‘सुशीला सदन’ लेखक पराग डिमरी की सातवीं पुस्तक है। यह पुस्तक केवल एक घर की नहीं बल्कि उस घर में रह रही ज़िंदगियों और उनके बीच आ रहे बदलावों की कहानी भी है। वहीं दूसरी तरफ एक कस्बाई जीवन की झलक भी यह पाठकों के सम्मुख प्रस्तुत करती है। सुशीला सदन पर हमने पराग डिमरी के साथ यह बातचीत की है। आप भी पढ़ें:
प्रश्न: नमस्कार पराग जी, एक बुक जर्नल में आपका स्वागत है। सर्वप्रथम को नवीन पुस्तक के प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई। सुशीला सदन आपकी सातवीं पुस्तक है। पुस्तक के विषय में पाठकों को कुछ बताएँ।
उत्तर: शुभकामनाओं के लिए धन्यवाद, और आभार भी, सब कुछ हृदय की गहराइयों से।
इस दौर में घर पाने के, अपने घर के मालिक बनने के विचार, और तरीके भी बदल गए हैं। कभी दादा-दादी माता-पिता ने मानसिक, आर्थिक, शारिरिक तौर पर बहुत गहरा श्रम किया होता था, अपनी वाली एक छत पाने के लिए।
वहीं नयी पीढ़ी के लिए घर, अब एक भावनात्मक जरूरत भी नहीं रह गया है। घर इसलिए भी खरीद लिए जाते हैं कि उनके स्टेटस सिंबल को पुख्ता करें या उसमें बढ़ोतरी करें। पति-पत्नी दोनों का नौकरी करना, होम-लोन की आसानी से उपलब्धता ने पहले वाली मनोस्थिति के सारे समीकरण बदल दिए हैं।
घर अपना न भी हो, किराये का भी हो, चलता, दौड़ता है। किराये के घर में रहने पर कोई असुरक्षा या उलझन का अहसास भी, उनमें नहीं जगता।
दूसरे मकान मालिक भी अच्छे किराये की प्राप्ति पर, जहाँ यह उनकी अतिरिक्त आमदनी है, जीवन की भौतिक जरुरतों को पूरा करने का इकलौता स्रोत नहीं, किरायेदार को पहले की तरह, हेय समझना, वो सब वर्तमान में काफी हद तक अदृश्य सा हो गया है।
यहाँ पुराने दौर वाली घर की चाहत पर, उसकी यात्रा पर लिखा गया, जिसमें हवा के बजाय, घर ज़मीन पर होता था, इसलिए ही शायद पाँव भी ज़मीं पर रहते थे। इसके अलावा घर के आस-पड़ोस से जो मानवीय रिश्तों का सहारा मिलता था, जो भी विलुप्त सा हो गया है, उस की भी झलक उपस्थित है।
प्रश्न: पुस्तक को लिखने का विचार कैसे आया? कोई विशेष बात जिसने पुस्तक लिखने के लिए उत्प्रेरक का काम किया हो।
उत्तर: किसी भी लिखने वाले को कुछ अपने आसपास वर्तमान वाला, या भूत (बीते वक्त) का भी कुछ दिखता रहता है, तन, मन दोनों वाली आँखों से। उनमें कुछ नज़ारे, अवलोकन, ऐसे भी होते हैं, जो उसे उकसाते हैं कि उन पर मनन, सोच को केंद्रित, स्थिरता, गहराई, और गम्भीरता के साथ किया जाए।
उनमें से, जिन कुछ पर, ठहराव ज्यादा होने लगता है, वो अक्सर कहने, चूँटी सी भी काटने लग जाते हैं कि उन पर लिखा जाए, उन्हें काग़ज़ पर उकेरा जाए। सुनियोजित ढंग से दुनिया के सामने, उन्हें प्रस्तुत करने को आगे बढ़ाया जाए।
जो पूर्ववर्ती, सुशीला सदन से पहले, छह में से चार लिखी गई, उनके सृजन का मुख्य कारण भी यही था। अवलोकन, निरंतर आग्रह।
वर्तमान की सुशीला सदन भी इसी तरह देखे, अनुभव किए गए लम्हों का, एकत्रित किया जाना ही है।
जानकारी में किसी परिवार में संपत्ति का विवाद था, भाईयों के मध्य। विधवा माँ इस कलह से बहुत परेशान। मुझे बताया कि कैसे, किस तरह खाली पेट रहकर, इच्छाओं का गला घोंटकर, खून पसीना बहाकर घर बनवाया, क्या यही सब देखने के लिए।
पुराने विवाह सम्बंधों में एक के दुनिया से चले जाने पर, दूसरा भी अधमरा, दीन-हीन सा हो जाता था। माताजी भी ऐसी अवस्था में आ चुकी थीं।
भाइयों के सामाजिक स्तर में भी भारी अंतर था, एक बहुत आगे, दूसरा बहुत पीछे, अपनी दुनिया में रहने में सुकुन पाने वाला। समझता बहुत कुछ, किंतु उस पर उजागर, प्रकट करने से दूरी बनाकर रखने वाला। वहीं सफल भाई से बातें करने पर, उसकी वाकपटुता के चलते उसके दोषी होने का अहसास नहीं होता था।
इन सबसे विचार उत्पन्न हुआ कि किसी पुराने घर को देखने से ऐसा मनन भी किया जाना चाहिए कि वो घर किसी ने कैसे, किस तरह बनाया होगा।
जो भी इसमें प्रसंग हैं, वे सभी पिछले दो तीन वर्ष के बीते हुए प्रत्यक्ष अनुभवों, दृश्यावलोकन से ही उपजे, पनपे, ढले हैं। कहीं भी कुछ, ज्यादा की मिलावट नहीं, बल्कि कई जगह कुछ अंशों को कथा में शामिल करते हुए, उन्हें हल्का, या डाइल्यूट सा भी कर दिया गया।
ऐसे कई प्रसंग उपस्थित हैं सुशीला सदन में, जैसे कि कई परिवार रेलवे स्टेशन, बस अड्डों से लम्बी यात्रा के बाद बाहर आकर, मन में घर या गंतव्य स्थल तक जाने की तीव्र इच्छा के बावजूद भी, तुरंत या एकदम से घर या गंतव्य के लिए प्रस्थान नहीं कर पाते। नयी दिल्ली रेलवे स्टेशन में एक परिवार को ऐसे कुछ को ही जीते, सहते हुए गुज़रते हुए देखा था, अंततः उस परिवार के बजट, और थ्री व्हीलर वाले की माँग, के बीच के पाट के पैसे, परिवार के मुखिया को दिए, तब कहीं जाकर वो थका हारा, रोते बिलखते बच्चों वाला परिवार अपने घर के लिए रेलवे स्टेशन से निकल पाया।
ऐसे ही सुशीला सदन में श्मशान घाट में बेटा एक बोर्ड पर लिखे हुए को पढ़ने से गुज़रता है, इस लिखे को गाजियाबाद के श्मशान घाट पर अनुभव किया था, उसे पढ़कर अनुभव हुआ कि जीवन के मायने तो सारगर्भित हो गए।
एक और घटनाक्रम में, नये नये घर की मालकिन बनी, किसी दंपति के मर्सिडीज़ में, उसके नये घर में आकर, उसे शुभकामनाएँ देकर चले जाने के बाद, ऐसी इच्छा अपने पति से ज़ाहिर करती है कि काश वो भी मर्सिडीज़ में बैठकर एक चक्कर लगा पाती, ऐसी ही अतृप्त रह जाने वाली इच्छा को, एक बहुत बड़े लेखक ने बाँटा था।
इसमें एक बात स्पष्ट करना चाहूँगा कि किसी अखबार में पढ़ा, किसी फिल्म या किसी स्क्रीन पर देखा, वो कुछ भी शामिल नहीं है, क्योंकि अखबार और स्क्रीन से सामान्यतः दूरी बनाकर ही रखी जाती है।
पुस्तक की शुरुआत में इस बात को कि आसपास का देखा गया ही लिख डाला गया, रेखांकित भी किया गया है, हिंदी फिल्मों के महान गीतकार आनंद बख़्शी साहब के लिखे एक गीत के अंश का सहारा लेकर।
सुशीला सदन के पात्र ऐसे ही हैं जो मन के भीतर बहुत कुछ सम्हाले हुए हैं, किंतु जिह्वा से उन्हें कहने में असमर्थ हैं। वो सोशल मीडिया या आभासी दुनिया के सहजीवी नहीं है। जीवन की परिस्थितियों, संघर्ष, किसी प्रिय रिश्ते के खो जाने ने उन्हें ऐसी चुप्पी के साथ जीने की आदत डाल दी है।
इसके चलते समस्या यही आती है कि पाठकों को लिखे में मौजूद मौन को समझने से गुजरना पड़ता है, जो संवादों की तुलना में, उनके लिए दुरुह सा रहता है।
इस पर मेरे अनुसार जब मौन को समझा जाने लगता है, तब दुनिया में साँसों को लेने छोड़ने वाले जीवन का आनंद, बहुत गहराई से महसूस होने लगता है।
प्रश्न: पुस्तक के शीर्षक के विषय में बताएँ। क्या शीर्षक आप पहले ही तय कर लेते हैं या बाद में तय होता है। सुशीला सदन के शीर्षक के पीछे की कहानी क्या है?
उत्तर: पहले घर महिलाओं के नाम पर ही लिए जाते थे। पुरुष के मुकाबले, महिला ज्यादा समय घर में ही गुज़ारती थी, तो उसे दूसरे या पराए घर में रहने पर कुछ दिक्कतें होने पर, उन्हें ज़्यादा ही चुभा करती थी। इसलिए अपना घर हो, यह उसकी प्रबल इच्छा रहती थी। यहाँ भी पति सशंकित था कि अपने घर के बनाने पर जाना चाहिए कि नहीं, किंतु सुशीला ने ही यहाँ शुरुआत करी, ओर इसे अंतिम बिंदु तक भी पहुँचाया, तो यह ही शीर्षक सबसे उपयुक्त लगा।
इसके साथ ही आवरण में दिखाई दे रही बेंच का भी बड़ा महत्व है, और तकरीबन अंत तक भी उसका संदर्भ है।
प्रश्न: अपनी लेखन प्रक्रिया के विषय में बताएँ। विचार के आने बाद आपकी लेखन प्रक्रिया क्या रहती है।
उत्तर: मेरे लिए लेखन यही है कि लिखे को अनावश्यक खींचा न जाए, दही की लस्सी न बनाई जाए। दूसरा मन में जो है, उसे ही, और उतना ही लिखा जाए। यदि स्वयं का काला या टंकण किया, अंतर्मन को रास आ रहा है, तो उससे जुदा, भटकना नहीं चाहिए। पाठक पसंद करेंगे या फलाने ने ऐसा लिखा, उन सब अंदेशों से परे रहकर।
जितना मौलिक लिखेंगे, उतनी ही बेहतर अच्छे लेखन की डकार लिखने के दौरान आएगी। प्रसिद्धि लेखन को मिलना, प्रारब्ध पर निर्भर करता है, उसके लिए ईश्वर से प्रार्थना करते रहिए।
अपने लेखन को अपना, मौलिक ही बने रहने दीजिए, प्रेरित होने में कोई बुराई नहीं, लेकिन लिखिए स्वयं वाला ही।
प्रश्न: आपके जीवन में संगीत का महत्व है। गीतों का महत्व है। यहाँ भी पुस्तक के जरूरी पलों में गीतों का प्रयोग किया गया है। क्या संगीत से जुड़ाव ही इसका कारण है या कोई विशेष कारण है।
उत्तर: देखिए संगीत से गहरा नाता है, किंतु गायक, संगीतकार के तौर पर नहीं, मात्र श्रोता के तौर पर ही।
यह नाता भी पुराने हिंदी फिल्मों के गीतों से ज़्यादा है। नयी फिल्मों के गीतों से भी जुड़ाव रहता है, लेकिन बहुत ही अल्प मात्रा में। जबसे जीवन में गीतों के भावों के प्रति समझ बढ़ी है। शब्द, शब्द न रहकर, भाव बनने लगे हैं, यह भी स्पष्ट हुआ कि इन गीतों में तो हमारे जीवन का, जीवन के हिस्सों का, पूरा संदर्भ, अर्थ छुपा हुआ है। इसलिए उन गीतों के मुखड़े या अंतरों का प्रयोग भी अपने लिखे में कहानी को आगे बढ़ाने या किरदार को मानसिकता को और गहरे रुप में उभारने के लिए कर दिया जाता है।
यहाँ समस्या यह भी आती है कि पढ़ने वाले उन गीतों (उनके पुरानी फिल्मों से होने के चलते) परिचित नहीं हों।
इसके अलावा गीत— उनसे सम्बंधित गायकी, वाद्यों के इस्तेमाल फिल्मांकन के कारण भी अच्छे लगे हो, पुस्तक में तो गीत बस अक्षरों, शब्दों वाक्यों के संयोजन में ही मौजूद हैं, तो उतने प्रभावशाली न महसूस हो।
इस बात को आगे लेकर आगे बढ़ा जाता रहा कि कुछ तो सुशीला सदन को तन्मयता के साथ पढ़ने के चलते उन गीतों में शामिल आत्मा तक भी पहुँच जाए।
लुकाछिपी (गीतकार- प्रसून जोशी), जो मेरी संगीत के दौर की पसंद के अनुसार नयी या हालिया फिल्म है, (गाने के मुखड़े, और एक अंतरे का सुशीला सदन में प्रयोग है), जो माँ और बेटे के बीच अनुपस्थिति वाले सम्बंध को बहुत ही पवित्रता के साथ वर्णित करता है। जहाँ बेटा बचपन में इस सोच से गुज़रता है कि शाम को मेरे घर पहुँचने में देरी होने पर चिंता करने वाली माँ नहीं है मेरे पास।
लुकाछुप्पी बहुत हुयी
सामने आजा ना
कहाँ कहाँ ढूँढा तुझे
थक गयी है अब तेरी माँ
आजा सांझ हुई मुझे तेरी फिकर
धुंधला गयी देख मेरी नज़र
आ जा न
इसी तरह अंत में भी यही है कि बेटा दिवंगत माँ से कहने जा रहा है कि जब उड़ने को मेरे पास खुला आकाश आ जाएगा, तब मैं भी तेरे पास आ जाऊँगा।
क्या बताऊँ माँ कहाँ हूँ मैं
यहाँ उड़ने को मेरे खुला आसमाँ है
तेरे किस्सों जैसा भोला
सलोना जहाँ है
यहाँ सपनों वाला
मेरी पतंग हो बेफिक्र उड़ रही है माँ
डोर कोई लुटे नहीं बीच से काटे ना
मेरे एक जानने वाली ने बताया यह अंत उन्हें एकदम से समझ नहीं आया, जब आया, तो उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
मुझे बहुत प्रसन्नता हुई कि किसी ने , कहीं तो गीतों के प्रयोग के पीछे के कारणों को समझा।
प्रश्न: दौड़ती भागती दुनिया में जब सब कुछ तेजी से घटित होता है। सब तेज़ भागना चाहते हैं। ऐसे में आप ठहराव पुस्तक में लाते हैं। इसके पीछे की सोच क्या है?
उत्तर: पाठक पढ़ना शुरू करें, उसे यात्रा के तौर तरीकों से आगह कराया जाना चाहिए। सुशीला सदन की समझ के लिए बहाव के साथ ठहराव भी बहुत आवश्यक है। ठहरना, दम लेना , लम्बी-लम्बी साँसे लेकर हालिया बीते, भोगे हुए को पूर्णतया महसूस करने के लिए बहुत ज़रूरी है। खासकर वहाँ जहाँ लिखा गया फास्ट फूड नहीं है।
एक और पाठक में, जब वो इश्यू मैम वाला प्रसंग सही अर्थों में घुसपैठ कर पाया, तो हँसी के चलते उनकी कप से चाय उनके कपड़ों पर छलक पड़ी। फास्ट फूड के जैसे सेवन के कारण इससे वो वंचित रहे थे।
कारण यही कि सब मंजिल तक जल्द से जल्द पहुँचना चाहते हैं, जबकि असली आनंद तो सफ़र के पड़ावों के सुख से गुज़रने में ही है।
प्रश्न: यह किताब जितनी सुशीला सदन के विषय में है उतनी ही आगे जाकर उसके रहने वालों के विषय में हो जाती है। पुस्तक में दो भाई हैं। एक दुनिया की नज़र में सफलता के पैमाने पर खरा उतरता है। दूसरा शायद नहीं। आपके लिए व्यक्तिगत तौर पर सफलता के क्या मायने हैं?
उत्तर: दोनों भाइयों के सम्बंध में ऊपर कह चुका हूँ, सफलता के मायने की कसौटी व्यक्तिगत तौर पर यही कि कितना स्वयं की मर्ज़ी के अनुसार जीवन को बिता पाए। समझौते बहुत ज़्यादा किए हैं, तो जीवन में सफल आंशिक तौर पर ही रहे, ऐसा विश्वास करता हूँ। पैसा, संपत्ति, सामाजिक स्थिति इनके भी मायने तो हैं, किंतु इन सबमें कितना अपने आप को जिएँ, यह एक यक्ष प्रश्न है, जो हम सबको कचोटना चाहिए।
प्रश्न: पुस्तक में विभिन्न प्रकार के रिश्तों के बीच का समीकरण दर्शाया गया है। पिता-पुत्र, ससुर-बहु, दादा-पोती, दो सहेलियाँ। हालाँकि भाई‑भाई के बीच का समीकरण कम देखने को मिलता है। तब भी जब भाइयों के बचपने का समय भी दर्शाया जा रहा था। इसके पीछे कोई विशेष कारण?
उत्तर: देखिए जो जीवन में शुरू से किन्हीं ऊँचाइयों को छूने पर केंद्रित रहा है, वो उस बिंदु तक पहुँचने में उसके सहयात्री बन सकते हैं, उन पर ही ध्यान केंद्रित रखता है, बाकी सब उसके लिए नगण्य हो जाते हैं।
इस संदर्भ में, बड़े भाई के जीवन के दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए एक गीत के अंतरे का सहारा लिया गया है
वर्तमान से भी हसीं है
ख्वाब मेरी जिंदगी के
इस खुशी से परे है
मोड़ ओर भी खुशी के
मैं देखता नही
कभी इधर-उधर
बस अपनी मंज़िलो पर
है मेरी नज़र
प्रश्न: उपन्यास का कोई पहलू या किरदार जिसके विषय में आपको ऐसा लग रहा हो कि कहना या लिखना छूट गया?
उत्तर: लोग शायद इस कहे पर विश्वास न करें कि यहाँ प्रकाशित हो जाने के पश्चात पुस्तक के पन्नों से होकर नहीं गुज़रता। लगता यही है कि हे ईश्वर कितना बेकार, घटिया सा लिख डाला। अपने को कोसने, लताड़ने का मन करने लगता है। इसलिए पहली पुस्तक के पश्चात से इस तरह से अनुभव, वो रह गया, या गलत कर दिया, इस तरह के पछतावों से होकर नहीं गुज़रना पड़ता।
प्रश्न: उपन्यास के अंत में एक किरदार अपने जीवन का ऐसा निर्णय लेता है जिससे उसके जीवन की दिशा बदल जाने वाली होती है। उपन्यास को इस मोड़ पर अंत करने के पीछे क्या कारण था? क्या उस किरदार के जीवन की आगे की यात्रा कभी पाठकों को पढ़ने को मिलेगी?
उत्तर: द्वितीय भाग की सम्भावनाएँ तो हैं, किंतु अभी कुछ इस पर सोचा नहीं।
वैसे अधूरेपन का भी ऐसा अहसास है, जो जीवन को नमकीन बनाए रखता है, जिंदा रहने को मजबूर करता रहता है।
प्रश्न: आपने जीवनी लिखी है, संस्मरण लिखें हैं, कहानियाँ लिखीं हैं और उपन्यास भी। आपको व्यक्तिगत तौर पर कौन सी विधा अधिक भाती है।
उत्तर: आसपास वालों पर लिखना बहुत रास आता है। जो परिवार में हैं, आफिस में हैं, यातायात के दौरान दिखने महसूस होने वाले हैं। ऊपर बताया भी कि कैसे सुशीला सदन आसपास वालों की ज़िंदगी के देखने से ही जन्म या सम्पूर्ण हो पायी है।
प्रश्न: पुस्तक में दो कहानियाँ भी मौजूद हैं। कुछ इनके विषय में बताएँ। आपकी वेबसाइट पर और भी कहानियाँ हैं। उनके बीच में से इन्हें चुनने का कोई विशेष कारण?
उत्तर: दो वर्ष पूर्व सोचा गया था कि वेब साइट पर ही लिखे की उपलब्धता रहेगी, किंतु इस कहानी ने, उस निर्णय से मुझे पीछे हटने को मजबूर किया।
वेब साइट पर मौजूद को भी सम्मान देने के चलते उन्हें भी जगह दे दी गयी।
प्रश्न: यह दोनों ही कहानियाँ अलग-अलग विषयों पर लिखी गयी हैं। पाठकों को इनके विषय में कुछ बताएँ?
उत्तर: बचपन में लाइट के चले जाने पर भूत, प्रेत की कहानियाँ सुनने में डर के बावजूद मज़ा आता था। उस दौर के लम्हों से उत्पन्न हुई यह कहानी है, जहाँ मौत से मुलाकात होती तो है, किंतु वो मिलना प्राण हरण के लिए नहीं, और इसमें स्त्री शक्ति या उनके भी यहाँ कार्यरत होने का उल्लेख है।
दूसरी कहानी किसी रिश्ते में बंधे की सामाजिक, पारिवारिक के दहलीज, चौखट से बाहर आने की उत्कंठा की कहानी है, जहाँ सब कुछ हो चुका था, बस अंतिम एक कदम चलने से दूरी रखी गयी।
मुझे यह कहानी बहुत पसंद हैं।
प्रश्न: आप आगे क्या लिख रहे हैं? कोई विचार जिस पर लिखने का मन हो? पाठक आगे क्या पढ़ने की उम्मीद लगा सकते हैं?
उत्तर: अगला एक शोध परक रहेगा।
शोधपरक के साथ समय बहुत लगता है, प्रयास यही रहेगा कि उस समय को कमतर किया जाए, जिससे कि आठवीं पर भी इस तरह से ही बातें की जा सकें।
साथ साथ एक जासूसी रोमांचकारी उपन्यास जैसा कुछ मन में है, कई लोग कहते भी हैं कि सुरेंद्र मोहन पाठक के शिष्य होने पर भी, उनके लेखन के विषयों के आसपास वाला क्यों नहीं लिखते?
निश्चित होकर या दृढ़ होकर, अभी कुछ कहना उचित नहीं होगा।
आपकी आने वाली रचनाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
तो यह थी लेखक पराग डिमरी से उनके हालिया प्रकाशित उपन्यास सुशीला सदन पर हमारी बातचीत। उम्मीद है यह बातचीत आपको पसंद आयी होगी। सुशीला सदन ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर मौजूद है।
पुस्तक विवरण:

एक तरफ सुशीला सदन जहाँ कथा की नायिका सुशीला के महकपुर की जय सिंह कॉलोनी में एक 200 गज के घर बनने की कहानी हैं वहीं दूसरी तरफ यह नायिका, उसके परिवार और उसके पड़ोस में मौजूद बाकी लोगों की ज़िंदगियों का दस्तावेज भी है। घर बनाने के लिए नायिका द्वारा किए जा रहे संघर्ष के साथ-साथ उनके नज़दीकी सभी लोगों की ज़िंदगियाँ और इनके बीच का आपसी बनते-बिगड़ते समीकरणों से यह कथा गुँथी हुई है।
यहाँ वो सब कुछ है, जो मानव, मानवीय पहलुओं, संवेदनाओं से जुड़ा है। सुख-दुख, हँसना-रोना और लोगों की नज़रों से ढका छुपा प्रेम भी यहाँ चलता हुआ दिखता है।
यह धनाढ्य लोगों की नहीं बल्कि अपनी छत के नीचे, दो रोटी चैन से खाने के लिए जद्दोजहद में जुटी रहने वाली ज़िंदगियों से जुड़ी कहानी है।
पुस्तक लिंक: अमेज़न
