कहानी: जैसिरी – राहुल सांकृत्यायन

कहानी: जैसिरी - राहुल सांकृत्यायन

जैसिरी का गाँव पंदहा, बहुत छोटा गाँव था। किसी समय उसके पास जंगल था। किंतु अब नाम मात्र का थोड़ा-सा हिस्सा बच-बचा पाया था, और वह भी दूसरे गाँववालों की सीमा के भीतर था। पंदहा की सारी ज़मीन खेत बन चुकी थी, लेकिन तब भी वह गाँव के सब मुखों में अनाज डालने के लिए पर्याप्त न थी। धनी तो वहाँ कोई था ही नहीं; खाने-पीनेवाले घर भी चार-पाँच से ज्यादा न थे और वह भी पंदहा के भरोसे नहीं। उनका गुज़र बसर तो कलकत्ते की कमाई पर था। जैसिरी के माँ-बाप गाँव के सबसे गरीब आदमियों में थे। गरीबी ही के कारण उनके एक बूढ़े चाचा ज़िंदगी भर क्वारे रह गये। जैसिरी की भी शादी शायद होती क्योंकि वे घर के बड़े लड़के थे, लेकिन लड़कपन में ही चेचक से उनकी एक आँख के चले जाने के कारण उसकी आशा जाती रही। घर में एक भाई की शादी हुई थी और वंश चलाने के लिए वह काफी थी।

पंदहा ब्राह्मणों का गाँव था, लेकिन ऐसे ब्राह्मणों का जिन्होंने पीढ़ियों से अक्षर-ज्ञान के खिलाफ शपथ खा ली थी। अगर एकआध आदमी रामायण पढ़ भी लेते थे तो वे भी जैसिरी की पट्टी में न थे। सत्यनारायण की कथा गाँव में, साल भर में, दस पाँच बार हो जाया करती थी, क्योंकि उसमें खर्च कम और पुण्य अधिक था। हैजा या चेचक का डर होने पर एक आध बार दुर्गा-पाठ भी हो जाया करता था। लेकिन वह पारायण होता था; और भाषा में अर्थ न करने से गाँव के और आदमियों की भाँति जैसिरी को भी उसका अर्थ नहीं मालूम होता था। वाल्मीकि रामायण और भागवत की कथा खर्चीली चीजें थीं, पंदहा में उसकी दान-दक्षिणा के लिए किसी में शक्ति न थी। तो भी एक आध बार कम-से-कम भागवत की कथा हुई जरूर होगी, क्योंकि जैसिरी को कृष्ण और कंस की, परीक्षित और तक्षक की कथाएँ याद थीं। किसी पाठशाला के न रहने और गाँव में शिक्षितों के न होने पर भी, मौखिक शिक्षा के लिए जैसिरी को यही अवसर मिला था या यों कहिए कि थोड़ी-सी भी सुनी बात से गुनकर वे बहुत अर्थ निकाल लिया करते थे। तभी तो चव्वालीस वर्ष की उम्र में उनको देखकर कोई भी आदमी उनके संस्कृत मस्तिष्क को पहचाने बिना नहीं रहता।

होश सँभालने के साथ ही जैसिरी को चरवाही का काम मिला था। दो-चार गाये और एक दो भैंसे, यही उनके पास चराने को थीं। थोड़ा और सयाना होने पर चार-पाँच घटा घास काटने के लिए भी उन्हें देना पड़ता था और जब हाथों में कुदाल उठाने की ताकत आयी तो खेत पर भी घरवालों की मदद करनी पड़ती। देहात के और गाँवों की तरह पंदहा में भी चरवाही लड़कों का काम समझा जाता था, लेकिन जैसिरी चालीस वर्ष से ऊपर पहुँच जाने पर भी नियम से रोज़ गायों को चराने ले जाया करते थे। वैसे तो उनका शरीर दुबला-पतला था, लेकिन वह कमज़ोर न था। हड्डियाँ काफी मजबूत थीं। तेज़ चलने में गाँव भर में कोई उनका मुकाबला नहीं कर सकता था। बीमारी उनके पास फटकती न थी। फिर भी घरवाले क्यों चरवाही के लिए राजी हुए? जान पड़ता है जैसिरी का खुद का आग्रह इसमें कारण था। गाँववालों के पास काम भी बहुत होता है और छुट्टी का समय भी। लेकिन उनके छुट्टी के समय के बिताने के तरीके सभी श्लाघ्य नहीं हैं। बाज़ वक्त जमा होकर मंडली में उड़ती बात में एक झूठ की जगह सात झूठ जोड़कर दोहराया जाता था। बाज़ वक्त गाँव के हर एक आदमी की जब शिकायत शुरू हो जाती तो कोई आदमी न बच पाता था। और शिकायत भी ऐसे कड़े शब्दों में कि दूसरे ही दिन, एक कान से दूसरे कान में होते-होते दोनों ओर से लाठियाँ निकल जाती थीं। अक्सर गाली-गलौज और बीच बिचाव से काम चल जाता था किंतु कितनी ही बार दोनों ओर की कुछ खोपड़ियाँ लाल हुये बिना नहीं रहती थीं। ऐसी कथा-मंडली जैसिरी जैसे आदमी को पसंद न हो सकती थी और कभी भी उन्हें ऐसी मंडली में बैठा देखा नहीं गया। मंडली में बैठने से उनको घृणा थी यह भी नहीं कहा जा सकता था। ढोल-झाँझ के साथ रामायण गाये जाते वक्त अवश्य वे दिखाई नहीं पड़ते थे, लेकिन अर्थ के साथ चौपाई जहाँ चलती थी, जैसिरी वहाँ जरूर मौजूद रहते — यदि वे चरवाही में चले न गये होते। बहुधा अर्थ करने को काम उन्हीं के जिम्मे रहता था। अक्षर का उन्हें बिल्कुल ज्ञान न था, लेकिन चौपाइयों का जो अर्थ वे करते थे उसको सुनकर आदमी को दंग रह जाना पड़ता था। लेकिन दंग होने की जरूरत नहीं। जैसिरी अक्षर से परिचित न होने पर भी बहुश्रुत थे या जो कुछ सुनते थे उसे गुनते थे और याद रखते थे।

जैसिरी को गीत-गोविंद और विनयपत्रिका के कितने ही पद भी याद थे। विनयपत्रिका के पदों को बहुत कुछ समझ भी लेते थे, लेकिन गीत-गोविंद के पद को वे नहीं समझते थे, और उनके संस्कृत के भ्रष्ट उच्चारण को सुनकर तो कोई नवागत पंडित झल्लाकर बोल उठता, “काने ने क्या बकबक कर रक्खी है।” पंदहा और गीत-गोविंद तथा विनयपत्रिका? हाँ, ये सम्भव नहीं थे, लेकिन लगन के समय हर साल पंदहा में पाँच दस बरातें आ जाती थीं जिनमें नाच भी होती थी। जैसिरी नाच के शौकीन न थे, लेकिन जब उन्हें मालूम होता कि कोई नाचनेवाला लड़का गीत-गोविंद और विनयपत्रिका के पद गाता है, तो वे उसमें बराबर मौजूद रहते थे और जो दो-चार पद उन्हें याद थे उन्हें उन्होंने इन्हीं बारातों में सीखा था।

जैसिरी का घर अत्यंत गरीब था, लेकिन उनको देखकर कोई वैसा समझ नहीं सकता था। वे अपनी धोती बराबर साल रखते। फटी होने पर भी सिलाई ऐसी करके रखते थे कि कोई पहचान न सकता था। हाँ, वे अपनी धोती घुटनों से नीचे नहीं जाने देते थे। धोती के अतिरिक्त बदन पर एक दो गज का अँगोछा होता था और वह भी वैसा ही साफ़ होता था जैसी धोती। पंदहा के आस-पास कसर नहीं था, जिससे कि उन्हें सब्जी या रेह मिल जाती। साबुन का उस समय (1604) तक सर्वत्र प्रचार नहीं हुआ था और अगर प्रचार होता भी तो उनके पास खरीदने के लिए पैसे कहाँ?

धोती-अंगोछा के अतिरिक्त बरसात में उनके पैरों में बद्धीदार खड़ाऊँ (पौवा) होती थी। वर्षा से बचने के लिये एक बाँस का छत्ता जिसमें दो हाथ बाँस का मोटा डंडा रहता था। पानी रोकने के लिए छत्ते का ऊपरी भाग बारीक बाँस की बुनाई का होता था और निचला भाग कुछ मोटी तीलियों के चारखाने का। दोनों परतों के बीच में पलास के पत्त की तहें ऐसी जमाई गयी होती कि कितना ही पानी बरसने पर भी एक भी बूँद भीतर नहीं जा सकती थी। जैसिरी के लिए यह छत्ता सिर्फ़ वर्षा रोकने के लिए ही न था, बल्कि उसका ज़मीन से थोड़ा ऊपर उठा डंडा तानपूरे का काम देता था। यदि किसी सावन भादों के महीने में पंदहा के पूर्वोत्तरवाले बचे खुचे जंगल या परती भूमि पर कोई आदमी अचानक निकल पड़ता और यदि वहाँ उसे जहाँ-तहाँ बिखरी हुई पचास-साठ गायें भैंसे दीख पड़ती, तो उसे यह पता लगाने में मुश्किल न होता कि वह जैसिरी और उनके बाल-गोपालों के पास पहुँच गया है। यदि कहीं उस समय आकाश में नीले-नीले बादल होते जो हलकी हवा के झोंके से पूरब से पश्चिम की ओर चलते दिखलाई पड़ते। उस वन की बिखरी हुई पलास की हरी हरी झाड़ियों, और लबालब भरे डाबरों ( पल्वलों) तथा क्षितिज तक फैले हुए शांत और मनोहर भू-भाग को देखकर यदि उसके हृदय में रसिकता का भाव उदय हो आता तो उसे अपार आनंद होता यदि उसी समय वह जैसिरी की मंडली को ढूँढने निकल पड़ता। उसे उसके लिए बहुत दूर नहीं जाना पड़ता। उस हरे-भरे मैदान की सबसे ऊँची जगह— ऐसी ऊँची जगह जहाँ से पानी बरसने के साथ दरक जाता हो और जहाँ से बिखरी हुई गायों पर निगाह रक्खी जा सकती हो— की तरफ़ यदि निगाह डालता, पर बीच में बाँस का एक छत्ता दिखाई पड़ता। उसके चारों ओर घेरकर बैठी हुई दस-बारह नन्हीं-नन्हीं मूर्तियाँ होती। नजदीक पहुँचने पर उसे मालूम होता कि छत्ते के नीचे एक अधेड़ आदमी उकड़ू बैठा है। उसने अपने घुटनों और कमर को घेर कर अँगोछे से बाँध लिया है। कोई ताज्जुब नहीं कि छत्ते के डंडे पर ताल देकर उस वक्त ‘सिरिपति कमलाकंत’ गाया जा रहा हो। यद्यपि उन श्रोताओं के लिये जिनमें सबसे बड़े की उम्र बारह-तेरह बरस से अधिक न रही होगी, यह गाना अजीब-सा मालूम होता और दर्शक को यह देखकर और भी आश्चर्य होता कि सभी शांत हैं, कोई आपस में कानाफूसी तक नहीं कर रहा है। इसके लिए आश्चर्य करने की आवश्यकता नहीं। न श्रोतृ-मंडली गाने के एकएक शब्द को समझ रही है, न वह गायक के स्वर पर मुग्ध है। बात यह है कि जैसिरी और उनकी श्रोतृ-मंडली एक-दूसरे के दिल का बहुत खयाल रखती है। वह भले प्रकार जानती है, कि कभी-कभी उनके मनोरंजन का विषय अलग अलग भी हो सकता है और जब सम्मिलित मनोरंजन का भाग ही अधिक है तो पृथक मनोरंजन के समय थोड़ा धैर्य से काम लेना चाहिए। बाल-मंडली अच्छी तरह जानती है कि ‘सिरिपति कमलाकंत’ घंटों नहीं होता रहेगा। और उसके खतम होने के साथ ही वह अपनी मनचाही बात सुनेगी।

आठ से तेरह बरस आयुवाली पलटन के ऊपर अनुशासन करना साधारण काम नहीं है। बड़े-बड़े नीतिकार भी इनके मामले में इतने निराश हुये कि उन्होंने पाँच से पंद्रह वर्षवालों के लिए ‘दश वर्षाणि ताडयेत्’ कह दिया। जैसिरी ने लड़कपन ही से चरवाही शुरू की थी। और अब उनकी आयु 44 वर्ष की होगी। 28 वर्षों से तो वे पंदहा के चरवाहों के सर्वमान्य नेता होते आ रहे हैं। चरवाहों की कितनी ही टुकड़ियाँ अपने चरवाही जीवन को समाप्त कर किसान बन गयीं और उनकी जगह पर जगातार कितने नये चेहरे आते गये, लेकिन जैसिरी का प्रभाव अक्षुण्ण रहा। जैसिरी का हुक्म मानने में कभी किसी ने आनाकानी नहीं की। मारने की तो बात ही क्या, उन्होंने कभी किसी को डाँटकर भी कुछ नहीं कहा। लड़कों के मनोरंजन के लिए जैसिरी के पास छकड़ों-भरी कहानियाँ— सुनने की भी पहेलियाँ और हँसाने के किस्से भी थे। एक दो वर्ष तक तो वे लगातार नयी कहानियाँ सुना सकते थे और उनके कहने का ढंग ऐसा था कि पुरानी कहानी भी लड़कों को नयी मालूम होती थी। उनकी हँसानेवाली कहानियाँ तो ऐसी चित्ताकर्षक होती थीं कि लड़के दिन में चार-चार बार उसी को दोहराने को कहते थे, और सुनकर लोट-पोट हो जाते थे। जैसिरी लड़कों के मन और उसके झुकाव के सम्बन्ध में रत्ती-रत्ती जानते थे। वे जानते थे कि लड़कों को खुश करना जैसा आसान है, उसी तरह जरा-सी गलती से वे नाराज़ भी किये जा सकते हैं। कहानी के बीच में कभी वे किसी गाय को खेत या गाँव की ओर जाते देख लेते तो उस समय मामला बड़ा बेढब हो जाता। साधारण स्थिति में ऐसे समय कोई लड़का कहानी छोड़कर गाय लौटाने के लिये जाने को तैयार न होता; लेकिन जहाँ जैसिरी एक पतली-सी हँसी की रेखा अपने मुँह पर लाकर कहते— “मँगरू, बच्चा, जाओ तो गाय लौटा लाओ” तो उसी वक्त वह लड़का दौड़ जाता। हाँ, वह लौटकर आने के लिए भी उतनी ही जल्दी करता। वह जानता था कि कथा तब तक वहीं रुकी रहेगी जब तक वह लौट नहीं आयेगा; और उसे यह भी विश्वास था कि काम देने में जैसिरी चाचा सबको एक निगाह से देखते हैं। इस बीच के समय में जैसिरी मंडली में रसभंग भी नहीं होने देते थे। वे बीच में कोई ऐसा चुटकुला छोड़ देते कि उतने में वह लड़का भी आ जाता।

अपरिचित आदमी को जैसिरी बहुत चुप्पे मालूम होते थे। मितभाषी वे ज़रूर थे। लेकिन उनके पास वाणी की शक्ति पर्याप्त थी। जहाँ बोलने की आवश्यकता होती, वे खूब बोलते थे। जिस विषय को वे हानिकारक समझते, उस पर मौन ज़रूर रहते थे, और जिस मंडली में लोग होड़ लगाकर बात करने में एक-दूसरे से बाज़ी मार ले जाना चाहते थे, वहाँ भी जैसिरी मुँह खोलने की आवश्यकता न समझते थे। लड़कों से उनका अपार स्नेह था। उनसे बात करने में उन्हें आनंद आता था। इसमें कोई शक नहीं कि पंदहा जैसे गाँव में जहाँ अक्षर-ज्ञान से लोगों को सरोकार न था, बालकों के लिए जैसिरी की संगति खुली हुई पाठशाला थी। उनकी कहानियों और गीतों से उनको बहुत शिक्षा मिलती थी।

वर्षा और ऋतु के सम्बन्ध की पचास लोकोक्तियाँ उन्हें याद थीं जिनमें घाघ की सूक्तियाँ भी शामिल थीं। बादल, हवा, चींटी और फतिंगे को वे देखकर बतला देते थे कि वर्षा होने वाली है या सूखा, और ऐसा अवसर शायद ही आता था जब कि उनकी बातें गलत होती थीं।

चरागाह के अतिरिक्त एक और भी स्थान था जहाँ लोगों को जैसिरी की मोठी बातों के सुनने का अवसर मिलता था और यह था कुल्हाड़। उस समय और जगहों की तरह पंदहा के भी सभी कोल्हू
पत्थर के थे। उनकी दस-दस बारह बारह गज़ लम्बी जाठ (यष्टि) इतनी भारी होती थी कि कोल्हू की धुलाई के वक्त आठ-दस आदमियों के बिना काम नहीं चल सकता था। इसीलिए बिना चार-पाँच दूसरे घरों को सम्मिलित किये अकेले किसी घर के लिए एक कुल्हाड़ चलाना असम्भव था। जैसिरी का घर जिस कुल्हाड़ में शामिल होता उसके कार्यकर्ताओं और आसपास के लड़कों का तो भाग्य खुल जाता। जैसिरी कातर पर बैठकर बैलों के हाँकने के काम को काहिलों और कमज़ोरों का काम समझते थे। कम्बल की घोघी ओढ़े, कोल्हू की परिक्रमा करते घानी चलाना उन्हें बहुत पसंद था। यद्यपि इसमें पैरों और हाथों को मिहनत और सर्दी दोनों से तकलीफ होती थी। कुल्हाड़ों में कभी-कभी श्रोता— जिनमें कितने ही उनके पुराने शिष्य भी होते— आधी रात तक आग तापते रहते; इस प्रतीक्षा में कि घानी समाप्त होने पर जैसिरी आग के किनारे बैठकर कथा सुनाएँगे। इस वक्त की कथा में ताराओं का भाग काफी रहता था। शरदकाल के स्वच्छ आकाश में मोती की तरह बिखरे हुए इन अगणित शुभ्रतारों को देखकर वैसा होना ज़रूरी था। सप्तर्षि जैसे कुछ तारों को छोड़कर बाकी सभी तारों के ऐसे नाम होते थे जिनका किताबों में पता मिलना मुश्किल था। हर एक तारों के झुंड के इतिहास के बारे में कितनी ही कथाएँ उनको याद थीं। चर्खा चलानेवाली बुढ़िया कैसे वहाँ पहुँची? मृगशीर्ष के खटोले को कौन लोग लिये जा रहे हैं?वशिष्ठ और अरुन्धती कैसे सप्तर्षि मंडल में पहुँचे! चंद्रमा की प्रिया रोहिणी क्यों लाल है! लोधवा (लुब्धक) क्यों इतना चमकता है ? उनका खगोल का ज्ञान कथाओं तक ही सीमित न था। उस पुरानी कुल्हाड़ की संस्था में आधीरात (जिसे जैसिरी के प्रदेश की भाषा में परेव कहते थे) का ठीक समय जानने की बड़ी आवश्यकता थी। कार्यकर्ताओं की बदली का यही समय था। इसके लिए हमेशा जैसिरी ही पूछे जाते थे। जैसिरी जानते थे कि जाड़े के किस महीने में कौन तारा रात के बारह बजे ठीक सिर के ऊपर आता है। इसके सम्बन्ध में घाघ की कुछ सूक्तियाँ उन्हें कंठस्थ थी।

रात के वक्त बहुधा गाँव और रास्ते के भूतों और चुड़ैलों की कथा निकल आती थी। भूत-प्रेत नहीं हैं— यह तो जैसिरी नहीं कह सकते थे; क्योंकि जो भी बड़ा से बड़ा ज्ञान लड़कपन से अब तक उन्होंने पाया था; सभी भूत-प्रेतों की सचाई के पोषक थे। हाँ, जैसिरी भूतों से उतना डरते नहीं थे। गाँव से आधा मील पर, सुनसान जगह में, एक ठूँठा पीपल का लम्बा वृक्ष था। दोपहर और सूर्यास्त के वक्त भी लोग अकेले दुकेले उसके पास से गुज़रने की हिम्मत न रखते थे।आसपास के मील दो मील के भूतों का राजा उस वृक्ष पर रहता था। किसी की हिम्मत की परीक्षा लेनी होती तो लोग उसी ठूँठे पीपल से पत्ता तोड़कर लाने की शर्त पेश करते। मालूम नहीं कि कभी किसी ने जैसिरी के सामने यह शर्त पेश की, लेकिन यदि कोई ऐसी शर्त करता तो इसमें शक नहीं कि जैसिरी आधी रात को भी जाकर, पत्ता तोड़ लाते। हो सकता है, वे यह सब हनुमान्जी के नाम के बल पर करते, लेकिन इसमें तो संदेह ही नहीं कि वे दिल के बहुत मजबूत थे। घानी खतम होने से पहले दो-मील चलकर लौट आने की परीक्षा तो उन्होंने एक से अधिक बार पास कर ली थी।

जैसिरी कुछ मंत्र भी जानते थे।शरीर पर चित्तियाँ पड़ जातीं, इसे लोग साँप के जूठे पानी पीने के कारण बतलाते थे। बहुत से आदमी जैसिरी के पास झाड़ फूँक के लिए आते थे। इसमें तो उनकी ख्याति इतनी थी कि कई मील तक के लोग उनके पास आते थे। वे आदमी की पीठ पर सफेद काँसे (फूल) की थाली रख देते थे। मंत्र-बल या शरीर के जहर अथवा पसीने से, थाली पीठ पर चिपक जाती। इसके बाद मन्त्र पढ़-पढ़कर शुद्ध मिट्टी की छोटी-छोटी डलियों को वे उस पर फेंकते। यह क्रिया तब तक ज़ारी रहती जब तक कि थाली खुद ज़मीन पर गिर न पड़ती। शायद इसके लिए उन्होंने एतवार या मंगल का दिन भी नियत कर रक्खा था। लोगों का विश्वास था कि दो-चार बार के झाड़ने से साँप के जूठ का ज़हर निकल जाता है। शायद वे साँप काटे को भी झाड़ते थे। आँख के पीलिया (कामला) रोग पर भी उनका मंत्र खूब चलता था। सभी रोगियों को इससे फायदा होता था, यह तो नहीं कहा जा सकता; किंतु एक बात तो प्रत्यक्ष देखने में आती थी। थाली में पानी रखकर रोगी के दोनों हाथों को उसमें रखवा जब वे अपने दोनों हाथों से झाड़ने लगते थे, तो थोड़ी देर में सारा पानी पीला हो जाता था।सम्भव है कि वे अपनी अंगुलियों में कोई पीले रंग की जड़ी लगाकर झाड़ते थे। इन चिकित्साओं के लिए वे एक पैसा भी किसी से न लेते थे।

जैसिरी इतने मधुर भाषी थे और निंदा शिकायत से इतनी दूर रहते थे कि पंदहा में उनका कोई शत्रु न था। गाँवों के स्वभाव के अनुसार उनके घर की भी बोलचाल किसी न किसी घर से बराबर बंद रहती थी, लेकिन जैसिरी के लिए सबका मुँह खुला रहता था और सभी जगह स्वागत का शब्द तैयार था। गाँव में अपनी धार्मिकता और भक्तिभाव दिखाने के लिए कितने ही लोग रुद्राक्ष की माला या तुलसी की कंठी धारण करते थे, कितने ही तिलक और चंदन लगाते थे। जैसिरी धार्मिक थे, लेकिन उनके पास धर्म के ये बाह्य चिह्न बिलकुल न थे। वस्तुतः जैसिरी जन्मजात दार्शनिक थे। जैसिरी का जन्म यदि तीन हज़ार वर्ष पहले हुआ होता तो उनकी सूक्तियाँ मंत्रों और उपनिषदों में जमा होकर श्रुति समझी जातीं और उनका नाम ऋषियों की
परम्परा में अंकित होता। यदि वे अपने ही समय में, किंतु ऐसे घर और परिस्थिति में पैदा होते जहाँ उन्हें आधुनिक शिक्षा के सभी साधन सुलभ होते, तो वे अपने समय के सबसे बड़े शिक्षा-सम्बन्धी विशेषज्ञ बनते।

समाप्त


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