यात्रा वृत्तांत: …तो यहाँ रहा करते थे शरतचंद्र

.. तो यहाँ रहा करते थे शरतचंद्र - रुपाली संझा

ये तय था कि ये वो आख़िरी सप्ताहांत था जब हम तीनों हमेशा की तरह इकट्ठे साथ जाकर, घर के बाहर कहीं, एक साथ समय बिता सकते थे। इस बार के बाद फिर कब ये मौका हाथ लगेगा, इसका हममें से किसी को कोई अंदाज़ा नहीं था। हफ्तों, महीनों या साल भर बाद! उस छोर का कोई ओर छोर नहीं था। क्योंकि हमारा बेटा कुछ ही दिनों बाद दूसरे देश चले जाने वाला था, वहीं बस जाने के लिए। अगली बार ना जाने फिर कब ये मौका हाथ लगे, इसलिए इसे यूँ ही हाथ से गँवा देना कतई गवारा नहीं था मुझे।

ये वो एक वज़ह बन रही थी जिसके चलते मैं उसके जाने के पहले इस सप्ताहांत को हर बार से कहीं अधिक ख़ास, ख़ासमख़ास बनाने के लिए जी-जान से उतारू थी। हर बार से नितांत भिन्न होना ही था इसे। क्यूँकि आख़िरी याद ही ज़ेहन में हमेशा ताज़ी बनी रहती है। वो धुँध की तरह इतनी सघन होती है कि अपने आगोश में सबको ढाँप लेती है। ऐसे में उससे पहले के साफ दिखाई देते रहे सारे दृश्य धुँधले पड़ जाते हैं।

और मैं, ज्यूँ काले मटमैले बादलों से हुई घनघोर बारिश के बाद धुले हुए निर्मल आसमान में खिल उठा सतरंगा इंद्रधनुष मन में बिंध जाता है, ठीक वैसा ही इंद्रधनुष अपने और उसके अंतस के आसमान में आँक लेना चाहती थी।

बेटे को सात समंदर पार जाना था, सालों के लिए जाना था। ढेरों तैयारियाँ करनी थी, समय कम था तो ज़्यादा दूर तो जाया नहीं जा सकता था। इसलिए पूर्व में, अपनी झोंक में घूमने जाई जाने वाली इच्छित जगहों की अपनी बनाई हुई लम्बी फेहरिस्त में से काफ़ी माथापच्ची के बाद मैंने एक जगह पर उँगली रखकर वहाँ जाने का तय किया। उसका मन टटोलने के लिए कि कहीं वहाँ जाने में उसकी नापसंदगी तो नहीं, मैंने बड़े धड़कते दिल से उसकी ओर देखा। जैसे उसने मेरा मन पढ़ लिया हो। एक क्षण गँवाये बिना उसने बाख़ुशी हामी भर दी। वो हमेशा ही ऐसा करके मेरा मन गले-गले तक भर दिया करता था। दो मनों ने एक दूसरे को बूझ लिया था। उन्होंने दिल ही दिल में एक दूसरे को प्यार भरा ये एक साझा तोहफ़ा दे दिया था। ऐसा हमारे बीच बरसों से बेरोकटोक होता चला आ रहा था। ‘कफलिन और क्लिप’ कहानी हमारे दरमियान एक सेतु की तरह हरदम बिछ जाती थी हम उससे सारी नदियाँ पार कर लेते थे,चाहे उनमें पूर ही क्यों ना आया हुआ हो!

उसकी हामी के रजनीगंधा के फूलों से पूरा माहौल महकने लगा। उस मंद-मंद महक को साँसों में भरते हुए हम चले गये एक गाढ़ी नींद लेने अपने बिस्तरों पर!

कल सुबह दस बजे तक हमने अपनी तय की गयी जगह पर पहुँचने का लक्ष्य रखा था। दूसरे दिन सुबह जल्दी उठकर तैयार हो अपने गंतव्य तक पहुँचने के लिए ठीक आठ बजे हमने घर छोड़ दिया। गाड़ी में बैठते ही गूगल मैप शुरू कर लिया ताकि भटकने की कोई गुँजाइश ना रह जाये। हालाँकि लोकेशन कल ही देख ली थी। हाईवे तक आधे से ज्यादा रास्ता वैसे काफ़ी जाना-पहचाना था क्योंकि बाज दफ़ा इसी रास्ते से हमारी ऐसी कई यात्राओं के रास्ते खुले हैं।

“तुम्हें याद है पिछले कार्यक्रम में मैंनें ‘डोला रे डोला’ गाने पर प्रस्तुति दी थी,” मैंने बातों की भूमिका बनाते हुए पूछा!

“हाँ मम्मा, वो आपका बहुत सुपर परफॉर्मेंस था!”

“याद है वो किस मूवी का था?” मैंने कहा।

“ऑफकोर्स, देवदास का। हर बार मुझे ही तो कहती थीं वो गाना टीवी पर कनेक्ट करने को। और बाय द वे आपके लिए वो गाना भी मैंने ही डाउनलोड किया था। बार-बार एक ही काम करने पर कोई उसे भूल सकता है क्या? लगता है ये आप भूल रही हैं!”

“नहीं मैं भी नहीं भूली कुछ!”

“पता है ये मूवी शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के उपन्यास पर आधारित है। जिनके घर हम जा रहे हैं। जिन्होंने कई चर्चित उपन्यास लिखे बंगाल के निचले तबके के लोगों, खासकर औरतों की ज़िंदगी को अपने कथानकों के मूल किरदारों में ढालकर!” मैंने अपनी बात की डोर को और ताना।

“हाँ आपने बताया था। नानू ने भी इनके बारे में बताया था। उन्होंने मुझसे कहा था कभी मौका मिले तो देवदास ज़रूर देखना।” ढील मिलते ही पतंग ऊँचाई छूने लगी।

“ओह तभी तुमने देखी। पर ये कहते वक्त उनके दिमाग में सहगल और दिलीप की फ़िल्में ज़्यादा घूम रही होंगीं। तुम्हें नहीं मालूम होगा कि इसपे तीन फिल्में बन चुकी हैं। एक के एल सहगल की, एक दिलीप कुमार वाली, एक नये ज़माने की शाहरुख वाली!

“खैर, इतना याद है तब तो तुम्हें ये भी ज़रूर याद होगा कि पिछली बार जब हम चंदननगर गये थे रविंद्रनाथ टैगोर की बाड़ी, तब लौटते वक्त रास्ते में शाहू मोदक की मिठाई की दूकान पर गये थे ना, संदेश लेने, उसका ज़िक्र भी शरतचन्द्र की किताब में आया है!” इस बार मैंने डोर को दो झटके देकर घिर्री को और ढीला किया।

“अच्छा! पापा की फेवरेट मिठाई की दूकान,” उसने कहा था। काल्पनिक वो बतरसी पतंग अब आसमान चूमने लगी थी।

शहरों के बीच से गुज़रते हुए हाईवे आमतौर पर ख़ुश्क से होते हैं। आसपास से कुछ ख़ास नहीं गुज़रता सिवाय कुछ दुकानों और ढाबों या रेस्तरां के। या फिर सड़क के किनारे खड़ी ट्रकों की लम्बी कतार के। इस नीरसता को हावी ना होने देने के लिए हमने बातों का लम्बा सिलसिला लूप मोड में डालकर चला दिया।

लगभग आधा रास्ता पार कर लेने के बाद चाय काॅफ़ी की तलब ने एक ढाबे पर गाड़ी खड़े करने को मजबूर कर दिया। लगातार एक तरह से चलते रहने की एकरसता को भी विराम मिलना चाहिए। सफ़र चाहे सड़कों का हो या ज़िंदगी का। इस थोड़े से ठहराव ने हममें नयी स्फूर्ति भर दी। ताज़ादम हो हम फिर आगे बढ़ चले।

कलकत्ता शहर से दूर जाते, गाँवों के नज़दीक बढ़ते हुए सड़क के दोनों किनारों पर नारियल, केले और बाँस के झुरमुट, धान के हरे कच पनीले खेत काली लम्बी कोलतारी सड़कनुमा चुनरी पर चौड़ी हरियाली किनार बना रही थी। काफ़ी लम्बे समय तक ये चुनरी हमारी गाड़ी के साथ-साथ फरफराती रही।

तकरीबन साठ किलोमीटर सड़क नाप लेने के उपरांत दूर से चमकती ‘देउलटि’ नाम की नामपट्टिका संकेत कर रही थी कि अंततः हम उस फरफराहट से हाथ छुड़ाकर दायीं ओर भूरे रंग की मुंज की रस्सीनुमा सँकरी सड़क के साथ कदम मिला लें। देउलटि गाँव में अंदर जाते जाने के लिए जहाँ ‘शरतकुटीर’ स्थित है जो हमारे आज के सफ़र का पड़ाव है।

यात्रा शरतकुटीर की - रुपाली नागर 'संझा'

दौड़ते-खेलते, हठात रुककर टाटा करते, साइकिल के टायर को लकड़ी के फट्टे से चलाते अधनंगे बच्चों, कुड़कुड़ाते हुए इधर उधर भागते मुर्गे-मुर्गियों, ठुमकती हुई बेपरवाह बतखों, आँखें मुंदियाई पड़ी बिल्लियों, आते अजनबियों को देख चौकस चौकीदारों की रस्म निभाते भौंकते हुए, या खदेड़ने की अदा में कुछ दूर तक पीछा करते कुकूरों, घरेलू काम घर के बाहर बैठ निपटाती औरतों, और घर की बाहरी ड्योढ़ियों और ओटलों पर नीली चौखाने की लुंगी लपेटे अलसाए से इकहरे बदन के, मगर मटके की तरह पेट लिए, खाली बैठे लोगों के बीच से अपनी गाड़ी को बैलगाड़ी की मानिंद चलाते हुए लगभग दस पन्द्रह मिनट मय गाड़ी दुबले होकर किसी तरह उन सबको ठोकर लगने से बचते-बचाते एकाएक हम एक खुले प्रांगण के सामने जा टिके। वो आज की राह का अंतिम छोर था। यही हमारा आज का ठिया भी था।

ऊँची चारदीवारी से बद्ध घने पाम, बाँस और नारियल के पेड़ों से घिरा शरत चंद्र का घर।

बोगनवेलिया के चंदोवे से आच्छादित मुख्य द्वार से अंदर जाते हुए विभिन्न पेड़ पौधों से सुसज्जित एक बड़े अहाते जिसे बगीचे का रुप दे दिया गया है, की दूसरी ओर सामने शालीनता और बेहद सादगी से खड़ा दो मंज़िला लाल कवेलू की ढलवा छत वाला घर। कितनी देर तो सामने टकटकी लगाये चुपचाप खड़े ही रह जाते हैं।

शरतकुटीर का मुख्य द्वार
शरतकुटीर का मुख्य द्वार
शरतकुटीर

आह्ह… तो यहाँ रहा करते थे शरतचंद्र।

१९२३ (1923) में गोपालदास नामक व्यक्ति ने सत्रह हज़ार रुपयों की लागत से इसका निर्माण कराया था। १९७८ (1978) की आयी बाढ़ में इसे काफ़ी नुकसान पहुँचा। प.बंगाल सरकार ने इसकी मरम्मत करवाई। २००१ (2001) में इसे ऐतिहासिक धरोहर स्थल घोषित किया गया। तब से ये कुटिया पर्यटकों की नज़र में आयी।

ये सारी जानकारी एक पेड़ के सहारे टिकी खड़ी पट्टिका पर अंकित है। एक ऐसी जानकारी जिसे साहित्य को जानने वाला न भी जाने तो भी, इस स्थल की अहमियत का उस पर कम असर नहीं पड़ेगा।

लम्बाई में फैले घर में हरे रंग के लकड़ी के मोटे खम्भों पर टिका, लाल चिकनी एकसार कावी फ़र्श वाला पूरी लम्बाई में खुला बरामदा। लकड़ी की मोटी बीमों के सहारे बनी छत, छत पर छाबी हुईं लाल मिटी की खपरैलें। बरामदे से ढेर सारे हरे रंग से पुते लकड़ी के, लोहे की साँकलों वाले दरवाज़े और लोहे की सीखचों वाली लकड़ी की ही हरे रंग की खिड़कियाँ। ये वो दरवाज़े खिड़कियाँ हैं जो बाड़ी के बैठक, शयनकक्ष, पूजाघर और अध्ययन कक्ष में खुलते हैं। कुल मिलाकर बड़ा सा लम्बोतरा एक घर।

बर्मा टीक के खालिस बंगाली तरीके का भारी लेकिन सादा, थोड़ा सा फर्नीचर। एक बिस्तर, एक अलमारी, एक किताब शैल्फ, एक आराम कुर्सी, एक पूजा घर, और इधर उधर कोनों में रखे कुछ कलात्मक टेबल और रैक। ये सब मिलकर बनाते हैं शब्दों के धन्ना सेठ का एक अत्यंत सादा सा घर।

घर का सबसे ख़ूबसूरत हिस्सा है उनका अध्ययन कक्ष। निहायत ही छोटा सा। लेखक का कद जितना बड़ा था उतने ही व्युतक्रमानुपात में लेखक के लिखने का स्थान। दरवाज़े से अंदर घुसते ही बायीं तथा सामने की ओर बड़ी खिड़कियाँ बनी हैं, जो थोड़ी दूर बह रही गंगा के पाट को दिखाती रहती हैं।

मैं सोचने लगी, कितनी चुनकर ये जगह उन्होंने अपने मन लायक काम के लिए तय की थी। दूर-दूर तक पसरा समतल हरा मैदान, उनमें सिर उठाये खड़े बाँस के झुरमुट, और सामने कल-कल बहती गंगा। इतने नीरव, सुरम्य वातावरण के तादात्म्य में रहकर उनका मन कितना तो रमता होगा अपने लेखन में। सच ही है, अनुकूल देश, काल, वातावरण प्रतिभा के लिए ईंधन का ही काम करते हैं। हालाँकि गंगा अब मन मारकर काफी पीछे चली गयी है कि मानो बताना चाह रही हो कि अब शरत ही नहीं रहा तो मैं क्या करूँ वहाँ रहकर?

सामने वाली खिड़की के पास एक लिखने की मेज है जिसकी ऊँचाई एडजस्ट की जा सकती है। लगातार लिखते समय शरीर को थकन से बचाने का उपाय बनाती है ये युक्ति। बगल ही में लम्बे हत्थे वाली आराम कुर्सी है जिस पर बैठकर वे किताबें पढ़ा करते थे; तब; जब लिख नहीं रहे होते थे। उसके पास में एक और टेबल है जिस पर पढ़ने वाली किताब और पानी वगैरह रखा जाता था। कोने में लकड़ी की एक चिकनी छड़ी रखी है। जो संगी बनती थी उनकी हर साँझ को, बाहर गंगा किनारे घूमने जाते समय। ये था शरत की शब्द सम्पदा का कोठार। जहाँ वे अपना विचारधन सहेजते थे,समय आने पर उसे खुले हाथ लुटाते थे।

शरतचंद्र के लिखने का स्थान
शरतचंद्र जहाँ बैठकर लिखा करते थे

मैं कितनी ही देर तक उस कुर्सी के हत्थे थामे खड़ी रह गई। ये आभास कितना उन्माद भरने वाला था कि इस पर शरतचंद्र ने बैठकर अपने कितने कहानी, उपन्यास रच डाले। उस मेज पर बहुत देर हाथ फिराती रही जिस पर रख उन्होंने कागज़ों पर अपनी कलम से ना केवल देवदास जैसी कालजयी रचना लिखी वरन बैंकुठेर वील (बैंकुंठनाथ की वसीयत), देना पावना, निष्कृति जैसी प्रसिद्ध कृतियों को भी जन्म दिया।

ऐसी तमाम जगहों पर जहाँ विश्व प्रसिद्ध लेखक या कलाकार अपना सृजन करते रहे हैं, उन जगहों पर थोड़ी देर के लिए भी समय बिता पाना उनके साथ रागात्मक लगाव से जुड़ जाने के लिए पर्याप्त होता हैं। हम हमेशा इन जगहों पर अपनी कल्पनाओं में इनके साथ उस लोक में पहुँच जाते हैं जिसमें जीते हुए, अपना हुनर रचते हुए इन्होंने हमें ये क्लासिक कृतियाँ सौंपी।
मन में ये ख़्याल भी कौंधा कि काश कुछ ऐसा जादू हो जाये कि मैं मेज पर हाथ फिराऊँ और उनकी लेखनी का असर मेरे हाथों में समा जाये। इनसान अपनी चाहनाओं के पूरी होने की ही तो दुआएँ माँगता हैं। मैंने भी वही किया। क्या बुरा किया? हाँ शायद बताकर बुरा कर रही हूँ!

“कितना छोटा सा है ना मम्मा इनका कमरा,” बेटे के स्वर में हैरानी थी। नामी गिरामी लोगों के बारे में जुड़ी रोज़मर्रा की छोटी-छोटी बातें भी कैसे हमारे अंतस में बड़े आकार अख्तियार कर लेती हैं। उन्हें नज़दीक से जानने पर उन्हें लेकर मन में गढ़ा हुआ वो विशाल मायालोक कैसे छन्न से टूटकर बिखर जाता है। कि वे भी इसी लोक के अन्य आम इनसानों की तरह ही हैं, कोई एलियन नहीं। जोड़ता नहीं, ये सच तोड़ता ही है।

“हाँ बेटे सारे सृजन ऐसे ही किन्हीं कोनों में होते हैं। उनके लिए वृहदताओं की आवश्यकता नहीं होती। ना किन्हीं बड़े तामझाम की। समझ पा रहे हो ना?” मैंने कहा था।

सहमति में सिर हिला था। निश्चित ही कुछ तो खलबल उसमें हुई ही होगी।

ये घर का आख़री हिस्सा है। वहाँ से निकलकर बायीं ओर पीछे की तरफ़ रसोई और बड़ा सा कोठारघर है। और एक ओर स्नानागार भी। वहीं से दायी तरफ़ ऊपरी मंजिल पर जाने के लिए जीना है। खड़ी सीधी सीढ़ियों पर चढ़ने में दिक्कत ना हो इसलिए मोटे रस्से की सिरे से टेक लगायी गयी है। ऊपरी बरामदा भी पूरी लम्बाई में सामने से खुला हुआ है। यहाँ ज्यामितीय आकृति वाली लाल बदामी रंग की सुंदर चिकनी फ़र्श है। दीवार की टेक लिए लकड़ी की एक बेंच रखी हुई है जिस पर बैठ कर गंगा को निहारा जा सकता है। यहाँ भी निचली मंज़िल की तरह कमरे बने हुए हैं। सादगी को गले लगाये हुए। शरतबाड़ी बड़ी है पर बड़बोली नहीं।

दूसरी मंज़िल को जाती सीढ़ियाँ
दूसरी मंज़िल को जाती सीढ़ियाँ
यहाँ बेंच पर बैठकर गंगा को निहारा जा सकता है

कला कहीं से भी देहरी उलाँघकर बाहर आ सकती है। महल, कोठियाँ बाड़ियाँ या झोपड़ियाँ उसके लिए कुछ मायने नहीं रखती। बस ढेल पार करके निकल आने की ही तो बात है। बातों-बातों में ये एक बड़ी सीख अपने बेटे के साथ बाँध दी थी। मैं कभी भी बोल टोक कर कोई बात उसके दिलोदिमाग में भरने के पक्ष में ना रही। उसे मैंने जो भी बताना चाहा, उसके पास या उसके सामने ले जाकर खड़ा कर दिया ताकि वो ख़ुद प्रत्यक्षतः उसे महसूस कर अपने अंदर समाहित कर सके। उसने भी हर बार मेरे कदम से कदम मिलाये हैं। हाँ थोड़ा भी लड़खड़ाने पर झट से हम दोनों के हाथ एक दूसरे के हाथों में बँध जाते हैं, अपने आप संतुलन बनाते हुए। ये हमारा आपसी अनकहा गहरा तालमेल है।

कुटीर से निकलकर हम पैदल ही हरी घास का बड़ा सा मैदान पार कर गंगा किनारे गये। वहाँ की नम ठंडी महीन मुलायम रेतीली जमीन पर काफी देर दूर तक टहले। ऐसे ही कभी शरतचंद्र के कदम यहाँ चहलकदमी करते रहे होंगें। उनके पदचापों का तो कोई नाम‑ओ‑निशां बाकी नहीं पर शरतचंद्र का नाम अब भी वहाँ की फिजाओं में तैरता है!

देवदास, चरित्रहीन, शेष प्रश्न, श्रीकांत, परिणीता, बड़ी दीदी, मँझली दीदी, पथ के दावेदार, शुभदा, बिराज बहू, गृहदाह, देहाती समाज, ब्राह्मण की बेटी जैसे उपन्यासों से अपने दौर के समाज को उकेर देने वाला कलाकार गहरे पानी पैठ कर ही तो ये मोती निकाल सका।

“तुम्हें बताऊँ, मैंने अपने बेटे से कहा, ये सब कुछ उन्होंने हिंदी में नहीं, बल्कि बांग्ला में लिखा है। लेकिन हिंदी में अनुदित उनकी इन सारी किताबों ने ऐसी धूम मचाई कि बिना उन्हें जाने, उनकी किताबों से पढ़ने की शुरुआत करने वाले भी काफ़ी लम्बे समय तक उन्हें हिंदी का साहित्यकार ही मानते रहे हैं। लगभग हर भारतीय भाषा और विश्व की प्रमुख भाषाओं में उनकी किताबों का अनुवाद हुआ है। ऐसी थी उनकी लोकप्रियता। ऐसी थी उनकी लिखने पर पकड़। भारत में ऐसा नाम कमाने वाले वो पहले ही रहे।”

“और टैगोर? नोबल पुरस्कार मिला था उनको तो? गीतांजलि और जन गण मन से तो सारी दुनिया में उनका नाम है। तुरंत उसका प्रश्न आया। वंदेमातरम वाले बंकिमचंद्र भी तो। फेलुदा वाले सत्यजीत रे का भी नाम नहीं लिया आपने!” मैं और आगे बढ़ती उससे पहले ही उसने मुझे बीच में टोका।

“हाँ ये सब तो हैं ही। इन पर तो अपन पहले ही बात कर चुके हैं। अभी तो मैं तुम्हें केवल शरतचंद्र के बारे में बता रही हूँ। अभी यहाँ आये हैं ना इसलिए,” मैंने उसके पक्ष पर अपनी सफाई दी।

ऐसी बातें कहाँ ख़त्म होने वाली हैं। लेकिन किसी एक बिंदु पर रहने का समय बड़ी जल्दी खत्म हो जाता है। हम आज की चढ़ाई पूरी कर उसकी चोटी पर पहुँच चुके थे। अब वहाँ से ढलान ही शेष थी। दिन भी ढल चुका था। शाम गहराने लगी थी। सुभीते से घर लौट कर आना था भी तो था।

कितने सवाल होते हैं मेरे बेटे के पास, कितनी जिज्ञासाएँ! बहुत पढ़ने का ये लाभ हो रहता है। और ये भी, कि आप सब नहीं तो अधिकतर का जवाब तो दे ही पाते हैं। यौवन की दहकती सिगड़ी पर दिमाग के भगोने में गर्म दूध जैसे उभाते विचारों पर ज्ञानरुपी पानी के ठंडे छींटें डालकर उन्हें व्यर्थ बह जाने से बचा ले जाते हैं।

लौटते में पारम्परिक छोटे-छोटे गाँवों से गुज़रते हुए डाब, खाँटी बंगाली सिंघाड़े (समोसे), झालमूड़ी, दमआलू-लूची, घुघनी और गुणेर संदेश के चटकारों के साथ आज का सफ़र समाप्त किया। इस तमाम सफ़र के दौरान हम सबका मुँह लगातार चलता रहा। बतियाते और खाते हुए। स्वाद योग का योग भी लिखा हुआ था आज की यात्रा में।

कल शाम उसे चले जाना है हमसे दूर, सालों के लिए। सामान पैक करते समय ‘शरत’ की किताब ‘शेष प्रश्न’ उसके कपड़ों के बीच रख दी है। मैं जानती हूँ वो उसे कभी पढ़ नहीं पाएगा। लेकिन जब भी वो किताब उसकी नज़रों से गुज़रेगी, अपना सामान उठाते-धरते हाथ में आएगी तब आज का ये दिन उसकी यादों में शुक्र तारे की तरह जगमगा उठेगा। वो बीती जा चुकी हर बात की सुखद स्मृतियाँ सहेजना सीखेगा! उनकी कदर करना जानेगा! उन्हें प्यार से अपने अंदर भरने के हुनर को वो चाक पर बनाये जाने वाले गुलदान की तरह आहिस्ता‑आहिस्ता आकार दे पाने की काबिलियत में पक्का हो सकेगा।

आख़िरकार ये छोटी-छोटी बातें ही उसे एक दिन बहुत बड़ा बनने में मदद करेंगीं। एक छोटा सफ़र भी एक शाइस्ता पड़ाव पर ले जाकर खड़ा कर सकता है। वहाँ से जो हासिल हो उसे झोली में समेटे बिना कैसे तो लौट आएँ, ये समझ पाने की उसकी समझ भी बढ़ेगी।

लौट तो आये ही, पर तस्वीरों में हमेशा के लिए उन लम्हों को कैमरे में कैद कर लाये। ये छोटा सा कैदखाना अब शरतचंद्र को हमारे एकदम नज़दीक रहने में मददगार होगा। हम दोनों को भी इस सुंदर साझी याद के साथ जोड़े रखेगा। यात्राएँ तो निश्चित ही फिर फिर होगीं पर जैसा कि मैंने शुरुआत में ही कहा था साथ-साथ अगला योग कब बनेगा इसका ठीक-ठीक ठिकाना नहीं। अतः अगली यात्रा तक के लिए सायोनारा!

(यह लेख आहा ज़िंदगी पत्रिका में जून 2021 को प्रकाशित हो चुका है। यहाँ लेखिका की अनुमति से इस लेख को प्रकाशित किया जा रहा है।)


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