रामदीन खाने में भिड़ा था। दनादन कौर-पे-कौर मुँह में ठूँसते जा रहा था। लगता था वह एकबारगी सबकुछ चट कर जायेगा। खाते-खाते ही वह नज़र उठाकर चढ़ते सूरज को भी देख लेता, “कहीं अबेर तो नहीं हो गया। अगर अबेर हो गया तो मानो सबकुछ गुड़-गोबर हो जाएगा।”
खाते-खाते अनायास उसका हाथ रुक गया। इसके साथ ही उसकी मुख-मुद्रा भी बदल गयी।
आज उसे ठाकुर गजेंद्र सिंह के खिलाफ गवाही देने के लिए कचहरी जाना है। गजेंद्र सिंह का ख़याल आते ही उसकी भृकुटि तन गयी। चेहरा गुस्से से लाल हो गया। आँखों से चिंगारियाँ निकलने लगीं। पूरा वजूद एकबारगी झनझना उठा।
मगर अगले ही पल चेहरा उदास और गमगीन हो गया। पलभर के लिए कहीं खो-सा गया। एकदम शांत स्थिर-सा। बिना पलक झपकाये। कुछ पल तो वह यूँ ही बुत बना रहा। सोच का दायरा बढ़-सा गया था उसका। इसके साथ ही फड़फड़ाने लगे थे अतीत के पन्ने। उसकी आँखों के सामने घटी घटनाएँ किसी चलचित्र की भाँति झिलमिलाने लगीं। ठाकुर की दरिंदगी के आगे लुटती फुलिया की चीख और फिर आग उगलती ठाकुर की बंदूक। सबकुछ तो उसकी आँखों के सामने घटित हुआ था। वही तो उसका एकमात्र गवाह था।
दोपहर का वक्त था। रामदीन अपने खेत में मकई कोड़ (निराई गुड़ाई करना) रहा था। सामने ही अड्डे पर फुलिया घास काट रही थी। अभी वह दो मुट्ठी ही घास काट पायी थी कि दो-चार गुर्गों के साथ बंदूक लहराते ठाकुर गजेंद्र सिंह आ धमके। उनकी आँखों में वासना के लाल‑लाल डोरे तैर रहे थे। वहशीपन पूरी तरह हावी था।
फुलिया ने देखा तो वह सिर से पाँव तक कांँप उठी। एकबारगी उसकी पूरी देह सिहर उठी। वह डलिया उठाये उठ खड़ी हुई।
बगल से रास्ता निकाले वह आगे बढ़ने ही वाली थी कि सामने आकर ठाकुर ने उसका रास्ता रोक लिया। अधरों पर वहशी हँसी थिरक रही थी। वे दाँत निपोरते बोले, “जाती कहाँ हो जानेमन? हम तो तुम्हें देखकर ही इस तपती दुपहरिया में यहाँ आये हैं और तुम हो कि हमें देखकर फुर्र हो जाना चाहती हो। आखिर ऐसा अन्याय क्यो?”
“मुझे जाने दीजिये!” डरते-डरते फुलिया ने मुँह खोला।
मगर ठाकुर का क्या! वे उसी वहशियाना अंदाज़ में बोले, “चली जाना। मैंने कब रोका है। बस अपनी जवानी के दो-चार घूँट पिला दे। फिर आराम से चली जाना।”
“नहीं!” वह ज़ोर से चीखी और उसने भागने की भरपूर कोशिश की, मगर भाग नहीं सकी। ठाकुर ने उसे अपनी मज़बूत बाँहों में दबोच लिया।
“हाय मैं मरी। बचाओ हो बापू….! बचाओ हो मैया… !”
उसकी चीख दूर-दूर तक गूँज गयी। चप्पा-चप्पा दहल गया। कांँप गया माटी का कण-कण।
रामदीन चौंका। उसकी तंद्रा टूटी। झट उसने नज़र उठायी, मगर उसने जो कुछ देखा, देखते ही उसके रोंगटे खड़े हो गये।
ठाकुर गजेंद्र सिंह ने देखते ही देखते फुलिया को धक्का देकर बगल के मिर्च के खेत में गिरा दिया और उसके सीने पर चढ़ बैठे। अगले ही पल वहशी-दरिंदा बनकर उस पर टूट पड़े । उसे नोंचने- खसोटने लगे । बेचारी चीखती, चिल्लाती रही। रोती, गिड़गिड़ाती रही, मगर ठाकुर का दिल नहीं पसीजा। दिल दहलाने वाली उसकी चीख-पुकार दोपहर के सन्नाटे को चीरती हुई दूर-दूर तक गूँजती रही। उसकी दशा देख धरती‑आसमान का कलेजा फट पड़ा, मगर ठाकुर की हैवानियत नहीं थमी। आखिर उन्होंने हैवानियत का नंगा कुकृत्य करके ही दम लिया। बड़ी बेदर्दी से उसे तहस-नहस कर दिया।
वहीं फुलिया की चीख-पुकार और क्रंदन सुन रामदीन उसकी रक्षा के लिए आगे बढ़ा भी था, मगर तभी उनके गुर्गे बंदूक लिये चिल्ला पड़े, “आगे बढ़ने की कोशिश मत करना, वर्ना इसका अंजाम बुरा होगा। यहीं पे लाश गिरा देंगे।”
रामदीन डर गया। उसके बढ़े पाँव जहाँ थे, वहीं रुक गये। पता नहीं उसे फिर क्या सूझी? उल्टे पाँव बस्ती की तरफ दौड़ लगा दी।
इधर, ठाकुर फुलिया की इज़्ज़त से खेलते रहे तबतक, जबतक उनका मन नहीं भर गया। आखिरकार उन्होंने उसके कौमार्य को भंग करके ही दम लिया।
रामदीन हांँफते-धाँपते बस्ती पहुँचा और उसके माँ-बाप को खबर दी। दोनों बेचारे रोते-पीटते खेत की तरफ दौड़े।
ठाकुर की यह करतूत जंगल में आग की तरह पूरे गाँव में फैल गयी। मगर ठाकुर का खौफ़ इतना कि कोई उसके खिलाफ मुँह नहीं खोल पाया। सब अपने-अपने घरों में दुबके रहे।
कुछ ही क्षण बीते होंगे कि ज़ोरों की आवाज हुई, धाँय…धाँय…धाँय!
एक साथ तीन आवाज!
रामदीन से रहा नहीं गया। वह जान की परवाह किये बगैर दूसरी तरफ दौड़ पड़ा। बड़ी तेज़ी से। सरपट दौड़ते हुए।
वहाँ का मंजर बड़ा ही वीभत्स और रोंगटे खड़ा कर देने वाला था। खून से सनी एक साथ तीन-तीन लाशें! फुलिया के साथ-साथ उसके माँ‑बाप को भी ठाकुर ने मौत के घाट उतार दिया था। लाशें चीख-चीखकर ठाकुर गजेंद्र सिंह के आतंक और दरिंदगी को बयाँ कर रही थीं।
रामदीन को तो मानो काठ मार गया हो। काटो तो खून नहीं। वह चुपचाप फटी आँखों से तीनों लाशों को टुकुर-टुकुर देख रहा था। इसी बीच उसने ठाकुर के एक गुर्गे को पास आते देखा। आते ही वह रामदीन से बोला, “दीनू! तुमने जो कुछ देखा, वह किसी से कहना नहीं, वर्ना इसका अंजाम बहुत ही बुरा होगा। यह देख रहे हो न बंदूक। सीने के आर-पार कर दूँगा। समझे!”
कुछ देर बाद पल्ला झाड़ते हुए ठाकुर अपने गुर्गों के साथ बंदूकों को हवा में लहराते हुए उसी रास्ते से वापस लौट पड़ा।
रामदीन बस देखता ही रह गया, अपलक!
मगर अंतरात्मा की आवाज़ पर वह चुप बैठा नहीं रह सका। उसने न सिर्फ पुलिस के आगे अपनी जुबाँ खोली, बल्कि कचहरी में पेशी के समय ठाकुर के खिलाफ गवाही देने के लिए भी तैयार हो गया।
रामदीन अतीत के इस खोह में पूरी तरह से खो गया। एकाएक उसकी तंद्रा भंग हुई। उसने नज़र उठाकर ऊपर देखा। समय काफी हो गया था। उसने झटपट खाना खत्म किया और कपड़े पहनने लगा।
अभी वह कपड़े पहन ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई:
खट-खट-खट!
रामदीन चौंका। इस वक्त कौन हो सकता है? कहीं पुलिस तो नहीं! या कोई और!
एक अनजानी आशंका से उसकी पूरी देह सिहर उठी। क़मीज़ घुसाये वह दरवाज़े की ओर लपका। ज्योंहि उसने किवाड़ खोला सामने ठाकुर के गुर्गों को देखकर वह भौंचक्क रह गया। उसे समझते देर नहीं लगी कि ये लोग क्यों आये हैं। उसने ठाकुर के खिलाफ पुलिस के सामने जुबाँ जो खोली है। काफी देर तक वह उन सबको टुकुर-टुकुर देखता रहा। कभी उनके रौबदार चेहरे को, तो कभी उनके हाथ में लहराती बंदूकों को।
पता नहीं अब कौन-सी मुसीबत आने वाली है। न जाने ये लोग उसके साथ क्या करेंगे? कहीं ये लोग…!
मन में एक डर घर कर गया। इसके आगे वह कुछ सोच नहीं सका।
वे लोग उसे खा जाने वाली नज़रों से घूर रहे थे, जिससे उसका डर और भी बढ़ गया। सोचने की शक्ति क्षीण पड़ गयी। दिमाग सुन्न पड़ गया। इसके आगे वह कुछ सोचता, तबतक बंदूक वाला एक युवक आगे बढ़ा और उसका कॉलर पकड़ कर उसे झिंझोड़ते हुए गुर्रा पड़ा, “हरामी के पिल्ले! तुझे समझाया था न कि किसी के सामने अपनी ज़ुबान मत खोलना! मगर तूने बात नहीं मानी। अब बोल तुम्हें यहीं मारकर ज़मीन में गाड़ दूँ। बोल हरामी।” इसके साथ उसे दो-चार तमाचे रसीद कर दिये। तमाचे पड़ते ही उसके गाल लाल हो गये। इसके साथ ही कान सुन्न पड़ गये। उसे रोना आ गया। वह चुपचाप गाल सहलाता रहा।
“तुम्हारी ही नादानी के कारण आज ठाकुर साहब पुलिस कस्टडी में हैं। अगर उन्हें ज़रा भी खरोंच आयी, तो तुम्हारे टुकड़े-टुकड़े करके गंगा में बहा देंगे। छोड़ेंगे नहीं!”
इतने पर भी वह रुका नहीं। उसके सीने पर बंदूक सटाते हुए उसी रौब में गुर्राया, “गवाही देने जा रहा है न! जा! हम भी देखते हैं, तू कैसे गवाही देता है? लाश न गिरा देंगे तेरी।”
रामदीन सिर से पाँव तक कांँप उठा।
उसकी आँखों के सामने कैलू दास का खून से तड़पता शरीर घूम गया। कैलू का सिर्फ़ इतना ही कसूर था कि उसने कोर्ट में ठाकुर के खिलाफ गवाही देने की हामी भरी थी, मगर गवाही देने के पहले ही ठाकुर के बदमाशों ने दिन दहाड़े उसे मौत के घाट उतार दिया था।
इसी बीच एक दूसरे गुर्गे ने बीच-बचाव करते हुए रामदीन को समझाया, “देखो दीनू। गवाही के लिए जाने से पहले अच्छी तरह सोच लो।इसका अंजाम क्या होगा! क्यों मुफ्त में मौत को बुलावा दे रहे हो? देखो दीनू! इतना भला और सीधा बनने का अब समय नहीं रहा। इससे कुछ हासिल होने वाला नहीं है। देखो, अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। जाकर पुलिस के सामने बोल दो कि मैंने किसी के दवाब में आकर झूठ बोला है। मैंने कुछ भी नहीं देखा है। कोर्ट में भी यही तुम्हें बोलना है। फिर ठाकुर साहब छूट जाएँगे और अगर ठाकुर साहब छूट गये, तो हम उनसे कहकर तुम्हें मालामाल करवा देंगे। जो भी तुम्हें चाहिए, खुशी-खुशी दिलवा देंगे। ज़िंदगी भर ऐश करते रहना, मगर इंकार कर गये तो समझ लो, तुम ज़िंदा नहीं बचोगे। कोई नहीं बचा पायेगा तुझे! पाताल के अंदर भी छुपे रहोगे तो भी ठाकुर के आदमी, वहाँ से तुम्हें खींच निकालेंगे। अब तुम्हीं बताओ कि सुख के हिंडोले पर झूलोगे या फिर दर्दों की धार में डूबते-उतरते मौत का वरण करोगे! बाकी क्या रखा है इन गवाही‑दवाई में। आजकल सब पैसे पर बिकते हैं।”
रामदीन सोच में पड़ गया। पल भर के लिए तो उसका ईमान डोल गया। अबतक के विश्वास और संकल्प पत्ते की तरह एक-एक कर बिखरने लगे। मन के कोने से आवाज़ आयी, “रामदीन! मौका अच्छा है। मान भी जाओ। कब तक दरिद्री का बोझ ढोते रहोगे। पेट की आग में झुलसते चीथड़ों में दिन काटते रहोगे? क्या रखा ईमानदारी में? क्या दिया है इसने तुझे? गधे बैल की तरह दिन-रात हाड़-चाम तोड़ते रहे, धूप‑वर्षा की मार सहते रहे। मगर क्या मिला? वही झिड़की, प्रताड़ना और बदनामी। सब दिन तड़पते-कराहते रहे।”
रामदीन विचारों के खोह में खोता चला गया। सपनों के जाल में उलझता चला गया। कुछ क्षण के लिए तो उसने मन-ही-मन सोच भी लिया था कि वह ठाकुर के गुर्गों की बात मान लेगा। कम-से-कम उसकी गरीबी तो दूर हो जायेगी। सुख से तो रहेगा। न कोई चिंता, न कोई दुःख। आराम से जिंदगी कटेगी।
वह मन ही मन हिसाब करने लगा।
“किस सोच में पड़ गये रामदीन!” एक गुर्गे ने उसे झकझोरा।
“आँय!” जैसे वह नींद से जागा हो।
“आँय-ओह से काम नहीं चलेगा। अच्छी तरह सोच लो। किसमें तुम्हारी भलाई है। ऐसा नहीं कि बाद में पछताना पड़े। समझ रहे हो न, हम क्या कह रहे हैं?”
उसने रामदीन को दुविधा में डाल दिया।
थूक घूँटते हुए, वह मुश्किल से बोल पाया, “जी समझ गये।”
हालाँकि, वह कहना चाहता था, कि मुझे आपकी शर्त मंजूर है, ठाकुर साहब के खिलाफ गवाही नहीं देंगे। मगर वह कह न सका। बात अधूरी रह गयी। ज़ुबान तालु से चिपक गयी।
“चलो यार!अब यह अच्छी तरह समझ गया है कि क्या करना है,अगर नहीं करेगा तो फिर हम लोग हैं किसलिए?” और फिर वे सब बंदूक लहराते हुए झटके से निकल गये। रामदीन उसे देखता रहा। अपलक। तबतक, जबतक वे सब नज़रों से ओझल नहीं हो गये। वह सोचता रहा।
तभी उसकी अंतरात्मा चीख पड़ी, ‘क्या रामदीन, तुम भी ठाकुर की बंदूक से डर गये। डर के मारे क्या उसके खिलाफ गवाही न दोगे! या फिर तुम्हारा भी ईमान डोल गया है। स्वार्थ ने घेर लिया है। बोलो दीनू! क्या औरों की तरह तुम भी बिक गये। आखिर कब-तक ये सब होता रहेगा? कब तक ठाकुर गरीबों की बेटियों की इज़्जत से खेलते रहेंगे। निरीह निर्दोषों को मौत के घाट उतारते रहेंगे। आखिर कब तक? बोलो दीनू! चुप क्यों हो?’
रामदीन अंदर तक कांँप गया। उसकी अंतरात्मा चीख-चीख कर कह रही थी:
‘अगर पहले ही किसी ने ठाकुर के खिलाफ गवाही दी होती तो आज ठाकुर गजेंद्र सिंह जेल के सींखचों के अंदर बंद होते। कम-से-कम इतना ज़ुल्म और अत्याचार तो नहीं होता।
‘आगे बढ़ो दीनू! गाँव की इज्जत की रक्षा के लिए मौत का सामना करो। ठाकुर के ख़िलाफ़ गवाही दो। अवश्य दो, ताकि उसे, उसके किये पापों की सज़ा मिले। हांँ दीनू, उसके पापों से धरती माँ कराह रही है।’
एकाएक दीनू उबल पड़ा। अपने आप चिल्ला पड़ा, “हाँ। फुलिया और उसके मांँ-पिता को वह इंसाफ़ दिलायेगा। ठाकुर के ख़िलाफ़ गवाही देगा। भले ही उसे मौत को गले लगाना पड़े। अधिक-से-अधिक कैलू की तरह, उसे भी मौत के घाट उतार दिया जाएगा। मगर वह पीछे नहीं हटेगा, उसने जो कुछ देखा है, उसे अवश्य बयाँ करेगा। उसका क्या! आगे नाथ न पीछे पगहा। कोई तो नहीं है, जो उसकी मौत पर आँसू बहाएगा? अकेले तो है। बच्चे तो हुए नहीं। घरवाली भी पिछले साल भगवान को प्यारी हो गयी।”
रामदीन समझ चुका था कि हो न हो, आज उसके जीवन का आखिरी दिन हो सकता है, फिर भी उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। कोई गम नहीं था। ‘जो होगा देखा जायेगा,’, उसने सोच लिया था।
वह पूरे उत्साह के साथ कचहरी के लिए निकला। कचहरी में उसने बड़ी निर्भीकता से ठाकुर गजेंद्र सिंह के ख़िलाफ़ गवाही दी। उसके एक‑एक करतूत को खोलकर रख दिया। उसका कच्चा चिट्ठा खोलकर वह फूले नहीं समा रहा था। उसकी गवाही को सुन पल भर के लिए पूरा इजलास सन्न रह गया। कई की आँखें हैरत से फटी रह गयीं, तो कई आँखों में आँसू के साथ गुस्सा उबलने लगा था। जज साहब की आँखों में भी कई भाव आये गये। उन्होंने नाबालिग के साथ दुष्कर्म और फिर तीन निर्दोषों की नृशंस हत्या के मद्देनजर ठाकुर गजेंद्र सिंह को फाँसी की सज़ा सुनाई।
चलो! उसकी गवाही से एक पापी को सज़ा तो मिली। इसी आत्म-संतोष के साथ, वह कचहरी से घर के लिए निकला। मगर वह घर वापस नहीं लौट सका।
अभी वह कचहरी के गेट से बाहर निकला ही था कि ज़ोरदार आवाज हुई।
धाँय… धाँय…!
बाहर पेड़ की ओट में छिपे ठाकुर के गुर्गे की बंदूकें एकाएक गरज उठीं। जब तक लोग दौड़ते-सँभालते तब तक रामदीन की इहलीला खत्म हो चुकी थी।
कचहरी के बाहर उसकी लाश पड़ी थी, मगर उसके चेहरे पर अब भी वहीं आत्म-संतोष था। उसे सुकून था कि उसने ठाकुर के खिलाफ गवाही देकर एक अत्याचारी को उसके किये की सज़ा दिला दी। उसके अत्याचार पर विराम लगा दिया। वह एक सच्चा गवाह निकला।
समाप्त
