कहानी: मुस्कान – चंडीप्रसाद ‘हदयेश’

कहानी: मुस्कान - चंडीप्रसाद ‘हदयेश’

1

वह शुभ दिन धीरे-धीरे निकट आने लगा, जिस दिन सुशीला की गोद भरी-पूरी होने वाली थी! मातृत्व ही नारी-जीवन का परम सार है और उसी सार-वस्तु की सुशीला शीघ्र ही अधिकारिणी होनेवाली है—यह जानकर सुशीला के पति सत्येंद्र भी परम प्रसन्न हुए। दाम्पत्य-जीवन‑रूपी कल्पतरु में मधुर फल के आगमन की सूचना पाकर पति-पत्नी के आनंद का पारावार नहीं रहा।

सुशीला के सास-ससुर कोई नहीं थे; इसलिए सुशीला को कभी-कभी अंतर्वेदना हुआ करती थी; पर वह व्यथा पति के पवित्र शीतल-प्रेम मलिल से शीघ्र ही शांत हो जाया करती थी। सुशीला अपने गृह की एकमात्र अधिश्वरी होने के साथ-ही-साथ अपने पति के अखंड प्रेम की भी एकमात्र अधिकारिणी थी। सत्येंद्र सुशीला को अपनी आत्मा का ही दूसरा स्वरूप मानते थे और वे उसे अपने गले की मणिमाला के समान बड़े आदर और यत्न से रखते थे। जबसे सुशीला को गर्भ-स्थिति हुई, तब से तो उन्होंने उसकी सुश्रूषा और सेवा की और भी सुचारु व्यवस्था कर दी थी। पहले घर में केवल एक वृद्धा दासी थी, अब उन्होंने सुशीला की समवयस्का एक और परिचारिका का भी प्रबंध कर दिया। वे उसकी इच्छा की सदा पूर्ति किया करते थे! खाने-पीने में छोड़कर बाक़ी उसकी और किसी अभिलाषा का वह प्रतिवाद नहीं करते थे। सुशीला के मुख से निकलते-निकलते ही वे उसकी इच्छा को पूरी कर देते। प्रातःकाल और सायंकाल वे उसे अपने साथ लेकर गृह‑संलग्न उद्यान में शीतल मधुर वायु का सेवन करते। रात्री में भोजन के उपरांत वे उसे धार्मिक वीर पुरुषों की पवित्र गाथाएँ सुनाते और उनकी सदा यही चेष्टा रहती कि सुशीला का मनोरंजन होता रहे। सुशीला के मन में दुःख अथवा ग्लानि की एक क्षीण रेखा भी अंकित न होने पावे—इस विषय में सत्येंद्र सदा प्रयत्नशील रहते।

रात्रि का प्रथम प्रहर व्यतीत हो चुका है। सत्येंद्र अपने कमरे में एक आराम कुर्सी पर लेटे-लेटे किसी ग्रंथ का पारायण कर रहे हैं—पास ही एक दूध के फेन के समान कोमल शय्या पर सुशीला लेटी हुई है। सुशीला एक टक अपने प्राणाधार के प्रोज्ज्वल मुख की ओर देख रही है। थोड़ी देर तक इस प्रकार रूप-सुधा पी चुकने के उपरांत सुंदरी सुशीला ने मृदुल मंद स्वर में कहा, “नाथ! मेरी एक इच्छा है।”

सत्येंद्र—“कहो प्रिये! निस्संकोच भाव से कह डालो। मैं तुम्हारी इच्छा की अवश्य ही यथा-शक्ति पूर्ति करूँगा। ऐसा करने से मुझे बड़ा आनंद मिलता है।”

सुशीला—“सो जानती हूँ देव! यद्यपि आपने मेरी सुश्रूषा के लिये दो-दो परिचारिकाएँ नियुक्त कर दी हैं; पर तो भी मैं सोचती हूँ कि यदि इस समय कोई अपना आत्मीय स्वजन आ जाता, तो बड़ा अच्छा होता। दोनों परिचारिकाएँ मेरी बड़ी सेवा करती हैं; पर तो भी जो स्नेह, जो आदर अपने आत्मीय से मिल सकता है, वह इन परिचारिकाओं से प्राप्त नहीं हो सकता।”

सत्येंद्र—“इसमें संदेह नहीं। इस विषय में मैं भी सोचता था; पर कुछ समझ में नहीं आता। बहुत सोचने पर भी कोई ऐसा आत्मीय नहीं दिखाई पड़ता, जिसके आ जाने से तुम्हारी सेवा-सुश्रषा की मधुर व्यवस्था हो सके। मेरी चचेरी भाभी हैं—उनका स्वभाव तुम जानती ही हो—वह बड़ी कर्कशा हैं। और भी दो-एक निकट सम्बन्धिनी हैं; पर वे भी सब लगभग एक ही सी हैं। तुमने कुछ इस विषय में सोचा है प्रिये?”

सुशीला—“नाथ! यदि गुणसुंदरी को बुला लिया जाये, तो कैसा हो?”

सत्येंद्र—“बहुत उत्तम। तुमने बहुत ठीक सोचा। वास्तव में उसके आ जाने से सब ठीक हो जायगा।”

गुणसुंदरी सुशीला की छोटी बहिन है। उसका विशद परिचय हम अगले परिच्छेद में देंगे।

सत्येंद्र स्थानीय कॉलेज में साहित्य के प्रोफेसर थे। उन्होंने दूसरे दिन कॉलेज पहुँचते ही लखनऊ को, जहाँ सुशीला का मायका था, गुणसुंदरी के बुलाने के लिये तार भेज दिया। तीसरे दिन ही गुणसुंदरी अपने भाई के साथ आ गयी।

पतिव्रता स्त्री की उपलब्धि जिस प्रकार पति के लिये परम सौभाग्य का विषय है, एकांत अनुरक्त पति की प्राप्ति भी पत्नी के लिये पूर्वकृत पुण्य-पुंज की उतनी ही मधुर भेंट है।


2

गुणसुंदरी सुशीला की कनिष्टा सहोदरा है। वह उससे ३ वर्ष छोटी है अर्थात् इस समय उसकी अवस्था १७ वर्ष की है। गुणसुंदरी ने आते ही घर की व्यवस्था के समस्त नियमों का ज्ञान प्राप्त कर लिया और उन्हीं के अनुसार वह सुचारुरूप से गृहस्थी का विधान करने लगी। उसने आते ही सुशीला को एकांत वियाम का अवसर दे दिया और गृहस्थी की सारी चिंता का भार अपने सिर पर ओढ़कर उसने अपनी प्यारी सहोदरा को पूर्ण रूप से निश्चिंत कर दिया।

गुणसुंदरी बाल-विधवा है। वह अपने पति के पर्यंक पर केवल एक बार ही पौढ़ी थी और उसके उपरांत ही, आज ४ वर्ष हुए, उसका सौभाग्य‑सिंदूर दुर्भाग्य के कठोर विधान से पुँछ गया। तब से गुणसुंदरी अपने पिता के ही घर पर रहती है। उसके पिता प्रकांड विद्वान् हैं और उन्होंने भली-भाँति यह जान लिया था कि विधवा गुणसुंदरी के तपोमय जीवन की मृदुल अवाधगति के लिये यह अनिवार्य रूप से आवश्यक है, कि उसे ज्ञान, विवेक और आत्मानुभूति का पवित्र साहचर्य प्राप्त हो जाये। इसीलिये उन्होने स्वयं गुणसुंदरी को संस्कृत तथा अन्य देशी भाषाओं की ऊँची शिक्षा दी थी। वाल्मीकि रामायण और महाभारत के प्रसिद्ध श्लोक की वह दस-दस बार आवृति कर चुकी थी। कला‑कौशल तथा गृह-प्रबंध की उसे पर्याप्त शिक्षा विवाह से पहले ही मिल चुकी थी; इसीलिये गुणसुंदरी केवल अतुलनीया सुंदरी ही नहीं थी, वह अद्वितीया गुणवती विदुषी भी थीं।

सत्येंद्र के घर में आते ही उसने गृहस्थी का सुचारु प्रबंध करना प्रारम्भ कर दिया। माधुर्य्य और आनंद की नदी-सी उस घर में प्रवाहित होने लगी। प्रातःकाल ब्रह्ममुहूर्त में उठकर वह नित्य कर्मादि से निवृत्त हो जाती और उसके उपरांत वह गृह-संलग्न उद्यान से सुमन चयन करके लाती तथा चंदन, नैवेद्य इत्यादि प्रस्तुत करके वह सत्येंद्र के स्नानादि से निवृत्त होते-न-होते उनकी पूजा की मधुर व्यवस्था कर देती। अपने हाथ ही से वह सुस्वाद भोजन बनाती और बड़े प्रेम से अपनी बहिन और जीजाजी को जिमाती। सत्येंद्र के कॉलिज चले जाने पर उनके पठन-कक्ष को साफ़ कर के वह उनकी पुस्तकों को सुंदर प्रकार से सजा देती। सायंकाल को अपने हाथ से सुगंधित फूलों के सुरम्य गुलदस्ते बनाकर वह उनके टेबुल पर लगा देती। इस प्रकार गुणवती गुणसुंदरी ने सत्येंद्र को सुशीला की प्रेममयी सेवा एवं श्रद्धा-मयी सुश्रूषा का अभाव कणभर भी अनुभव नहीं करने दिया। सत्येंद्र भी गुणसुंदरी को स्नेहमयी श्रद्धा की दृष्टि से देखने लगे—उसके गुणों का ऐसा विकास देखकर वे बड़े संतुष्ट हुए।

परिजन ही के प्रति नहीं—परिचारिकाओं के प्रति भी गुणसुंदरी का ऐसा स्नेहमय व्यवहार था, कि वे भी उसे पाकर बड़ी प्रसन्न हुई और उस पर बहन की भाँति प्रेम करने लगी। ऐसी सुंदरी गुणवती स्वामिनी की सेवा को वे अपना सौभाग्य समझने लगीं।

गुणसुंदरी अपूर्व रूप-राशि की स्वामिनी थी अवश्य; पर उसने इस यौवन-वन को यों ही छोड़ दिया था। शृंगार के नाम से उसके कोमल शरीर पर एक भी आभूषण नहीं था। उसके हिमशुभ्र ललाट पर न तो कृष्ण बिंदु सुशोभित होता था और न उसके सहज-अरुण अधर पर ताम्बूल‑राग ही विलसित होता था। उसकी उस देह माधुरी को न तो चित्राम्बर ही आच्छादित करता था और न उसकी कुंतल केश राशि पर पुष्पहार ही सुगंध का विस्तार करता था। वह पहनती थी केवल एक स्वच्छ शुभ्र सारी और उसके उन्नत पुण्य पीन-पयोधर आच्छादित होते थे एक खद्दर की जाकट द्वारा। बस यही उसकी वैराग्यमयी वेष-भूषा थी, यही उसकी संन्यासमयी शोभा थी और यही उसकी पवित्र तपोमयी माधुरी थी। वह निष्कलंक आत्म-प्रभा की भाँति, निर्विकार तपोमयी साधना की भाँति एवं तेजोमयी पुण्य-पवित्रता की भाँति प्रतीत होती थी। विधवा के संन्यास अर्थात् निष्काम कर्म योगमय जीवन का सम्पूर्ण रहस्य उसके आंतरिक लोचनों के सम्मुख विवृत हो चुका था और उसने पिता की पुण्यमयी शिक्षा के पावन प्रभाव से यह जान लिया था कि इस वैधव्य के दुःखमय जीवन की पवित्र एवं अवाध मृदुल गति से व्यतीत करने का एक मात्र उपाय निःस्वार्थ सेवामयी साधना है। गुणसुंदरी सदा, निर्विकार हृदय से, निस्वार्थ बुद्धि से एवं निष्काम कामना से इसी साधना के अनुष्टान में तन्मयी होकर रत रहती।

सेवा और साधना—दोनों सहोदरा हैं और उनकी जननी है पुण्य-प्रवृत्ति।


3

श्रावण-शुक्ला-त्रयोदशी के प्रातःकाल शुभ ब्रह्म-मुहूर्त में सुशीला ने पुत्र-रत्न प्रसव किया। सत्येंद्र एवं सुशीला के आनंद की बात जाने दीजिये, उनके सारा घर-का-घर आनंद की मंदाकिनी से साबित होने लगा। गुणसुंदरी अपनी माता के घर ही से एक सुवर्ण की कंठमाला बनवा लायी थी जिसमें मध्यमणि के स्थान पर एक सुवर्ण मंडित रुद्राक्ष था। उसने अपने पवित्र आशीर्वाद के साथ उसे नवजात शिशु के गले में रक्षा कवच के रूप में पहना दिया। उस दिन सत्येंद्र और सुशीला ने देखा कि गुणसुंदरी के मुख पर एक अपूर्व उल्लास है, एक परम पवित्र तेज है। उस दिन गुणसुंदरी का गम्भीर प्रशांत हृदय-सागर भी चंद्र-दर्शन को पाकर आनंदातिरेक से उद्वेलित होने लगा।

गुणसुंदरी स्वभावतः ही गम्भीर प्रकृति की थी। रस-रंग, हास, परिहास पर उसका विशेष अनुराग नहीं था; पर सुशीला के उस परम आनंद में योग देने के कारण उसका वह गम्भीर भाव अनेकांश में तिरोहित हो गया था और उसके मुख-मंडल की शोभा आंतरिक आनंद की श्री से और भी मनोहर एवं प्रभामयी हो गयी थी। सत्येंद्र गुणसुंदरी के गुणों पर मुग्ध थे ही और जैसा हमने पहले कहा है, वे उस पर विशेष रूप से स्नेहमयी श्रद्धा रखते थे! पर उस आनंद से प्रफुल्ल वदन-कमल की जो अपूर्व शोभा उन्होंने उस आनंद-अवसर पर देखी वह कुछ और ही प्रकार की थी, उसमें कोई और ही प्रकार का निरालापन था। उसे देखते ही उनके हृदय में एक और ही प्रकार को प्रवृत्ति जागृत हो उठी। अभी तक उनका जो स्नेह श्रद्धा के पवित्र शीतल सलिल से सिंचित होता था, वह अब दूसरी ही प्रकार के प्रवृत्ति प्रवाह में अवगाहन करने लगा। वात्सल्य शृंगार में परिणत हो गया।

तब तो सत्येंद्र एक प्रकार से व्याकुल हो उठे। वे विद्वान थे, पंडित थे और अब तक उनका जीवन सदाचार ही के साहचर्य में व्यतीत हुआ था। उन्होंने इस प्रवृत्ति को दबाने की चेष्टा की; पर वह उनमें दबी नहीं। वे गुणसुंदरी को बार-बार देखने के लिये व्याकुल हो उठते और निरर्थक ही उसे अपने कमरे में किन्हीं कामों के बहाने बुलाकर रात-दिन में वे उसका दस-पाँच बार दर्शन कर लेते; पर इससे उन्हें शांति मिलना तो दूर, उनकी लालसा और भी तीव्र होती जाती। इधर सुशीला प्रसूतिकगार में थी और इसलिये गुणसुंदरी को उनके कमरे में किसी‑न‑किसी काम के लिये कई-कई बार आना ही पड़ता था। सुशीला की निरन्तर अनुपस्थिति से अनुचित लाभ उठाकर सत्येंद्र की मोहमयी प्रकृति और भी प्रबल वेग से प्रधावमान होने लगी।

आज नवजात-शिशु के शुभ नामकरण-संस्कार का आनंद-दिन है। दिन-भर गुणसुंदरी अभ्यागतों की अभ्यर्थना में लगी रही और उसने स्वयं दिन-भर बिना खाये-पीये सबको खिलाया पिलाया। गुणसुंदरी उस उत्सव में अपने अस्तित्व तक को भूल गयी।

रात्रि के लगभग आठ बजे गुणसुंदरी अपने जीजा सत्येंद्र के लिये भोजन लेकर उनके कमरे में गयी। सत्येंद्र उस समय कोई साहित्य की पुस्तक पढ़ रहे थे और उसमें वर्णित नायिका के सुंदर स्वरूप की कल्पना को गुणसुंदरी में आरोपित करने की धुन में लगे हुए थे। ऐसे ही समय गुणसुंदरी ने भोजन की थाली लिये हुए उनके कमरे में प्रवेश किया। सत्येंद्र एकटक गुणसुंदरी के मुख-चंद्र की ओर देखने लगे। उस समय सहसा उनके मुख की आकृति कुछ बड़ी विलक्षण-सी हो गयी। उनकी आँखें फैल गयी; मुख-विवर खुल गया, दंत-पंक्ति कुछ बाहर निकल आयी और उनकी चेष्टा ठीक वैसी ही हो गयी, जैसी किसी मूर्ख की उस समय हो जाती है, जब वह अपनी दृष्टि में कोई बड़ी विलक्षण वस्तु देखता है। गुणसुंदरी को जीजा का यह आश्चर्य-भाव कुछ ऐसी कुतूहलता से भरा हुआ प्रतीत हुआ, कि सहसा उसके स्निग्ध मृदुल अधर पर मंद मुस्कान आ गयी। उसने नीची दृष्टि कर ली भोजन की थाली टेबुल पर रखकर वह बिना कुछ कहे-सुने शीघ्र ही कमरे से बाहर चली गयी।

सत्येंद्र को उस रात में क्षणभर के लिये भी नींद नहीं आयी। उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ, कि मानो उनके हृदय में, उनकी बुद्धि में, उनकी आँखों में, उनकी विवेक-दृष्टि में, वह मधुर मंद मुस्कान सजीव स्थिर दामिनी की भाँति प्रवेश कर गयी।

यह एकांत सत्य है, कि रूपवती रमणी की मधुर मंद मुस्कान बड़े-बड़े ज्ञानी और पंडितों को भी परम मूर्खों की भाँति उद्भ्रांति की गम्भीर अंधकारमयी गुफा में गिरा देती है।


4

धीरे-धीरे ब्रह्म-मुहूर्त आ पहुँचा। मंद-मंद शीतल समीर प्रवाहित होने लगी। नक्षत्रावली रात्रि-भर के विहार के उपरांत परिआंत होकर अपने‑अपने प्रासाद में प्रवेश करने लगी। सत्येंद्र भी अपने कमरे से निकलकर गृह-संलग्न उद्यान में जाकर घूमने लगे। उस समय उद्यान में अनेक प्रकार के प्रस्फुटित पुष्पों की सुगंध परिव्याप्त हो रही थी और शीतल समीर का संयोग पाकर वह इधर-उधर इठलाती फिरती थी। उसके अंचल के सुशी-तल स्पर्श से सत्येंद्र का उत्तम मस्तिष्क कुछ-न-कुछ शांत हो गया।

वे इधर-उधर गूमने लगे। वे अपनी उद्भ्रांत विचारमाला में तल्लीन थे। गुणसुंदरी की उस मधुर मंद मुस्कान की मूक कविता का अर्थ तथा भाष्य करने में वे ध्यानावस्थित से हो रहे थे। कभी वे सोचते थे, कि वह मुस्कान क्रमशः परिवर्द्धित होने वाली प्रेम-प्रवृत्ति की प्रथम झलक थी और कभी उनका यह विचार स्थिर होता, कि वह मुस्कान उनकी प्रेम-भिक्षा के प्रति उपहासमयी उपेक्षा की प्रथम किरण थी। कभी वे सोचते, कि गुणसुंदरी ने उस मधुर मुस्कान के द्वारा उनके प्रेम का अभिनंदन किया था और कभी उनकी यह धारणा होती, कि उस अपूर्व संयमशीला रमणी ने उस मुस्कान के द्वारा उनके इस अनुचित साहस का तिरस्कार किया था। सत्येंद्र निश्चित् रूप से उस रहस्यमयी मुस्कान का अर्थ समझने में कृतकार्य नहीं हो रहे थे। उनकी बुद्धि उद्भ्रांत हो गयी थी और उस उद्भ्रांति की संशय-स्वरूपा अग्नि को हृदय में धारण करके वे उस उद्यान में घूम रहे थे।

सहसा उन्हें एक ओर से गाने की ध्वनि सुनाई दी। उन्होंने कंठ-स्वर से जान लिया, कि गुणसुंदरी ही गुनगुना रही है। सत्येंद्र को यह जानकर और भी हर्ष हुआ, कि गुणसुंदरी गान-विद्या में भी अधिकार रखती है। हृदय की प्रबल प्रेरणा से परिचालित होकर वे उसी ओर को, धीरे-धीरे उस मधुर गान को सुनते-सुनते अग्रसर होने लगे, ठीक उसी तरह जैसे मृगी वीणास्वर में आकृष्ट होकर उसी ओर को, चलने लगती है।
गुणसुंदरी का स्वर ही अभी तक सत्येंद्र को सुनाई पड़ता था—अब स्पष्ट‌ रूप से गान भी सुनाई पड़ने लगा। गुणसुंदरी गा रही

रे मन! भूल्यो फिरै जग बीच।
कुसुम कुसुम पै अटकत डौले
नीचे लखै नहिं मीच। रे मन०
एक बार फँस निकस न पैहै,
जैसे फँस्यो काई कीच। रे मन०
त्यों ‘हृदयेश’ सुमिर प्रभु-पद को,
छाँड़ि मदन मद नीच। रे मन०

उषा देवी प्राची दिशा में स्थित होकर इस गान को तन्मयी बनी हुई सुन रही थीं, उन मधुर स्वरों के स्पर्श से कोमल कुसुम रोमांचित हो रहे थे। सत्येंद्र ने प्रभात काल के उस स्निग्ध प्रकाश में देखा, कि गुणसुंदरी एक हाथ से डाल पकड़े है और एक हाथ से जूही के कोमल फूल तोड़‑तोड़कर नीचे रखी हुई टोकरी में डालती जाती है। वह अपने इस कृत्य में तन्मयी होकर आंतरिक आनंद के आवेश में गुनगुना रही है। सत्येंद्र एकटक से इस छवि-माधुरी को देखने लगे। थोड़ी देर तक इस स्वरूप-सुधा को पान करने के उपरांत सत्येंद्र ने मंद मधुर स्वर में पुकारा, “गुणसुंदरी!”

गुणसुंदरी ने चकित हरिणी की भाँति पीछे फिरकर देखा। उसके हाथ से डाल छुट गयी। उसने सलज्ज भाव से प्रत्युत्तर दिया, “जीजाजी?”

सत्येंद्र—“हाँ! क्या फूल तोड़ रही हो?”

गुणसुंदरी—“हाँ! पूजन के लिये फूल चुन रही हूँ।”

सत्येंद्र ने हृदय में साहस भरकर कहा, “गुणसुंदरी! मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।”

गुणसुंदरी ने चकित भाव से कहा, “कहिये!”

सत्येंद्र क्षण-भर के लिए चुप हो गये। फिर बोले, “मुख से कहने का साहस नहीं है, मैं लिखकर दूँगा। क्या तुम उसका उत्तर देने की कृपा करोगी?”

गुणसुंदरी ने स्थिर भाव से कहा, “जीजाजी! मेरा विश्वास है कि हृदय के जिन भावों को एक दूसरे की समुपस्थिति में मुख की भाषा-द्वारा व्यक्त करने में लज्जा या संकोच मालूम हो, तो उनको लिखकर व्यक्त करना भी अनुचित ही है। उनका हृदय में घुट-घुटकर मरजाना ही मेरी तुच्छ बुद्धि में बहुत अच्छा है।”

सत्येंद्र—“ऐसा भी हो सकता है; पर मेरे प्रश्न का क्या उत्तर है?”

गुणसुंदरी—“वही, जो मैंने अभी कहा है। वह स्पष्ट है।”

इतना कहकर गुणसुंदरी शीघ्रता-पूर्वक वहाँ से चली गयी। सत्येंद्र और भी उलझन में पड़ गये। गये मुस्कान की परिभाषा करने और रास्ते में दूसरी ही शंका उठ खड़ी हुई।

मानसिक ग्रंथि का तारतम्य कुछ ऐसा विलक्षण होता है कि उसको जितना ही सुलझाया जाय, वह उतना ही और उलझता जाता है। इसका सबसे उत्तम उपाय है—अग्नि-संस्कार। पर उसका अनुष्टान उतना ही कठिन है, जितनी की सायुज्य मुक्ति की साधना।


5

इस घटना को घटित हुए लगभग एक सप्ताह व्यतीत नहीं होने पाया था कि सुशीला के भाई हेमचंद्रजी गुणसुंदरी को बुला ले जाने के लिए आ गये। गुणसुंदरी विधवा हो जाने के कारण अपनी वृद्धा माता की और भी स्नेहपात्री हो गयी थी। उस वृद्ध वयस में उन्होंने गृहस्थी का सारा भार अपने कंधों से उतारकर गुणसुंदरी के सिर पर डाल दिया था। गुणसुंदरी अपने पिता की गृहस्थी की परिचालिका थी—छोटे-से-छोटे काम से लेकर बड़े-से-बड़े काम का भार उसी पर था। उसका व्यथा-मय जीवन निरंतर कर्म के अनुष्ठान से बड़ी सरलता से व्यतीत होता जाता था—घर की एकमात्र अधीश्वरी होने के कारण ग्लानि की क्षीण रेखा तक उसके हृदय में उप्तन्न नहीं होने पाती थी। उसकी माता तो एक ओर बैठी भगवती का भजन करती थी। भौजाई इत्यादि गुणसुंदरी की अधीनता में सुखी ही रहती थीं—उनकी भी चिंता कम हो जाती थी। यद्यपि सत्येंद्र ने बहुत कुछ कहा सुना; पर हेमचंद्र, गुणसुंदरी को और थोड़े दिनों के लिए छोड़ जाने पर किसी भाँति भी राजी न हुए। सत्येंद्र कुछ अप्रसन्न भी हो गये; पर हेमचंद्र ने बड़ी विनम्र भाषा में उनसे क्षमा माँग ली। उन्होंने कहा कि माताजी की अवस्था वृद्ध है, उनका शरीर बड़ा दुर्बल हो रहा है, गृहस्थी के झंझट उनसे सँभाले सँभलते नहीं, इधर उनकी आँखों में परवाल हो गये हैं, मेरी स्त्री भी वहाँ नहीं है, मैके में है, उसकी भौजाई के लड़का इत्यादि होने वाला है; अतः वह भी नहीं आ सकती; इसीलिये माता ने आपसे अनुरोध किया है कि आप गुणसुंदरी को और अधिक न रोकें। तब क्या करें? सत्येंद्र विवश थे। उनके हृदय में एक तुमुल संग्राम हो रहा था—उनके मस्तिष्क में एक प्रबल अग्नि हाहाकर कर रही थी। वे रोक नहीं सकते थे—उनके देखते-देखते ही उनकी हृदय-रत्न-राशि को दूसरा लिये जा रहा था। सत्येंद्र बड़े आकुल हो गये; पर उपायांतर था ही नहीं—क्या करते?

दूसरे दिन ५ बजे सायंकाल की गाड़ी से गुणसुंदरी का जाना निश्चित हो गया। सुशीला भी क्या करती? उसने भी एकाध बार गुणसुंदरी को छोड़ जाने के लिये हेमचंद्र से अनुरोध किया; पर हेमचंद्र की उक्ति के सम्मुख उसे भी विवश होकर अंततः स्वीकृति देनी ही पड़ी।

इन २४ घंटों के भीतर सत्येंद्र ने सहस्रों बार यह चेष्टा की कि गुणसुंदरी से एकांत में मिलने का अवसर प्राप्त करें; पर वे बार-बार विफल‑प्रयास हुए। गुणसुंदरी उनकी दृष्टि के सम्मुख कई बार पड़ी, कई बार उन्होंने आँखों-आँखों में उससे अपने कमरे में आने के लिए आकुल अनुरोध किया; पर गुणसुंदरी ने देखकर भी नहीं देखा। उस दिन उसने हेमचंद्र और सत्येंद्र को भोजन भी साथ ही साथ कराया। सत्येंद्र को एकांत-मिलन का अवसर दिया ही नहीं। अंत में वह समय आ पहुँचा, जब उनकी प्राण-प्रतिमा उनके घर और हृदय को अंधकारमय बनाकर जाने के लिए प्रस्तुत हुई। और चलते समय भी उसका इतना निष्ठुर भाव था कि उसने एक बार भी उनकी ओर आँख उठाकर नहीं देखा। सत्येंद्र बड़े ही दुखित, आकुल और क्षुभित हो गये। अश्रु-विसर्जन के साथ सुशीला ने गुणसुंदरी और हेमचंद्र को विदा किया; गुणसुंदरी ने चलते समय शिशु का मुख चूमा और आँखों में आँसू भरकर उसने बड़ी बहन को प्रणाम किया। सत्येंद्र उन दोनों को पहुँचाने के लिए साथ-साथ स्टेशन तक गये। स्टेशन पर पहुँचते-पहुँचते गाड़ी आ गयी और एक सेकंड क्लास में हेमचंद्र गुणसुंदरी के साथ बैठ गये। सत्येंद्र प्लेटफार्म पर खड़े-खड़े उस रूप-राशि को देखने लगे। गुणसुंदरी के उस निष्ठुर आचरण ने उनके हृदय में बड़ी वेदना उत्पन्न कर दी थी। उसी समय जब ट्रेन चलने में ३-४ मिनट शेष थे, गुणसुंदरी ने अपने मुखावरण को हटाकर कोमल स्वर में पुकारा, “जीजाजी!”

सत्येंद्र ने कम्पित कण्ठ से कहा, “हाँ।”

गुणसुंदरी—“कृपा करके बहन के साथ दुर्गापूजा की छुट्टी में अवश्य पधारियेगा। जब मैं आयी थी, तब माताजी ने मुझसे कह दिया था कि मैं आप से इस विषय में अनुरोधपूर्वक उनकी आज्ञा कह दूँ। नवजात शिशु और बहन को देखने के लिए उनका बहुत मन है।”

सत्येंद्र ने दर्द-भरी हँसी के साथ व्यंग्य-पूर्वक कहा, “पर तुम्हें इस अनुरोध का स्मरण बड़े बिलम्ब से हुआ।”

गुणसुंदरी—“हाँ! काम में लगी रहने से मैं भूल-सी गयी थी। मुझे आशा है कि आप अपनी छोटी समझ कर मेरे इस अपराध को क्षमा करेंगे।”

सत्येंद्र—“कह नहीं सकता, हो सका तो आऊँगा।”

गुणसुंदरी—“हो सका नहीं, आपको आना ही पड़ेगा।”

सत्येंद्र—“क्यों?”

गुणसुंदरी—“आपको मेरे अनुरोध की रक्षा करनी चाहिये। आप अवश्य आइयेगा। आपको मेरी शपथ है!”

सत्येंद्र—“अच्छा आऊँगा।”

गाड़ी चल दी। हृदय थामकर सत्येंद्र घर लौट आये।

सत्येंद्र ने देखा कि घर जैसे प्राण-शून्य हो गया है। सबके होते हुए भी वह माधुर्य अंतर्हित हो गया।

इसीलिये यह सम्पूर्ण सत्य है कि आलम्बन के बिना उद्दीपन केवल शव का मंडन-मात्र है।


6

बड़े दुःखित एवं व्यथित होकर सत्येंद्र घर लौटे थे। यद्यपि गुणसुंदरी के उस निष्ठुर भाव ने उनके हृदय को बड़ी ही वेदना पहुँचाई थी; पर उसकी चलते समय की शपथ ने उनके उस काल्पनिक तिरस्कार की मात्रा को अधिकांश में दूर कर दिया था। सत्येंद्र सुशीला से बिना मिले ही अपने कमरे में चले गये और जल्दी-जल्दी कपड़े उतारकर वह बड़े अन्यमनस्क भाव से एक आराम-कुर्सी पर लेट गये। उनके हृदय‑श्मशान में, उनकी अभिलाषा की चिंता के आलोक में, प्रेतात्माओं की भाँति प्रवृत्ति-पुंज हाहाकार कर रहा था और उनके मस्तिष्क में विरोधी भावों की सेना तुमुल-संग्राम में प्रवृत्त हो रही थी। सत्येंद्र बड़े आकुल,बड़े उद्विग्न, एवं बड़े संतप्त हो रहे थे।

रात्रि का अंधकार क्रमशः प्रगाढ़ हो रहा था। उसी समय उनकी परिचारिका ने उनके कमरे में प्रवेश किया और उसने आते ही उनके हाथ में एक बंद लिफ़ाफ़ा दे दिया। वह बिना कुछ कहे-सुने चली गयी—सत्येंद्र ने भी उससे कुछ नहीं पूछा।

सत्येंद्र ने काँपते हुए हाथों से पत्र खोला। बड़े उत्सुक भाव से वे उसे पढ़ने लगे। पत्र की प्रतिलिपि इस भाँति है—

पूज्य जीजाजी—श्री चरणों में प्रणाम!

न माना आपने। पत्र लिख ही तो डाला। ज्यों ही इसी नौकरानी ने मुझे आपका पत्र दिया,त्योंही क्रोध, क्षोभ एवं ग्लानि से मेरी बुरी दशा हो गयी। पत्र खोलने से पहले ही मैंने भाई हेमचंद्र को, मुझे बुला ले जाने के लिये पत्र लिख दिया।

एक बार मेरे मन में आया कि मैं आपका पत्र बिना खोले ही सुशीला बहन को दे दूँ और इस प्रकार मैं दाम्पत्य-दंड-विधि के अनुसार आपको गार्हस्थ-न्यायालय से विश्वास-घात का समुचित दंड दिलाऊँ; पर मेरी आत्मा ने मुझे ऐसा करने की आज्ञा नहीं दी। मैंने सोचा कि सम्भव है, इसके कारण आप में और मेरी बहन में मन-मुटाव हो जाय और उसका दुःखमय परिणाम उस निर्दोष सरल बहन को भुगतना पड़े; पर मुझे दु:ख है कि आप पंडित, विद्वान् एवं आचार्य होकर भी इस घृणित कृत्य की ओर प्रवृत्त होने में कण-मात्र भी कुंठित एवं लज्जित न हुए। छिः!

कदाचित् आपने यह सोचा होगा, कि एक तो वह मेरी साली है और उस पर भी है—बाल-विधवा। उसे भ्रष्ट करने का मेरा अधिकार है और उसमें सफल होना भी बड़ा सरल है; पर आपने इतने बड़े विद्वान होकर भी यह नहीं सोचा कि संसार-भर की साली और बाल-विधवाएँ सभी मदन-देव की उपासिका नहीं होती हैं और न काम-प्रवृत्ति का उन पर इतना प्रबल अधिकार ही होता है कि वह प्रत्येक भगिनी-पति एवं परपुरुष को आलिंगन करने के लिये इतनी उद्विग्न हो उठे कि वे उस प्रबल प्रवाह में अपने धर्म, विवेक एवं सर्वश्रेष्ठ सतीत्व को नगण्य वस्तु की भाँति बह जाने दें। जीजाजी! हम बाल-विधवा हैं—हमारा जीवन कर्म-संन्यास का प्रोज्ज्वल उदाहरण है—सबकी बात जाने दीजिये अपवाद कौन से नियम में नहीं है—पर अब भी हमारी जाति पुण्यशीलाओं से एकांत रूप में खाली नहीं हो गयी है—अब भी हम गर्व करती हैं कि हम उन्हीं आदि सती की प्रतिनिधि हैं। हम वैधव्य के कठोर कारागार में साधना की कठोर शृंखला से सर्व-विजयी मदन-देव को जकड़कर हृदय के एक अंधकारमय निभृत कोण में डाल देती हैं। जीजाजी! आप चाहे कुछ हो—चाहे बृहस्पति के साक्षात् अवतार ही क्यों न हों; पर रमणी-हृदय का रहस्य आप नहीं जान सकेंगे। छिः, आप बड़े निर्लज्ज हैं!

मुझे जहाँ तक स्मरण है, मैंने आपके सम्मुख ऐसा कोई आचरण नहीं किया, जिससे आपको ऐसा घृणित पत्र लिखने का साहस हुआ हो। हाँ! एक बार अवश्य आपको देखकर मुझे मुस्कराहट आ गयी थी। उससे आपने कदाचित् यही अभिप्राय निकाला (सुना है आप तर्क-शास्त्र के भी पंडित हैं) कि गुणसुंदरी मेरे इस जवाकुसुम-सुगंधित चारु केश-विन्यास पर, मेरी इस सुंदर मुख-श्री पर, एवं मेरे इस सिल्क-सूट-शोभित शरीर पर मुग्ध होकर, आनंद से, कामासक्त होकर मुस्करा रही है। पर आपकी यह भूल थी। वास्तव में उस दिन आपने मेरी ओर कुछ ऐसे विलक्षण भाव से देखा था—आपके नेत्र विस्फारित, आपका मुख विवृत, आपकी आकृति विकृत एवं आपकी चेष्टा कुतूहलमयी थी—मुझे सहसा मुस्कराहट आ गयी। सच मानिये, मैंने उस दिन आपके मुख पर मूर्खत्व का प्रोज्ज्वल नृत्य देखा था—बस इसीलिए मैं मुस्करा पड़ी और पंडित-प्रवर साहित्याचार्य श्रीमान् प्रोफेसर सत्येंद्र एम० ए०, पी० एच० डी० महाशय ने उसका जो अर्थ लगाया उससे उनको मिट्टी पलीत हुई सो तो हुई, मुझ निरपराधिनी को भी व्यर्थ में आत्मग्लानि सहनी पड़ी।

जीजाजी! आपने अपनी सरल सती स्त्री के प्रति विश्वासघात किया है। आपको इसका प्रायश्चित्त करना चाहिये और अपने इस महा कुत्सित आचरण के लिये उस पुण्यमयी देवी से क्षमा माँगनी चाहिए। इसी में आपका कल्याण है।

जीजाजी! रमणी पुष्प की भाँति मधुर, रत्न की भाँति प्रभामयी, प्रभात-तुषार-कण की भाँति पवित्र, आत्मा की भाँति प्रकाशमयी, साधना की भाँति तपोमयी एवं भगवती शक्ति की भाँति पुण्यमयी है; अत: आपको अपने कल्याण के लिये इस बात का ध्यान रखना परम आवश्यक है कि आप उसके हृदय-सागर को अपने घृणित आचरण से उद्वेलित न करें; क्योंकि उसके अंतर में ऐसी बड़वाग्नि निहित है, जिसमें अपनी समस्त सृष्टि के समेत स्वयं भगवान तक भस्मावशेष हो सकते हैं।

जीजाजी, मैं आपकी छोटी हूँ। यदि आपके प्रति मैंने कुछ अनुचित व्यवहार कर दिया हो, या मुझसे प्रमाद-वश कोई अपराध बन पड़ा हो, तो उसे आप अपने उदार हृदय से क्षमा करने की कृपा करें। साथ-साथ मेरी यह भी विनय है कि इस घटना से उत्पन्न होनेवाली ग्लानि और वेदना को सतत साधना की सुर-सरिता में प्रवाहित कर देने की सदा चेष्टा कीजियेगा।

दुर्गा-पूजा के अवसर पर प्यारी बहन के साथ अवश्य ही दर्शन देने की कृपा कीजियेगा।

आपकी वात्सल्य-पात्री—

गुणसुंदरी

पुनश्च—इस पत्र के साथ आपका पत्र भी लौटा रही हूँ। सच मानियेगा, मैंने आपका पत्र अच्छी तरह पढ़ा भी नहीं है। ऊपर ही की दो-चार लाइनें पढ़कर समझ गयी कि उसमें कैसे-कैसे भ्रष्ट विचार ग्रथित किये गये होंगे।

पत्र को समाप्त करते ही सत्येंद्र का वह मोहावरण, जो लालसा ने उनकी विशुद्ध विश्व-दृष्टि के सम्मुख डाल दिया था, हट गया। उन्होंने आत्म‑प्रकाश में देखा कि वह उनका आचरण कितना नीच, कितना हेय एवं कितना कुत्सित है। आत्मग्लानि की प्रबल अग्नि धधक उठी और उनका सारा हृदय उसमें धक-धक करके जलने लगा।

आध्यात्मिक मूर्छा का नाम मोह है।

लगभग २० मिनट के उपरांत सुशीला ने अपने नव-जात शिशु को गोद में लिये प्रवेश किया। आते ही उसने शिशु को सत्येंद्र की गोद में दिया और आप पास ही पड़ी हुई कुर्सी पर बैठ गयी। सत्येंद्र ने शिशु को गोद में ले तो लिया; पर उनके मुख पर नित्य की-सी प्रफुल्लिता नहीं दिखाई दी। उनके हृदय में ग्लानि, पश्चात्ताप और वेदना की भीषण अग्नित्रयी धाँय-धाँय करके जल रही थी और उसकी व्यथा के लक्षण उनके शुष्क मुख-कमल पर सुस्पष्ट रूप से दिखाई पड़ रहे थे। सुशीला के स्नेहमय सरस लोचनों से यह भाव छिपा नहीं रह सका और उसने बड़े आकुल भाव से सत्येंद्र का हाथ अपने हाथ में लेकर कहा, “नाथ! आज आप इतने व्यथित क्यों है?”

सत्येंद्र—“प्यारी मैंने एक घोर पाप किया है और उसीकी वेदना से मेरा हृदय जल रहा है।”

सुशीला—“पाप! आप और पाप? असम्भव! मैं इस बात पर विश्वास करने को प्रस्तुत नहीं हूँ।”

सत्येंद्र—“तुम सरल एवं एकांत पवित्र हो; इसीलिये तुम ऐसा समझती हो। मैंने तुम्हारे प्रति विश्वासघात किया है और मैं तुम्हारी क्षमा का भिखारी हूँ।”

सुशीला—“यह उल्टी बात कैसे देव? प्रभु होकर दासी से क्षमा-याचना? मुझे आपको क्षमा करने का क्या अधिकार है? मेरे प्रति यदि आप कोई अपराध भी करें, तो भी वह पाप नहीं, आपका अधिकार है।”

सत्येंद्र—“सो बात नहीं है प्रिये! पाप सदा पाप है। पाप करने का किसी को भी अधिकार नहीं है। मैं सच कहता हूँ—स्वयं भगवती राजराजेश्वरी कल्याणसुंदरी साक्षी हैं—कि जब तक तुम मुझे अपने हृदय से क्षमा नहीं कर दोगी, तब तक मुझे शांति नहीं मिलेगी; क्योंकि तब तक मुँह खोलकर मैं अपने पाप को कहने का साहस ही नहीं कर सकूँगा। क्षमा! प्यारी क्षमा!”

सुशीला ने साश्रुलोचना होकर कहा, “नाथ! यदि मेरे ऐसा कहने ही से आपके हृदय को शांति मिल सकती है, तो मैं आपको क्षमा करती हूँ; पर मैं यह शब्द केवल आपके एकांत अनुरोध से कह रही हूँ, नहीं तो मेरा निज का विचार है कि आप मेरे लिये सदा निष्पाप हैं। पाप आपके स्पर्शमात्र से पुण्य में परिणत हो सकता है, आप मेरे ईश्वर हैं।”

सत्येंद्र ने सजल नेत्र हो कर दोनों पत्र सुशीला के हाथ में दे दिये। सुशीला उन्हें बड़े मनोयोग-पूर्वक पढ़ने लगी। साद्यांत पढ़ चुकने पर उसके मुख पर मंद, मधुर मुस्कान दिखाई दी। सत्येंद्र के गले में बड़े प्रेम से हाथ डालकर उसने कहा, “बस इतनी ही‌ सी बात के लिए आपने आकाश-पाताल एक कर दिया था?” सत्येंद्र के लोचन-युगल से अश्रुधारा पतित होने लगी। सुशीला ने अपने अंचल से उनके आँसू पोंछ डाले और फिर उसने हार्मोनियम उठाकर इस चरण को बार-बार मधुर स्वर में गाना प्रारम्भ कर दिया—

सूरदास प्रभु वे अति खोटे,
वह उनहू ते अति ही खोटी।
तुम जानत राधा है छोटी।

सत्येंद्र भी इस बार मुस्करा दिये।

सती का सहज-सुंदर स्नेह सुर-सरिता की स्वच्छ धारा से भी अधिक विमल, शीतल एवं पवित्र है।


7

सुशीला की विमल आमोद-लहरी के शीतल प्रवाह ने सत्येंद्र के हृदय की वेदना एवं ग्लानि को अधिकांश में प्रशमित कर दिया था; पर अब भी कभी-कभी उनकी भस्म में से एकाध स्फुलिंग चमक उठती है। उसे भी शांति करने के लिए सत्येंद्र सुशीला के समेत दुर्गापूजा की छुट्टी में उनके मायके को गये। बड़े आदर-सत्कार से गुणसुंदरी तथा उसके माता-पिता और भाई ने उनका स्वागत किया। गुणसुंदरी शिशु को पाकर हर्ष से खिल उठी।

उसके दूसरे दिन की बात है। प्रभात-काल का मनोरम प्रकाश धीरे-धीरे फैल रहा था—रजनी का अंधकार क्रमशः पुष्पाभरण-भूषिता उषा देवी के पद-नख को आभा में विलीन होता जा रहा था। गुणसुंदरी उस समय घर से सटे हुए बाग में पूजा के लिये फूल चुन रही थी। इसी समय, इसी भाव में, इसी दशा में, एक दिन और सत्येंद्र ने गुणसुंदरी को देखा था। सत्येंद्र ने पीछे से बड़े मृदुल स्वर में पुकारा, “गुणसुंदरी!”

गुणसुंदरी ने भी उसी प्रकार चकित भाव से पीछे मुड़कर देखा और कहा, “जीजाजी! कहिये चित्त तो प्रसन्न है?”

सत्येंद्र—“दया है जगज्जननी की, मैं आज तुमसे क्षमा माँगने आया हूँ। तुम्हारे पत्र को पढ़कर मेरा मोह अंतर्हित हो गया था और उस समय मुझे अपना वह व्यवहार बड़ा कुत्सित प्रतीत हुआ। मैंने उसके लिये प्रायश्चित किया है—अब मैं पवित्र होकर आया हूँ। देवि! मुझे क्षमा करो।”

गुणसुंदरी—“जीजाजी! आपको मुझसे नहीं, मेरी बहन से क्षमा माँगनी चाहिये। मेरी तो आप कुछ हानि कर ही नहीं सके—हाँ! अपनी स्त्री के प्रति आपने अवश्य विश्वासघात किया है।”

सत्येंद्र—“उस सती ने मुझे क्षमा कर दिया है। गुणसुंदरी! वास्तव में हम लोग बड़े मूर्ख हैं। रमणी के भावों का, रमणी की चेष्टाओं का रहस्य जानना सहज नहीं, बड़ा दुष्कर है। कारण कि उसमें उद्भ्रांत कर देने की सामर्थ्य है; नहीं तो अधिकांश में रमणी का हृदय और मुख सरल भाव से ही उद्दीप्त रहता है। तुम्हारी उस मंद मुस्कान ने मुझे उद्भ्रांत कर दिया था—उसके रहस्य-भेद से असमर्थ होकर ही मैंने कैसा पाप करने का साहस किया था। देवी! अब मैं अपने अपराध के लिये तुमसे क्षमा माँगता हूँ।”

गुणसुंदरी—“जीजाजी! आप कैसी बातें कह रहे हैं। मैं आपकी छोटी हूँ—आप मेरे बड़े हैं। मैं क्या आपको क्षमा करने के योग्य हूँ।”

सत्येंद्र ने हाथ जोड़कर घुटने टेक दिये, वे बड़े भक्ति-भरित स्वर में बोले, “बयस से कुल्ल नहीं होता है। तुम महामाया की प्रतिनिधि हो। जब तक तुम मुझे क्षमा नहीं करोगी, तब तक मैं यहाँ से नहीं उठूँगा।”

गुणसुंदरी के सहज-अरुण कपोल लज्जा से और भी गुलाबी हो गये। उसके अधर पर लज्जामयी मंद मुस्कान नृत्य करने लगी—उसके ललाट पर प्रस्वेद के दो बिंदु चमकने लगे—उसने सलज्ज भाव से कहा, “उठिये जीजाजी! मुझे बड़ी लज्जा मालूम हो रही है। मैं नहीं जानती थी, कि आप नाट्य-कला में भी इतने प्रवीण हैं। यदि आपको इसी में संतोष है, तो उठिये, मैं आपको क्षमा करती हूँ। उठिये! जल्द उठिये जीजाजी! मुझे बड़ी लज्जा मालूम हो रही है। दया करके शीघ्र उठिये।”

ठीक उसी समय सुशीला ने एक और बड़े कोमल, मधुर, स्वर में यह पद गाते हुए प्रवेश किया——

देख्यो सखी वह कुंज कुटी तट;
बैठ्यो पलोटत राधिका पाँयन।

सुशीला का मुख-मंडल जिस प्रफुल्ल मंद मुस्कान से विलसित हो रहा था, वह और भी मधुर रहस्यमयी एवं पवित्र अर्थमयी थी।

समाप्त


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Author

  • जन्म: 1899-99

    चंडीप्रसाद ‘हृदयेश’ हिंदी भाषा के लेखक, उपन्यासकार, कवि, नाटककार और कथाकार थे। वह अपने उपन्यासों और कहानियों के लिए जाने जाते हैं। चाँद पत्रिका के वह सहकारी संपादक भी रह चुके थे।

    रचनाएँ:
    उपन्यास: मंगल प्रभात, मनोरमा
    कहानी संग्रह: नंदन निकुंज, वनमाला
    निधन: 15 अगस्त 1927

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