लेखक अशफ़ाक़ अहमद का पहला उपन्यास भले ही 2019 में प्रकाशित हुआ था पर वो काफी समय से लेखन कर रहे हैं। उनकी अब तक 60 से ऊपर किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं। वह अपराध साहित्य भी लिखते हैं तो हॉरर भी लिखते हैं। विज्ञान गल्प लिखते हैं तो सामाजिक उपन्यास और कहानियाँ भी लिखते हैं। ऐसे में उनका लेखन क्षेत्र काफी वृहद हो जाता है। एक बुक जर्नल पर हमने उनसे उनके लेखन, उनकी लेखन प्रक्रिया और लेखन से जुड़े दूसरे अनुभवों पर बात की है। आप भी पढ़ें:
प्रश्न: नमस्कार अशफ़ाक़ जी, एक बुक जर्नल पर आपका स्वागत है। सर्वप्रथम पाठकों को अपने विषय में बताएँ।
उत्तर: नमस्कार। वैसे तो मैं सीतापुर का रहने वाला हूँ, जो लखनऊ से सटा हुआ एक शहर है। वहीं मेरा जन्म हुआ, वहीं मैं बड़ा हुआ और वहीं पढ़ाई-लिखाई हुई— लेकिन फिर एक लम्बा वक़्त मुंबई में बीता। अब फिलहाल 13 सालों से लखनऊ में रह रहा हूँ।
प्रश्न: बातचीत शुरू करने से पहले आपकी नवीनतम पुस्तक ‘जॉली रोजर’ के लिए आपको हार्दिक बधाई। कुछ इस पुस्तक के विषय में बताएँ?
उत्तर: ‘जॉली रोजर‘ स्पाईवर्स शृंखला का आठवाँ उपन्यास है। इस शृंखला में सभी कहानियाँ जिओपाॅलिटिक्स से जुड़ी होती हैं। ‘जाॅली रोजर’ भी ऐसी ही एक कहानी है जो अंडमान निकोबार की तरफ़ होती कुछ संदिग्ध गतिविधियों की खोजबीन और उनके पर्दाफाश पर आधारित है। स्पाईवर्स में कहानियाँ तीन नायकों के साथ चलती हैं, जो एक गुप्तचर एजेंसी के एजेंट हैं और ‘जाॅली रोजर’ इनमें से एक निहाल सिंह के साथ है।

प्रश्न: चलिए अब पुस्तक से आपकी तरफ़ को मुड़ते हैं। ये बताइएगा कि साहित्य से जुड़ाव कैसे हुआ? क्या घर में बचपन से ही साहित्यिक माहौल था?
उत्तरः हाँ, घर में मेरे पिताजी किताबों के शौकीन थे तो वह एक लाइब्रेरी से किताबें लाते थे और मैं जब सिक्स्थ में था तो मैंने तभी से चुरा‑छुपा कर उन किताबों को पढ़ना शुरू कर दिया था। इन किताबों में ज्यादातर वेद प्रकाश शर्मा के जासूसी उपन्यास और गुलशन नंदा, ऋतुराज, राजहंस आदि के सामाजिक उपन्यास होते थे। फिर मैंने अपने इलाके की एक लाइब्रेरी ज्वाइन की और वहाँ जितने भी तरह की किताबें और लेखक थे, काॅमिक्स, पत्रिकाएँ थीं— सबको पढ़ डाला। उस वक़्त लाइब्रेरी की सैकड़ों किताबों में ऐसी एक किताब नहीं बची थी जो मैंने पढ़ी न हो।
प्रश्न: वह कौन से लेखक या रचनाएँ थीं जिन्होंने शब्दों के प्रति आकर्षण जागृत किया?
उत्तरः अगर सच कहूँ तो उस वक़्त मुझे सबसे ज्यादा एस सी बेदी की राजन-इकबाल सीरीज की किताबें पढ़नी पसंद थीं। उस वक़्त तक मुझे ‘साहित्य’ कही जाने वाली किताबें खास पसंद नहीं आती थीं क्योंकि उनमें कहानी कम और बाकी बातें ज्यादा होती थीं— वह सब बाद में ठीक से समझ आनी शुरू हुईं। उस वक़्त मुझे वेद प्रकाश शर्मा, सुरेन्द्र मोहन पाठक, इब्ने सफी, गुलशन नंदा, कृश्न चंदर (उर्दू में) ज्यादा आकर्षित करते थे।
प्रश्न: लेखन का खयाल कब और कैसे आया? क्या आपको अपनी वो रचना याद है जो सबसे पहले आपने लिखी थी? अगर हाँ, तो वो कौन सी थी? उसे लिखने का विचार कैसे आया था?
उत्तरः जैसा ऊपर मैंने बताया एस सी बेदी की राजन इकबाल सीरीज की किताबें मुझे काफी पसंद थीं। स्कूल टाइम में ये किताबें पढ़ते-पढ़ते मन में ख़ुद ही कहानियाँ बनने लगी थीं कि अगर ऐसा हो तो कैसा हो, वैसा हो तो कैसा हो। यहाँ तक कि उनसे प्रेरित हो कर मैंने छठी-सातवीं क्लास में एक अपनी कहानी भी लिखी थी, जो यूँ तो किसी लायक नहीं थी और मेरे पिता ने उसमें ढेरों लेखकीय त्रुटियाँ भी निकाली थीं— लेकिन बड़ी बात यह थी कि उस वक़्त तक मेरे अंदर इतनी कल्पनाशीलता पैदा हो चुकी थी कि मैं किताब लिख सकता।
वहाँ से टेंथ तक मैंने कई कहानियाँ लिखीं, कुछ उपन्यास लिखे— और हाँ, मुझे शायरी का शौक था तो ढेरों गाने भी लिखे… लेकिन वह सब स्कूल की कॉपियों के पीछे खाली बचे पन्नों को जोड़ कर बनायी काॅपियों पर होता था, जो फिर ज़्यादातर नष्ट हो गया, गुम हो गया और जो थोड़ा-बहुत बचा भी— तो वह बाद के दौर में प्रांसगिक न रहा।
मुझे पहली रचना या उपन्यास का अब कुछ याद तो नहीं लेकिन अब स्पाईवर्स और क्राइम फिक्शन विद डेविड शृंखला में जो कहानियाँ प्रकाशित हुई हैं— इनमें सात-आठ के क्रम तक की कहानियाँ तभी की लिखी हैं, जो अब वर्तमान दौर के हिसाब से एडिट कर के प्रकाशित की हैं।
प्रश्न: आपकी पहली लिखी पुस्तक कौन सी थी। उसको लिखने का विचार कैसे आया था?
उत्तरः समस्या यह है कि जो रियल में पहली थी, वह तो अब याद भी नहीं। जो सबसे पहले लिखा था, वह एक कहानी थी। फिर जो कुछ लिखा, वह बाल उपन्यास कहे जा सकते हैं। उस दौर में पहला उपन्यास कौन सा लिखा, यह अब याद भी नहीं— पर मोटे तौर पर कहें तो जो पहला उपन्यास लिखा था, वह एक प्राइवेट डिटेक्टिव पर आधारित कहानी थी, जो मैंने सुरेंद्र मोहन पाठक के उपन्यासों से प्रभावित हो कर उसी स्टाइल में लिखने की कोशिश की थी। वह एक मर्डर मिस्ट्री थी— लेकिन वह उपन्यास कभी प्रकाशित नहीं हुआ।
प्रश्न: अच्छा तो फिर आपकी पहली प्रकाशित रचना कौन सी थी? उसके विषय में बताएँ? उसे लिखने का खयाल कब आया था?
उत्तरः मेरी पहली प्रकाशित रचना ‘जिहादी परिंदे’ थी जो 2019 में ‘नोशन’ से प्रकाशित हुई थी। हालाँकि यह किताब भी मैंने 98-99 में लिखी थी लेकिन तब उसे प्रकाशित करने का संयोग नहीं बन सका था और फिर ज़िंदगी में दूसरी व्यस्तताओं में फँस कर लेखन की तरफ़ से ध्यान ही हट गया। लगभग बीस साल बाद अपने दूसरे कामों से जब फारिग हुआ और वापस लेखन की तरफ़ फोकस किया— तब इसे प्रकाशित कराया।

प्रश्न: आपकी हालिया पुस्तक जॉली रोजर आयी है। इसे लिखने का विचार कैसे आया? कोई विशेष घटना या विचार जिसने इस किताब को लिखने के लिए प्रेरित किया हो?
उत्तरः नहीं— इस किताब को जैसा कि मैंने बताया, कि यह सभी कहानियां मूल रूप से बीस से तीस साल पहले लिखी थीं और अब रीराइट कर के प्रकाशित कर रहा हूँ तो जब यह लिखी थी तब ऐसी कोई विशेष घटना तो नहीं घटी थी। अलबत्ता विशेष विचार कह सकते हैं। तब इब्ने सफी की एक सीरीज पढ़ी थी, जो टापुओं पर बेस्ड थी। तब उसी तरह की एक कहानी लिखने का ख़्याल आया था तो यह कहानी लिखी थी। अभी वर्तमान समय के हिसाब से इसमें चीन का एंगल इनक्लूड करना पड़ा, जिसकी वास्तविक उपस्थिति उस क्षेत्र में बाज़रिया कोको आइलैंड एक रियलिटी है और जिसके कारण यह क्षेत्र वर्तमान में चर्चित हुआ है।
प्रश्न: अच्छा, आपका लिखने का तरीका क्या है? कुछ लेखक पूरी प्लॉट लाइन तैयार करके लिखते हैं और कुछ लिखते चले जाते हैं और फिर जैसा कथानक बनता है उस तरह से उनका लेखन बनता है? आपके मामले में कैसा है?
उत्तरः मेरे मामले में दोनों चीज़ें हैं… मेरी कुछ कहानियाँ ऐसी हैं, जिनका पूरा खाका कहानी शुरू करने से पहले ही मेरे दिमाग़ में था— और कई कहानियाँ ऐसी हैं कि मैं बस लिखता चला गया और कहानी ख़ुद ही शेप लेती चली गयी। खास कर ‘अर्ल्ज़वर्स’ कांसेप्ट वाली तीस किताबों तक फैली चारों कहानियों में ऐसा ही कुछ था। इन कहानियों का मोटा-मोटा खाका तो मेरे दिमाग़ में था कि मुझे क्या लिखना है— लेकिन कहानियाँ चूँकि काफ़ी लम्बी थीं तो सबकुछ पहले से नहीं सोचा जा सकता था। बस मेन थीम को ध्यान में रखते लिखता गया और कहानी के सब-प्लाॅट और दूसरी छोटी-छोटी चीज़ें एड होती गयी।

प्रश्न: एक किताब पर काम करते समय आपका रूटीन क्या होता है?
उत्तरः मैं एक टार्गेट ले के चलता हूँ कि फलाँ कहानी मुझे कितने वर्ड में लिखनी है। जैसे सीरीज़ से अलग कहानियों के लिये मैंने लगभग एक लाख शब्द तय कर रखे हैं और सीरीज में ‘अर्ल्ज़वर्स’ के लिये अस्सी से नब्बे हज़ार वर्ड्स, तो ‘स्पाईवर्स’, ‘क्राईम फिक्शन’ के लिये साठ से सत्तर हज़ार वर्ड्स। जब किसी कहानी को शुरू करता हूँ तो डेली टार्गेट रहता है कि मिनिमम तीन हज़ार वर्ड्स तो लिखने ही हैं, और मैक्जिमम यानी दिन में और दूसरे कुछ काम न हो और पूरा दिन लिखने को मिल जाये तो दस से ग्यारह हज़ार वर्ड्स लिख डालता हूँ। इस तरह कहानी पूरी होती है और फिर एक ब्रेक ले कर दूसरे कामों की तरफ़ ध्यान देता हूँ।
प्रश्न: क्या एक बार में एक ही किताब पर काम करते हैं?
उत्तरः हाँ, ऐसा संयोग कम ही होता है कि एक साथ दो किताबों पर काम होता हो। ज़्यादातर एक वक़्त मेें एक किताब पर ही काम करता हूँ— इससे फोकस करना आसान रहता है।
प्रश्न: अच्छा अपनी पहली पुस्तक और अपनी नवीन पुस्तक को देखते हैं तो लेखन में क्या किसी तरह का फर्क देखते हैं? इस बदलाव को कैसे देखते हैं? क्या कुछ ऐसा पाया है जिसे आप सहेज कर रखना चाहेंगे और इस बदलाव ने क्या कुछ ऐसा लिया है जिसे आप वापस हासिल करना चाहेंगे?
उत्तरः हाँ, यह तो बड़ी स्वाभाविक चीज़ है। उम्र के हर पड़ाव पर आप और चीज़ें सीखते हैं, और तजुर्बों से गुजरते हैं और थोड़े और परिपक्व होते जाते हैं। फिर अगर आप लेखक हैं तो आपके लेखन में भी वह अंतर स्पष्ट रूप से नज़र आने लगता है। फिर भी एक बात है कि जब आप यंग होते हैं, तब आपका दिमाग़ आइडिया पैदा करने और उसे प्रोसेस करने में बहुत तेज़ होता है जो उम्र बढ़ने के साथ शिथिल होता जाता है। तो मेन अंतर यह है कि जब मैं यंग था तब मेरे दिमाग़ में एक के बाद एक स्टोरी आइडिया आते थे, लेकिन तब लेखन में उतनी मैच्योरिटी नहीं थी— अब दिमाग़ उतने आइडिया नहीं पैदा कर पाता, लेकिन लेखन में पहले के मुकाबले ज़्यादा परिपक्वता है। अगर पहले जैसा कुछ मिल सके तो मैं अपनी यंग एज की उस मानसिक अवस्था को पाना चाहूँगा, जहाँ दिमाग़ जैसे स्टोरी आइडियाज़ की एक फैक्ट्री हुआ करता था।
प्रश्न: अगर आपकी लिखी सामग्री को देखा जाए तो इसे कई श्रेणियों में बाँटा जा सकता है। आपने क्राइम फिक्शन, हॉरर, विज्ञान गल्प और सामाजिक कहानियाँ लिखी हैं। इन्हें लिखते वक्त क्या लेखन की प्रक्रिया एक जैसी होती है? या इसमें बदलाव रहता है।
उत्तरः लेखन की प्रक्रिया तो एक ही रहती है लेकिन इतना अंतर ज़रूर आता है कि जब जिस सब्जेक्ट को लिख रहा होता हूँ, तो बीच-बीच में उससे रिलेटेड मटेरियल पर भी नज़र मारता रहता हूँ कि एक लेखक के तौर पर, उस विशिष्ट सब्जेक्ट के साथ लेखकीय मोड हंड्रेड पर्सेंट सेम पिच पर रहे।
प्रश्न: अच्छा आपने लम्बी लम्बी सीरीज भी लिखी हैं। जैसे मिरोव, ओरियन, विलाद, इक्वोडो। (इधर डेविड फ्रांसिस और स्पाईवर्स वाली सीरीज की बात मैं इसलिये नहीं कर रहा हूँ क्योंकि शायद उनमें अलग अलग मामले ही होते हैं।) आज के समय में जब व्यक्ति का ध्यान लगाने की क्षमता सोशल मीडिया के कारण कम से कमतर होती चली गयी है तो ऐसे में इतनी वृहद शृंखला लिखने का रिस्क लेते हुए आपको कैसा लगा था? पहले तो ये बताएँ कि इनको लेकर पाठकों की कैसी प्रतिक्रिया आपको देखने को मिली? फिर क्योंकि इतनी वृहद शृंखला लिखना खुद में ही एक भागीरथी प्रयास होता है। ऐसे में इसका फल न मिले तो लेखक निराश अधिक हो सकता है? ऐसे में क्या मन के किसी कोने में डर भी था कि कहीं इतनी मेहनत बेकार न चली जाये?
उत्तरः दरअसल ज़माना नकल का है और इंटरनेट और पाइरेसी के कारण आपके कंटेंट तक हर किसी की पहुँच है। लोग बड़ी आसानी से न सिर्फ आपकी कहानियाँ बल्कि पूरा उपन्यास तक चुरा कर दूसरे डिजिटल प्लेटफॉर्म्स पर परोस देते हैं— कई बार तो शीर्षक बदल देते हैं, कई बार वह भी ज़रूरी नहीं समझते। ऐसे में आपकी मौलिकता ही संदिग्ध हो जाती है। मैं अपनी कुछ कहानियाँ प्रतिलापि पर पकड़ चुका हूँ, और भी कहाँ-कहाँ होंगी— पकड़ पाना मेरी क्षमता से बाहर है। मैं इस चोरी से बचना चाहता था, यह पहला कारण था…
दूसरे मैं नेचर, ब्रह्मांड, पृथ्वी और ईश्वर जैसे विषयों पर बहुत जिज्ञासू प्रवृत्ति का रहा हूँ तो इन सब बातों को ले कर मेरे मन में अपनी भी एक थ्योरी थी जो सम्भावनाओं पर आधारित है कि ऐसा भी हो सकता है। इन सब विषयों को समेट कर एक कम्पलीट कांसेप्ट बनता है जिसे मैंने नाम दिया है ‘अर्ल्ज़वर्स’ का। इसमें एक दूसरे से जुड़ी चार अलग-अलग कहानियाँ हैं। पहली कहानी ‘मिरोव’ है, जो तीन भाग में है। दूसरी ‘ओरियन’ पंद्रह भागों में। तीसरी ‘विलाद’ चार भागों में और चौथी व अंतिम कहानी ‘इक्वोडो’ है जो आठ भाग में है।
इस दौर में इतनी लम्बी कहानियाँ लिखना रिस्की तो है, लेकिन मुझे यह अपने लिये लिखना था। कोई पढ़े न पढ़े— मुझे इसका मलाल कभी नहीं होना था। फिर एक दूसरा कारण यह भी है कि मेरी सभी कहानियाँ इंग्लिश भाषा के सहारे ग्लोबल पाठकों तक जानी थीं तो मुझे पाठकों के रिस्पांस को ले कर उतनी फ़िक्र कभी नहीं रही। हाँ, अब तक भारत में जितना इन्हें पढ़ा गया, उसे कोई खास नोटिसेबल रिस्पांस नहीं कह सकते और इसका बड़ा कारण यह पूरा कांसेप्ट है जो आम भारतीय पाठक की रूचि का नहीं है।
प्रश्न: अच्छा, मैंने देखा है आपकी रचनाएँ अक्सर विदेशी पृष्ठभूमि और विदेशी किरदारों को काफी लिए हुए होती हैं? क्या इसके पीछे कोई विशेष कारण है?
उत्तरः हाँ, इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जब कभी मैंने लिखना शुरू किया था तो भले टार्गेटेड ऑडियंस हिंदी भाषी भारतीय पाठक वर्ग रहा हो लेकिन बाद में गोल बदल गया और अब जो मैं लिखता हूँ, वह इस लिहाज से होता है कि अमेरिका में बैठा पाठक भी उससे मनोरंजन पा सके और उससे रिलेट कर सके।
प्रश्न: आपकी किताबों की एक खूबी उसमें रिसर्च की अधिकता भी होती है। आपकी रिसर्च प्रक्रिया के विषय में बताएँ? मसलन अभी मैं सावरी उपन्यास पढ़ रहा हूँ। मूल रूप से उसमें तंत्र मंत्र भी है तो अफ्रीका के कबीलों का ज़िक्र भी है। ऐसे में आपने उसके लिए रिसर्च कैसे की? विशेषकर बंगाल और वहाँ से जुड़े तंत्र साधना से जुड़े पहलुओं का जिक्र है। क्या अफ्रीका कहानी में पहले से था या रिसर्च के दौरान वह जुड़ा? क्या 1950 के बंगाल में कहानी बसाने के लिए कुछ विशेष रिसर्च करनी पड़ी? सावरी की रचना प्रक्रिया के विषय में बताएँ?
उत्तरः मैं जब भी कोई कहानी लिखता हूँ— चाहे वह किसी भी सीरीज से सम्बंधित हो या सिंगल बुक, उसके सब्जेक्ट के हिसाब से अच्छी-खासी रिसर्च करता हूँ, जिसका ज़्यादातर हिस्सा नेट से आता है और कुछ बहुत किताबों से। यहाँ तक कि मैं जिस लोकेशन को उकेर रहा होता हूँ, उसे भी गूगल अर्थ पर खोल कर थ्रीडी मोड में ज़मीन के हर हिस्से को चेक करता हूँ कि कहाँ क्या है, तब लिखता हूँ। पहले एआई नहीं था तो इसके लिये काफ़ी मेहनत हो जाती थी लेकिन इधर साल भर से एआई की मदद लेनी शुरू की है तो काफी कुछ इनफार्मेशन उससे मिल जाती है, लेकिन उस पर भी पूरा भरोसा करने के बजाय मैं क्रॉस चेक ज़रूर करता हूँ, तब लिखता हूँ।
रही ‘सावरी’ की बात, तो इस कहानी में जो भी है वह सब पहले से दिमाग़ में था और इससे रिलेटेड काफ़ी इनफॉर्मेशन पहले ही जुटा रखी थी। ‘सावरी’ और ‘द ब्लडी कैसल’ वह कहानियाँ थीं, जिनका लगभग पूरा खाका पहले से दिमाग़ में था।

प्रश्न: जैसे ऊपर बात हो ही गयी है कि आपने विज्ञान गल्प, हॉरर, अपराध कथा के अलावा कुछ समाजिक कथाएँ और उपन्यास भी लिखे थे। फरवरी में आयी कहानी जंक्शन शायद आपकी इस विधा में आयी सबसे ताज़ा तरीन किताब है? कुछ इस किताब के विषय में बताएँ? इस किताब में संगृहीत कहानियों का लेखन आपने कितने वक्फ़े में किया है और किन किन विषयों को यह छूती हैं?
उत्तरः हाँ, मेरी सभी कहानियाँ इन पाँच मुख्य कहानी-संग्रहों में लिखी गयी हैं— गिद्धभोज, इश्क अनलिमिटेड, आसेब, फसादी रात और कहानी जंक्शन। ‘आसेब’ हाॅरर कहानियों पर आधारित संग्रह है, ‘इश्क अनलिमिटेड’ रोमांटिक कहानियों पर बेस्ड, ‘फसादी रात’ अपराध कथाओं पर आधारित है तो ‘गिद्धभोज’ और ‘कहानी जंक्शन’ सोशल इशूज़ पर आधारित हैं, जिनमें गिद्धभोज में मिक्स कहानियाँ हैं जबकि कहानी जंक्शन की सभी कहानियाँ एक खास पैटर्न पर हैं। यह कहानियाँ दुःख, अवसाद और निराशा से शुरू होती हैं और एक उम्मीद की तरफ़ ले जाती हैं। कहानियाँ लिखने में मुझे दो-तीन दिन से ज़्यादा नहीं लगते, और पूरी किताबें आठ दिन से ले कर कभी-कभी बीस-पच्चीस दिन भी ले लेती हैं।

प्रश्न: क्या किसी नए सामाजिक उपन्यास पर भी आप कार्य कर रहे हैं?
उत्तरः नहीं— नयी कहानियों में अभी मैं सिर्फ डेविड सीरीज और स्पाईवर्स शृंखला की कहानियाँ ही लिख रहा हूँ। हाँ, ऐसी तीन कहानियाँ ज़रूर कतार में हैं जिनमें से एक औरत के कुल सफ़र पर (आदिवासी युग से वर्तमान तक), दूसरी कश्मीर से रिलेटेड तो तीसरी पाकिस्तान बँटवारे की पृष्ठभूमि पर है लेकिन अभी कहना मुश्किल है कि इनका नम्बर कब तक आयेगा।
प्रश्न: अक्सर ऐसा माना जाता है कि सामाजिक या गम्भीर मुद्दों पर लिखी किताबें उतने पाठकों तक नहीं पहुँच पाती हैं जितना कि अपराध, विज्ञानगल्प, रोमांच या हॉरर पहुँचती है। आप चूँकि इन सभी विधाओं में लिखते हैं तो आपके क्या अनुभव है? क्या आपके द्वारा लिखे समाजिक मुद्दों से जुड़ी कोई ऐसी किताब है जो आप चाहेंगे कि वृहद पाठक वर्ग तक पहुँचे? अगर हाँ, तो वो कौन सी है और क्यों आप ऐसा चाहते हैं?
उत्तरः हाँ, यह बात सही है कि गम्भीर सामाजिक मुद्दों पर लिखी किताबें कम पाठकों तक पहुँचती हैं और अपराध कथा या हाॅरर पर लिखी किताबें ज़्यादा लोगों तक पहुँचती हैं। यहाँ एक बात और है कि हिंदी में साइंस फिक्शन सामाजिक उपन्यासों से भी पिछड़ी साबित होती हैं— इसका कारण शायद पाठकों में व्याप्त यह धारणा है कि कोई भारतीय या हिंदी का लेखक भला साइंस फिक्शन पर क्या लिखेगा, सिवा नकल के। हालाँकि यह इल्ज़ाम काफ़ी हद तक सही भी है लेकिन फिर भी हंड्रेड पर्सेंट तो ऐसा नहीं होता। साइंस फिक्शन में ज़्यादातर अनुवादित किताबें पढ़ी जाती हैं। मेरी सामाजिक मुद्दों पर लिखी किताबों में मुझे सबसे ज़्यादा ‘कहानी जंक्शन’ पसंद है, और इसके लिये मैं ज़रूर चाहता हूँ कि यह ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुँचे।
प्रश्न: अच्छा आपने कहानियाँ भी लिखी हैं और उपन्यास भी? दोनों की लेखन प्रक्रिया में क्या फर्क आपको दिखता है? आपको क्या लिखना पसंद है?
उत्तरः कहानियाँ छोटी होती हैं लेकिन दिमाग़ पर एक्स्ट्रा प्रेशर डालती हैं कि आपको कम से कम शब्दों में वह बात लिखनी है जो पाठक के मन पर बड़ा असर छोड़ जाये। उपन्यास में तो आपको खुला मैदान मिलता है, जहाँ आप जितने चाहे पन्ने ले सकते हैं अपनी बात कहने के लिये। मुझे कहानी लिखना काफी मेहनत वाला और दिमाग़ खपाऊ काम लगता है, जबकि उसके मुकाबले उपन्यास लिखना ज़्यादा आसान।
प्रश्न: इस बात का चुनाव कैसे करते हैं कि कौन सी रचना कहानी बनेगी या उपन्यास?
उत्तरः दोनों चीज़ें एक छोटे विचार से शुरू होती हैं, अब वह विचार क्या इतना बड़ा हो सकता है कि पाठक को देर तक कहानी में रोके रख सके— या पाठक उससे कुछ ही पन्नों में छुटकारा चाहने लगेगा। मैं इसी से कहानी और उपन्यास का अंतर तय करता हूँ। अक्सर मेरी प्रायोरिटी उपन्यास रहती है, जब लगता है कि यह कहानी उतनी लम्बी नहीं बन सकती, तब उसे और संक्षिप्त कर के कहानी बना लेता हूँ।
प्रश्न: अच्छा आपकी अधिकतर किताबें स्वयं प्रकाशित हैं? आपने ट्रेडिशनल रूट का चुनाव न करके ये रूट क्यों अपनाया? क्या आपने ट्रेडिशनल रूट के लिए भी कोशिश की थी? आपके अनुभव कैसे रहे हैं इसे लेकर?
उत्तरः इसका ईमानदार उत्तर यह है कि ऐसा सभी लेखक चाहते हैं, लेकिन इसमें दिक्कत यह है कि प्रकाशन आपसे सहयोग राशि के नाम पर बीस से तीस हज़ार तो ले लेता है लेकिन अंततः किताब आपके अपने प्रयासों से ही बिकती है— वर्ना जाने कितने लेखक हर साल आते हैं और एक दो किताब के बाद ख़त्म हो जाते हैं। ऐसे में जब ख़ुद के दम से ही किताब बेचनी है तो मुझे यही सही लगा कि ख़ुद अपना पब्लिकेशन स्थापित करो, और ख़ुद से अपनी किताब पब्लिश करो। काबिलियत होगी तो धीरे-धीरे जगह बन ही जायेगी। हाँ, मैंने कोशिश ज़रूर की थी लेकिन सहयोग राशि पर बात नहीं बन पायी। उतना पैसा मैं सेल्फ पब्लिश कर के प्रमोशन पर कर सकता था।
प्रश्न: दोनों रूटस के क्या फायदे और नुकसान आप देखते हैं?
उत्तरः हाँ, ट्रेडीशनल में दो तरह के पब्लिकेशन हैं, एक राजकमल, वाणी, हिंदयुग्म जैसे कुछ गिने-चुने, जिनके पास एक अपना पाठकवर्ग है— दूसरे वह तमाम जो हैं तो उसी रूट पर, लेकिन अपना कोई खास बेस नहीं। अब अगर कोइ सीधे राजकमल से छपता है तो उसे किसी स्टार किड के लॉन्च जैसा स्टार्ट तो मिल जाता है और आगे उसकी अपनी काबिलियत से उसका आगे का सफ़र तय होता है लेकिन अगर आप ट्रेडीशनल मगर छोटे प्रकाशक की तरफ़ जा रहे हैं या सेल्फ पब्लिशिंग कर रहे हैं तो बात शुरू से वही रहती है कि आपका आगे का आगे का सफ़र अपने पहले क़दम से ही आपकी अपनी काबिलियत तय करेगी।
प्रश्न: आप एक नवीन लेखक को इस मामले में कोई सलाह देना चाहेंगे? अगर वो सेल्फ पब्लिशिंग के रूट में जाना चाहता है तो उसे किन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए?
उत्तरः मैं तो यही कहूँगा कि पहले बड़े ट्रेडीशनल प्रकाशनों के सहारे अपनी क्षमता परख लें— अगर वे मना करते हैं, या आप उनकी माँगी सहयोग राशि चुकाने में इंट्रेस्टेड नहीं हैं तो सेल्फ पब्लिशिंग की तरफ़ जाएँ। मगर सेल्फ पब्लिशिंग में जाने के लिये आपके पास अव्वल तो सोशल मीडिया पर अपनी फैन फाॅलोइंग होनी चाहिये या फिर प्रमोशन पर खर्चने लायक अच्छा बजट होना चाहिये। दूसरा एक तरीका प्रतिलिपि और पाॅकेट रीडर/एफएम का है, जिसके सहारे आप अपनी सम्भावनाओं को प्रापर छपने से पहले ही परख सकते हैं।
प्रश्न: आपकी आगामी किताब डेविड फ्रांसिस शृंखला की ‘स्याह सफेद’ है। यह 27 मई को आएगी। इस शृंखला और इस उपन्यास के विषय में कुछ बताएँ? इस बार डेविड किन दुश्मनों से जूझ रहा है?
उत्तरः मैं किसी एक स्पेसिफिक डेट या साइकल पर पब्लिश नहीं करता। जब जो किताब मेरे पास रेडी हो गई, मैं पब्लिशिंग के लिये डाल देता हूँ। ‘स्याह-सफ़ेद’ भी पेपरबैक के रूप में पब्लिश है उससे पहले के क्रम की ‘सिकारियो’ के साथ ही। किंडल पर ईबुक के रूप में चूँकि तब ‘जाॅली रोजर’ और ‘सिकारियो’ साथ ही पब्लिश की थी तो ‘स्याह-सफ़ेद’ के लिये एक गैप दे दिया था। हालाँकि अभी केडीपी अनलिमिटेड पर न ‘सिकारियो’ है और न ‘स्याह-सफ़ेद’। वहाँ पहले 31 को ‘सिकारियो’ एनरोल होगी और नेक्स्ट मंथ के लास्ट में ‘स्याह-सफ़ेद’। स्याह-सफ़ेद डेविड के पाकिस्तान टूर की कहानी है जिसकी बैकग्राउंड पेशावर, स्वात और पाक अधिकृत कश्मीर है, जहाँ उसे टीटीपी और आईएसकेपी के लोगों से उलझना पड़ जाता है और नौबत यहाँ तक आ जाती है कि ख़ुद को अवैध रूप से सरहद पार करनी पड़ती है।

प्रश्न: अच्छा, हाल फिलहाल में आपने अपनी किताबों से इतर कुछ अन्य रोचक रचनाएँ पढ़ी हैं? क्या उन रचनाओं के नाम पाठकों से साझा करना चाहेंगे?
उत्तरः करीब पाँच साल पहले तक इब्ने सफी की उर्दू में सभी किताबें पढ़ी थीं जो रिपब्लिश हुई थीं डाइजेस्ट के रूप में। फिर चेतन भगत की कुछ किताबें और एक संतोष पाठक की। साल भर पहले सुरेंद्र मोहन पाठक की जीत सिंह सीरीज की शुरुआती तीनों किताबें।
हाल-फिलहाल आलोक सिंह खालौरी की एस थ्री पढ़ी थी। इस बीच कई किताबें ऐसी भी रहीं कि पढ़ने की कोशिश की मगर आधी भी न पढ़ी जा सकीं।
प्रश्न: आप अब किस पुस्तक पर कार्य कर रहे हैं? स्याह सफेद के बाद पाठकों को आपकी कलम से निकली कौन सी रचना पढ़ने को मिल सकती है?
उत्तरः इधर साल भर से मैं अपनी सभी किताबों को इंग्लिश में कर के उन्हें इनग्राम के ज़रिये ग्लोबली पब्लिश करने में लगा हूँ तो मेरा ज़्यादातर वक़्त उसी में जाता है। बीच-बीच में ब्रेक ले कर इन्हीं दो चालू सीरीज की किताबें लिख लेता हूँ जैसे अभी अप्रेल और मई मिला कर ‘सिकारियो’ और ‘स्याह-सफ़ेद’ लिखी। अभी ‘ओरियन’ को इंग्लिश में करने में लगा हूँ जिसके बाद स्पाईवर्स की दो किताबें आगे-पीछे लिखूँगा— जिनमें एक संग्राम सीरीज की ‘कोड साइरन’ है और दूसरी आरव सीरीज की ‘बौना महामहिम’… इसके सिवा डेविड की अगली किताब शायद सितंबर में लिखी जायेगी।
(नोट: यह साक्षात्कार मई के आखिरी हफ्ते में लिया गया था। इसके बाद कुछ कारणों के चलते इसे प्रकाशित होने में समय लग गया। अब डेविड फ्रांसिस शृंखला की ‘स्याह सफेद’ उपन्यास को आए भी काफी समय हो गया होगा। पर चूँकि उस सवाल के उत्तर में लेखक अपने उपन्यासों के प्रकाशन प्रक्रिया के एक पहलू का ज़िक्र कर रहे हैं तो उस प्रश्न और उत्तर को जैसा का तैसा ही इधर छोड़ा जा रहा है। )
तो यह थी लेखक अशफ़ाक़ अहमद से हुई हमारी बात। उम्मीद है यह बातचीत आपको पसंद आयी होगी।
अशफ़ाक़ अहमद की सभी पुस्तकें अमेज़न पर उपलब्ध हैं। आप किंडल अनलिमिटेड के सब्सक्राइबर हैं तो उनके लिखे तो बिना किसी अतिरिक्त शुल्क दिए पढ़ सकते हैं।
पुस्तक लिंक: अशफ़ाक़ अहमद
