दैनिक जागरण द्वारा वर्ष 2026 की दूसरी तिमाही यानी अप्रैल से जून के बीच सबसे ज्यादा बिकने वाली किताबों की सूची जारी की जा चुकी है। कथा, कथेतर, अनुवाद और कविता श्रेणी में यह सूची जारी की गयी है। कथेतर श्रेणी में जिन पुस्तकों ने जगह बनाई है वह निम्न हैं:
जाति जनगणना – डॉ. लक्ष्मण यादव

पुस्तक विवरण
जाति जनगणना का सवाल सिर्फ़ आँकड़ों का सवाल नहीं है। यह सत्ता, संसाधन, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय का सवाल है। यह किताब इसी सवाल को इतिहास की गहराई, राजनीति की जटिलता और समाज की संरचना के साथ जोड़कर देखती है। डॉ. लक्ष्मण यादव की यह पुस्तक जाति जनगणना को किसी ख़ास दौर तक सीमित नहीं करती, बल्कि उसे मानव सभ्यता की शुरुआती गिनतियों से लेकर आज़ाद भारत की राजनीतिक बहसों तक फैले लंबे सामाजिक-सांस्कृतिक प्रवाह में रखती है।
प्रकाशक: अनबाउंड स्क्रिप्ट | पुस्तक लिंक: अमेज़न
काशी: सत्य ज्ञान और मोक्ष का संगल स्थल – पी नवीन कुमार

पुस्तक विवरण:
काशी का नाम तो सुना होगा, ये नाम नहीं सुना तो बनारस या वाराणसी तो सुना ही होगा यह सब एक ही जगह के नाम है। ऐसा कहा जाता है ये नगरी स्वयं महादेव ने बसायी है और ये उनके त्रिशूल पर टिकी हुयी है यही कारण है कि जब कभी भविष्य में पूरी सृष्टि प्रलय के प्रहार को सह रही होगी तब भी काशी ऐसी ही स्थिर, दृढ़ और चिरकाल तक वैसी ही बनी रहेगी जैसी आज है, प्रलय से बिल्कुल अछूती।
प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
महाराणा: सहस्त्र वर्षों का धर्मयुद्ध – डॉ. ओमेंद्र रत्नू

पुस्तक विवरण:
इस क्षणभंगुर अस्तित्व में यदि कोई तत्त्व स्थायी हैं तो वे हैं आत्मसम्मान तथा स्वतंत्रता। ये तत्त्व, बहुत मूल्य चुका कर प्राप्त होते हैं। मेवाड़ के महान सिसोदिया राजवंश ने अपने सुख, संपत्ति व जीवन का मूल्य चुकाकर ये तत्त्व हिंदू समाज को सहजता से दे दिए। एक सहस्त्र वर्षों तक अरावली में यायावरों का सा जीवन जीने वाले मेवाड़ के इन अवतारी पुरुषों के कारण ही भारत में आज केसरिया लहराता है।
यह पुस्तक उन महापुरुषों के प्रति हिंदू समाज की कृतज्ञता व्यक्त करने का एक प्रयास है। लेखक ने निष्पक्ष प्रामाणिकता से भारत के इतिहास के साथ हुए व्यभिचार को उजागर किया है । यह पुस्तक स्थापित भ्रांतियों को भंग करने के अतिरिक्त नई मान्यताओं को भी स्थापित करती है।
प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
रूह – मानव कौल

पुस्तक विवरण:
मैं जब इस किताब को लिखने, अपनी पूरी नासमझी के साथ कश्मीर पहुँचा तो मुझे वहाँ सिर्फ़ सूखा पथरीला मैदान नज़र आया। जहाँ किसी भी तरह का लेखन सम्भव नहीं था। पर उन ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर चलते हुए मैंने जिस भी पत्थर को पलटाया उसके नीचे मुझे जीवन दिखा, नमी और प्रेम। मैं कहीं भी बचकर नहीं चला हूँ। जो जैसा है में, जैसा जीवन मैं देखना चाहता हूँ, उसे भी दर्ज करता चलता हूँ। कभी लगता है कि मैं पिता के बारे में लिखना चाहता था और कश्मीर लिख दिया और जब कश्मीर लिखने बैठा तो पिता दिखाई दिए। मेरी सारी यादें वहीं हैं जब हम चीज़ों को छू सकते थे। मैं छू सकता था, अपने पिता को, उनकी खुरदुरी दाढ़ी को, घर की खिड़की को, खिड़की से दिख रहे आसमान को, बुख़ारी को, काँगड़ी को। अब इस बदलती दुनिया में वो सारी पुरानी चीज़ें मेरे हाथों से छूटती जा रही हैं। उन छूटती चीज़ों के साथ-साथ मुझे लगता है मैं ख़ुद को भी खोता चला जा रहा हूँ। आजकल जो भी नयी चीज़ें छूता हूँ वो अपने परायेपन की धूल के साथ आती हैं। मैं जितनी भी धूल झाड़ूँ, मुझे अपनापन उन्हीं पुरानी चीज़ों में नज़र आता है। लेकिन जब उनके बारे में लिखने बैठता हूँ तो यक़ीन नहीं होता कि वो मेरे इसी जनम का हिस्सा थीं।
—किताब की भूमिका से
प्रकाशक: हिन्द युग्म | पुस्तक लिंक: अमेज़न
मिथकों से विज्ञान तक: ब्रह्मांड के विकास की बदल – गौहर रज़ा

पुस्तक विवरण:
मानव ने सवाल पूछना और जवाब ढूँढ़ना कब शुरू किया पता नहीं, पर एक बार शुरू किया तो सवालों और जवाबों का सिलसिला कभी नहीं रुका। इन्हीं सवालों और जवाबों की तलाश ने मानव ज्ञान की हर शाख़ को जन्म दिया। मिथक, कहानियाँ, धर्म, दर्शन, अध्यात्म, दर्शन, विज्ञान―प्रश्नों के उत्तर की तलाश का ही नतीजा हैं। सवालों की इस भीड़ में दो बड़े सवाल थे : ब्रह्मांड की उत्पत्ति और जीव-जंतु और मानव की उत्पत्ति कैसे और क्यों हुई। इतिहास हमें ये बताता है की कैसे और क्यों पूछने में एक बुनियादी अंतर है। कैसे से शुरू होने वाले सवाल हमें विज्ञान की तरफ ले जाते हैं और क्यों से शुरू होने वाले सवालों की तलाश हमें अध्यात्म और धर्म की तरफ। यह किताब ब्रह्मांड और जीवन के विकास की बदलती कहानी के उदाहरण को दर्शाती हुई ‘विज्ञान’ की परिभाषा चिह्नित करने की एक कोशिश है। इतिहास के पन्ने पलटते हुए यह किताब बताती है कि विज्ञान को, अध्यात्म और धार्मिक ज्ञान को छुए बिना, और इनके बीच लकीर खींचे बिना, पारभाषित नहीं किया जा सकता। विज्ञान और धार्मिक ज्ञान में कई बुनियादी तरह के फ़र्क़ में से एक अहम फ़र्क़ ये है कि विज्ञान में पुराने सच को ग़लत साबित करने पर जश्न मनाया जाता है और धर्म में हमेशा के सच पर उंगली उठाने से संकट पैदा हो जाता है।
प्रकाशक: पेंगुइन रैंडम हाउस | पुस्तक लिंक: अमेज़न
प्रोफेसर की डायरी- लक्ष्मण यादव

पुस्तक विवरण:
यह किताब डायरी, नोट्स और टिप्पणियों की शैली में अपने समय की तफ्तीश करती है। इसमें समाज और राजनीति की बड़ी परिघटनाएं हैं तो इसके बीच बनते हुए एक प्रबुद्ध नौजवान की कहानी भी है। यह आज़मगढ़ के पिछड़े किसान परिवार में पैदा होता है। इलाहाबाद और दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ायी करता है। दशक भर से ज़्यादा दिल्ली के एक कॉलेज में अध्यापन करता है। उसके कंधों पर गरीब परिवार की अपेक्षाओं और अपने सपनों का वज़न है। वह अकेला है। वह असमंजस, असुरक्षा और अनिश्चितता से घिरा हुआ है। वह डरा हुआ है। मगर वह किताबों को नौकरी पाने का जरिया नहीं बनाता, उनसे अपने समाज को समझने का नज़रिया हासिल करता है। सत्ताएँ उसे डराती हैं तो वह डरने की बजाय दुस्साहसी होता जाता है। धीरे-धीरे उसकी समझ, दायित्वबोध और लोकप्रियता का दायरा बढ़ता जाता है। वह क्लास के छात्रों से सुदूर ग्रामीण लोगों तक का प्रोफ़ेसर बन जाता है। यह फिक्शनल है, क्योंकि इसमें संज्ञाएँ बदल दी गयी हैं. यह नॉनफ़िक्शन है, क्योंकि शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति, सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियाँ रत्ती-रत्ती सही हैं। इसमें इसमें कथा, संवाद और सटायर है तो वक्तृता और विश्लेषण की चमक भी।
प्रकाशक: अनबाउंड स्क्रिप्ट | पुस्तक लिंक: अमेज़न
इतिहास की थाली – अनिमेष मुखर्जी

पुस्तक विवरण
कोलंबस भारत नहीं आ सका, लेकिन उसके चक्कर में आलू आ गया और उस आलू ने हमारी आबादी को जिस रफ़्तार से बढ़ाया कि दुनिया देखती रह गई। ईसाई पादरी ‘क्रिसमस नहीं मनाएँगे’, कहते रह गए मगर बाज़ार ने उसे दुनिया का त्योहार बना डाला। कभी हीर और रांझे की प्रेम कहानी ने बासमती को अमेरिका की संपत्ति बनने से बचा लिया, तो कहीं परंपरा के नाम पर महिलाओं का पोषण ही रोक दिया गया। कभी एक फ़ास्टफ़ूड कंपनी ने कहा कि फ़ेमिनिस्ट होने का मतलब है खाना न पकाना, तो कभी केलों के व्यापार ने सरकारों को तानाशाह बना दिया। अगर अब्राहम लिंकन की वजह से बंबई को उसकी पावभाजी मिली, तो कोला कंपनियों ने खेल को धर्म और खिलाड़ियों को भगवान बनाया। रोटियों से क्रांति करने और नमक से सत्ता गिराने वाले देश में इतिहास की थाली इन तमाम घटनाओं के साथ-साथ, बिरयानी से लेकर 1947 के बँटवारे तक को एक नई नज़र से देखने की क्षमता देती है। क्योंकि हमारे हर निवाले में स्वाद के साथ-साथ इतिहास, व्यापार, संस्कृति, पहचान और साज़िशों की पूरी दुनिया छिपी होती होती है।
प्रकाशक: पेंगुइन रैंडम हाउस | पुस्तक लिंक: अमेज़न
पीपल की छाँव में – पीपल बाबा

पुस्तक विवरण
एक ऐसी पुस्तक है जो पर्यावरण, आध्यात्म और मानवीय संवेदनाओं को एक सूत्र में पिरोती है। यह केवल वृक्षों की कहानी नहीं, बल्कि उस गहरे संबंध की खोज है जो मनुष्य और प्रकृति के बीच सदियों से मौजूद है। इस पुस्तक में पीपल बाबा ने अपने जीवन के अनुभवों, संस्मरणों और विचारों के माध्यम से यह दिखाया है कि पीपल का वृक्ष केवल एक प्राकृतिक इकाई नहीं, बल्कि ऊर्जा, चेतना और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। भारतीय संस्कृति में इसकी विशेष महत्ता को लेखक ने आधुनिक दृष्टिकोण के साथ प्रस्तुत किया है। यह पाठकों को न केवल पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करती है, बल्कि उन्हें अपने भीतर और प्रकृति के साथ गहरे जुड़ाव को महसूस करने के लिए प्रेरित करती है।
प्रकाशक: पेंगुइन रैंडम हाउस | पुस्तक लिंक: अमेज़न
राष्ट्र निर्माण में आदिवासी – डॉ. जितेंद्र मीणा

पुस्तक विवरण
यह पुस्तक उनके लिए है: जो इतिहास को सिर्फ विजेताओं की कथा नहीं मानते जो भारत की सामूहिक स्मृति में आदिवासियों की उपस्थिति दर्ज करना चाहते हैं जो वैकल्पिक और समावेशी विमर्श की तलाश में हैं “इतिहास में किसी को नज़रअंदाज़ करना, वर्तमान में उसकी हिस्सेदारी छीनने का सबसे महीन तरीका होता है।” यह पुस्तक उसी ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध एक सशक्त हस्तक्षेप है- जो सदियों से भारत के आदिवासी समुदायों के साथ होता आया है। उत्तर से दक्षिण, पूरब से पश्चिम तक फैले इन समुदायों ने अंग्रेज़ी हुकूमत के खिलाफ सबसे शुरुआती और सबसे दीर्घकालिक विद्रोह किए, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास में उन्हें वह स्थान नहीं मिला जिसके वे अधिकारी थे। ‘राष्ट्र-निर्माण में आदिवासी’ सिर्फ एक इतिहास पुस्तक नहीं, बल्कि एक वैचारिक यात्रा है जो हमें भारत के भूले-बिसरे जननायकों से मिलवाती है। यह किताब पूछती है- क्यों आदिवासी विद्रोह, बलिदान और संघर्ष हमारी ऐतिहासिक चेतना का हिस्सा नहीं बन सके? लेखक डॉ. जितेंद्र मीणा इतिहास के प्रोफ़ेसर और सामाजिक विमर्शकार हैं। उन्होंने प्रमाणों और वैकल्पिक इतिहास दृष्टि से भारत के हर हिस्से से आदिवासी संघर्ष की बहुरंगी छवियाँ प्रस्तुत की है। यह पुस्तक न केवल पाठकों को एक भुला दिए गए इतिहास से जोड़ती है, बल्कि यह भी दिखाती है कि आदिवासी भारत के राष्ट्र-निर्माण में कैसे केंद्रीय भूमिका निभाते रहे हैं।
प्रकाशक: अंबाउंड स्क्रिप्ट | पुस्तक लिंक: अमेज़न
कतरनें – मानव कौल

पुस्तक विवरण
इस किताब के लेख और विचार काँच के टुकड़ों की तरह नाजुक और दिल को छू लेने वाले हैं, जो पाठक से सीधे संवाद करते हैं। इसे विचारों, यादों और भावनाओं के छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में लिखा गया है।
प्रकाशक: हिंद युग्म | पुस्तक लिंक: अमेज़न
अन्य पुस्तकें जिन्होंने विस्तृत सूची में जगह बनायी:
- सुपरकॉप अजीत डोभाल – महेश दत्त शर्मा | प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- नैनन में आन बान:शास्त्रीय संगीतज्ञों की आलापचारी – यतींद्र मिश्र | प्रकाशक: पेंगुइन रैंडम हाउस | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- आक्रांता क्रूरता और षड्यंत्र – रघु हरि डालमिया | प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- मेवाड़ एवं मराठों की सहस्त्र वर्षों की शौर्य गाथा – रघु हरि डालमिया/विवेक मिश्र | प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- रॉ सीक्रिट एजेंट – हर्षा शर्मा | प्रकाशक: प्रभात प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- ठाकुरबाड़ी – अनिमेष मुखर्जी | प्रकाशक: पेंगुइन रैंडम हाउस | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- जादूनामा: जावेद अख्तर – अरविंद मंडलोई | प्रकाशक: मंजुल पब्लिशिंग हाउस | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- लोग जो मुझमें रह गये – अनुराधा बेनीवाल | प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- तुम पहले क्यों नहीं आए – कैलाश सत्यार्थी | प्रकाशक: राजकमल प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न
- जितनी मिट्टी उतना सोना – अशोक पांडे | प्रकाशक: हिंद युग्म | पुस्तक लिंक: अमेज़न
