क्या लिखै – प्रताप नारायण मिश्र
‘क्या लिखै’ प्रताप नारायण मिश्र का निबंध है। वह पाठक से पूछ रहे हैं कि उन्हें क्या लिखना चाहिए? आखिर वो ऐसा क्यों पूछ रहे हैं? आप भी पढ़ें:
क्या लिखै – प्रताप नारायण मिश्र Read Moreसाहित्य की बात, साहित्य से मुलाकात
‘क्या लिखै’ प्रताप नारायण मिश्र का निबंध है। वह पाठक से पूछ रहे हैं कि उन्हें क्या लिखना चाहिए? आखिर वो ऐसा क्यों पूछ रहे हैं? आप भी पढ़ें:
क्या लिखै – प्रताप नारायण मिश्र Read More
बातचीत करना मनुष्यों को धरती के अन्य जीवों से अलग बनाता है। हम बातें करते हैं, तरह-तरह की बातें करते हैं और अलग-अलग कारणों से करते हैं। बातचीत क्या होती है? कितने प्रकार की होती है? यह सब बालकृष्ण भट्ट ने अपने इस लेख में दर्शाया है। आप भी पढ़ें:
निबंध: बातचीत – बालकृष्ण भट्ट Read More
मित्रों से धोखा हम सभी ने कभी न कभी खाया है। पर क्या कपटी मित्र बुरा होता है? इसी विषय पर लेखक प्रताप नारायण मिश्र ने यह लेख लिखा था। आप भी पढ़ें:
मित्र कपटी भी बुरा नहीं होता – प्रताप नारायण मिश्र Read More
किसी आती हुई आपदा की भावना या दुख के कारण के साक्षात्कार से जो एक प्रकार का आवेगपूर्ण अथवा स्तम्भ-कारक मनोविकार होता है उसी को भय कहते हैं। क्रोध दुख के कारण पर प्रभाव डालने के लिए आकुल करता है और भय उसकी पहुँच से बाहर होने के लिए।
निबंध: भय – आचार्य रामचंद्र शुक्ल Read More
उपन्यास किस तरह का होना चाहिए। उसकी रचना करते हुए किन किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए। इन सब बातों पर महावीर प्रसाद द्विवेदी द्वारा यह लेख लिखा गया था। लेख काफी हद तक आज भी प्रासंगिक है। आप भी पढ़ें:
उपन्यास रहस्य – महावीर प्रसाद द्विवेदी Read More
उपन्यास लेखन करते समय किन बातों का खयाल रखना चाहिए? उपन्यास कितने तरह के होते हैं और क्या चीज इन्हें एक दूसरे से अलग बनाती है। उपन्यास में प्लॉट का क्या महत्व है? यह ऐसे प्रश्न हैं जिनसे हर लेखक कभी न कभी जूझता है। कथासम्राट प्रेमचंद द्वारा इस विषय पर लिखा यह निबंध ‘उपन्यास रचना’ इन सभी प्रश्नों के उत्तर देता है। आशा है यह पाठकों और लेखकों के काम आएगा। आप भी इसे पढ़ें:
निबंध: उपन्यास रचना – प्रेमचंद Read More
समाज में किस तरह गालियाँ व्याप्त हैं इस पर प्रेमचंद ने उर्दू में यह निबंध लिखा था। यह निबंध मूल रूप से उर्दू में प्रकाशित हुआ था और उर्दू मासिक पत्रिका ‘ज़माना’ के दिसंबर 1909 के अंक में प्रकाशित हुआ था। आप भी पढ़ें:
गालियाँ – प्रेमचंद Read More
ऐतिहासिक उपन्यास हर समय लिखे जाते रहे हैं। आज भी यह लिखे जा रहे हैं। ऐसे उपन्यास लिखते समय किन बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए यही राहुल सांकृत्यायान अपने इस लेख में बता रहे हैं। आप भी पढ़ें:
ऐतिहासिक उपन्यास – राहुल सांकृत्यायन Read More
साहित्य की भाषा कैसी होनी चाहिए? सरल या क्लिष्ट। यह एक ऐसा विषय है जिस पर बहस निरंतर चलती रहती है। इस विषय पर सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ द्वारा भी लिखा गया था। आप भी पढ़ें:
साहित्य और भाषा – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ Read More
‘सरस्वती’ महावीर प्रसाद द्विवेदी के सम्पादन में प्रकाशित होने वाली पत्रिका थी। यह हिंदी की पहली मासिक पत्रिका थी। हिंदी के प्रचार प्रसार में इस पत्रिका और महावीर प्रसाद द्विवेदी का क्या योगदान था और कैसे इस पत्रिका ने राहुल सांकृत्यायन को प्रभावित किया यह वह इस निबंध में बताते हैं। आप भी पढ़िए:
निबंध: सरस्वती का प्रकाशन – राहुल सांकृत्यायन Read More
नये ज़माने और पुराने ज़माने में क्या फर्क था? नये ज़माने में क्या अच्छी बातें हैं और कौन सी बुरी और पुराने ज़माने के हिसाब से वह कहाँ ठहरता है। और नये ज़माने के शासकों को किन बातों का खयाल रखना चाहिए? यह सब प्रेमचंद अपने इस लेख में बता रहे हैं। आप भी पढ़ें:
पुराना ज़माना – नया ज़माना – प्रेमचंद Read More
उपन्यास साहित्य की सबसे प्रसिद्ध विधाओं में से एक है। उपन्यास, उसकी विषय वस्तु, और उसमें गढ़े गए चरित्र, कैसे होने चाहिए? किस तरह के उपन्यास अच्छे कहे जाएँगे और वह कौन सी चीजें हैं जो उपन्यास को कमजोर बना सकती हैं? इन्हीं सब बातों के ऊपर लेखक प्रेमचंद ने लिखा है। यह लेख 1930 के मार्च माह में प्रकाशित ‘हंस’ पत्रिका के अंक में सर्वप्रथम प्रकाशित हुआ था। आप भी पढ़ें:
निबंध: उपन्यास के विषय – प्रेमचंद Read More