निबंध: घोड़ाशाही – सियारामशरण गुप्त

निबंध: घोड़ाशाही - सियारामशरण गुप्त

प्राचीन भारत में चक्रवर्ती होने के लिए अश्वमेध किया जाता था। यज्ञ का घोड़ा छोड़ दिया जाता था और उसके पीछे-पीछे रक्षक सिपाही चलते थे। घोड़े को स्वच्छंदता रहती थी कि चाहे जिस ओर जाय। जो कोई उसे पकड़ता था, उसी के साथ लड़ाई छिड़ जाती थी।

ऐसे यज्ञ धार्मिकों के द्वारा ही किए देखे गए हैं। राम के अश्वमेध की बात हमने सुनी है, रावण के अश्वमेध की नहीं। पांडवों के अश्वमेध का वर्णन पाया है, दुर्योधन-दु:शासनों को उसका अवसर नहीं मिला।

अश्वमेध के अनुष्ठान में धर्म की विजय और अधर्म की पराजय की घोषणा थी। उद्देश्य उसका सही था। यज्ञ में दीक्षित हो कर जो उसका आयोजन करता था, उसके लक्ष्य में स्वर्ग की ऊँचाई रहती थी। भौतिक सुख की कामना से उसे दूर रहना पड़ता था। इसी से ऐसे राजा ‘मृत्पात्रशेषाम्’ विभूति ले कर, मिट्टी के बरतनों से ही अपना काम चला कर, लज्जित नहीं होते थे। जनता उन्हें जानती थी। घोड़ा छोड़ कर वे प्रजा को यह आश्वासन देते थे कि सबकी स्वतंत्रता सुरक्षित है। किसी घोड़े अथवा पशु तक को कोई पीड़ित नहीं कर सकता। उसकी रक्षा के लिए सारे राज्य की शक्ति उसके पीछे है। अश्वमेध में यह आश्वासन न होता, उद्धत की चुनौती ही उसमें होती, तब किसी जगह उसका सम्पन्न होना कठिन था। क्योंकि हमसे छिपा नहीं है कि भौतिक बल में यज्ञ के अश्वरक्षक कहीं-कहीं बालकों के द्वारा भी बुरी तरह हराए गए हैं।

इस तरह हम देखते हैं, घोड़े के माध्यम से एक बार प्राचीन भारत की सभ्यता प्रकट हुई है। वहाँ वह निर्भयता और स्वतंत्रता का प्रतीक है।

बीच के युग में घोड़े को ले कर दूसरी तरह की बात प्रकट हुई है। असंख्य घुड़सवार सेनाएँ भिन्न-भिन्न दिशाओं से आकर हिंदुस्तान पर आक्रमण करती हैं। यह आक्रमण पशुता का था, घोड़े की पीठ पर बैठे हुए मनुष्य का नहीं। घोड़े में पशुता की जितनी कमी थी, उसे उसके सवार ने पूरा किया; सवार में पशुता की जितनी कमी थी, उसे उसके घोड़े ने पूरा किया। दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। इस तरह यहाँ यह दिखाई देता है कि वहाँ प्रजा अरक्षित है। कहाँ से आ कर कब मृत्यु अपना नाच नाचने लगेगी, इसकी निश्चिंतता नहीं। युवक जीने के लिए नहीं, मरने के लिए तैयार हैं। किसी का भरोसा न करके अपनी रक्षा के लिए स्त्रियों ने वस्त्रों के भीतर या अपने केशपाश में स्वयं विष की पोटली छिपा रक्खी है! बच्चे दैव के आसरे हैं। दैव के आसरे भी इसलिए हैं कि पशुता में भी बच्चों के प्रति मोह पाया जाता है। घर और गाँव और पथ और घाट, यहाँ तक कि बड़े-बड़े दुर्ग तक आशंका से खाली नहीं। घरों में आग लगायी जाती है, बाज़ार लूटे जाते हैं, अन्न के खेत खुरों से रौंदे जा कर उजाड़ हैं। स्कूल और कॉलेज के इतिहास में यह सब हमें अच्छी तरह बताया गया है। शकों और हूणों का किस्सा हमें मालूम है। मुगलों और पठानों के कारनामे हमसे नहीं छिपे। राजपूतों और मराठों के उत्पीड़न भी हमें हस्तामलकवत् हैं।

इस युग को हम सामंतशाही का युग कहते हैं। यह अपने-आप निंदात्मक हो गया है, इसलिए इसके लिए और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं रह जाती।

इसके बाद ही हम आधुनिकता में आ उतरते हैं। सामंतशाही समाप्त होती है और नये युग का आरम्भ होता है। पर घोड़े का हमारा सम्बंध टूटता नहीं। उसका लोप नहीं हुआ। अबकी बार वह नये ही रूप में प्रकट होता है। अब वह हाड़-मांस का सजीव प्राणी नहीं। यह लोहे का है, इस्पात का है। एक अंतर और है। पहले आदमी उसे चलाता था, अब आदमी को स्वयं वही चलाता है। पहले जो सवारी थी, अब वह सवार हो गया है; जो सवार था वह सवारी हो गयी है।

यह नया घोड़ा है इंजिन, और यह नया युग है घोड़ेशाही का।

पता नहीं, इंजिन की ताकत के लिए ‘हॉर्स पावर’ शब्द का आविष्कार पहले-पहल किसने किया। जिसने किया हो, किया है ठीक ही। विकासवाद के अनुसार सामंतशाही का विकास इस घोड़ेशाही में ही हुआ है।

सामंतशाही में जो घोड़ा था, वह पशु था। पशु स्वयं बुरा नहीं, पशुता ही उसकी बुरी है। इस युग का घोड़ा पशु नहीं है। यह सौभाग्य है या दुर्भाग्य?

कुछ हो, बुद्धि उसे आदमी की मिली है। इसी से सब कहीं उसे टापों की टपटपाहट में धूल के पहाड़ नहीं उड़ाने पड़ते। हज़ार-हज़ार घोड़ों की ताकत एक अपने में भर कर वह एक जगह जम जाता है। वहीं से वह हमारे घर को बिजली का प्रकाश देता है, वहीं से वह हमारे आँगन को स्वच्छ जल पहुँचा कर धोता है। विस्मय में डूब जाते हैं हम उसे देख कर। सर्कस के सीखे जानवर की तरह हम उसे सभ्य जानवर कह सकते हैं।

यही कारण है, जिससे अब उसके आगमन की कल्पना से हम भीत नहीं होते। सामंतशाही से युवक की तरह मरने के लिए हरदम फेंटा कसे रहने की आवश्यकता आज के युवक को नहीं दिखाई देती। स्त्रियों के लिए भी आज विष एक बेकार वस्तु है। हमारे गाँव, हमारे पथ-घाट आज घुड़सवार के भय से पीड़ित नहीं जान पड़ते। अपने घर हम खुले रख सकते हैं। पथ-घाट में भीड़ जमा करके खड़े रहने में हमारे लिए किसी तरह की बाधा नहीं।

है क्यों नहीं, बाधा है। हमारे घर खुले रहें, इसका अवकाश ही कहाँ? घोड़े की वह ताकत हमें वहीं दूर से खींच जो रही है। उसी दूरी से उसने हमारे हाथ का काम छीन लिया, उसने हमें बेहाथ कर डाला है। वह मामूली नहीं है, छोटा नहीं है। इतने-से काम के लिए पुराने घुड़सवार की तरह गली-गली घूमने का कष्ट करे ही वह किसलिए? हमें दौड़ कर स्वयं उसके पास जाना होगा। हमें लूटने के लिए हमारे पास वह आए तो तब, जब कि हम स्वयं उसके पास न जा सकते हों। वह बहुत दूर से उसके कारखाने की घरघराहट सुनाई पड़ती है। वहाँ उस हज़ार- हज़ार घोड़े के एक घोड़े की विद्युत्गति में हम हज़ार- हज़ार प्राणी एक साथ जोत दिए गए हैं। हममें से कोई नारी है, कोई पुरुष। यह कोई बड़ा अंतर नहीं। रक्त और मांस नारी और नर में एक-सा ही होता है! यहाँ हममें से कोई वृद्ध है, कोई युवा है, कोई किशोर है। वह भी कोई वास्तविक भेद नहीं। आदमी चाहिए, आदमी! और आदमी-पन में ये सब एक-से हैं। हाँ, शिशु यहाँ नहीं दिखाई देते। वे अपने थान पर आगे की मंज़िल में जुतने के लिए तैयार किए जा रहे हैं। सामंतशाही के घोड़े में यह बुद्धि नहीं थी। आगे की बात सोच कर शिशु को वह छोड़ नहीं सकता था। ऐसे इसके पीछे दौड़ना छोड़ कर हम अपना घर खोले रहें, अपने गाँव के टेढ़े-मेढ़े और गर्द-गुबार से भरे पथ-घाट में बेकार घूमते रहें, इसका अवकाश आज हम नहीं पाते।

अवकाश आज हमें दूसरे तरह का है। रात को शराब पी कर अपनी नयी बस्ती के मुहल्ले में हम आनंद-विनोद की छुट्टी पाते हैं। एक-दूसरे को गाली दे सकते हैं। एक-दूसरे के साथ मारामारी कर सकते हैं। नाच सकते हैं, चिल्ला सकते हैं, रोटी खा सकते हैं। कर क्या नहीं सकते? यहाँ तक कि अपनी डेढ़ हाथ की खटिया पर आँख मूँद कर सवेरे तक के लिए सो भी सकते हैं।

हाँ, आज के इस घोड़े का रूप ऐसा ही है। इसके दबाव से तिल-तिल गल कर पीले पड़ते हुए भी, इसके चक्के के नीचे कुचल कर पिसते हुए भी हम जो इस तरह हँस-खेल लेते हैं, यह हमारा सौभाग्य है। सौभाग्य ही कहना चाहिए। आज हमें इसी तरह हँस-खेल लेने दो! अधिक कुछ चाहते हो तो देखो उस स्पेन की ओर। और निकट से अबलाओं का विध्वंस और आर्तनाद देखना-सुनना हो, तो बढ़ो उस चीन की ओर। कौन है वह स्थान, कौन है वह देश, जहाँ का मानव कहीं खुले में, कहीं छिप कर, आज की घोड़ेशाही से पीसा न जा रहा हो। संसार की अंतरात्मा का दम आज भीतर-ही-भीतर घुट रहा है। सारे का सारा आकाश आच्छादित है चिमनियों के सफेद और काले धुएँ से। मनुष्य के ऊपर आज से बढ़ कर संकट कभी नहीं आया।

सामंतशाही के घोड़े की निंदा हमने भरपूर की है। उसे बर्बर और असभ्य कहते हुए हम नहीं थके। परंतु वे घोड़े और घुड़सवार आए और चले गए। हमारे घर, हमारे गाँव रोंद कर एक बार में ही वे सब कुछ समाप्त कर देते थे। जिबह करने के लिए ही भेड़-बकरियों की तरह वे हमें पालते नहीं थे। आज का घोड़ा और घुड़सवार वैसा नहीं है। शरीर उसका लोहे का, प्राण उसका दानव का। कल्पना का दानव उसमें साकार हो उठा है। सदियों के घोड़े और घुड़सवार आज कहीं एकत्र हो जायँ, तब भी क्या संख्या-बल और क्या बर्बरता, किसी बात में आज के घोड़े का मुकाबला नहीं कर सकते।

रावणों और दु:शासनों ने जो नहीं कर पाया, उसी को पूरा करने की बात आज के घोड़ेशाह ने सोची है। चक्रवती होने के लिए उसने अपना घोड़ा खोल दिया है। कितने देश, कितनी सेनाएँ, कितने जन-समूह, उसके खुरों के नीचे पिसे हैं और पिसेंगे, इसका हिसाब नहीं है।

संसार प्रतीक्षा में है। चाहता है, कोई कुश, कोई लव, कोई वभ्रुवाहन सामने आ कर आज खड़ा हो जाय। इस बर्बर का प्रतिरोध उसी से हो सकता है जिसमें बालक की निर्भयता हो। उसके पशुत्व का दलन करना ही होगा। हमारा विश्वास है, अगली पीढ़ियाँ आज की घोड़ेशाही का वर्णन उसी प्रकार पढ़ेंगी, जिस तरह हम सामंतशाही को याद करते हैं।


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Author

  • सियारामशरण गुप्त

    जन्म: 4 सितंबर, 1895

    सियारामशरण गुप्त का जन्म सेठ रामचरण कनकने के परिवार में चिरगाँव झाँसी में हुआ था। 1914 में उन्होंने अपनी पहली रचना मौर्य विजय लिखी। 1910 में इनकी पहली कविता ‘इंदु’ प्रकाशित हुई थी। उन्होंने कविताएँ, खंड काव्य, उपन्यास, निबंध, नाटक इत्यादि विधाओं में लेखन किया।

    वह प्रसिद्ध हिंदी कवि मैथलीशरण गुप्त के अनुज थे।

    प्रमुख रचनाएँ:
    खंड काव्य: मौर्य विजय (1914), अनाथ (1917), आर्द्रा (1927), विषाद (1925), दूर्वा दल (1924), आत्मोत्सर्ग (1931), पाथेय (1933), मृण्मयी (1936), बापू (1937), उन्मुक्त (1940), दैनिकी (1942), नकुल (1946), सुनन्दा और गोपिका।
    कविता संग्रह: अनुरुपा, अमृत पुत्र
    काव्यग्रंथ: दैनिकी नकुल, नोआखली में, जय हिन्द, पाथेय, मृण्मयी तथा आत्मोसर्ग।
    कहानी संग्रह: मानुषी
    नाटक: पुण्य पर्व
    उपन्यास: अंतिम आकांक्षा, नारी और गोद।
    निबंध संग्रह: झूठ-सच

    निधन: 29 मार्च, 1963

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