महाराष्ट्र में मौजूद अजंता की गुफाएँ अपने आप में एक आश्चर्यलोक हैं। यह पत्थरों को काटकर बनाए गयी तीस से अधिक बौद्ध स्मारकों का समूह है। इन गुफाओं की दीवारों ने अपने समय के समाज को अपने भीतर ज्यों का त्यों सहेज लिया है। एक अद्भुत कला-वीथिका है— अजंता। बौद्ध भिक्षुओं द्वारा उत्कीर्ण किये गये गौतम बुद्ध के जीवन एवं जातक कथाओं के अनुपम भित्तिचित्रों के लिए विख्यात। वहाँ अगर आप जाएँ तो यह सोचने से खुद को नहीं रोक पाते हैं कि इनका निर्माण क्यों हुआ होगा? इस निर्माण के पीछे की क्या कहानी रही होगी?
सौरभ शर्मा की किताब ‘अजंता की राजकुमारी’ इसी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखी गयी है। लेखक सौरभ शर्मा ने इस उपन्यास के ज़रिए उस समय की कहानी कही है जब अजंता की गुफाएँ अस्तित्व में नहीं आयीं थीं बल्कि उनको बनाए जाने का विचार चल रहा था। ऐसे में उनके बनाए जाने के सम्भावित कारणों पर प्रकाश डालने का का काम ‘अजंता की राजकुमारी’ करती है।
यूँ तो ऐतिहासिक विषयों पर लिखी गयी पुस्तकें प्रायः ज्ञानवर्धक एवं सूचनापरक पुस्तकों की श्रेणी में ही रखी जाती हैं। मनोरंजन के लिए सम्भवतः ऐतिहासिक पृष्ठभूमि पर लिखी पुस्तकें कम ही पढ़ी जाती होंगी पर इस बात को ‘अजंता की राजकुमारी’ सिरे से ख़ारिज करती है। पुस्तक ऐतिहासिक कालखंड पर तो रोशनी डालती ही है पर साथ में इसकी पठनीयता पुस्तक को पढ़ा ले जाती है। लेखक ने ऐतिहासिक घटनाओं में अपनी कल्पना का समावेश कर एक कहानी में ढाल लेने का अनूठा प्रयोग किया है और वह इस प्रयोग में सफल भी रहे हैं।
लेखक परिचय में सौरभ शर्मा के लिए लिखा गया है कि दुनिया जिन अच्छे लोगों की वजह से सुंदर है, उन पात्रों को चुन-चुनकर ये अपने गद्य में ले आते हैं, जिससे इनकी साहित्यिक दुनिया और भी समृद्ध जाती है और पाठक के लिए न भूलने वाली स्मृति छोड़ जाती है। मैं भी यहाँ इस बात से इत्तेफाक रखती हूँ।
प्रस्तुत पुस्तक में लेखक ऐसे कई पात्र पाठकों के लिए लाएँ हैं। अजंताओं की गुफाओं का निर्माण वाकाटक राजवंश के काल में, विशेषकर राजा हरिषेण के संरक्षण में हुआ था। ऐसे में उसी समय के लोगों और उनके जीवन को लेखक ने यहाँ दर्शाया है। राजा हरिषेण, राज महिषी, राजकुमारी विशाखा, सम्राट बुद्ध गुप्त, ब्रह्म गुप्त और बौद्धिक स्तर पर अनेक अमात्यों से बेहतर राजनीतिक एवं रणनीतिक सोच रखने वाली नगर वधू प्रियवंदा इस उपन्यास के कुछ प्रमुख पात्र हैं। इनके अतिरिक्त कुछ काल्पनिक चरित्र भी हैं जो कहानी के प्रवाह को बनाए रखते हैं।
जब राजपुरुषों और सम्राट हरिषेण के मन में अपनी सार्थक स्मृतियों को सहेज लेने का विचार आया होगा, कैसी परिस्थितियाँ रही होंगी… वार्त्ताओं, चर्चा-परिचर्चाओं के कितने दौर चले होंगे… विचार-मंथन का वह घटनाक्रम बौद्धिक रूप से कितना समृद्ध कर देने वाला रहा होगा यह उपन्यास पढ़ते हुए पाठक सहज ही अनुमान लगा सकता है। इन सभी बिंदुओं पर सौरभ जी की उर्वर कल्पनाशीलता का प्रकाश पड़ा है। गुप्त साम्राज्य व वाकाटक साम्राज्य की सहजीविता, आपसी सम्बंधों, दोनों परिवारों के बीच होने वाले गठबंधनों की आवश्यकता को रोचकता से लिखा गया है। उपन्यास पढ़ते हुए पाठक भी इतिहास के उस कालखंड में पहुँच जाता है।
भाषा वो वाहन होती है जिस पर बैठकर लेखक पाठकों को अपने कथासंसार में ले चलता है। ‘अजंता की राजकुमारी’ का एक सबल पक्ष इसका सुंदर भाषा सौष्ठव भी है। यहाँ शुद्ध हिन्दी का प्रयोग हुआ है, यही देश-काल एवं पात्रों की माँग भी थी, किंतु कहीं पर भी भाषा दुरूह नहीं है। बोझिल नहीं लगती। लेखक ने सजीव, चित्रात्मक भाषा का प्रयोग किया है जो पढ़ते-पढ़ते पाठक के सम्मुख एक दृश्य भी प्रस्तुत कर देती है। अनेक जगहों पर भाषा माधुर्य मिला, सभी का उल्लेख तो सम्भव नहीं, एक उदाहरण दे रही हूँ इसी पुस्तक से जहाँ बहुत सुंदर, भावपूर्ण शब्द-संयोजन पढ़ने को मिला।
राजा हरिषेण की पुत्री राजकुमारी विशाखा राजकुमार ब्रह्म गुप्त के लिए पत्र लिख रही हैं। अपने शब्द चातुर्य से वो राजकुमार की प्रशंसा कर रही हैं, उनके पूर्वजों से उनके चारित्रिक साम्य के विषय में बता रही हैं, अपनी आशंका का ज़िक्र कर रही हैं। उसके कुछ अंश…
मन में सोचा कि पहली बार आपसे भेंट की स्मृति को चित्र के रूप में सहेज कर रख लूँ। यह निश्चित कर आपका चित्र बनाना आरम्भ कर दिया, आपके हाथ में एक कमल का पुष्प पकड़ा दिया। आप नीचे देख रहे हैं और आपके हाथ में कमल का पुष्प है जिसे आपने हृदय के समक्ष रखा है। जब यह चित्र पूरा हुआ तो सहसा मुझे लगा कि यह तो मैंने पद्मपाणि बुद्ध जैसा चित्र बना दिया! फिर इस अज्ञात आशंका से काँप गयी कि कहीं आप भी बुद्ध के मार्ग पर न चले जाएँ।
आपने बताया था कि आपको वीणा वादन पसंद है, वह बात याद करते हुए मैंने आपके हाथों में वीणा की कल्पना की। आपकी उँगलियों से वीणा के तार झंकृत हो रहे थे। चित्र तैयार हुआ और इस बार मैं जोर से हँसी। यह क्या! मैंने तो महान सम्राट समुद्रगुप्त की तरह की तस्वीर बना दी थी, मैं कामना करती हूँ आप ऐसे ही यशस्वी हों।
फिर एक तीसरा चित्र भी मैंने बनाया है। सम्राट चंद्रगुप्त की तरह आप अश्व पर सवार हैं और तेज़ी से आगे बढ़ रहे हैं।
यह अंश बहुत सुंदर, सार्थक और प्रभावी बन पड़ा है। अपने भावी वर में सभी वांछित विशेषताओं की कल्पना विशाखा ने कर ली है। स्वरचित चित्रों के माध्यम से अपनी भावनाएँ व्यक्त भी कर दी हैं। चंद्रगुप्त सा तेजस्वी, पराक्रमी… समुद्रगुप्त सा कला एवं संगीत प्रेमी।
राजकुमार ब्रह्म गुप्त द्वारा लिखित इसका प्रत्युत्तर भी रोचक है। वो स्वीकार करते हैं कि अपने पूर्वज सम्राट चंद्रगुप्त का शौर्य और बौद्धिकता तो उनके पास नहीं है किंतु समुद्रगुप्त के समान वीणा वादन में रुचि है उनकी। विशाखा को लिखते हैं…
मैं कल्पना करता हूँ कि कदाचित कोई मायावी शक्ति अथवा उपकरण होता तो उसके माध्यम से मैं वीणा की यह धुन तुम्हें भेज देता।
(इन पंक्तियों को पढ़ मन ही मन शुक्र मनाया मैंने… अच्छा हुआ यह मायावी उपकरण मोबाइल उस समय पर नहीं था, वरना हज़ारों पीढ़ियों की कल्पना शक्ति वहीं से कुंद हो चुकी होती!)
उपन्यास का एक अन्य उल्लेखनीय तत्त्व है लेखक द्वारा सृजित सुदृढ़, प्रतिभावान, प्रखर महिला पात्र। प्रियंवदा का चरित्र बहुत सुंदर गढ़ा गया है। उसके माध्यम से स्त्रियों की बुद्धिमत्ता, विवेक एवं योग्यता पर संशय रखने वाली आदिम मानसिकता पर करारा प्रहार किया गया है। इस पर कई पंक्तियाँ हैं जो गहरे उतर गयीं…
शिखर वार्त्ता के लिए चयनित होने पर प्रियंवदा को आत्मविश्वास नहीं है, थोड़ी अशांत (नर्वस) भी है किंतु हरिषेण के शब्द उसको सांत्वना देते हैं…
गुरुकुल में शिक्षा के दौरान हमें स्त्रियों की कमजोरी बतायी जाती थी कि उनका विवेक कमजोर होता है, तब मेरी दादी का चेहरा मेरी आँखों के सामने आता था और लगता था कि मुझे जो शिक्षा दी जा रही है, वो किताबी है। जीवन इससे बिलकुल अलग है और विलक्षण है, जिसे मैं अपने अनुभवों से समझ पा रहा हूँ। शिखर वार्त्ता में तुम्हारा चयन उसका ही परिणाम है।
शिखर वार्त्ता में प्रियंवदा की उपस्थिति राजा बुद्ध गुप्त को हास्यास्पद प्रतीत होती है किन्तु उससे साक्षात्कार के बाद उनकी धारणा बदल जाती है। वे प्रियवंदा से कहते हैं:
नीतिशास्त्रों में नारी की कमजो़र स्थिति पढ़कर मैं इस निर्णय पर पहुँचा था कि नारी के भीतर वैसे बौद्धिक गुण नहीं होते जैसे पुरुषों में, लेकिन वत्सगुल्म की नगर वधू ने एक एक कर सारे भ्रम तोड़ दिये।
बंधुवर्मन का कटाक्ष भी पठनीय है, याद रह जाता है…
हमारे यहाँ स्त्रियों को राजनीति से बाहर क्यूँ रखा जाता है, यह प्रश्न आज आपसे बातचीत कर आता है। हमारा तंत्र विरूपाक्ष जैसे संधिविग्रहक और प्रविराज जैसे महामात्य चुनता है, अथवा आनुवंशिक रूप से स्वीकार करता है… किंतु गार्गी जैसी प्रखर मेधा को नगर वधू बनाकर शोभा की वस्तु बना देता है।
कई समसामयिक विषय उपन्यास में इस प्रकार उठाये गये हैं कि अप्रासंगिक नहीं लगते। आश्चर्य होता है जो चीज़ें उस काल में होती थीं वही सब आज भी होती हैं… और ईश्वर ना करें कि कल भी हो! दोहरा चरित्र, भ्रष्टाचार, शिक्षित बेरोजगार युवा और उनका असंतोष सब आज भी तो व्याप्त है। इन सबके अतिरिक्त यहाँ काव्य प्रेत भी हैं। काव्य प्रेतों का ज़िक्र मुझे उन व्यंग्यों की याद दिला गया जो पहले कभी अखबारों के स्तम्भों में या पत्रिकाओं में प्रायः कवियों पर हास्य के रूप में छपा करते थे। ये हास्य-व्यंग्य लिखे जाते थे उन निरीह कवियों पर जो श्रोताओं की तलाश में रहते थे। जो एकाध कहीं मिल जाता तो उसे पकड़-पकड़ कर अपनी कविताएँ सुनाया करते थे। बहरहाल, समय बदल चुका है… कवियों और कविताओं को भरपूर सराहना मिलती है और अगणित श्रोता भी।
पुस्तक के दुर्बल पक्ष की बात करनी हो तो इसकी भाषा का ज़िक्र उसमें आ सकता है। सम्भव है कुछ पाठकों, जो हिंगलिश भाषा में ज़्यादा सहज हैं, को पुस्तक की भाषा कुछ दुरूह लगे, किंतु ऐतिहासिक पृष्ठभूमि तत्कालीन देश-काल के संदर्भ में ऐसी भाषा का होना स्वाभाविक ही है। ऐसे में वह भाषा को कथानक का ज़रूरी अंग मान इसे पढ़ेंगे तो उतनी कठिनाई शायद उन्हें न हो।
अंत में यही कहूँगी लेखक सौरभ शर्मा ने प्राचीन इतिहास को एक नये कलेवर में प्रस्तुत किया है, और अपनी कल्पनाओं के ढेर सारे रंग यहाँ भर दिए हैं, जिससे अजंता की राजकुमारी एक रोचक व पठनीय पुस्तक बन गयी है। उपन्यास बौद्धिक रूप से आपको पुष्ट तो करेगी ही, साथ ही लेखक की कल्पनाशीलता आपका मन मोह लेगी। नहीं पढ़ी है तो एक बार पढ़कर देखें।
प्रकाशक: फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस | पुस्तक लिंक: अमेज़न
