मेरी पहली यात्रा – राहुल सांकृत्यायन

मेरी पहली यात्रा - राहुल सांकृत्यायन

पढ़ने का काम मेरे लिए बिलकुल मुश्किल न था। वस्तुतः चार मास की पढ़ाई के लिए मेरे बारह मास यों ही बरबाद किये जा रहे थे। नाना को गप-शप की बहुत आदत थी, यह कह ही आया हूँ। घर में भी रहते वक्‍त, विशेषकर फुरसत के वक्‍त-और वह उनके पास काफी था, उन्हें देखना था, सिर्फ श्रोता को क्योंकि उसके बिना बात की नहीं जा सकती—नाना की पुरानी आप-बीतियाँ शुरू होतीं। जैसे निद्रित या मूर्छित अवस्था से बात का ताँता शुरू हो, और आदमी को मालूम न हो कि बात कब शुरू हुई, उसी तरह मेरे भी होश सँभालने से पहिले से वह कथाएँ होती चली आ रही थीं, और कब से मैंने नाना की कथाएँ सुननी शुरू कीं, इसका मुझे पता नहीं। जाड़े के दिनों में रात के वक्‍त खाना खा लेने के बाद आग के सामने ही बड़ी रात तक कथाएँ होतीं। सोने के समय भी उनका समय था। दोनों ही वक्‍त या तो नाना की बगल में या उनकी गोद में, मैं बैठा रहता। कहानियों के सुनने में जितना रस आता, उससे कम नाना की शिकार और यात्रा की बातों में न था। भारत के भूगोल को पढ़ने का मुझे पीछे मौका मिला, किंतु कामठी-अकोला-बुल्डाना-औरंगाबाद-बम्बई-शिमला ही नहीं, कोचीनबंदर और कौन-कौन पचासों नाम मैं सुन चुका था। सब मुझे याद थे। वस्तुतः भूगोल पढ़ने में नाना की ये ही कथाएँ दिलचस्पी पैदा करने का कारण हुईं। इन कथाओं में जहाँ व्यक्तियों, भिन्न-भिन्न प्रांतों और उनकी भाषाओं का ज़िक्र आता, वहाँ भूमि के प्राकृतिक स्वरूप का भी ज़िक्र होता। बाघ के शिकार में अर्दली होकर नाना बराबर अपने कर्नेल के साथ जाते थे। कैसे जंगलों और पहाड़ों में बाघ रहता है? कैसे स्वच्छन्द बाघ-परिवार किलोलें करता है? बाघ के शिकार में कितना तद्दुद (दुविधा) और जोखिम उठाना पड़ता है?—इन बातों के जानने का उनकी बातों में काफी मसाला होता था।

नाना की पल्टन हैदराबाद की जालना छावनी में थी। नाना कई बार अजंता, एलौरा, और औरंगाबाद की गुफाओं का दूसरे नामों से वर्णन करते। एलौरा और अजंता की गुहामूर्तियों के बारे में उनका कहना था—रामजी वनवास को जाएँगे यह खयाल कर विश्वकर्मा ने पहाड़ काटकर ये महल बनाये, कि इनमें देवता लोग वास करेंगे, और रामजी को वनवास में कष्ट न होगा; किंतु महल बनाकर जब तक विश्वकर्मा ब्रह्मा को खबर देने गये, तब तक राक्षसों ने आकर उन महलों में डेरा डाल दिया। लौटकर विश्वकर्मा ने देखा, उन्हें बहुत क्रोध आया; और शाप दिया—जाओ तुम सब पत्थर हो जाओ। नाना की परम्परा के अनुसार अजंता-एलौरा की गुहामूर्तियाँ वही पथराये राक्षस हैं। वे बड़ी गम्भीरता से भौंहों को तानकर नानी से कहते, ”जो राक्षस जहाँ जैसे रहा, वह वैसा ही वहाँ पत्थर हो गया। शराब पीनेवाले की बोतल वैसी ही हाथ और मुँह में लगी रही। नाचनेवाले वैसे ही नाचते रहे। सोने-बैठनेवाले वैसे ही सोये-बैठे रहे। आज भी देखने से मालूम होता है, अभी उठकर बोल देंगे।” नानी प्रोत्साहन दे कहतीं, “क्या जाने शाप छूट जाये, तो वे फिर ज़िंदा हो जावें।”

पंदहा में एक और व्यक्ति थे, जिनकी बातें सुनने में मुझे बड़ा मजा आता था, वह थे जैसिरी (जयश्री पाठक)। थे तो वह काने, और ऐसे आदमी को ज़रा-सी बात में भी काना कहकर ताना मारना लोगों को आसान मालूम होता है, किंतु जैसिरी1 के बारे में वैसा कहते मैंने किसी को नहीं सुना। घुटने तक की साफ धोती, देह पर या शिर में बँधा एक वैसा ही साफ अँगोछा, पैर में बाधा-खड़ाऊँ, हाथ में बाँस का छाता या डंडा लिये उनकी पतली, किंतु स्वस्थ सबल मूर्ति अब भी मेरे सामने है। जिस समय की बात मैं कर रहा हूँ, उस वक्‍त वह चालीस से ऊपर के हो चुके थे; किंतु बचपन से अब तक वह बराबर चरवाही करते चले आये थे, और आगे भी करते रहे। इसीलिए मैंने जब भी उनको देखा, चरवाहे लड़कों की ही मंडली में। कहानियाँ उन्हें बहुत याद थीं, और वर्षों से जिस तरह से श्रोताओं को वह सुनाई जा रही थीं, उससे मँजी-तुली और मनोरंजक बन गयी थीं। नाना तो मुझे सदर-आला या डिप्टी-कलेक्टर बनाना चाहते थे, इसलिए घास छीलने या भैंस चराने का मौका क्‍यों देने लगे? तो भी किसी न किसी बहाने मुझे दो-चार बार जैसिरी की मंडली में शामिल होने का मौका ज़रूर मिला। चरवाही से छुट्टी रहने पर जैसिरी को कभी-कभी रामायण, का अर्थ करते भी मैंने सुना था। कुल्हाड़ में आग तापते हुए भी उनकी बातें मैंने सुनी थीं। उस समय इस असाधारण प्रतिभा के धनी किंतु अवसर से वंचित व्यक्ति को, एक मनोरंजक आदमी के तौर पर जानता था, किंतु अवसर मिलने पर वह क्या बनता, इसका खयाल कर अफसोस तो दुनिया देख लेने पर होने लगा।

शायद 1902 के ही अप्रेल में मेरा जनेऊ हुआ। आमतौर से हमारे परिवार में धूमधाम से जनेऊ हुआ करता था। मंडप बनाया जाता, कलशा सजाया जाता; आम के नये पीढ़े और पट्टी—लिखने की—तैयार की जाती; पंडित आते; देर तक देवताओं की पूजा और मंत्रोचारण होता, लड़के को धोती-लँगोटी पहना, कंधे पर मृगचर्म बाँध, हाथ में पलाश का दंड दे ‘काशी पढ़ने के लिए भेजा जाता’, हाँ, और चंद ही मिनटों बाद उसी मंडप के एक कोने से यह कहकर लौटा लिया जाता— चलो लौट चलो, तुम्हारा ब्याह कर देंगे।

मुझे बहुत असंतोष हुआ, जब सुना कि मेरा जनेऊ गाने-बजाने, धूम-धाम के साथ घर पर नहीं बल्कि विंध्याचल में होगा। माँ ने या किसी ने दीर्घायु होने के खयाल से वैसी मिन्नत मानी थी, इसलिए दूसरा करके विंध्याचल की जागता देवी के कोप का भाजन कौन बनता? लाचार, एक दिन मेरे चचा प्रताप पांडे—वह मेरे पिता से छोटे थे—मुझे पंदहा लिवाने आये। अप्रैल का महीना था, गर्मी थोड़ी-थोड़ी शुरू हुई थी। पहिले हम लोग कनैला गये, वहाँ से चौदह मील चलकर सादात स्टेशन। कह नहीं सकता, उस वक्‍त तक रानी की सराय रेल पहुँच गयी थी। सम्भवतः रेल के लिए ज़मीन नप गयी थी। मैंने रेल की सवारी अभी तक नहीं की थी। सादात हम दो ही तीन बजे दिन को पहुँच गए थे और रेल सूर्यास्त के बाद आने वाली थी। चचा के पास एक गठरी, कम्बल, लोटा-डोर के अतिरिक्त हाथ में सेर-डेढ़ सेर गाय का घी मिट्टी के बर्तन में था। गाय के घी ही में पूड़ी पकाकर विंध्याचल में ब्रह्मभोज कराना था। शाम को सादात के पोखरे पर—स्टेशन के पास ही—चचा ने दाल-बाटी बनायी, शायद आलू का भर्ता भी था। भोजन हुआ। गाड़ी आने पर सवार हुए। भीड़ थी या नहीं इसका मुझे स्मरण नहीं, यह भी याद नहीं कि रेल के ‘चलते हुए घरों में’ बैठकर मुझे क्या-क्या खयाल आ रहा था।

रात थी जब हम अलईपुर (बनारस शहर) स्टेशन पर उतरे। शहर में घुसने से पहिले चुंगीवाले ने घेरा। और भी बहुत-से दिहाती मुसाफिर थे। कुछ देर इंतिज़ार करने के बाद हमारी बारी आयी। पोटरी खोलकर देखी गयी, शायद घी पर कुछ चुंगी लगी। पिता के मामा ईसरगंगी पर एक छोटे-से वैरागी महंथ थे, वहीं हम लोग ठहरे।

बनारस से विंध्याचल तक की सभी बातें क्रमशः याद नहीं हैं। ईसरगंगी मठ में आते-जाते दोनों बार हम ठहरे थे। अब तक रानी की सराय ही मेरे लिए शहर था। वहाँ के लड़कों को एक खूँट एड़ी, और दूसरा फांड घुटने तक रखकर धोती, नाखूनी किनारे की बूटेदार टोपी पहिने देख, मैं उन्हें नागरिकता का चरम नमूना समझता था। हम दिहातवाले जिसे ‘धरना’ कहते थे, उसे रानी की सराय के हमारे साथी ‘पकड़ना’ कहते, और इसे हम पूर्ण नागरिक भाषा की बानगी समझते थे। फिर अब छोटे-मोटे शहरों से न गुज़रकर सीधा बनारस जैसे महान्‌ नगर में पहुँच जाना—मेरे लिए बड़े कौतूहल की बात थी। मीलों चली गयी उसकी सड़कें, गलियाँ और उनके किनारे के आलीशान मकान—जिनकी ऊपरी छत को देखने में बाबू पत्तरसिंह के कथनानुसार शिर की पगड़ी गिर जाती थी—मेरे लिए बिलकुल दूसरी दुनिया की चीज़ें थीं। सबेरे चचा मुझे ले पंचगंगा घाट नहाने गये। गंगा जैसी बड़ी नदी पहिले-पहिल देखी, और फिर उस पर के पत्थर के घाट, जिनकी सीढ़ियाँ उतरने में खतम ही नहीं मालूम होती थीं। शायद हमारे साथ मठ का कोई साधु भी था, क्योंकि चचा जैसे अटट दिहाती के साथ घाटियों की छीना-झपटी का मुझे स्मरण नहीं है। चचा ने हाथ पकड़े हुए मुझसे गंगा में डुबकी लगवायी। विश्वनाथ और अन्नपूर्णा का दर्शन हुआ। फिर चौक के रास्ते जब लौट रहे थे, तो वहाँ मैंने किसी बिसाती की चद्दर पर शीशा, कंघी और क्या-क्या चीजों के साथ लिथों में छपी कुछ उर्दू की पुस्तकें देखीं। शायद चचा भी वहाँ से कुछ खरीद रहे थे। मैंने देखा कि उन किताबों में कुछ किस्से और कुछ उर्दू हरफ में छपे तुलसीकृत रामायण के भिन्न-भिन्न कांड थे। चचा ने दो या चार पैसे में एक-दो किताब मेरे लिए खरीद दी, लेकिन मेरी इच्छा उतने से पूरी होनेवाली नहीं थी।

दूसरे दिन सबेरे, चचा मुँह धोने या किसी से बात करने में लगे थे, मैं चुपके से निकला। मठ के दरवाज़े से बाहर वह पत्थर का शेर था, जिसके लिए पिछले सालों हिन्दू-मुसल्मानों का झगड़ा होने लगा था; और अब वह कठघरे के अंदर चबूतरे पर रखा है। उस वक्‍त उस शेर को कोई नहीं पूछता था, रास्ते की बगल में आधा धरती में दबा और आधा ऊपर पड़ा हुआ था। वहाँ से होते सड़क पर आया, और फिर सीधे चौक। रास्ते में कई जगह मुड़ना था, किंतु मालूम होता है, वह सारे मुड़ाव मेरे दिमाग पर नक्श थे। मैंने न खिलौने लिये, न मिठाई, सीधे जा बिसाती से दो-दो पैसे में पाँच या सात किताबें खरीदीं, और फिर लौट पड़ा। दो तिहाई रास्ता पार करके जब मैं आ रहा था, तो चचा हैरान-परेशान मिले। लोग बहुत शंकित हो उठे थे। बनारस जैसे ‘राँड़-साँड़-सीढ़ी-संन्यासी’ वाले शहर में एक दिहाती भटकते लड़के के लिए और दसरी आशा ही क्‍या हो सकती? मार नहीं पड़ी, सिर्फ डाँटे ही भर गये, चचा के लिए खोये लड़के का मिल जाना ही भारी प्रसन्नता की बात थी।

एक तरह मेरी साहसपूर्ण यात्राओं का क-ख यहीं से शुरू हुआ।

राजघाट के पुल-पार का मुझे स्मरण नहीं। मुगलसराय में गाड़ी बदलने का कुछ खयाल जरूर है। विंध्याचल में स्टेशन से उतरकर हम अपने पंडे के पास गये। बस्ती के बारे में मुझे इतना ही याद है, कि वहाँ की कितनी ही दीवारें मिट्टी की जगह पत्थर की ईटों की थीं। विंध्याचल की भगवती दिन में तीन रूप धारण करती हैं—सबेरे बालिका, दोपहर को तरुणी, शाम को वृद्धा। मालूम नहीं मुझे भगवती के किस रूप का दर्शन मिला। मंदिर में उत्कीर्ण अक्षरवाले कितने ही बड़े-बड़े घंटे टँगे थे। पास के आँगन में बलि दिये बकरों के खून की पॉक-सी पड़ी हुई थी।

भगवती के नाबदान में नया जनेऊ डुबोया गया, और मेरे गले में डाल दिया गया। बस जनेऊ की विधि समाप्त।

लौटकर हम बनारस में फिर ईसरगंगी मठ में ठहरे। मठ में एक गुफा है। लोग बतला रहे थे, यह पातालपुरी गुफा है, इस रास्ते आदमी पतालपुरी पहुँच जाता है; किंतु आजकल सरकार ने भीतर से रास्ते को बंद कर दिया है, सिर्फ बाहर से दर्शन होता है। बाहर से दर्शन मैंने भी किया। मठ की एक कोठरी में 14-15 वर्ष की उम्र का एक संस्कृत का विद्यार्थी रहता था। उसने वहाँ की बातों का परिचय देने में मेरी बड़ी सहायता की। मठ में तो पानी का नलका नहीं था, किंतु सड़क पर शेर के मुँहवाले नलकों को मैंने देखा था। मेरा साथी बतला रहा था, है तो गंगाजल ही, किंतु उसके पानी से धर्म चला जाता है, क्योंकि उसके भीतर चमड़ा लगा हुआ है। उसने ‘ओले’ का शर्बत पिलाया, सचमुच ही वह बहुत मीठा और ठंडा मालूम हुआ। मठ के हाते में पीछे की ओर इमली के वृक्षों के नीचे कुछ स्त्री-पुरुष रेशम का ताना-बाना करते थे। उन्होंने कुछ टूटे धागे मुझे दिये थे, और उन रंगीन चमकते धागों को मैं अपने साथ घर ले आया था। मठ की बगल में जगेसरनाथ का मंदिर था। उनकी विशाल-पिंडी का दर्शन करते वक्‍त मुझे बतलाया गया, कि बाबा हर साल जौ-भर मोटे हो जाते हैं।

बनारस से हम दिन की गाड़ी में लौटे थे, इसलिए सारनाथ पार होते लोगों के इशारा करते वक़्त मैंने भी ‘लोरिक की धमाक’ (धमाक स्तूप) को देखा। लोरिक अहीर का नाम शायद मैं सुन चुका था। लोग बतला रहे थे, लोरिक दोनों हाथों में दो घड़ा भैंस का दूध दुहकर एक धमाक (चौखंडी) से दूसरे पर कूद जाता था।

लौटकर मैंने अपने स्कूल में अपने से अगले दर्जे के लड़के राजाराम—जो रानी की सराय के डाकमुंशी का बेटा था, और अँगरेजी अक्षर लिख लेता था—से पूछा, कि ईसरगंगी के विद्यार्थी मित्र को मैं कैसे पत्र भेज सकता हूँ। उसने बड़ी संजीदगी के साथ पूछा,”पता बनारस छावनी है या शहर?” मुझे नहीं याद मैंने उसका क्या जवाब दिया। उसके बताये अनुसार एक पोस्टकार्ड— जिसका दाम उस वक्‍त एक पैसा था—मैंने भेजा ज़रूर, किंतु उसका जवाब कभी नहीं आया, शायद वह पहुँचा भी नहीं।

समाप्त

1सतमी के बच्चे कहानी संग्रह में इन्हीं को लेकर राहुल सांकृत्यायन ने ‘जैसिरी’ नाम से कहानी लिखी है।

(राहुल सांकृत्यायन की आत्मकथा मेरी जीवन यात्रा से।)


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