कहानी
विकास अपनी बूढ़ी माँ और विधवा बहन का एकलौता सहारा था। पेशे से वह एक क्लर्क था जिसकी तनख्वाह में घर का खर्चा बड़ी मुश्किल से ही चल पाता था। पर उसके मन में एक बड़ा संगतीतज्ञ बनने की इच्छा भी कहीं मौजूद थी।
सेठ सदानंद शहर के सम्मानित धनाढ्य व्यक्ति थे। विकास को जब एक प्रोग्राम में सेठ सदानंद के बेटे शरद ने वायलन बजाते हुए देखा तो उसने विकास से उसे भी वायलन सिखाने की गुज़ारिश की। विकास ने शरद को वायलन की शिक्षा देने के लिए हामी इसलिए भरी थी ताकि कुछ पैसे वो ज़्यादा कमा सके और घर की ज़रूरतों को पूरा कर सके।
पर अब विकास इन्हीं सेठ सदानंद की बड़ी बेटी अर्चना के कत्ल के इल्ज़ाम में जेल में बंद था।
क्या विकास ने सेठ सदानंद की बेटी का खून किया था?
उस पर कत्ल का ये संगीन इल्ज़ाम क्योंकर लगा था?
क्या वो अपने को बेगुनाह साबित कर पाया?
टिप्पणी
मनुष्य परिस्थितियों का पुतला है। ये परिस्थितियाँ और इनमें किया गया हमारा या किसी और का किया गया चुनाव ही हमारी नियति और हमारा जीवन की दिशा निर्धारित करता है। परिस्थितियों के कारण विवश ऐसे ही दो व्यक्तियों की कहानी रानू प्रस्तुत उपन्यास ‘प्रायश्चित’ में दर्शाते हैं।
उपन्यास के केंद्र में है एक युवा विकास जो बनना तो संगीतज्ञ चाहता था लेकिन हालात ऐसे बने कि उसे कातिल करार दिया गया। लेखक कथानक के शुरुआत में ही ये दर्शा देते हैं कि विकास ने कत्ल नहीं किया है पर फिर भी मासूम होते हुए भी उसे उस अपराध की सज़ा मिलती है जो उसने नहीं की।
हमारे देश आज भी कई ऐसे कैदी हैं जो बेगुनाह होते हुए भी सजा काट रहे थे। केवल इसलिए क्योंकि किसी ने उन्हें फँसा दिया या उनके पास इतना धन नहीं होता है कि वो महंगी न्यायिक प्रक्रिया का खर्चा उठा सकें या कानून अपना काम ढंग से न कर सका। आये दिन ऐसी खबरें आती हैं जिसमें कोई व्याक्ति कई वर्षों की सजा काटने के बाद बेगुनाह साबित हो जाता है। ऐसे ही लोगों के दर्द और सजा पाने के बाद उनके और उनके परिवार के अनुभवों को कुछ हद तक विकास के माध्यम से लेखक द्वारा बयान किया गया।
उपन्यास की दूसरी महत्वपूर्ण पात्रा वंदना है। वंदना उस लड़की की बहन रहती है जिसका कत्ल होता है। कई बार हमें जो चीज़ दिख रही होती है वो असल में होती नहीं है। पर हम इतने आहत हो चुके होते हैं कि उस दिखने वाली चीज़ को ही सच मान लेते हैं। फिर क्रोध में हम उसे सच साबित करने के लिए झूठ बोलने से नहीं हिचकते हैं। पर ऐसी गलती करने का क्या दुष्परिणाम होता है ये इस कहानी में देखा जा सकता है।
उपन्यास का शीर्षक वंदना द्वारा की गयी इसी गलती से आता है। उसे जब अपनी गलती का अहसास होता है तो वह प्रायश्चित करने का मन बना लेती है। वह जिस तरह से अपने गुनाह का प्रायश्चित करती है। इसमें उसे जो जो दिक्कतें आती हैं और वह इनसे पास जिस तरह से पाती है वह भी उपन्यास का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते हैं।
लेखक ने इन दोनों किरदारों को अच्छे से गढ़ा है। आपको विकास के लिए बुरा भी लगता है लेकिन वंदना का किरदार जिस तरह से गढ़ा गया है उसके चलते आप ये भी चाहते हो कि वंदना का प्रायश्चित सफल भी हो जाए।
कई बार हमारे जीवन में हमारे कुछ नजदीकी होते हैं जो कि हमारे अच्छे दिनों के साथी होते हैं जो कि बुरे दिनों की आहट पाते ही गधे के सिर से सींग की तरह गायब हो जाते हैं। ऐसे ही किरदार गौरी और उसके पिता हैं। वह कहने को तो कलाकार हैं लेकिन वह संवेदनशीलता उनमें दिखती नहीं हैं। अपने स्वार्थ को को हमेशा तरजीह देते हैं। उनकी इस प्रवृत्ति को अच्छे से लेखक दर्शाते हैं और पढ़ते हुए अपने जीवन में मौजूद ऐसे लोगों के नाम बरबस ही हमारे ज़ेहन में आ जाता है।
यहाँ अंजू जैसा किरदार भी है जो कि दोस्ती के लिए सब कुछ करने को तैयार रहता है। इसके अलावा उपन्यास में एक जेल सुप्रीटेंडेंट का किरदार भी है। यह एक सहृदय किरदार है जो वैसे तो जेल के कैदियों के बीच रहता है लेकिन दया और मानवता पर अधिक विश्वास करता है। ऐसे में कई बार अपनी दया और मनुष्यता से कैसे व्यक्ति किसी के जीवन को बदल सकता है वह भी उपन्यास में दिखता है।
उपन्यास की भाषा शैली सरल है और कथानक बाँध कर रखता है। जहाँ आप पहले भाग को ये जानने के लिए पढ़ते जाते हैं कि असल कातिल कौन है और बेगुनाह विकास कैसे छूटेगा। वहीं आप दूसरे भाग को ये जानने के लिए पढ़ते चले जाते हैं कि वंदना का प्रायश्चित सफल होगा या नहीं। उसके सामने क्या मुश्किले आएँगी और विकास और उसका समीकरण किस तरह बदलेगा। वंदना जो तरीका अपना प्रायश्चित पूरा करने को अपनाती है वो भी कथानक में रोचकता लाता है।
उपन्यास का पहला भाग जहाँ आपको दुख से भर देता है और विकास और उसके नजदीकियों के लिए आपका मन पसीज सा जाता है। वहीं बाद के हिस्से में थोड़ी रूमानियत, थोड़ा हँसी मज़ाक, थोड़ी जलन और थोड़ी उम्मीद दिखती है।
उपन्यास की कमी की बात करूँ तो उपन्यास के पहले भाग में कत्ल के महत्वपूर्ण बिंदु है। इधर रहस्य का एक तत्व भी रहता है पर जिस तरह से असली कातिल की पहचान को संयोग के माध्यम से खोला है उसे पढ़कर ऐसा लगता है जैसे लेखक ने कातिल को उजागर करने का आसान सा रास्ता चुन लिया था। कातिल के असल रूप को उजागर बेहतर तरीके से बिना संयोग का प्रयोग किये खोला जाता तो बेहतर होता।
यह उपन्यास जब लिखा गया था उस समय के सामाजिक उपन्यासों में प्रेम एक केंद्रीय भाव होता था तो इसमें भी विकास और वंदना के बीच प्रेम दर्शाया गया है। वंदना की चाहत अपने गुनाह का प्रायश्चित करने की तो होती ही है पर वो विकास का प्रेम भी पाना चाहती है। मुझे लगता है यह भी उपन्यास का एक कमज़ोर हिस्सा है। उपन्यास के अंत तक पहुँचते पहुँचते लेखक इन दो किरदारों के बीच जो प्रेम उपजता हुआ दर्शाते हैं वो जल्दबाजी में लिखा गया लगता है। उसे पचाने में पाठक को थोड़ा दिक्कत हो सकती है। उस कोण को बेहतर तरीके से दर्शाया जा सकता था। या तो समय लिया जाता या फिर प्रेम वाले हिस्से को सफल होता न दर्शाते तो बेहतर होता।
अंत में यही कहूँगा कि रानू का लिखा ‘प्रायश्चित’ एक पठनीय फिल्मी उपन्यास है। अगर आपको सामाजिक उपन्यास पसंद आते हैं आपको इसे पढ़कर देखना चाहिए। मुझे लगता है आप आप इसका लुत्फ ले पाएँगे। वहीं अगर आप 70 80 के दशक के फिल्मों के शौकीन हैं तो भी इस उपन्यास का आनंद आप ले सकेंगे।
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