साक्षात्कार: लेखक शुभानन्द से ‘राजन इकबाल: हॉन्टेड होटल’ पर बातचीत

साक्षात्कार: शुभानन्द | राजन इकबाल: हॉन्टेड होटल

लेखक शुभानन्द ने अपने लेखन की शुरुआत राजन-इकबाल रिबॉर्न सीरीज़ से की थी। यह एस सी बेदी के किरदारों का रीबूट था जिसमें वह राजन इकबाल को लेकर नये ज़माने के कथानक पाठकों को परोस रहे थे। इसके बाद उन्होंने जावेद अमर जॉन शृंखला और क्राइम एम डी शृंखला के उपन्यास लिखे हैं। बहुत समय से वह राजन-इकबाल रिबॉर्न शृंखला के उपन्यास नहीं लिख रहे थे। अब काफी समय बाद वो राजन इकबाल रिबॉर्न शृंखला का उपन्यास ‘राजन इकबाल: हॉन्टेड होटल‘ लेकर प्रस्तुत हुए हैं। इसी उपन्यास से जुड़ी बातचीत हमने उनके साथ की। आप भी पढ़ें:


प्रश्न: शुभानंद जी सर्वप्रथम तो हॉन्टेड होटल के लिए बधाई। काफी समय बाद राजन इकबाल रिबॉर्न सीरीज़ का एक्सक्लूसिव उपन्यास आया है। कैसा लग रहा है?

उत्तर: धन्यवाद विकास। राजन इकबाल तो मुझे हमेशा खुशी देते हैं चाहें वो किसी भी रूप से या जरिए से दें। काफी समय बाद इस सीरीज़ पर उपन्यास लिखा और लिखकर बहुत खुशी हुई।

प्रश्न: अच्छा, बीच में आपके द्वारा लिखे राजन इकबाल रिबॉर्न सीरीज़ के उपन्यास आने बंद हो गए। इसका क्या कारण था? फिर से आपने उपन्यास लिखने की कैसे ठानी?

उत्तर: जब बेदी सर (एस सी बेदी) ने दोबारा लिखना शुरू कर दिया था तो मेरे इस सीरीज़ पर लिखते रहने का कोई औचित्य नहीं रहा था। उनके गुज़रने के उपरांत राजन इकबाल सीरीज़ के कई प्रशंसकों ने लगातार आग्रह किया जिसके कारण फिर से लिखने की प्रेरणा मिली।

प्रश्न: अच्छा राजन इकबाल की अपनी एक लीगेसी है। पाठकों के मन में इन पात्रों ने जगह बनायी है। उनकी इनसे कुछ अपेक्षाएँ रहती हैं। ऐसे में उपन्यास लिखते हुए इन अपेक्षाओं का भार आपको महसूस होता है? आप इस चीज़ को कैसे लेते हैं और लिखते समय आपका मुख्य ध्येय क्या होता है?

उत्तर: ये सत्य है एक विश्व विख्यात सीरीज पर लिखना आसान नहीं होता। इस सीरीज़ के पाठक शायद वैसा ही अनुभव चाहते हैं जैसा उन्हें बेदी सर के उपन्यासों को पढ़ते हुए मिला। कोशिश रहती है कि उस कसौटी पर खरा उतरा जा सके। इस सीरीज़ को बचपन से घोट-घोट कर पढ़ा है तो पात्रों की कैमिस्ट्री बैठाने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती और कोशिश होती है कि भले ही कहानी नये ज़माने के अनुसार हो पर पात्रों के चरित्र चित्रण में कोई बहुत बड़ा बदलाव न हो।

प्रश्न: हॉन्टेड होटल लिखने का खयाल कैसे आया? वो क्या चीज़ थी जिसने आपको इस उपन्यास को लिखने के लिए प्रेरित किया?

उत्तर: राजन इकबाल पर हॉरर उपन्यास लिखना था जिसमें कि थोड़ा थ्रिल और क्राइम भी जुड़ा हो। बस एक आइडिया आया कि अगर एक मुस्कराती हुई लाश मिले तो उसके क्या मायने हो सकते हैं। बस इसी पर कहानी बुनती चली गई।

प्रश्न: अच्छा इस बार राजन इकबाल और उनकी टीम अपने गृहनगर चंदननगर से निकलकर लखनऊ में आ गए हैं। क्या ये बदलाव करने का कोई विशेष कारण था?

उत्तर: एक तरह का एक्सपेरिमेंट समझ लीजिए। काल्पनिक शहर से वास्तविक चित्रण की ओर बदलाव करके देखा कि शायद ये पाठकों को पसंद आये।

प्रश्न: आप भी लखनऊ से ही आते हैं न?? तो क्या ये भी इसके पीछे प्रेरणा थी?

उत्तर: हाँ लखनऊ में बचपन का काफी समय बीता है इसलिए उस शहर पर लिखना आसान लगता है।

प्रश्न: क्या राजन इकबाल कभी वापस चंदननगर जाएंगे? या वो परमानेंटली शिफ्ट हो गए हैं?

उत्तर: अभी इस बारे में कुछ सोचा नहीं है। कहानी के अनुसार देखेंगे अगर शहर कभी बदल जाये।

प्रश्न: अच्छा उपन्यास लिखते हुए क्या किसी हिस्से में आपको परेशानी आई? वो कौन सा हिस्सा था और आप कैसे उससे उभरे?

उत्तर: कहानी को पैरानॉर्मल और फॉरेंसिक इनवेस्टिगेशन के बीच संतुलन बनाना चैलेंज था। दोनों पक्ष को महत्व देने के लिए काफी दिमागी कसरत करनी पड़ी।

प्रश्न: आपका लिखने का रूटीन क्या होता है?

उत्तर: कोई रूटीन फॉलो नहीं करता। सबकुछ मूड और समय पर निर्भर रहता है।

प्रश्न: आम तौर पर, एक उपन्यास लिखने में कितना समय लगता है?

उत्तर: ये लघु उपन्यास था तो तीन महीने में ही गया था। बड़े उपन्यास में कम से कम छह महीने लग जाते हैं।

प्रश्न: क्या सिंगल ड्राफ्ट में ही कहानी पूरी हो जाती है या कई ड्राफ्ट लगते हैं। इस उपन्यास के मामले में क्या हुआ?

उत्तर: सिंगल ड्राफ्ट में तो आजतक कोई उपन्यास नहीं पूरा हुआ। आगे पीछे बीच में हमेशा कई बदलाव करने पड़ते हैं। इसमें भी यही हुआ।

प्रश्न: अच्छा मुख्य किरदारों को छोड़कर इस उपन्यास का कौन सा किरदार आपका पसंदीदा है और कौन सा आपको सबसे कम पसंद है? पसंद-नापसंद होने के कारण भी दीजिएगा?

उत्तर: नफीस के कॉमेडी सीन लिखने में आनंद आता है। पात्र अच्छे हो या बुरे उसे रचने वाले को नापसंद तो क्यों ही आएँगे!

प्रश्न: क्या अब पाठकों को नियमित तौर पर राजन इकबाल रिबॉर्न सीरीज के उपन्यास पढ़ने को मिलेंगे?

उत्तर: कोशिश करूंगा अगर पाठकों को इस सीरीज पर मेरी लेखनी पसंद आती रही तो कुछ और उपन्यास लिख सकूँ।

प्रश्न: चूँकि राजन इकबाल लखनऊ में हैं तो क्या जावेद अमर जॉन में से कोई इन्हें मिलेगा? क्या ऐसा सोचा है आपने?

उत्तर: ऐसा कुछ फिलहाल सोचा नहीं है।

प्रश्न: अच्छा आजकल आप क्या पढ़ रहे हैं? क्या हाल फिलहाल में पढ़ी अच्छी पुस्तकों में से किसी के नाम पाठकों के साथ साझा करना चाहेंगे?

उत्तर: विमल सीरीज का पुराना उपन्यास हाल ही में पढ़ा: किस्मत का खेल

प्रश्न: आपके आने वाले प्रोजेक्ट्स के विषय में बताए? आप आजकल क्या लिख रहे हैं और क्या पाठकों को जल्द ही पढ़ने को मिलेगा?

उत्तर: अभिषेक मिश्रा पर नया उपन्यास लिख रहा हूँ। आशा करता हूँ कमीना और मिर्ज़ा बेईमान की तरह ये भी पाठकों को पसंद आये।

प्रश्न: आखिर में अगर आप पाठकों कोई संदेश देना चाहें तो वो क्या होगा?

उत्तर: बस एक आग्रह है कि लेखकों तक किताब पढ़कर उसकी प्रतिक्रिया पहुँचाते रहें। एमेजन पर भी रिव्यू अवश्य दें इससे उनका मनोबल बना रहेगा। धन्यवाद।


(तो यह था लेखक शुभानन्द से उनके उपन्यास राजन-इकबाल: हॉन्टेड होटल पर की गयी बातचीत। यह बातचीत मई के आखिरी हफ्ते में की गयी थी जो कि कुछ कारणों के चलते अब जाकर प्रकाशित हो रही है। अभी हाल ही में लेखक शुभानन्द का उपन्यास जोकर करे न चाकरी भी प्रकाशित हुआ है। पाठक उसका भी लुत्फ ले सकते हैं।)

राजन इकबाल: हॉन्टेड होटल

राजन इकबाल हॉन्टेड होटल | शुभानन्द | राजन-इकबाल रिबॉर्न शृंखला | फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस

जब शहर के एक नामी होटल के कमरे में युवा बिजनसमैन यश मेहता की लाश चेहरे पर अजीबोगरीब मुस्कान के साथ मिलती है तो सवाल उठता है: क्या यह किसी आत्मा का प्रकोप है या फिर कोई रची गई साजिश?

होटल का कमरा नंबर 108 कुछ ऐसा था जहाँ पिछले बीस सालों में यह चौथी मौत थी। पिछली सभी मौत खुदखुशी के केस थे। जब राजन इकबाल इस केस की तह तक जाने की कोशिश करते हैं तो रहस्य की कई परतें खुलती हैं, सामने आते हैं झूठ, फरेब और छुपे हुए रिश्तों के राज़। हर सुराग किसी नई दिशा की ओर इशारा करता है, लेकिन सच तक पहुँचना आसान नहीं था।

क्या यश की मौत वाकई किसी परालौकिक शक्ति का काम था, या इंसानी लालच और धोखे की कहानी?

पुस्तक लिंक: अमेज़न


FTC Disclosure: इस पोस्ट में एफिलिएट लिंक्स मौजूद हैं। अगर आप इन लिंक्स के माध्यम से खरीददारी करते हैं तो एक बुक जर्नल को उसके एवज में छोटा सा कमीशन मिलता है। आपको इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ेगा। ये पैसा साइट के रखरखाव में काम आता है। This post may contain affiliate links. If you buy from these links Ek Book Journal receives a small percentage of your purchase as a commission. You are not charged extra for your purchase. This money is used in maintainence of the website.

Author

  • विकास नैनवाल

    विकास नैनवाल को अलग अलग तरह के विषयों पर लिखना पसंद है। साहित्य में गहरी रूचि है। एक बुक जर्नल नाम से एक वेब पत्रिका और दुईबात नाम से वह अपनी व्यक्तिगत वेबसाईट का संचालन भी करते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *