1
दोपहर का समय था। पं चंद्रकांत सर्राफ अपनी दुकान पर बैठे थे। थोड़ी ही दूर पर उनका एक सहकारी भी विराजमान था। एक बगल में उनका एक नौकर भी बैठा था। चंद्रकांत की दुकान पर अनेक प्रकार की सोने-चांदी की तैयार वस्तुएँ बिकती थीं।
पं० चंद्रकांत जम्हाई लेकर बोले, “आज बड़ा सन्नाटा है।”
सहकारी बोला, “अब धूप कुछ तेज़ होने लगी है इसलिए दोपहर में आदमी नहीं निकलते।”
“हाँ यह बात तो है,” चंद्रकांत ने कहा। दोनों मौन हो गये। समय काटने के लिए चंद्रकांत ने एक बही उठा ली और उसके पन्ने उलटने लगे। कुछ समय इस प्रकार बीतने के पश्चात सामने से स्त्री-पुरुष का एक जोड़ा आता दिखाई पड़ा। दुकानों की ओर ताकते हुये वे दोनों चंद्रकांत की दुकान के सामने आये। दुकान के सम्मुख आकर दोनों ठिठक गये। शो केस में लगे हुये सामान को कुछ देर ध्यान-पूर्वक देखने के पश्चात दोनों ने धीमे स्वर में कुछ बात की। चंद्रकांत ने बही पर से दृष्टि उठाकर उनकी ओर देखा। स्त्री की वयस २०-२२ वर्ष के लगभग थी। गोरी चिट्टी नाक-नक्शे से दुरुस्त तथा हृष्ट-पुष्ट। पुरुष की वयस चालीस के लगभग होगी—साँवला रंग, कद नाटा, शरीर का पतला, कोट-पेंट‑कॉलर‑नेकटाई से लैस। स्त्री बैंगनी रंग की बनारसी साड़ी और उसी कपड़े का जम्पर तथा पैरों में सैंडल पहने थी। पुरुष ने आगे बढ़कर चंद्रकांत से पूछा, “साड़ी पिन है?”
“हाँ! ऊपर आ जाइये।”
आगे आगे स्त्री और पीछे पुरुष। दोनों दुकान पर चढ़ कर अंदर आ गये। पुरुष तो खड़ा रहा—स्त्री कुर्सी पर बैठ गयी। चंद्रकांत ने एक बड़ा बक्स खोल कर स्त्री के हाथ में दे दिया। इस बक्स में अनेक डिज़ाइन तथा मूल्य की साड़ी पिनें लगी हुई थीं। स्त्री कुछ क्षण तक उन्हें देख कर पुरुष से बोली, “ज़रा देखो!”
“मैं क्या देखूँ जो तुम्हें पसंद हो वह ले लो।”
“कुछ सलाह तो दो।”
“पसंद में सलाह का क्या काम!” यह कह कर पुरुष चंद्रकांत की ओर देख कर किंचित मुस्कराया। चंद्रकांत भी मुस्करा दिये और बोले, “ठीक कहा आपने।”
स्त्री एक पिन की ओर संकेत करके पुरुष से बोली, “यह पिन अच्छी है?”
पुरुष पिन की ओर देख कर बोला, “मुझे तो सभी अच्छी लगती हैं।”
स्त्री ने चंद्रकांत से पूछा, “इसके क्या दाम हैं?”
चंद्रकांत ने पिन में लगा हुआ छोटा सा टिकिट देख कर कहा, “पचीस रुपया।”
“गिनी गोल्ड का है?” पुरुष ने पूछा।
“हाँ बीच में जो सफेद नगीना है वह पुखराज है।”
“पुखराज तो पीला होता है,” स्त्री ने कहा।
चंद्रकांत शिष्टतापूर्वक हँसकर बोले, “पीला भी होता है और सफेद भी।”
“मैं तो हीरा समझी थी,” स्त्री ने कहा।
“इतना बड़ा हीरा होता तो इस पिन के दाम दो सौ रुपये होते।”
“अच्छा तो इसे ही निकाल दीजिये। यही ले लिया।” अंतिम वाक्य स्त्री ने पुरुष की ओर देख कर कहा।
“ठीक है!” चंद्रकांत से वह बोला, “दाम कुछ कम कर दीजिये।”
“बिलकुल एक दाम हैं। हमारे यहाँ मोलतोल नहीं होता।” चंद्रकांत ने पिन निकाल कर एक छोटी डिब्बी में रखते हुए कहा।
पुरुष ने जेब से मनी बेग निकाला और पचीस रुपये गिन कर चंद्रकांत को दिये। चंद्रकांत ने रसीद दी।
दोनों बिदा हुये।
2
पं. चंद्रकांत जवान आदमी हैं। वयस ३०-३२ वर्ष के लगभग है। चंद्रकांत, उन्हीं जैसे चरित्र के लोगों में रंगीली तबियत के आदमी प्रसिद्ध हैं। शरीफाना ढंग से परस्त्री तथा वेश्यागमन करने वाले को कुछ लोग रंगीली तबियत का आदमी कहते हैं। पं. चंद्रकांत इसी ढंग के रंगीले आदमी हैं।
संध्या का समय था। पं. चंद्रकांत अपनी दुकान पर विराजमान थे। इसी समय उनके एक घनिष्ट मित्र जो उन्हीं के समान रंगीले थे आये। चंद्रकांत मुस्कराकर बोले, “आओ रजनीगंधा।”
चंद्रकांत ने इनका नाम रजनीगंधा रख दिया था। अपने घनिष्ट मित्रों में यह महाशय इसी नाम से पुकारे जाते थे। रजनीगंधा नाम इस कारण पड़ा कि यह महाशय रात में ही निकलते थे। संध्या को स्नान करके, अच्छे वस्त्र पहन कर तथा इत्र-सेंट से सुवासित होकर घूमने निकलते थे और ग्यारह-बारह बजे घर वापस जाते थे। घर के रईस तथा धनाढ्य थे।
रजनीगंधा महाशय बैठ कर बोले, “क्या हो रहा है?”
“बस यहाँ तो वही नित्य के पापड़ बेलना—आप अपनी कहिये! आज कार नहीं लाये?”
“ऐसे ही टहलता हुआ चला आया। कार लड़के-बच्चों को सिनेमा ले गयी है।”
“यह कहो! और क्या खबर है?”
“खबर यह है कि कल लखनऊ चलते हो?”
“लखनऊ! हाँ काम तो है। तुम क्यों जा रहे हो?”
“ऐसे ही घूमने-फिरने! बहुत दिनों से कहीं गया नहीं इस कारण तबियत मचल रही है।”
“हूँ तबियत मचल रही है—मैं सब समझता हूँ।” चंद्रकांत ने मुस्कराकर सिर हिलाते हुये कहा।
रजनीगंधा महाशय भी मुस्करा दिये और बोले, “चलोगे?”
“चलो! मुझे तो जाना ही है। रेल से चलोगे या कार से!”
“कार ले चलेंगे। कल सबेरे चलो। दिन भर घूमें फिरें, तुम अपना काम कर लेना। रात को होटल में ठहर जाएँगे।”
“वह तो तू ठहरेगा ही—रजनीगंधा जो ठहरा रात को ही महकेगा।” चंद्रकांत ने मुस्कराते हुये रहस्यपूर्ण दृष्टि से कहा।
“हाँ तो बोलो—पक्का रहा।”
“अभी बताता हूँ।”
यह कह कर चंद्रकांत ने अपने सहकारी से कहा, “ज़रा वह लिस्ट तो निकालना—देखें कौन-कौन चीज लानी हैं।”
सहकारी ने सूची निकाल कर दी। चंद्रकांत उसे ध्यान-पूर्वक देख कर सहकारी से बोले, “इतनी सब चीज़ आवेंगी?”
“हाँ आना तो सभी चाहिये!”
“देखो! कल दिन भर में काम हो जायगा तो आ जाएँगी।”
“तो परसों भी ठहर जाएँगे—शाम तक काम हो जायगा बस उसी समय चल देंगे।” रजनीगंधा ने कहा।
“हाँ! हाँ! अच्छा पक्का रहा।”
3
दूसरे दिन पं. चंद्रकांत तथा रजनीगंधा कार द्वारा लखनऊ पहुँचे। दिन भर इधर‑उधर घूमने के पश्चात संध्या समय ये दोनों अपने परिचित होटल में पहुँच गये। होटल के मैनेजर ने मुस्कराते हुये इनका स्वागत किया। रजनीगंधा ने पूछा, “हमारा रूम खाली है?”
“खाली है सरकार! आप का रूम तो मैं अधिकतर खाली ही रखता हूँ कि न जाने कब सरकार तशरीफ ले आवें।”
“बड़ी मेहरबानी है।”
होटल के गेराज में कार खड़ी कर के दोनों अपने कमरे में पहुँचे। कमरा काफी बड़ा था। एक ओर दो पलंग बराबर एक दूसरे से सटे हुये बिछे थे। पलंग पर विस्तर भी लगे हुये थे। दूसरी ओर एक सिंगार मेज लगी थी, एक ओर कपड़े टाँगने की अल्मारी थी—दीवार पर भी खूँटियाँ थीं। बीच में एक छोटी सी गोल मेज के चारों ओर चार कुर्सियाँ बिछी थीं। एक ओर गुसलखाने में जाने का द्वार था। दो बत्तियाँ तथा पंखा भी था। रजनीगंधा ने पंखा खोलते हुये कहा, “अब गर्मी पड़ने लगी।”
दोनों ने कोट उतार कर टाँग दिए और कुर्सियों पर बैठ कर हवा खाने लगे। थोड़ी ही देर बाद एक ब्वाय आया और उसने पूछा, “खाना कब खाइयेगा।”
“खाना! नौ बजे! अभी तो ज़रा नहाना है।”
“बहुत अच्छा!” कह कर ब्वाय जाने लगा। रजनीगंधा ने उसे रोक कर कहा, “ज़रा सुनना। वह अल्लहरक्खू कहाँ है।”
“है। बुलवाऊँ?”
“हाँ”
ब्वाय चला गया। चंद्रकांत मुस्कराकर बोले, “क्या मजाल जो चूक जाय! अबे कभी कभी तो भूल जाया कर।”
“भूलने वाले की ऐसी-तैसी! और मैं भूल जाऊँ तो तुम कैसे हो? कर का माला छोड़ कर मनका माला जपते हो बच्चा! बगुला हो—देखने में बड़े शांत और गम्भीर परंतु ध्यान मछली की ही ओर रहता है।”
इस समय अल्लहरक्खू आ गया। उसने आते ही फराशी सलाम किया। अल्लहरक्खू की वयस पचास के लगभग! गाल में पान की गिलौरी दबी हुई है।
“कहो मियाँ अच्छे हो?”
“हुज़ूर के इकबाल से सब बखैरियत! क्या हुक्म है।”
“क्या बताना पड़ेगा?”
“बस आपका इशारा ही काफी है।”
“हमारी पसंद तो जानते ही हो।”
“नयी चीज लीजिए! इंशाअल्लाह देख कर फड़क जाइयेगा।”
यह कहकर अल्लहरक्खू चला गया।
“अच्छा मै जरा नहा डालूँ।”
“हाँ माँग चोटो से लैस हो जाऊँ।”
“बको मत!” कह कर रजनीगंधा गुसलखाने में चला गया।
जिस समय रजनीगंधा गुसलखाने से निकल कर बाहर आया और सिंगार मेज के आइने के सामने बैठकर बाल सँवार रहा था उसी समय अल्लहरक्खू आ गया। उसके पीछे एक स्त्री थी। अल्लहरक्खू उससे बोला, “चली आओ।” स्त्री सकुचाती हुई आकर कुर्सी पर बैठ गयी। परंतु ज्यों ही उसकी दृष्टि चंद्रकांत पर पड़ी वह चौंक उठी। चंद्रकांत ने भी उसे ध्यानपूर्वक देखा सहसा वह भी चौंके। यह स्त्री वही थी जो एक मास पूर्व पचीस रुपये की साड़ी पिन ले गयी थी!
स्त्री तुरंत उठ खड़ी हुई और अल्लह से बोली, “चलो!”
“क्यों! क्यों! बैठो शरीफ आदमी हैं।”
चंद्रकांत बोल उठा, “बैठो! कोई डरने की बात नहीं है। अल्लहरक्खू तुम जाओ।”
अल्लहरवखू चला गया। रजनीगंधा चुपचाप देख रहा था। चंद्रकांत ने पूछा, “तुम कौन हो सच बताओ।”
स्त्री रोने लगी। कुछ देर बाद जब वह शांत हुई तो बोली, “आप विश्वास नहीं करेंगे।”
“विश्वास क्यों नहीं करेंगे—कहो।”
स्त्री ने अपना वृत्तांत सुनाया। वह एक भले घर की लड़की थी। पड़ोस के एक युवक के प्रेम में फंँस कर उसके साथ भाग खड़ी हुई थी। उस युवक ने कुछ दिनों बाद उसे उस व्यक्ति को सौंप दिया जिसके साथ अब वह रहती है और जो उस दिन उसके साथ चंद्रकांत की दुकान पर गया था। वह पुरुष उससे यह पेशा करवाता है।
चंद्रकांत ने कहा, “तुम उसका कहना क्यों मानती हो?”
“वह जल्लाद है! उसकी बात न मानू तो जान से मार दे।”
चंद्रकांत रजनीगंधा से परामर्श कर के स्त्री से बोला, “तुम हमारे साथ चलो तो हम किसी भले आदमी से तुम्हारा विवाह कर दे।”
“मैं तैयार हूँ। मेरा उद्धार कीजिए। आपका जन्म भर एहसान मानूँगी।”
चंद्रकांत उस स्त्री को अपने साथ ले आये और एक युवक के साथ उसका विवाह करवा दिया।
कभी कभी भक्षक भी रक्षक हो जाता है।
समाप्त
