sudhagoyal0404@gmail.com

     

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