कहानी लेखक क्या लेखक भी मैं कैसे बना, इसे कहना मेरे लिए मुश्किल है। मेरे दिल में यह पहले कभी खयाल भी नहीं आया था कि मैं लेखक बनूँ। जब मैं निजामाबाद (आजमगढ़) में उर्दू- मिडिल का विद्यार्थी था, उस समय रसमी तौर पर निबंध लिखना पड़ता था। मेरे अध्यापक कोई विषय देते, और उसके ऊपर हम विद्यार्थी दो तीन पृष्ठ लिख लाते। मुझे अपने लेख पर कोई अभिमान न था, और अध्यापक की कुछ तारीफ को मैं कोई महत्व नहीं देता था। मुझे हाथ से नक्शा भी बनाना पड़ता था। मैं नक्शा बनाकर उसमें हरे-लाल रंग भर देता। नक्शे के बारे में मैं निश्चित जानता था कि वह बिलकुल गलत है इसलिए उसके बारे में कोई अभिमान नहीं कर सकता था। लेकिन हमारे अध्यापक (बाबू जगन्नाथ राय) तारीफ किए बिना नहीं रहते और दूसरे विद्यार्थियों के सामने मेरे नक्शे को आदर्श के रूप में पेश करते। मैं मन में केवल मुस्कुरा देता। उस समय भी मेरी यदि लालसा थी, तो घुमक्कड़ बनने की और कुछ ज्ञान अर्जन करने की। लेखक तो समझता हूँ, संयोग से ही मैं बन गया। यात्री लोग यात्रा के बारे में पूछा ही करते हैं, और हर यात्री श्रोताओं की जिज्ञासा पूरी करने के लिए कुछ कहता भी है। ऐसा कहना तो मेरा पहले से ही जारी रहा होगा। 1915 ई. में जब मैं आगरा में था, वहाँ ज़बरदस्ती कलम पकड़ा दी गयी। वहाँ मैं उपदेशक बनने गया था और मुझे व्याख्यान देने तथा शास्त्रार्थ करने की कला सिखाई जाती थी। वहाँ से एक उर्दू अखबार निकलता था। उसी में खंडन-मंडन के रूप में आर्यसमाजी ढंग का कोई लेख पहले-पहल मुझे लिखने के लिए कहा गया था। उससे उत्साहित होकर मैंने कहा — एक कदम आगे और बड़ा जाए। मुझे मालूम नहीं था कि मेरे सहपाठियों में— जिनमें सभी मिडिल पास या फेल थे — किसी का कोई लेख उसे समय तक हिंदी पत्र पत्रिका में छपा था। 1915 ई. में ही मैंने पहला हिंदी लेख लिखा था, जो कि आधा कहानी और आधा यात्रा के रूप में था। अधिकतर एक यात्र-वर्णन जैसा ही। सैंतीस वर्ष हो गए, उसके बाद फिर मैं उस लेख को देख नहीं पाया। वह मेरठ से निकलने वाले मासिक पत्र ‘भास्कर’ में छपा था। पहले छापे लेख को देखकर मुझे भी प्रसन्नता हुई।
1915 ई के बाद बहुत वर्षों के लिए मेरी लेखनी हिंदी में विश्राम होने लगी, वैसे भाई महेश प्रसाद (मौलवी फाजिल) मेरे पथ प्रदर्शक और अरबी के गुरु थे, वह पत्रिकाओं के लिए कुछ ऐतिहासिक कहानी लिखते थे, जिनमें अपनी संस्कृति और हिंदी की योग्यता के कारण मैं सहायता ज़रूर देता था, किंतु स्वयं नहीं लिखता था। अगले चार-पाँच सालों तक जब-तब मैंने लाहौर के उर्दू पत्रों में आर्यसमाजी ढंग के कुछ लेख जरूर लिखें, लेकिन हिंदी के लेख 1920 ई. में ही जालंधर कन्या विद्यालय से निकलने वाली ‘भारती’ के लिए लिखे। वे कुशीनगर, लुम्बिनी, जेतवन-श्रावस्ती, वैशाली, नालंदा-राजगीर के बौद्ध तीर्थ स्थानों की यात्रा के सम्बंध में थे। यात्रा लिखने का शौक कुछ ही कुछ पैदा होने लगा था।
1921 ई. में असहयोग आंदोलन में तथा राजनीतिक क्षेत्र में काम करने लगा। अब कार्यक्षेत्र था—बिहार का छपरा जिला। उस समय लिखने की न कोई इच्छा होती थी और न ज़रूरत ही, यद्यपि मेरी हिंदी अधिक स्वभाविक हो गयी थी, लेकिन मुझे याद नहीं कि अपने राजनीतिक जीवन के समय छपरा में मैंने कभी भोजपुरी छोड़कर हिंदी में भाषण दिया हो। 1921 ई. के अंत में मुझे सज़ा हुई और छह महीने के लिए जेल चला गया। वहाँ अब लिखने-पढ़ने का समय मिला, और मैंने कलम उठाई। यहीं कथा लिखने में पहले-पहल हाथ लगा। यद्यपि उसका उद्देश्य कहानी या कथा लिखना नहीं था। जैसे यात्री होने के कारण उसके बारे में मैंने कुछ लिखना शुरू किया था, उसी तरह 1918 और 1919 ई. में रूसी क्रांति की जो थोड़ी-बहुत खबरें ग़लत या सही हिंदी-पत्रों में निकलती, उनमें कल्पना की नमक मिर्च लगाकर मैंने अपने मन में एक साम्यवादी दुनिया की सृष्टि कर ली थी। उसी दुनिया को मैं काग़ज़ पर उतारना चाहता था। साम्यवाद का सैद्धांतिक ज्ञान उस समय मेरे पास कुछ नहीं था, इसीलिए मेरा साम्यवाद यूटोपियन साम्यवाद था, मुझे व्यावहारिक कठिनाइयों का कोई पता नहीं था। अभी मैं समझ नहीं पाया था कि साम्यवाद के वाहक साधारण मज़दूर और किसान हैं, जिन्हें अक्षर से भी कम सरोकार नहीं है। किस तरह साम्यवाद भारत में स्थापित हो, इसे संस्कृत श्लोकों में लिखना शुरू किया। खैरियत यही हुई कि मैं छह महीने के लिए ही जेल गया था, जिसमें संस्कृत रचना के लिए सारा समय दे भी नहीं सकता था। जेल के साथियों में कोई उपनिषद पढ़ता, तो कोई किसी दूसरी पुस्तक को, इसके कारण समय थोड़ा ही रहता। इस प्रकार संस्कृत में पद्यबद्ध कथा लिखने का काम थोड़े ही दिनों चलकर रुक गया। 1922 ई. के जून या जुलाई में जेल से छूटकर में बाहर आया, उसके बाद के छह महीने फिर कांग्रेस के कामों में लगे। पटना में प्रांतीय कांग्रेस कमेटी की बैठक थी, वहीं गुलाब बाग में एक सार्वजनिक सभा हुई। चौरी-चौरा कांड के सिलसिले में कई देशभाइयों को फाँसी की सज़ा दी गयी थी। राजनीति में एकांत अहिंसा पर मेरा कभी विश्वास नहीं था, इसलिए चौरी-चौरा के दंडित देशभक्तों की प्रशंसा में मैंने भी गरमा गरम भाषण किये।
उक्त व्याख्यान के बाद ही डेढ़ महीने के लिए मैं नेपाल चला गया— शायद 1923 ई. का फरवरी-मार्च का महीना था। छपरा के मित्रों ने सूचित करने के लिए नेपाल चिट्ठी भी भेजी थी कि आपके खिलाफ वारंट है। वह चिठ्ठी नहीं मिली, नहीं तो नेपाल में तिब्बत जाने का इतना आकर्षण और निमंत्रण प्राप्त हो गया था कि भारत आने की जगह उधर ही चला गया होता। खैर, लौटने के बाद गिरफ्तार हुआ, मैंने अपराध स्वीकार किया और पटने में दो साल की सादी सज़ा लेकर जेल में चला गया। 1923-25 ई. तक जेल जीवन में मैंने काफी कलम चलायी। यद्यपि वहाँ लिखी और अनूदित बारह-तेरह पुस्तकों में बहुत थोड़ी ही बचकर प्रकाशित हो पायीं, लेकिन अब से लिखने को भी मैंने अपने जीवन के कार्य में शामिल कर लिया। बक्सर की पहली जेल-यात्रा में जिस कथा को मैंने संस्कृत काव्य के पाँच सर्गों तक पहुँचाया था, अब उसे बेकार समझ उसकी जगह मैंने हज़ारीबाग में ‘बाइसवीं सदी’ लिखी। ‘बाइसवीं सदी’ को उपन्यास कह लीजिए या बड़ी कहानी या समाजवादी उटोपिया, वही मेरा पहला कथात्मक ग्रंथ है। जेल में मैंने चार अंग्रेजी उपन्यास ‘जादू का मुल्क’, ‘सोने की ढाल’, ‘विस्मृति के गर्भ में’, ‘शैतान की आँख’ का भावानुवाद करके भौगोलिक और वैयक्तिक तौर से उनका बहुत कुछ भारतीयकरण कर दिया। इस काम को मैं निष्काम भाव से कर रहा था, मैं यह नहीं समझता था कि वे किताबें कभी प्रेस का मुँह देखेंगी। जेल से जब कोई बाहर निकलता, उसके हाथ कुछ किताबें मैं बाहर भेज देता। मैं समझता, यदि नष्ट भी हो गयीं, तो कोई परवाह नहीं, मेरा अभ्यास तो हो रहा है।
भाई पारसनाथ त्रिपाठी सालभर जेल में मेरे साथ थे, उन्हें अंग्रेजी पढ़ाने के लिए मैंने हज़ारीबाग के जेलर के पास से कुछ अंग्रेजी उपन्यास मँगवाए थे, उन्हीं में ये भी थे। पढ़ाते वक्त खयाल आया कि ऐसे साहसपूर्ण उपन्यास हिंदी में भी हों तो अच्छे। इसलिए मैंने उनका रूपांतर किया था। मूल लेखकों का नाम खो गया और प्रकाशकों ने उन्हें इस तरह छापा, जिसमें मालूम हो कि वह मेरे मौलिक उपन्यास हैं।
1925 ई. के किसी समय जेल से निकलने पर फिर कुछ समय राजनीतिक काम और कुछ समय पंजाब और लद्दाख की यात्रा में लगे। पंजाब और लद्दाख की यात्रा के सम्बंध में मैंने कितने ही लेख लिखे। यात्रा और कथा कहानी का बहुत नज़दीकी सम्बंध है। यात्री होने के कारण यात्रा पर लिखने का मुझे शौक भी था। भारत की यात्राओं को समाप्त कर 1927 ई. में सीलोन जाकर डेढ़ वर्ष रहा, वहाँ से भी यात्रा के सम्बंध में ही अधिकतर लिखता रहा।
तिब्बत की प्रथम यात्रा करके लौटने पर मित्रों का आग्रह हुआ कि मैं उसे यात्रा को लेखबद्ध करूँ, जिसका परिणाम हुआ ‘तिब्बत में सवा वर्ष’। इसके बाद तो यात्राओं का ही सिलसिला 1938 ई. तक रहा और उनके बारे में मैं लिखता भी रहा। यात्राओं के लिखते ही लिखते 1935 ई. या 1934 ई. में कुछ वास्तविक घटनाओं को लेकर कहानी लिखने की इच्छा हुई और एक-एक करके मैंने उन कहानियों को लिखकर पत्रिकाओं में भेजा, जो कि ‘सतमी के बच्चे’ में संगृहीत हैं। उनमें ‘स्मृतिज्ञान कीर्ति’ ही एक पुरानी ऐतिहासिक कहानी है, जिसकी सामग्री तिब्बत में मिली थी, बाकी सभी कहानियों के नायक मेरे बचपन के परिचित थे। इस प्रकार ‘बाइसवीं सदी’ के बाद ‘सतमी के बच्चे’ और उसके साथ की और कहानियों को लिखकर मैंने कथा क्षेत्र में प्रवेश किया।
1938 ई. में किसान आंदोलन के सम्बंध में फिर जेल में जाना पड़ा, वहाँ मिले समय का इस्तेमाल करके मैंने ‘जीने के लिए’ नामक अपना पहला उपन्यास लिखा, जिसमें वर्तमान शताब्दी की राजनीतिक और सामाजिक पृष्ठभूमि को लेते हुए एक संघर्षमय जीवन का चित्र खींचा गया है। इसके बाद उपन्यास लिखने की ओर मेरी रुचि बड़ी, लेकिन जल्दी ही मुझे मालूम हो गया की ऐतिहासिक उपन्यासों को लिखना ही मुझे अपने हाथ में लेना चाहिए। कारण एक तो यह की इस तरह के उपन्यास लिखने में जितने परिचय और अध्ययन की आवश्यकता है, वैसे उपन्यास लेखक हिंदी में अभी कम हैं; दूसरा यह भी की अतीत के प्रगतिशील प्रयत्नों को सामने लाकर पाठकों के हृदय में आदर्शो के प्रति इस प्रकार प्रेरणा भी पैदा की जा सकती है। मेरे उपन्यासों या कहानियों में प्रोपेगैंडा के तत्व को ढूँढने के लिए बहुत प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उनके लिखने में मेरा उद्देश्य ही है— कुछ आदर्शों की ओर पाठकों को प्रेरित करना। अगर यह उद्देश्य मेरे सामने न रहता, तो शायद मैं कहानी या उपन्यास लिखता ही नहीं, इसलिए जिसे मेरे दोस्त प्रोपेगैंडा कहते हैं, उसे मैं अपनी मजबूरी मानता हूँ।
‘जीने के लिए’ के बाद तीन-चार साल तक मैंने फिर उपन्यास और कहानी नहीं लिखी। 1933 ई. में ही योरप लौटते समय मन में खयाल आया था कि साम्यवाद को समझने और उसकी ओर प्रेरित करने के वास्ते एक ऐसी पुस्तक लिखूँ, जिसमें हमारे देश के ऐतिहासिक विकास कहानियों में आ जाएँ। 1941 ई. या 1942 ई. में श्री भगवतशरण उपाध्याय की इसी तरह की ऐतिहासिक कहानियों को मैंने देखा। यदि भगवतशरण जी ने ऐतिहासिक कहानियों को परिमित संख्या में लिखकर प्रकाशित करवा दिया होता तो शायद ‘वोल्गा से गंगा’ लिखने में मैं हाथ नहीं डालता लेकिन अभी उन्होंने थोड़ी ही कहानियाँ लिखी थी, और उनसे पता नहीं लगता था कि वह कब तक और कितनी कहानियों में उसे समाप्त करेंगे।
1942 ई. में हज़ारीबाग जेल में रहते हुए मैंने ‘वोल्गा से गंगा’ की बीस कहानियाँ लिख डालीं। आसन्न-भविष्य में ‘विस्मृत यात्री’ (उपन्यास विस्मृत यात्री के नाम से आगे चलकर प्रकाशित हुआ।) के नाम से महान पर्यटक नरेंद्रयश (518 ई. – 82ई.) के स्वात्त-उपत्यका, सिंहल, मध्य एशिया, बैकाल सरोवर और चीन तक के बीते जीवन को लिखना चाहता हूँ। हो सकता है आगे भी भारत या वृहत्तर भारत के सम्बंध में ऐतिहासिक उपन्यास लिखूँ।
मैं अपनी कहानियों में किसको सबसे अच्छी समझता हूँ, यह कहना मेरे लिए मुश्किल है। ‘वोल्गा से गंगा’ की कहानी ‘प्रभा’ को श्रेष्ठ कहते पहले मैंने दूसरों को सुना, और सुन-सुन कर ही मेरी भी उसके बारे में वहीं धारणा हो गई, नहीं तो उसी संग्रह की ‘नागदत्त’, ‘प्रभा’ और ‘सुरैया’ इन तीनों में मैं कम ही अंतर मानता हूँ।
