- दास्तान-ए-गुरुदत्त हिन्दी सिनेमा और गुरुदत्त के रचनात्मक अंतर्विरोधों की गहरी पड़ताल है : जवरीमल पारख
- बेहद संवेदनशील, संतुलित और बिना किसी पूर्वाग्रह के लिखी गई है दास्तान-ए-गुरुदत्त : इरा भास्कर
- प्यासा जैसी फ़िल्में केवल सिनेमाई उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवन और कविता के गहरे अंतर्द्वंद्व हैं : प्रियदर्शन
- दास्तान-ए-गुरुदत्त सुनना और किताब को पढ़ना, दोनों बिल्कुल अलग लेकिन समान रूप से गहरे अनुभव हैं : सुदीप्ति
- गुरुदत्त के दुख को समझने के साथ उनकी फ़िल्मों और रचनात्मक विरासत को याद करने की ज़रूरत : महमूद फ़ारूक़ी
नई दिल्ली, 21 मई, 2026 (गुरुवार)
18वें हैबिटैट फ़िल्म फ़ेस्टिवल 2026 के अंतर्गत 20 मई, बुधवार की शाम इंडिया हैबिटैट सेंटर के गुलमोहर हॉल में एक विशेष सत्र का आयोजन हुआ। इसमें मशहूर दास्तानगो और रंगकर्मी महमूद फ़ारूक़ी की किताब ‘दास्तान-ए-गुरुदत्त’ का लोकार्पण किया गया। यह किताब फ़िल्मकार गुरुदत्त के जीवन और उनके समय के भारतीय सिनेमा की गहरी पड़ताल करती है। इसे राजकमल प्रकाशन ने प्रकाशित किया है।
लोकार्पण के साथ ही किताब पर परिचर्चा हुई जिसमें वरिष्ठ फ़िल्म समीक्षक जवरीमल पारख, फ़िल्म अध्येता इरा भास्कर, कवि व समीक्षक प्रियदर्शन और कवि व लेखक सुदीप्ति वक्ता के रूप में उपस्थित रहे। वहीं कार्यक्रम का संचालन दास्तानगो पूनम गिरधानी ने किया।
कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए पूनम गिरधानी ने कहा कि यह सिर्फ़ एक किताब के लोकार्पण का मौका नहीं, बल्कि अदब, सिनेमा और दास्तानगोई तीनों विधाओं के संगम का जश्न है। उन्होंने कहा कि दास्तान-ए-गुरुदत्त के बहाने सिर्फ़ गुरुदत्त की ज़िंदगी और उनके सिनेमाई मयार की बात नहीं होती, बल्कि उस भूली-बिसरी अदबी परम्परा की भी याद ताज़ा होती है, जब किताबें पहले सुनाई जाती थीं और बाद में छापी जाती थीं। दास्तान और किताब के बीच यही रिश्ता इस कृति को अलग बनाता है।
तक़रीर में इस बात पर भी ज़ोर दिया गया कि अगर किसी किताब को एक दास्तानगो तैयार करे तो उसका असर सिर्फ पढ़ने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि वह सुनने और महसूस करने का अनुभव बन जाती है।
हिन्दी सिनेमा को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण किताब
इस मौके पर जवरीमल पारख ने कहा, महमूद फ़ारूक़ी की दास्तान-ए-गुरुदत्त केवल एक जीवनी नहीं, बल्कि हिन्दी सिनेमा, गुरुदत्त के पारिवारिक जीवन और उनके रचनात्मक अंतर्विरोधों की गहरी पड़ताल है। उन्होंने कहा कि किताब की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें गुरुदत्त को किसी मिथकीय महानायक की तरह नहीं, बल्कि उनके अंतर्विरोधों, कमजोरियों और जटिलताओं के साथ प्रस्तुत किया गया है।
उन्होंने इस बात की सराहना की कि महमूद फ़ारूक़ी गुरुदत्त के प्रति मोहग्रस्त नहीं दिखते और गीता दत्त के साथ उनके सम्बंधों को ईमानदारी से सामने रखते हैं। पारख ने कहा कि किताब यह समझने में मदद करती है कि एक बड़े कलाकार के बनने की प्रक्रिया में निजी रिश्तों और संवेदनाओं की कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है।
उन्होंने गुरुदत्त की फिल्मों प्यासा, कागज़ के फूल और साहब बीवी और ग़ुलाम का उल्लेख करते हुए कहा कि इन फिल्मों के माध्यम से गुरुदत्त की रचनात्मक यात्रा और स्त्री पात्रों को देखने का उनका दृष्टिकोण बदलता हुआ दिखाई देता है। पारख के अनुसार, महमूद फ़ारूक़ी ने इन फिल्मों और गुरुदत्त के जीवन को जिस रचनात्मक और आलोचनात्मक दृष्टि से पढ़ा है, वह हिन्दी सिनेमा को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
गुरुदत्त जैसे कलाकारों के भीतर बैचेनी के साथ जीवन और सृजन के प्रति गहरी आस्था भी थी
किताब पर बात करते हुए इरा भास्कर ने कहा कि महमूद फ़ारूक़ी की दास्तान-ए-गुरुदत्त पढ़ते हुए वे गुरुदत्त के जीवन, उनके संघर्ष और उनकी त्रासदी के भीतर तक चली गईं। उन्होंने कहा कि किताब बेहद संवेदनशील, संतुलित तरीक़े से और बिना किसी पूर्वाग्रह के लिखी गई है, जिसमें लेखक ने गुरुदत्त से भावनात्मक निकटता के बावजूद ज़रूरी आलोचनात्मक दूरी बनाए रखी है। यही वजह है कि यह किताब पाठक को गहराई से छूती है।
उन्होंने कहा कि गुरुदत्त का जीवन जितना आकर्षित करता है, उतना ही उनकी असमय मृत्यु विचलित भी करती है। ईरा भास्कर ने गुरुदत्त की तुलना पी.सी. बरुआ और ऋत्विक घटक जैसे फ़िल्मकारों से करते हुए कहा कि इन कलाकारों में एक तरह की बेचैनी दिखाई देती है, लेकिन इसके साथ ही उनके भीतर जीवन और सृजन के प्रति गहरी आस्था भी थी। उन्होंने कहा कि गुरुदत्त को सिर्फ़ एक दुखांत व्यक्तित्व के रूप में नहीं, बल्कि एक जुनूनी फिल्मकार और मानवीय भावनाओं के अद्वितीय शिल्पी के रूप में याद किया जाना चाहिए।
गुरुदत्त के सिनेमा पर बात करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी सबसे बड़ी विशेषता लाइट, संगीत और कैमरा-एंगल के जरिए मानवीय भावनाओं की कोरियोग्राफी रचना थी। गुरुदत्त ने हास्य, रोमांस और त्रासदी जैसे अलग-अलग सिनेमाई रूपों में असाधारण काम किया। प्यासा, कागज़ के फूल और साहब बीवी और ग़ुलाम जैसी फिल्मों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि गुरुदत्त का सिनेमा केवल निजी दुख का आख्यान नहीं, बल्कि आधुनिक भारत, स्त्री-अनुभव, सामाजिक बदलाव और मानवीय संवेदनाओं की गहरी पड़ताल है।
यह सिर्फ़ जीवनी नहीं, बल्कि हिन्दी सिनेमा के एक पूरे दौर का जीवंत दस्तावेज़
इस मौके पर प्रियदर्शन ने कहा कि महमूद फ़ारूक़ी की किताब दास्तान-ए-गुरुदत्त सिर्फ़ गुरुदत्त की जीवनी नहीं, बल्कि हिन्दी सिनेमा के एक पूरे दौर का जीवंत दस्तावेज़ है। उन्होंने कहा कि पुस्तक में जिस बारीकी, शोध और संवेदनशीलता के साथ गुरुदत्त के जीवन, उनके संघर्षों, रिश्तों और सिनेमा को दर्ज किया गया है, वह असाधारण है।
उन्होंने गुरुदत्त की फिल्मों में मौजूद गहरे यथार्थ और रोमानी संवेदना की चर्चा करते हुए कहा कि प्यासा जैसी फिल्में केवल सिनेमाई उपलब्धि नहीं, बल्कि जीवन और कविता के गहरे अंतर्द्वंद्व का रूप हैं। यह किताब गुरुदत्त और गीता दत्त के सम्बंधों के जटिल और उदास पक्ष को भी ईमानदारी से सामने लाती है। उन्होने कहा कि यह किताब सिर्फ़ एक कलाकार की कहानी नहीं, बल्कि आज़ादी के बाद बदलते भारतीय समाज, टूटते स्टूडियो सिस्टम और उभरते हिन्दी सिनेमा का भी आईना है। महमूद फ़ारूक़ी की मेहनत और उनके गहरे अध्ययन की सराहना करते हुए प्रियदर्शन ने कहा कि इस तरह की किताब लिखने के लिए विषय को पूरी तरह जीना पड़ता है और दास्तान-ए-गुरुदत्त उसी समर्पण का परिणाम है।
किताब पढ़ते हुए फ़ारूक़ी की आवाज़, लय और प्रस्तुति लगातार स्मृति में बनी रहती है
इस मौके पर सुदीप्ति ने कहा, दास्तान-ए-गुरुदत्त सुनना और इस किताब को पढ़ना, दोनों बिल्कुल अलग लेकिन समान रूप से गहरे अनुभव हैं। उन्होंने बताया कि जब उन्होंने पहली बार यह दास्तान सुनी तो उसके अंत तक पूरा सभागार भावनाओं में डूब गया था और लम्बे समय तक लोग मौन बैठे रहे। उनके अनुसार, महमूद फ़ारूक़ी ने गुरुदत्त की रचनात्मक बेचैनी, उनके जीवन के अंधेरे और उनकी संवेदनशीलता को जिस तरह दास्तान में रूपांतरित किया, वह असाधारण है।
उन्होंने कहा कि इस किताब को पढ़ते समय भी महमूद फ़ारूक़ी की आवाज़, लय और प्रस्तुति लगातार स्मृति में बनी रहती है, लेकिन किताब दास्तान से आगे जाकर पाठक को इतिहास, सिनेमा, रचनात्मक प्रक्रियाओं और उस दौर की सांस्कृतिक दुनिया को गहराई से समझने का अवसर देती है। उनके अनुसार, यह पुस्तक केवल गुरुदत्त की कहानी नहीं, बल्कि हिन्दी सिनेमा के बदलते दौर, स्टूडियो संस्कृति के अंत और नए फिल्मी सौंदर्यबोध के उदय का भी दस्तावेज़ है।
किसी कलाकार की रचनात्मक थकान को समझना आसान नहीं है
वहीं दास्तान-ए-गुरुदत्त के लेखक महमूद फ़ारूक़ी ने कहा कि इस दास्तान को तैयार करते समय उनका उद्देश्य गुरुदत्त के जीवन और सिनेमा को किसी अतिरिक्त रंग-रोगन या रोमानी मिथक में बदलना नहीं था, बल्कि उनके व्यक्तित्व और रचनात्मक जीवन के अंतर्विरोधों को ईमानदारी से सामने लाना था। उन्होंने कहा कि गुरुदत्त को केवल एक महान फ़िल्मकार के रूप में नहीं, बल्कि एक त्रासद, संवेदनशील और गहरे रोमानी व्यक्तित्व के रूप में भी देखा जाता रहा है, और उनकी दास्तान इसी द्वंद्व से बनती है।
सवाल-जवाब सत्र में महमूद फ़ारूक़ी ने कहा कि यह कहना मुश्किल है कि अगर गुरुदत्त अधिक समय तक जीवित रहते तो वे कैसी फिल्में बनाते, लेकिन इतना स्पष्ट है कि वे अपने जीवन के अंतिम वर्षों में बेहद थक चुके थे और गहरे मानसिक तनाव से गुजर रहे थे। उन्होंने कहा कि वहीदा रहमान सहित कई लोगों ने यह महसूस किया था कि गुरुदत्त जिस तरह का जीवन जी रहे थे, उसमें उनके भीतर जीने की इच्छा लगातार कम होती जा रही थी।
फ़ारूक़ी ने यह भी कहा कि किसी कलाकार की रचनात्मक थकान को समझना आसान नहीं है। उदाहरण देते हुए उन्होंने वी.एस. नायपॉल और पी.सी. बरुआ जैसे रचनाकारों का उल्लेख किया, जो अपनी रचना-प्रक्रिया के दौरान गहरे अवसाद, बेचैनी और मानसिक यातना से गुजरते थे, लेकिन बाद में उस स्थिति से बाहर भी निकल आते थे। उनके अनुसार, कुछ कलाकार अपने भीतर के अँधेरे से उबर जाते हैं, जबकि कुछ उसी में डूबते चले जाते हैं।
फ़ारूक़ी ने कहा कि समय के साथ उन्होंने गुरुदत्त को देखने का अपना नज़रिया बदला। युवावस्था में वे गुरुदत्त के ‘सेल्फ़-डिस्ट्रक्टिव-ऑर्टिस्ट’ वाले रोमानी व्यक्तित्व से प्रभावित थे, लेकिन बाद में उन्होंने उनके जीवन और सिनेमा को अधिक आलोचनात्मक और मानवीय दृष्टि से समझने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि गुरुदत्त के दुख को समझने के साथ-साथ यह भी ज़रूरी है कि हम उन्हें उनकी फ़िल्मों और उनकी रचनात्मक विरासत के ज़रिए याद करें।
