धर्मवीर भारती पाठकों के बीच लेखक के रूप में ही विख्यात हैं पर ये भी सच है कि उन्होंने अपने जीवन का काफी हिस्सा पत्रकार और सम्पादक के रूप में बिताया था। ‘डॉ. धर्मवीर भारती की शख्सियत और पत्रकारिता’ में लेखक धर्मवीर भारती के पत्रकारीय जीवन को रेखांकित करने की कोशिश की गयी है। सुनील श्रीवास्तव, रवींद्र श्रीवास्तव और टिल्लन रिछारिया द्वारा इस पुस्तक का सम्पादन किया गया है। ‘रिश्ते बनाने और निभाने में बड़े माहिर रहे भारती जी’ इसी पुस्तक में संगृहीत लेख है जिसे कथाकार और वरिष्ठ रंगकर्मी अनीता गोपेश द्वारा लिखा गया है। आप भी पढ़ें:
पत्रकारिता का इतिहास संभवतः हमारे देश के स्वतंत्रता संग्राम के समानांतर ही माना जा सकता है। 1857 की स्वतंत्रता प्राप्ति के प्रयास के साथ जो लहर उठी, उसके प्रभाव को देश के कोने-कोने तक पहुँचाने के लिये हिंदी और उर्दू की जो पत्रिकाएँ निकलीं उनकी फेहरिस्त बहुत लम्बी है। कहने की ज़रूरत नहीं कि उनका प्रभाव पत्रकारिता की बेमिसाल धरोहर है। आज़ादी प्राप्ति के बाद जब समाज में परिवर्तन आने लगे तब पत्रकारिता के उस स्वरूप ने भी अपना कलेवर बदलना शुरू किया। ऐसे में पत्रकारिता के मंतव्य बदले और पत्रिकाएँ भी बदलने लगी। उनमें से कुछ पत्रिकाएँ बंद हो गयीं, तो कुछ नयी पत्रिकाओं का उद्भव हुआ। हमारी पीढ़ी ने जिस काल में होश सँभाला वह दशक 60-70 का, आज़ादी के बाद देश के विकास और समाज के नये स्वरूप को गढ़ने के सपनों का था। समाज जैसे-जैसे बदल रहा था, पत्र-पत्रिकाएँ भी वैसे ही बदल रही थीं। उस समय जो पत्रिकाएँ घर-घर में पढ़ी जा रही थी उनमें धर्मयुग, साप्ताहिक हिंदुस्तान, दिनमान, सारिका, कादम्बिनी, नवनीत, नंदन, पराग, चंदामामा आदि प्रमुख थीं। स्टेशनों के बुकस्टॉलों पर भी ये पत्रिकाएँ सहज ही उपलब्ध होती थीं। इन सभी साप्ताहिक पत्रिकाओं में ‘धर्मयुग’ की लोकप्रियता अप्रतिम और बेजोड़ थी। निश्चय ही इसका श्रेय तत्कालीन साहित्यिक परिदृश्य से, पत्रकारिता में आए डॉ. धर्मवीर भारती को जाता है। उनके पास अपने समय के समाज की संवेदना और अपेक्षाओं को पकड़ने और उससे अपने सम्पादकत्व को धार देने की गहरी समझ थी। उनके सम्पादन में ‘धर्मयुग’ ने समाज के विविध वर्गों के बीच जो लोकप्रियता हासिल की वह आज भी किसी और पत्रिका को हासिल नहीं है।
उनकी इस दृष्टि और समझ के विकसित होने की प्रक्रिया को उनके जीवन के विविध सोपानों से गुज़रने के क्रम में देखा और समझा जा सकता है। ये तय है कि उसका प्रस्थान-बिंदु इलाहाबाद और इलाहाबाद का तत्कालीन ऊर्वर परिदृश्य को था।
‘परिमल’ का गठन
भारती जी ने जब साहित्यिक दुनिया में प्रवेश किया, तब इलाहाबाद हिंदी का केंद्र बिंदु था। पंत, महादेवी, रामकुमार वर्मा, बच्चन, फिराक, निराला, उपेंद्रनाथ अश्क, नरेश मेहता, शमशेर बहादुर सिंह, रसाल जी, अज्ञेय, इलाचंद्र जोशी, रघुवंश, राम स्वरूप चतुर्वेदी, कमलेश्वर, दुष्यंत कुमार, मारकंडेय, नरेंद्र शर्मा, केशवचंद्र वर्मा, विजयदेव नारायण साही, विपिन कुमार अग्रवाल, जगदीश गुप्त, गोपीकृष्ण गोपेश और ऐसे ही कितने नामचीन साहित्यकारों से इस शहर का साहित्याकाश आच्छादित था। ऐसे में जन्मजात साहित्यिक अभिरूचि से लेस, युवा भारती ने साहित्यिक संसार में जब कदम रखा, तो इसके अनेक आयामों में सार्थक हस्तक्षेप करना शुरू किया। इतना कि इसे वरिष्ठ साहित्यकारों के बीच भी उन्हें अनदेखा न किया जा सका और उनकी अपनी एक जगह बनती गयी। साहित्यिक संस्था ‘परिमल’ का गठन हुआ, तब भारती के सुहृद मित्र और अतरसुइया वाले उनके आवास के नाते पड़ोसी गोपीकृष्ण गोपेश ने ‘परिमल’ की उनकी सदस्यता के लिये उनका नाम प्रस्तावित किया, जिसे उनके दूसरे मित्र बिशन नारायण टंडन के अनुमोदन पर स्वीकार कर लिया गया। अपने सहज, सरलता से जल्दी घुलमिल जाने वाले स्वभाव और स्तरीय लेखन के चलते वे जल्दी ही बहुत लोकप्रिय हो गये। उनके व्यक्तित्व की एक खास विशेषता यह थी कि वे जब किसी साहित्यिक व्यक्ति से जुड़ते तो उसके पूरे परिवेश और पारिवारिकता से जुड़ते थे। उनके परिचय को अंतरंगता और आत्मीयता की इस सीमा तक विस्तार देने के गुण ने कालांतर में उनकी पत्रिका से अनेकों रचनाकारों को जोड़ने में बहुत योगदान दिया। मेरे परिवार में भी उनका स्थान मेरी माँ के प्रिय मुँहलगे देवर का ही था। इस रिश्ते के सूत्रों को उन्होंने जीवन पर्यंत निभाया। भारती के स्वभाव में व्याप्त ये पारिवारिकता की चाह और उसमें घुले-मिले स्नेह के सम्पुट ने उनके जीवन में अनेक लेखकीय मित्रों का वृहद संसार बनाया, जिसे डॉ. पुष्पा भारती आज भी सहृदयता से निभाती हैं।
पत्रकारिता के सघन अनुभव
अपने शुरूआती आर्थिक तंगहाली के दिनों में भारती जी ने उस समय की विभिन्न पत्रिकाओं में काम किया। उसने उन्हें पत्रकारिता के सघन अनुभव दिये। पं.पद्मकांत मालवीय जी ने जब ‘अभ्युदय’ निकालना शुरू किया तब भारती जी ने उनके सहायक का दायित्व निर्वहन किया। पं. इलाचंद्र जोशी के सम्पादन में अपने ढंग का पहला और अकेला साप्ताहिक पत्र ‘संगम’ इलाहाबाद से छपना शुरू हुआ तब जोशी जी ने भारती को ही सहायक चुना।
भारती जी उसमें ‘साहित्यिक डायरी’ नाम से एक स्तम्भ नियमित रूप से लिखते थे। उस स्तम्भ में वे तात्कालिक घटनाओं पर अपनी टिप्पणी लिखते थे। इस पत्रिका के पूरे उत्तर भारत में बहुत लोकप्रिय होने में इस स्तम्भ का महत्वपूर्ण योगदान था। इसी तरह पूना से प्रकाशित होने वाली पत्रिका ‘राष्ट्रवाणी’ में स्तम्भ ‘जलते प्रश्न’ के बहुत सारे अंकों में भारती ने हिंदी साहित्य के विभिन्न मुद्दों पर खुलकर अपने विचार व्यक्त किये। इन आलेखों के चलते भारती के मौलिक व्यक्तित्व की सृजनात्मक एवं सकारात्मक छवि आकार लेती गयी। उनके गंभीर व्यक्तित्व की सघन छाप उत्तरोत्तर बढ़ती गयी।
साहित्य में उनके अवदान का एक महत्वपूर्ण सोपान बना ‘आलोचना’ और ‘निकष’ के सम्पादन में उनका सहयोग। ‘आलोचना’ पत्रिका राजकमल से प्रकाशित होने वाली महत्वपूर्ण पत्रिका साबित हुई जिसमें सम्पादन का दायित्व साही, रघुवंश और ब्रजेश्वर वर्मा के साथ भारती ने सफलतापूर्वक निभाया। इन सुधी साहित्यकर्मियों के सम्पादन काल में प्रकाशित ‘आलोचना’ के सभी अंक आज साहित्य में भी मील के पत्थर माने जाते हैं।
इन सभी पत्रिकाओं के सम्पादन कार्य ने निस्संदेह डॉ. धर्मवीर भारती को सम्पादन के अनुभवों से उत्तरोत्तर समृद्ध किया होगा, उन्हें पत्रिका प्रकाशित करने की प्रतिभा को निरंतर आकार दिया होगा जिसका प्रभाव उनके ‘धर्मयुग’ के सम्पादक पद को ग्रहण करते ही दृष्टिमान होने लगा।
‘टाइम्स ऑफ इंडिया’ ने जब उन्हें ‘धर्मयुग’ के सम्पादन के लिये बम्बई बुलाया, तो निःसंदेह उनकी इस पत्रकारिता के अनुभवों की विस्तृत चर्चा जानी-सुनी होगी। इसके बाद का सम्पादन का धर्म युगीन काल एक इतिहास है जिससे हम सब परिचित हैं।
अभी तक याद है ‘धर्मयुग’
मुझे याद है — घर में ‘धर्मयुग’ आने पर सबसे पहले उस पर कौन हाथ डाले — घर के सदस्यों में इसकी होड़ लगी रहती थी। साहित्यिक विषयों पर लेखों के अलावा उसमें समकालीन विषयों पर चर्चा, कहानी, कविता, हास्य-व्यंग्य, फिल्मी कोना, बच्चों के लिये ‘ढब्बू जी’ वाले कार्टून के अलावा पूरा एक पृष्ठ का मैटर यानी कि परिवार के हर सदस्य के लिये पत्रिका में एक अंश — अभी तक याद है ‘धर्मयुग’ में छपते धारावाहिक उपन्यास, कहानियाँ, संस्मरण, उत्सवों पर सजे विशिष्ट रंगीन पृष्ठ— होली, दीवाली, क्रिसमस कुछ भी छूटता नहीं था— उनके संपादन में निकलते ‘धर्मयुग’ में।
पत्रिका की सामग्री जुटाने में उनके पारिवारिकता से जुड़ने वाले गुण बहुत काम आते थे। छोटे-बड़े सभी लेखकों से वे व्यक्तिगत स्तर पर सम्पर्क स्थापित करते थे, ‘पत्रिका को उनसे क्या अपेक्षा है’ इस आशय की विशेष टिप्पणी के साथ ।
कवि-चित्रकार अजामिल उनके संदर्भ में अक्सर ये किस्सा सुनाते हैं, एक बार कवि श्री उमाकांत मालवीय बम्बई में भारती जी से भेंट करने गये तो अपने साथ नवोदित कवि अजामिल की कविताएँ लेते गए, ‘धर्मयुग’ में प्रकाशित करने हेतु अनुमोदन सहित भारती जी को देने। भारती जी ने ये कह कर वापस कर दिया कि “अजामिल से कहो, वे स्वयं अपनी रचनाएँ भेजे।” बाद में अजामिल जी ने जब उन्हें सम्पर्क किया तो भारती जी ने न सिर्फ उनकी कविताएँ ‘धर्मयुग’ में छापी बल्कि उनसे अपना व्यक्तिगत सम्बन्ध बनाया जो जीवन भर बना रहा।
भारती जी का नरम-गरम स्वभाव
अपनी ‘पत्रिका’ के लिये उपयुक्त रचना प्राप्त करने के लिये वे सही व्यक्ति से व्यक्तिगत स्तर पर सम्बंध साधते थे। रचनाओं के अस्वीकृत करने का तरीका भी उनका व्यक्तिगत स्पर्श लिये होता। इस सबके बावजूद यह तथ्य भी विदित है कि पत्रिका के सम्पादन में रचनाओं के चयन में वे अतिरिक्त दृढ़ निश्चयी और कठोर थे। जहाँ उनके सहृदय सम्पादक होने के प्रमाण स्वरूप बहुतों के पास उनके लिखे कार्ड अथवा पन्नों पर लिखे लम्बे पत्र आज भी सुरक्षित होंगे, वहीं कार्यालय में सहकर्मियों से काम कराने के कठोर, कुछ-कुछ तानाशाही रवैय्ये के किस्से भी कई लोगों के पास होंगे। कुछ ने तो उसके किस्से कहानियाँ भी लिखी जो बहुत मशहूर हुई। उस सब के बावजूद एक पत्रिका के सम्पादक के रूप में अनेकों पत्रिकाओं के लब्ध प्रतिष्ठित सम्पादकों की पंक्ति में डॉ. धर्मवीर भारती अलग ही दिखाई पड़ते हैं।
उनकी पत्रकारिता के काल में रचना के लिये उठाए गए कुछेक कदम तो ऐतिहासिक घटनाओं की तरह दर्ज हो गए हैं। जैसे बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में खुद मोर्चे पर जाकर वहाँ का यथार्थ विवरण ‘धर्मयुग’ में छापना । पं. विष्णुकांत शास्त्री ने, जो उस यात्रा में उनके साथ गये थे, भारती पर जो पुस्तक लिखी उसमें भारती जी के इस दुस्साहसिक कदम का विस्तार से वर्णन किया। आपातकालीन समय में उनकी लिखी कविता ‘मुनादी’ का लिखना एक साहसिक कार्य था। स्वयं जयप्रकाश नारायण इस कविता का पाठ अपनी सभाओं में मंचों से किया करते थे।
‘इलाहाबाद’ को छू-छू कर देखता रहा
कुल मिलाकर पत्रकारिता का जो स्वरूप उन्होंने ‘धर्मयुग’ के माध्यम से प्रतिपादित किया वैसा कोई दूसरा उदाहरण उनके बाद आज तक नहीं दिखता। कहने की जरूरत नहीं कि धर्मवीर भारती के व्यक्तित्व में उस किस्म की पत्रकारिता के बीज यहीं इलाहाबाद की गलियों‑सड़कों और आबोहवा में पड़े थे। वे जब इलाहाबाद को छोड़कर गये तो दोबारा यहाँ कभी लौट कर नहीं आये, पर ये सच है कि इलाहाबाद ने उनको अंत तक न छोड़ा। उनके इलाहाबाद से जुड़ाव का ये किस्सा स्वयं उन्होंने अपने मित्र केशव चंद्र वर्मा को सुनाया था, वह उन्हीं के शब्दों में —
“जब मैं बांग्लादेश में युद्ध के मोर्चे पर लिखने के लिये वहाँ जा रहा था तब मेरे आगे सामान से लदा एक ट्रक खड़ा हुआ दिखा, जिस पर ‘मुट्ठीगंज, इलाहाबाद’ लिखा हुआ था। मैं अपनी गाड़ी से उतर कर एकांत में जा कर उसे लिखे हुए ‘इलाहाबाद’ को छू-छू कर देखता रहा। मेरी आँखों से झर-झर आँसू बहते रहे।”
फिलहाल, धर्मवीर भारती की पत्रकारिता का अपना एक अलग स्वरूप था वह आने वाले समय में एक महत्वपूर्ण पाठ की तरह याद किया जाता रहेगा।
(यह लेख इधर प्रकाशक की अनुमति से प्रकाशित किया जा रहा है।)
पुस्तक विवरण:

साहित्य के क्षेत्र में धर्मवीर भारती की लोकप्रियता आज भी कायम है। युवाओं के बीच उनके उपन्यास ‘गुनाहों का देवता’ और ‘सूरज का सातवाँ घोड़ा’ खासे चर्चित रहे हैं। डॉ भारती का कथाकार रूप उनके पत्रकार रूप पर अधिक हावी रहा है, लेकिन यह भी सच है डॉक्टर धर्मवीर भारती ने साहित्य की जितनी सेवा की है उससे काफी लंबे समय तक पत्रकार और संपादक के रूप में पत्रकारिता की है। उनके व्यक्तित्व के इसी पहलू को उभारने का कार्य यह पुस्तक ‘डॉ. धर्मवीर भारती की शख्सियत और पत्रकारिता‘ करती है।
पुस्तक में पैंतीस के करीब अध्याय हैं, जिनमें आलेख, साक्षात्कार और संस्मरण मौजूद हैं जो कि डॉ. धर्मवीर भारती की शख्सियत और पत्रकारिता को रेखांकित करते हैं।
पुस्तक का सम्पादन रवींद्र श्रीवास्तव, सुनील श्रीवास्तव और टिल्लन रिछारिया द्वारा किया गया है।
पुस्तक लिंक: अमेज़न
