मैंने दामोदर के गले में धँसे छुरे पर आखिरी निगाह डाली। अपने खून से सने ग्लव्स खोले और उसे काग़ज़ में लपेट कर जेब में डाला।
दामोदर 15 लाख कैसे डकार सकता था? हम दोनों ने साझा गबन किया था। मेरे विलासितापूर्ण जीवन ने मुझे कम्पनी के रुपये चुराने पर मजबूर किया था।
हत्या से पहले ही मोबाइल ट्रैकिंग के डर से मैं अपना फोन घर रख आया था। पड़ोसियों को पता था बीमारी की वजह से दो दिन से घर में हूँ।
अब बचना था पुलिस से।
पुलिस की मुझसे पूछताछ लगभग खत्म हो चली थी। इंस्पेक्टर ठकराल ने मेरी कीमती मोबाइल, स्मार्टवाच, पेन आदि पर निगाह फेरी।
“तो मिस्टर रमेश आप तो बीमारी के कारण कल घर से हिले भी नहीं?”
“नहीं, चाहें तो दो दिनों के मेरे मोबाइल लोकेशन को चेक कर लें,” दृढ़ स्वर में मेरा जवाब था।
न जाने क्यों इंस्पेक्टर मोबाइल लोकेशन की जाँच में खास दिलचस्पी नहीं दिखा रहा था।
“वो ज़रा देंगे,” इंस्पेक्टर ने मेरी घड़ी की ओर इशारा किया।
“ये है स्मार्टवाच, जो ये भी बताता है कि आदमी दिन में कितना पैदल चला। इसे चेक करते हैं,” इंस्पेक्टर बोला।
मेरी आँखों के सामने अँधेरा छा रहा था।
समाप्त
नोट: लेखक आनंद कुमार सिंह की इस लघु-कथा ‘फंदा’ को वेस्टलैंड द्वारा सुरेन्द्र मोहन पाठक की आत्मकथा ‘ना बैरी न कोई बेगाना’ के प्रकाशन के अवसर पर वर्ष 2018 फरवरी में आयोजित प्रतियोगिता में तृतीय पुरस्कार मिला था।
टिक टॉक टिक टॉक
‘टिक टॉक टिक टॉक’ लेखक आनंद कुमार सिंह का नवीनतम उपन्यास है। यह एक साइ-फाइ थ्रिलर है जिसके मूल में एक ऐसा व्यक्ति है जो कि अपनी पत्नी को पाने के लिए कुछ भी करने को तैयार था।

पुस्तक के विषय में:
कहते हैं, गुजरा वक्त लौटकर नहीं आता …लेकिन क्या हो अगर आपके पास मौका हो अपने साथ हुए एक हादसे को रोक देने और अपनी तकदीर बदल देने का? …कुछ ऐसा ही होता है आशुतोष रोहिल्ला के साथ… अपनी पत्नी की हत्या के बाद जिंदगी से बेजार हुआ आशुतोष क्या उस मौके का फायदा उठा सकेगा? …या फिर असंभव को संभव बनाने का उसका इरादा नाकाम हो जायेगा…? इस अभियान में पल-पल है मौत का खतरा… उसकी रेस समय के साथ है… घड़ी की सुइयाँ तेजी से बढ़ रही हैं… टिक टॉक टिक टॉक…
पुस्तक लिंक: अमेज़न | साहित्य विमर्श प्रकाशन
