1
कुमार कश्यप जब बहुत बुलंदी पर थे, तब उनसे हमेशा मेरठ में किसी न किसी प्रकाशक के यहाँ ही मिलना हुआ, पर जब भी वह मिलते हमेशा जल्दी में रहते थे, ‘नमस्ते — जय राम जी की’ से आगे बात कम ही बढ़ी।
आम तौर पर उन्हें बाहरी चाय की दुकान पर चाय पीते कभी देखा नहीं, पर एक बार सुबह-सुबह वह ईश्वरपुरी के बाहर ही गिरधारी चाय वाले की दुकान पर दिख गये।
मेरठ में ईश्वरपुरी के बाद अगली ही गली हरिनगर की है, जिसका पहला और काफी बड़ा मकान मेरे मामाओं का था। मकान के चार हिस्सों में मेरे चार मामा रहते थे, जिनमें दूसरे नम्बर के मामा रामाकांत गुप्ता के यहाँ मैं ठहरा हुआ था।
मैं उन्हीं के यहाँ से बाहर सिगरेट फूँकने के लिए निकला था, तब मैं सिगरेट पीने लगा था, किंतु बड़ों के सामने… न बाबा न, इतना मॉडर्न और बेहिचक नहीं हुआ था।
गिरधारी चाय वाले की दुकान पर मैं सिगरेट लेने ही पहुँचा था कि बेंच पर बैठे कुमार कश्यप जी की आवाज आयी, “आओ योगेश जी, आओ। चाय पीते हैं।”
हमने चाय पी। सिगरेट भी पी। पैसे कुमार कश्यप जी ने ही दिये।
मेरे बहुत कहने पर भी उन्होंने मुझे नहीं देने दिये।
दरअसल कुमार कश्यप जी को जिस पब्लिशर से मिलना था, उसका ऑफिस तब तक खुला नहीं था, इसलिए हमारे बीच औपचारिकता से आगे बढ़ने की शुरुआत हो गयी।
उस दिन हमारे बीच काफी बातें हुईं।

2
उसके बाद हम इटावा में मिले। तब मेरे सबसे बड़े बहनोई शांतिभूषण जैन इटावा में यूपी रोडवेज़ में आर. एम. की पोस्ट पर थे। बहन का घर रेलवे स्टेशन के पास ही था।
मैं दिल्ली वापस जाने के लिए रेलवे स्टेशन पहुँचा ही था कि उसी समय किसी ट्रेन से वापस लौटे कुमार कश्यप जी की नज़र मुझ पर पड़ी, “अरे योगेश जी।”
कुमार कश्यप आवाज देकर मेरे निकट आये। छोटा सा पिट्ठू बैग उनके कंधे पर था, पर दायाँ हाथ पैंट की जेब में था।
“खूब मिले यार, आओ, घर चलते हैं।” बायें हाथ से मुझे समेट कर सीने से लगाते हुए कुमार कश्यप जी ने कहा तो मैं बोला, “नहीं यार, काफी दिनों से यहीं इटावा में था। अब दिल्ली जा रहा हूँ।”
“अरे, इटावा में थे और हमसे नहीं मिले।”
“मुझे आपका पता नहीं मालूम था।”
“अरे तो यहाँ स्टेशन में किसी से पूछ लेते। किसी नॉवल में देख लेते।”
मैंने क्षमा माँगते हुए कहा, “दरअसल मुझे यह भी नहीं पता था कि आप इटावा में रहते हैं। कभी एड्रेस वाले हिस्से पर नज़र ही नहीं डाली।”
“ठीक है, दिल्ली वाली ट्रेन तो लेट है।” किसी एनाउंसमेंट पर कान देते हुए कुमार कश्यप बोले, “चलिये, एक-एक पैग हो जाये।” और कुमार कश्यप ने दाँया हाथ पैंट की जेब से बाहर निकाला तो हाथ में एरिस्टोक्रेट का क्वार्टर था।
मैंने बहुत मना किया, पर कुमार कश्यप ने कहा, “एक-एक पैग ही तो पीना है — दोस्ती के नाम पर। फिर हम घर चले जाएँगे, आप दिल्ली चले जाइयेगा, पर दोबारा जब भी इटावा आएँ, एक फोन मार दीजियेगा या यहीं स्टेशन पर किसी को बोल दीजियेगा, हमें खबर हो जायेगी।”
और तब मैंने एक खास बात नोट की कि इटावा रेलवे स्टेशन पर बहुत सारे लोग कुमार कश्यप जी को जानते थे।
एक दुकान पर पहुँच कुमार कश्यप जी एक ठंडी थम्स अप की बोतल उठाई। दो काँच के गिलास उठाये और दो ही गिलासों में क्वार्टर खाली कर थम्स अप मिला, एक गिलास खुद थामा, एक मुझे दिया। गिलास टकराये। चीयर्स किया और गिलास मुँह से लगा, एक ही साँस में गिलास खाली कर दिया।
मेरा गिलास तब तक होंठों तक भी नहीं पहुँचा था। यह देख बोले, “सोच क्या रहे हो, गटक जाओ।”
और मैं गटक गया।
तभी वहाँ कुछ कम उम्र नौजवान आये और एकदम कुमार कश्यप के पाँवों पर झुक गये।
कुमार कश्यप ने उनसे कहा, “अरे सिर्फ हमारे ही पाँव छुओगे। हमारे साथ ये महागुरू हैं। इनके भी पाँव छुओ।”
कुमार कश्यप जी की आवाज़ में अधिकार भरा रुआब था।
उन बच्चों ने जिन्हें मैं जानता भी नहीं था और जो मुझे नहीं जानते थे, कुमार कश्यप जी के कहने पर मेरे पाँव छुए और मैंने आशीर्वाद दिया।
उसके बाद काफी देर तक हम गपशप करते रहे, जब मेरी ट्रेन आने का एनाउंसमेंट हुआ, तब कुमार कश्यप ने ‘बाय बाय’ कर विदा ली।

3
उसके काफी दिनों बाद या शायद लगभग दो वर्ष बाद दिल्ली में एक दिन जब मैं मनोज पॉकेट बुक्स की दुकान में होने के बाद नारंग पुस्तक भंडार के चंदर से गुफ्तगू करने के बाद, गर्ग एंड कम्पनी के ज्ञानेंद्र प्रताप गर्ग से धौल-धप्पा करने के बाद मैं आगे बढ़ रहा था कि हीरा टी स्टाल के सामने कुमार कश्यप।
नजरें मिलीं। यहाँ कहाँ… दोनों ने एक दूसरे से पूछा। फिर कुमार कश्यप ने मेरा हाथ थाम मुझे हीरा टी स्टाल में घसीट लिया।
चाय पीते पीते कुमार कश्यप जी ने बताया कि डायमंड में गुलशन जी से मिल कर आ रहे हैं।
“बात बनी…?” मैंने पूछा।
“शायद बने… शायद न बने।” कुमार कश्यप जी ने कहा।
“क्यों…?”
“बात अटकेगी तो शायद पेमेंट पर आकर अटकेगी। ये दिल्ली वाले पैसे बहुत कम देते हैं।”
“हाँ…।” मैंने स्वीकार किया।
दिल्ली वालों के बारे में मुझसे बेहतर और कौन जानता था।
फिर अचानक ही कुमार कश्यप ने मुझसे कहा, “मनोज में तो आपकी काफी वाकफियत है।”
“वाकफियत ही नहीं, मैं तो उनके लिए परिवार के एक सदस्य जैसा हूँ। मिलना हो तो चलो, अभी मिलाता हूँ,” मैंने कहा।
“नहीं, अभी नहीं। पहले आप वहाँ बात कर लें।”
“घबराइये नहीं, हम वहाँ आपकी नाक नीची नहीं होने देंगे,” मैंने कहा। दरअसल मुझे याद आ गया था कि कुछ दिनों पहले राज कुमार गुप्ता जी ने और गौरी शंकर गुप्ता जी ने दो अलग अलग अवसरों पर मुझसे पूछा था कि ‘यह कुमार कश्यप कैसा लिखता है’ और मैंने कुमार कश्यप जी की तारीफ ही की थी।
चाय के पैसे कुमार कश्यप जी ने ही दिये, किंतु दरीबे से शक्ति नगर अग्रवाल मार्ग तक आटो का किराया मैंने कुमार कश्यप जी के जबरदस्त विरोध के बावजूद अदा किया।
और मनोज में उन्हें ले जाकर राज और गौरी भाईसाहब से कहा, “भाई साहब! आप कुमार कश्यप जी के बारे में पूछ रहे थे ना, लीजिए आज मैं जबरदस्ती पकड़ ही लाया।”
बाद में कुमार कश्यप ने मनोज में विनय प्रभाकर नाम के लिए कुछ उपन्यास लिखे।
समाप्त
(6 जून 2020 को लेखक की फेसबुक वॉल पर प्रकाशित)
