कहानी
हीरालाल एक कर्त्तव्यपरायण शिक्षक थे जो दिन रात अपने छात्रों की भलाई के लिए कार्य करना पसंद करते थे।
कलवारा के जिस स्कूल में वह हेड मास्टर थे उधर के लोगों के मानना था कि उस स्कूल की इमारत में भूतों का वास था। हालाँकि हेड मास्टर इसे कोरा अंधविश्वास मानते थे।
पर फिर कुछ ऐसा हुआ कि उनकी मृत्यु हो गई और उन्हें भूत बनकर विद्यालय में ही आना पड़ा। तब जाकर उन्हें पता चला कि लोग जो मानते थे वो कितना सही था। यही नहीं विद्यालय में मौजूद भूतिया टोली से भी वो दो चार हुए।
अब वो भूतिया मास्साब बन चुके थे। पर अब भी उनकी प्रवृत्ति वही थी जो जिंदा रहते हुए थी। भूत बनकर उन्होंने कुछ कार्य करने के फैसले लिए।
आखिर ये क्या कार्य थे? विद्यालय में मौजूद भूतिया टोली में कौन-कौन था? क्या भूतिया मास्साब अपने इरादे में सफल हो सके?
टिप्पणी
भूत प्रेत होते हैं या नहीं इसे लेकर सबकी अपनी अपनी धारणा होती है। कुछ लोग इन पर विश्वास करते हैं और कुछ इन्हें अंधविश्वास मानते हैं। असलियत क्या है ये तो कोई नहीं जानता लेकिन लेखकों ने भूतों को लेकर कई तरह के रोचक कथानक ज़रूर बुने हैं। कई बार उन्होंने अंधविश्वास मानकर कथानक बुने गये हैं और कई बार भूतों के अस्तित्व को मानते हुए कई तरह की फंतासी रची गयी हैं। प्रस्तुत उपन्यास भूतिया मास्साब भी ऐसा ही उपन्यास है जिसमें भूतों का अस्तित्व दिखाया गया है।
उपन्यास के केंद्र में हैं मास्टर हीरालाल जिन्होंने अपना जीवन बच्चों की भलाई के लिए समर्पित कर दिया है। रात दिन वह बच्चों की भलाई के विषय में सोचते रहते हैं। वह खुद भूत-प्रेत को अंधविश्वास मानते हैं। लेकिन फिर जब अचानक उनका देहांत हो जाता है तो वह पाते हैं कि वह भूत योनि में प्रवेश कर चुके हैं और अब उसी विद्यालय में अन्य भूतों के साथ मौजूद हैं जिसमें वह आजतक पढ़ाते आये हैं। भूत बनने के बाद उन्हें क्या‑क्या अहसास होते हैं? जीवन के विषय में उनकी कौन सी गलतफहमियाँ दूर होती हैं? भूत बनने के बाद वह किस तरह से विद्यालय के भूतों और विद्यालय छात्रों की मदद करते हैं? इन्हीं सब प्रश्नों के उत्तर पाठक को यह उपन्यास पढ़ने पर प्राप्त होते हैं।
कई बार हम अपने जीवन का उद्देश्य ही काम को मान लेते हैं और जीवन जीना भूल जाते हैं। मास्टर हीरालाल के अनुभवों को पढ़ते हुए पाठक को यह अहसास होता है कि ऐसा सोचना कितना गलत होता है। जो काम हमें लगता था हमारे बिना नहीं होगा वो होता है। हम जिस काम के लिए अपनी जरूरी चीजों को छोड़ते आये थे वह हमारे जाने के तुरंत बाद ही किसी और यूँ सौंप दिया जाता है जैसे हमारी उधर कोई ज़रूरत कभी थी ही नहीं। मास्टर हीरालाल को भी कई प्रसंगों के माध्यम से यह अहसास होते दिखता है। ऐसे में मुझे लगता है कि उपन्यास के ये अंश पढ़ते हुए पाठक खुद से कई सवाल करेगा और शायद अपने जीवन को बेहतर संतुलित तरीके से जीने की कोशिश करेगा।
चूँकि लेखक खुद शिक्षक हैं तो उनका यह अनुभव इस उपन्यास में झलकता है। भूतों और विद्यालय के छात्रों के रूप में रचे गये किरदारों के माध्यम से वह सरकारी विद्यालयों, आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों और शिक्षकों की कई मुश्किलों को पाठकों के सामने रखते हैं। शिक्षकों के बीच की आपसी राजनीति। भ्रष्ट शिक्षकों का बच्चों पर पड़ने वाला असर। यह सब इधर दिखता है। कई बार यह प्रसंग हास्य पैदा करते हैं तो कई बार आपका दिल पसीज जाता है। आप जानते हैं यहाँ भूतिया मास्साब तो मदद करने के लिए हैं लेकिन ऐसे कई मामले असल जीवन में होते हैं जहाँ इस तरह की पीड़ा भोग रहे पीड़ितों को कोई मदद नहीं मिल पाती है। उनके विषय में सोचकर आपको दुख होता है।
जैसे कि ऊपर बताया कि भूतिया मास्साब बच्चों की मदद करते हैं लेकिन यह मदद जिस तरह से दी गयी यह मुझे पसंद आया। इधर इतना ही कहूँगा कि आत्मनिर्भर होने पर लेखक ने अधिक ज़ोर रखा है जो कि मुझे पसंद आया। वहीं उपन्यास में लेखक ने महिला शक्ति को भी अच्छे से दर्शाया है। अक्सर आज भी लोग स्त्रियों को कम आँकते हैं। यह इधर भी होते दिखता है। पर कृति मैडम और बच्चियों की एक टीम द्वारा खलनायकों के मंसूबों पर पानी फिरते देखने में बहुत आनंद आता है और आपको संतुष्टि भी होती है। यह किस तरह होता है यह आप खुद ही पढ़कर जाने तो बेहतर होगा।
कलवारा विद्यालय में भूत तो हैं लेकिन इस कहानी के खलनायक भूत नहीं बल्कि इंसान ही हैं। व्यक्ति अपने स्वार्थ के चलते कैसे कई लोगों के भविष्य को दाँव पर लगा सकता है यह ‘जेलर’ और तेजपाल सर नाम के किरदार से दृष्टिगोचर होता है।
जेलर का मुख्य मकसद विद्यालय को तुड़वाना है। वह चाहता है विद्यालय उधर से हटाकर दूसरी जगह स्थानांतरित किया जाए। वह जानता है कि ऐसा होगा तो बच्चों को दिक्कत आएगी क्योंकि वह उतनी दूर पढ़ने नहीं जा पाएँगे। पर उसे इससे कोई लेना देना नहीं है। वह अपने मकसद को पाने के लिए कुछ भी कर सकता है। वह क्या क्या हथकंडे अपनाता है और भूतिया मास्साब कैसे स्कूल को बचा पाते हैं यह देखना रोचक रहता है। वहीं वह ऐसा क्यों चाहता है इसे जानने के लिए भी आप उपन्यास के पृष्ठ पलटते जाते हैं।
वहीं तेजपाल सर बच्चों से ज्यादा जेलर के हित को देखते हैं। तेजपाल सर के रूप में लेखक ने उन सरकारी शिक्षकों को दर्शाया है जिनके वजह से सरकारी शिक्षकों की बदनामी होती है। ऐसे शिक्षक आम हैं और अगर आप या आपके रिश्तेदार सरकारी स्कूलों में पढ़े हैं तो कई ऐसे शिक्षकों के चेहरे आपके जेहन में जरूर आने लगेंगे।
इनके अतिरिक्त भी कुछ और लोगों से स्कूल को बचाते हुए मास्साब नज़र आते हैं। बचाने के लिए वह अक्सर उन्हें डराकर भगाते हैं। यह जिस तरह से होता है वह प्रसंग रोमांचक बन पड़े हैं।
जैसे कि पहले ही बता दिया गया है कि कलवारा विद्यालय में इंसानों के अलावा भूत भी अच्छी खासी संख्या में मौजूद हैं। हरिया, टेढ़ा भूत, चचा भूत, बुढ़ऊ भूत और माई चुड़ैल उपन्यास में मौजूद भूत हैं। भूतिया मास्साब उपन्यास में बच्चों को ही सीख नहीं देते बल्कि इन भूतों को सीख देते नजर आते हैं। वहीं भूत भी मास्साब को काबिल भूत बनने की शिक्षा देते दिखते हैं। कई बार ये दृश्य हास्य पैदा करते हैं। इस उपन्यास में दर्शाये गये अधिकतर भूत शरारती जरूर है लेकिन मूलतः शरीफ ही हैं। कुछ बुरे भूत हैं लेकिन उनकी मौजूदगी उतनी नहीं थी। अच्छे भूतों द्वारा किये गये कार्य और शरारतें आपके चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं। यहाँ मौजूद हर एक भूत की अपनी कहानी और अपनी परेशानी है। मास्टर साहब कैसे इनकी परेशानी दूर करते हैं यह देखना रोचक रहता है। जीवन के मूल्य भी इस उपन्यास में एक प्रेत की कहानी के माध्यम से रेखांकित किया गया है। आजकल लोग अपना जीवन समाप्त करने से पहले थोड़ा भी नहीं सोच रहे हैं। ऐसे में लेखक का अपनी कहानी के माध्यम से इस चीज को रेखांकित करने का प्रयास करना मुझे विशेष तौर पर अच्छा लगा।
उपन्यास की भाषा सरल सहज है और 24 अध्याय में यह कहानी विभाजित है। कहानी शुरुआत से लेकर आपको अंत तक बाँध कर रखती है। यह आपको हँसाती है तो आपके मर्म को छूती भी है। उपन्यास में रहस्य के तत्व भी मौजूद हैं जो आपको उपन्यास के पृष्ठ पलटने पर मजबूर करते हैं। उपन्यास आपका मनोरंजन करने के साथ-साथ आपको सोचने के लिए भी काफी कुछ दे जाता है।
उपन्यास की कमी के खाते में एक ही चीज़ मेरी नजर में आयी। मुझे लगता है शैतानी भूत उपन्यास में लाए तो गए लेकिन उनका उतने अच्छे तरह से प्रयोग न हो पाया। मुझे लगता है शैतानी भूतों की उपस्थिति थोड़ा और अधिक उपन्यास में होती तो पाठक को अधिक मज़ा आता। मुझे लगता है तब मास्साब के विरुद्ध कुछ ऐसी शैतानी शक्तियाँ होती जिनसे पार पाना उनके लिए मुश्किल होता और इससे उपन्यास में रोमांच के तत्व बढ़ जाते।
अंत में यही कहूँगा कि प्रांजल सक्सेना का लिखा यह उपन्यास ‘भूतिया मास्साब’ मुझे बहुत पसंद आया। उपन्यास के अंत में यह इशारा किया गया है कि भूतिया मास्साब का काम आगे भी जारी रहेगा। उम्मीद है जल्द ही लेखक भूतिया मास्साब से वापस मिलवाएँगे। अगर आपने उपन्यास नहीं पढ़ा है तो इसे पढ़कर अवश्य देखिएगा।
पुस्तक: भूतिया मास्साब | लेखक: प्रांजल सक्सेना | प्रकाशक: फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस | पुस्तक लिंक: अमेज़न
