समीक्षा: दिल मदारी

दिल मदारी | पूनम अहमद | साहित्य विमर्श प्रकाशन

‘दिल मदारी’ यह शीर्षक ही इतना अलग सा और दिलचस्प है कि बरबस पाठक को पढ़ने के लिए आकर्षित करता है। ‘दिल’, जो पूरे शरीर में रक्त प्रवाह द्वारा पोषण और ऑक्सीजन पहुँचाने के साथ ही कभी-कभी प्रेम में पड़ कर व्यक्ति से क्या कुछ नहीं करवा लेता, का बहुत ही दिलचस्प तानाबाना बुना गया है उपन्यास में जिसमें ऊर्जा से भरे हुए युवा हैं जो आधुनिक होते हुए भी अपनी जड़ों और संस्कारों से जुड़े हुए हैं। जो काम के प्रति निष्ठावान हैं, परिवार के प्रति समर्पित हैं और दोस्ती के अटूट बंधन में बँधे हुए हैं। यहाँ करियर और जॉब की व्यस्तता है, परिवार का प्रेम, विश्वास है और दोस्तों का साथ और मस्ती भी है। और इन्हीं के बीच चुपके से दो युवाओं की दिल की ज़मीन पर प्रेम का गुलाबी अंकुर जन्म लेता है और फिर उस अंकुर को मज़बूती से एक रिश्ते के रूप में परिवार के मध्य स्थापित करने की जद्दोजहद में उपन्यास कई रोमांचक मोड़ों से गुजरते हुए मुम्बई से लंदन तक की यात्रा करता है।

उपन्यास की नायिका वरदा अपने पारिवारिक मूल्यों व माता-पिता की भावनाओं को ज़रा भी आहत न करते हुए किस तरह से उन्हें जैकब के साथ अपने रिश्ते के लिए तैयार करती है उसका बहुत ही अनूठा तरीका लेखिका ने प्रस्तुत किया है।

युवावस्था जीवन की वह अवस्था है जिसमें बचपन का अल्हड़पन, नासमझी, अबोधपन पीछे छूट कर जीवन के यथार्थ से परिचय होने लगता है। इस अवस्था के संघर्ष भी सबसे अधिक है। खुद को, समाज को, रिश्तों को नये सिरे से जानना-समझना, करियर की चिंता। बचपन के अबोधपने में रिश्तों का जो कड़वा सच बहुत बार समझ नहीं आता वो इस उम्र में समझ आ जाता है और फिर उसके साथ तालमेल बिठाने में अपने आपके साथ कई बार बड़ी जंग लड़नी पड़ती है। वरदा भी अपने भीतर एक ऐसी ही जंग लड़ती रहती है। इतनी चुपचाप कि किसी को भी इसकी खबर नहीं लगने देती। एक ओर बचपन की भयावह स्मृति का दाह और दूसरी ओर प्रेम की सुखद छाँव। लेखिका ने एक युवा लड़की के इस भीतरी संघर्ष को बहुत भावुकता से साधा है। बहुत सी लड़कियाँ इस दुखद स्थिति से गुज़रती हैं और जीवन भर उससे उबर नहीं पाती। मगर वरदा खुद को उन स्मृतियों से बाहर निकालकर स्वस्थ होती है और एक नये रिश्ते के लिए खुद को पूरी तरह तैयार करती है।

लेखिका युवा मन को बहुत बखूबी समझती हैं। उपन्यास उनके इर्दगिर्द घूमता है। दोस्तों के बीच पार्टियाँ, बर्थडे सेलिब्रेशन पाठक को भी नयी ताज़गी से भर देते हैं। प्रत्येक आयु वर्ग का पाठक इस उपन्यास से जुड़ाव महसूस करेगा क्योंकि सभी या तो इस आयु में है या इस आयु से गुज़र चुके हैं। भाषा दैनिक बोलचाल की है जो सहज सम्प्रेषणीय है और पाठक के मन तक अपनी बात पहुँचा देती है।

उपन्यास की सबसे बड़ी खूबी है इसका शिल्प। कहानी के शिल्प में कथानक को बुनते हुए उसे चरम पर ले जाना सरल होता है लेकिन इसकी बुनावट एकदम भिन्न है। यहाँ हर पात्र आकर अपनी-अपनी बात कहता है और उनकी बातों में ही कथानक आगे बढ़ता है। लेखिका ने कथानक को अद्भुत ढंग से साधा है कि कहीं भी कोई सिरा न तो छूटा है और न ही कमज़ोर पड़ा है। एकदम प्रवाह में कहानी आगे बढ़ती है। कहीं उसका तारतम्य नहीं टूटता। इसके लिए वे विशेष बधाई की पात्र हैं। इस शिल्प में उपन्यास को गढ़ना वास्तव में दुष्कर कार्य है लेकिन उन्होंने बड़ी सहजता से उसका निर्वाह किया है। यह शिल्प कौशल उपन्यास की रोचकता को बढ़ाते हुए उसके प्रवाह को गति देता है तभी पाठक एक बार यदि इसे पढ़ना शुरू कर दे तो पूरा पढ़े बिना इसे रख देना कठिन है। शुरू से आखिर तक उपन्यास एकसमान रुचि से पाठक को बाँधे रखने में पूर्णतः सफल रहा है।

भिन्न-भिन्न धार्मिक आस्थाओं के परिवेश से आने के बाद भी सभी पात्रों में मनुष्यता का धर्म ही सर्वोपरि दिखाई देता है और वे सहजता से एक-दूसरे के उत्सवों में शामिल होकर आनंद मनाते हैं। मुम्बई के बाद लंदन की गलियों की सैर उपन्यास को एक अलग आस्वादन देती है। विदेशी धरती का रोमांच, वहाँ के लोग, रहन-सहन, शिक्षा पाठक की जिज्ञासा को जागरूक रखता है।

पूनम समय की नब्ज़ और पाठकों की पसंद को भलीभाँति समझती हैं। उनकी हर कृति एक भिन्न कथानक और भावभूमि पर रची होने के कारण हर वर्ग और आयु के पाठकों को आकर्षित करती है। उनका अनुभव संसार अत्यंत व्यापक है और अपनी कल्पनाशीलता से वे अद्भुत कौशल के साथ उत्कृष्ट रचनाओं का सृजन करती है। यह इस उपन्यास में भी दृष्टिगोचर होता है।

पुस्तक के विषय में

दिल मदारी - पूनम अहमद | साहित्य विमर्श प्रकाशन

वरदा और जैकब को पता ही नहीं चला कि कब वे एक दूसरे के नज़दीक आ गये। वे शादी करना चाहते थे लेकिन ऐसा होना मुमकिन नहीं दिख रहा था। पर दिल के हाथों दोनों मजबूर थे। दिल एक ऐसा मदारी बन गया था जो उन्हें नचा रहा था। वरदा अपनी उलझनों में घिरी जी रही थी। क्या थीं उसकी उलझनें? क्या दोनों का प्यार अपनी मंज़िल तक पहुँच पाया?

प्रकाशक: साहित्य विमर्श प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न


FTC Disclosure: इस पोस्ट में एफिलिएट लिंक्स मौजूद हैं। अगर आप इन लिंक्स के माध्यम से खरीददारी करते हैं तो एक बुक जर्नल को उसके एवज में छोटा सा कमीशन मिलता है। आपको इसके लिए कोई अतिरिक्त शुल्क नहीं देना पड़ेगा। ये पैसा साइट के रखरखाव में काम आता है। This post may contain affiliate links. If you buy from these links Ek Book Journal receives a small percentage of your purchase as a commission. You are not charged extra for your purchase. This money is used in maintainence of the website.

Author

  • विनीता राहुरीकर | vinita rahurikar

    विनीता राहुरीकर 2010 से लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं। उनके 200 से ऊपर कहानियाँ, लेख, और कविताएँ प्रकाशित हो चुकी हैं। मेरी सहेली, गृहलक्ष्मी, सरिता इत्यादि पत्रिकाओं और देश के अन्य समाचार पत्रों में उनकी कहानियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। विनीता बाल साहित्य भी लिखती हैं और उनकी बाल कथाएँ बाल पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं।

    प्रकाशित पुस्तकें:
    एक ज़िंदगी दो चाहतें, इत्र में भीगी हथेलियाँ, कर्मचक्र

    View all posts

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *