‘टिक टॉक टिक टॉक’ आनंद कुमार सिंह का उपन्यास है। यह मूलतः एक रहस्य कथा है जिसमें लेखक ने समय यात्रा का प्रयोग भी किया है। समय यात्रा उपन्यास में कैसे इस्तेमाल की गयी है यह तो आप उपन्यास पढ़कर ही जानेंगे फिलहाल पढ़ें इस उपन्यास का यह अंश:
करीब तीन साल बाद
उस वक्त वो एक बार में बैठा था। बढ़ी हुई दाढ़ी, कपड़े कई दिन पुराने, साफ लगता था कि वह कई दिनों से नहाया भी नहीं था। तगड़े नशे की हालत में भी वो बार के बाउंसर के मन को साफ पढ़ सकता था। वो उसे ही देख रहा था। कुछ देर पहले उसे सर्व करने वाले वेटर ने जाकर उसे धीमे से कुछ कहा था। इसके बाद दोनों की नज़रें उसपर आ टिकी थीं।
वेटर के हटने के बाद कुछ देर तक बाउंसर उसे देखता रहा। फिर दृढ़ कदमों से उसकी ओर बढ़ा।
“कितना पीया?” उसने भावहीन स्वर में पूछा।
“क… क्यों?” नशे के आधिक्य में झूमते हुए उसने उल्टा सवाल किया।
“अभी बहुत हो गया। बिल पे कर और यहाँ से निकल,” बाउंसर बोला और फिर उसने वेटर को इशारा किया।
बिल तत्काल टेबल पर पहुँचा।
“मेरी मर्जी है… मैं जितना पीऊँ… तेरे बा… प का क… क्या है?” आशुतोष रोहिल्ला से नशे की वजह से ठीक से बोला तक नहीं जा रहा था।
“तीन हजार सात सौ रुपये हुए तेरे… अभी पैसे या कार्ड, निकाल…” बाउंसर शांति से बोला।
“स्स्साले! मेरे को निकालेगा यहाँ से…”
“देख भाऊ, ठंडे-ठंडे निकल ले। मेरे को यहाँ लोचा नहीं माँगता… आराम से, इज्जत से निकल जा,” बाउंसर अभी भी शांत था।
रोहिल्ला ने बाउंसर की तरफ घूँसा चलाया जो उसकी नशे की अधिकता की वजह से बेहद धीमा था… एक मील दूर से देखा जा सकता था।
बाउंसर ने उसका हाथ पकड़ा और उमेठ दिया।
बार में मौजूद दूसरे लोग उन्हें देखने लगे।
वह बाँह उमेठे रहा…
दर्द और अपमान से रोहिल्ला के आँसू निकल गये।
उसने एक हाथ उठाकर सीज फायर का इशारा किया।
बाउंसर ने हाथ छोड़ दिया।
फिर उसने रोहिल्ला को एकाएक ज़ोरदार थप्पड़ मारा।
रोहिल्ला सन्नाटे में आ गया। उसे धरती घूमती हुई लगने लगी।
रोहिल्ला ने काँपते हाथों से चार हजार रुपये निकाले… टेबल पर रखे… अपना आखिरी पैग एक ही घूँट में हलक से उतारा और झूमते हुए दरवाज़े से निकल गया।
बाहर आकर उसने पाया शाम का धुँधलका छा चुका था।
लेकिन वो तो दोपहर को आया था। इतनी देर हो गयी?
वह चलता रहा। अचानक उसने देखा कि वो काफी दूर निकल आया था।
कार कहाँ थी?
ऑफिस?
लेकिन वो तो ऑफिस जा नहीं रहा था। या फिर बार के सामने ही रख छोड़ी थी?
कोई बात नहीं, बार तो अब रोज की बात है। कल ले लेगा। उसने सोचा।
फिर उसने अपना फोन निकाला और कुछ याद करने की कोशिश करने लगा। अपनी जेब से उसने एक मुड़ा-तुड़ा कार्ड निकाला। कार्ड पर दर्ज नम्बर देखकर उसने नम्बर डायल किया।
दूसरी ओर पर घंटी बजी… फिर किसी ने उठाया…
“हैलो?”
“इंस्पेक्टर बलदेव खुराना… होमिसाइड डिवीजन, मुम्बई पुलिस। आप कैसे हैं?” उसने झूमते हुए कहा।
दूसरी ओर ठंडी आह भरी गयी और फिर बोला गया, “रोहिल्ला… अब क्या है?”
“पहचान लिया,” उसने अट्टहास किया और फिर बोला, “नये नम्बर से कॉल करने पर भी पहचान लिया… आप तो बड़े काबिल इंस्पेक्टर हैं। आपको तो मेडल मिलना चाहिए। इंस्पेक्टर साहब मेरा एक छोटा सा काम कर देंगे?”
“क्या?” बलदेव के मुँह से अपने आप निकल गया।
“मेरी पत्नी के क़ातिल को ढूँढ देंगे… इंस्पेक्टर साहब… ढूँढ देंगे न… मैं आपका ज़िंदगी भर गुलाम रहूँगा इंस्पेक्टर साहब,” आशुतोष रोहिल्ला फोन पर ही फूट‑फूटकर रोने लगा।
कुछ क्षण खामोशी छायी रही।
“तुम कहाँ हो आशुतोष?” बलदेव का चिंतित स्वर उसे सुनाई दिया।
“पता नहीं कहाँ हूँ…” उसका रोना जारी था।
“देखो तुम अभी घर जाओ… मुझसे कल पुलिस स्टेशन में मिलना।”
“मुझे आपसे अभी मिलना है।”
“तुम अभी घर जाओ। घर जाकर आराम करो… कल पुलिस स्टेशन में मिलना।”
“मेरा घर कहाँ है… मेरा तो कोई नहीं… मेरा घर नहीं…”
“रोहिल्ला…”
“मेरा कोई नहीं… मेरा घर नहीं…” रोहिल्ला भजे जा रहा था।
“आशुतोष रोहिल्ला!” बलदेव खुराना की आवाज में इस बार दृढ़ता थी, “मैं अंधेरी में अपने भतीजे के जन्मदिन की पार्टी में आया हूँ। बंगला नम्बर 57/2। मैं आज यहीं ठहरूँगा। तुम करीब हो तो यहीं आ जाओ। मैं तुम्हें घर छोड़ दूँगा।”
“मैं आता हूँ… कैब पकड़कर आता हूँ।”
उसने मोबाइल पर कैब का ऐप इंस्टॉल किया और झूमते हुए टाइप करने लगा।
अंधेरी के बंगला नंबर 57/2 के सामने रंगीन रोशनी झिलमिला रही थी। अंदर से डीजे का संगीत छनकर बाहर आ रहा था। बंगले के बाहर तीन-चार छोटे-छोटे बच्चे दौड़ रहे थे।
आशुतोष रोहिल्ला धीरे-धीरे चलते हुए बंगले के दरवाज़े पर पहुँचा।
दरवाज़ा खुला हुआ था…
भीतर छोटे बच्चों का जमावड़ा था….
कुछ रंगीन टोपियाँ लगाये दौड़ रहे थे… कुछ डांस कर रहे थे… कुछ सीटी बजा रहे थे।
व्यस्क हॉल से थोड़ी दूर ड्रिंक्स के काउंटर के इर्द-गिर्द मंडरा रहे थे।
फुल वॉल्यूम में बजता म्यूजिक सिस्टम पार्टी के माहौल को पूरा कर रहा था।
तभी किसी बच्चे की नज़र उस पर पड़ी।
बच्चा चीखा…
बच्चे की चीख सुनकर दूसरे बच्चों ने उसकी ओर देखा… सभी बच्चे एकाएक चीखने लगे।
हॉल में मौजूद शीशे में रोहिल्ला ने खुद का अक्स देखा।
मैले कपड़े… दाढ़ी बढ़ी हुई…आँखें लाल… होंठ फट गया था और उस पर खून बहकर जम गया था। शायद बाउंसर के थप्पड़ का नतीजा था।
बच्चों की हालत देखकर जल्द ही बड़ों की नज़र उस पर पड़ी… दो आदमी उसकी ओर मजबूत कदमों के साथ बढ़े।
तभी बलदेव खुराना उसके करीब प्रकट हुआ। उसने उसकी बाँह पकड़ी और हॉल से होते हुए बगल के कमरे में उसे पहुँचाया।
आशुतोष धम्म से सोफे पर बैठ गया।
उसकी आँखें शून्य में घूर रही थीं।
बच्चों का शोर उसके आने पर कुछ देर के लिए शांत हुआ था जो धीरे-धीरे फिर से लय में आ रहा था।
दुनिया कितनी खुश है!
क्या उसे ड्रिंक्स के काउंटर पर जाना चाहिए?
जाने पर भी क्या उसे ड्रिंक्स मिलेगी?
गर्म पानी में डुबाये गये तौलिये से कोई उसका चेहरा साफ करने लगा।
आशुतोष ने सप्रयास देखा बलदेव उसका चेहरा साफ कर रहा था।
वह चिंतित नज़र आ रहा था।
उसने अपना काम खत्म किया। तौलिये को करीब की मेज पर डाला।
बलदेव कुछ देर तक रोहिल्ला को देखता रहा।
“ये क्या हाल किया है तुमने अपना? बच्चे तक देख कर डर जा रहे हैं।”
बड़ी मुश्किल से उसने अपनी नज़रें बलदेव पर टिकायी।
“मेरी बीवी के केस का क्या हुआ? कौन है क़ातिल?”
बलदेव ने ठंडी आह भरी और बोला, “देखो भाई, कहने को तो मैं बहुत कुछ कह सकता हूँ, जैसे कि पुलिस जाँच कर रही है, कई सस्पेक्ट्स अभी भी हैं… लेकिन सच्चाई यही है कि हमें नहीं पता। हमें नहीं पता कि तुम्हारी बीवी को किसने मारा। हमें तो यह भी नहीं पता कि क़ातिल कैसे उस होटल में हथियार लाया।”
आशुतोष ने अपनी आँखें बंद कर ली, फिर कहा, “तुम्हें पता है मेरी बीवी को गुजरे कितने दिन हुए?”
“हाँ… ढाई साल,” बलदेव ने आहत भाव से कहा।
“गलत… उसे मरे दो साल सात महीने दो दिन हो गये हैं… और तुम ये कहना चाहते हो कि करीब तीन साल में पुलिस कुछ नहीं कर सकी!बस मुझे ये कह सकती है कि हमें कुछ नहीं पता। हम बेवकूफ हैं… हम केवल नाम के पुलिसवाले हैं। शायद यही कह रहे हो… इसलिए अब मेरा फोन भी नहीं उठाते… इसलिए मुझे बार‑बार अपना नम्बर बदलने के लिए मजबूर करते हो।”
“देखो आशुतोष, मुझे पता है कि तुम अब तक बीवी के गम से नहीं उबरे हो। यकीन मानो, तुम्हारे जितना तो नहीं लेकिन दुख मुझे भी है। प्रोफेशनल तरीके से दुख है। मेरे जूरिस्डिक्शन में एक मर्डर होता है और हम उसका कोई सिर पैर नहीं तलाश सके तो ये मेरी ही नाकामयाबी है।”
एकाएक आशुतोष ने बदले हुए नरम स्वर में कहा, “पता है इंस्पेक्टर साहब, मुझे किस बात का दुख है?”
बलदेव ने उत्तर देने की बजाय उसकी ओर प्रश्नवाचक नज़रों से देखा।
“मुझे दुख है कि आखिरी बार मैंने अपनी बीवी को ठीक से देखा तक न था। उससे ठीक से बात तक नहीं की थी। वो एक प्रोफेशनल लेडी जरूर थी लेकिन एक पत्नी भी थी। एक अच्छी पत्नी। मेरी चिंता… मेरी उदास आँखें… वो झट से पढ़ लेती थी… और मैं… मैं तो अपने काम में ही उलझा रहता था। और आखिरी दिन न तो मैंने उससे कोई बात की थी और न ही उसे देख तक सका था। ये जो गम है न इंस्पेक्टर साहब… आखिरी वक्त में उसे न देख पाने का… उससे न बात कर सकने का जो दुख है न… वह मुझे मार डालता है। यही वजह है कि उसकी मौत के दो साल सात महीने और दो दिन बाद भी मैं उसे भूल नहीं पाता हूँ… अपनी ज़िंदगी में लौट नहीं पाता हूँ,” कहकर आशुतोष निःशब्द रोने लगा। बस उसकी आँखों से आँसू गिर रहे थे।
“लेकिन तुम्हें बदलना होगा आशुतोष। मेरी मानो तो किसी साइकियाट्रिस्ट की मदद लो। मुझे कहना तो नहीं चाहिए लेकिन पुलिस एक तरह से केस को ठंडे बस्ते में डाल चुकी है। तुम्हें अब नये सिरे से ज़िंदगी शुरू करनी होगी,” बलदेव चिंतित स्वर में बोला।
“नये सिरे से? साहब… मेरा सिरा अवंतिका के साथ चला गया। कहते हैं कि किसी आदमी के आधे शरीर पर उसकी पत्नी का हक होता है। लेकिन मेरे मामले में ऐसा नहीं है। मेरा पूरा शरीर उसके साथ चला गया है। ये जो आपके सामने “मैला‑कुचैला आदमी बैठा है… ये आशुतोष रोहिल्ला नहीं है… वो मर चुका है। ये तो बस अपनी पत्नी के क़ातिल को देखने, उसे फाँसी के फंदे पर झूलते देखने के लिए एक ज़िंदा लाश है।”
बलदेव से कुछ कहते न बना।
“साहब… क्या आपने भी क़ातिल की तलाश बंद कर दी है? आप निजी तौर पर भी केस में लग सकते हैं। बुरा मत मानिये… पैसे-वैसे अभी भी काफी हैं मेरे पास… वो अगर चाहिए तो…?”
“देखो भाई, तुम्हारी बात का मैं बुरा नहीं मानूँगा। पुलिस ने तुम्हें डिसापॉयंट किया है। आई एक्सेप्ट। लेकिन हकीकत यही है मेरे भाई कि एक पुलिस इंस्पेक्टर कुछ नहीं कर सकता। पुलिस के पास रोज नये मामले आते हैं। ऑफिशियली कोई केस क्लोज हम नहीं करते पर उस पर काम भी नहीं होता है। हाँ, कोई सूचना, कोई नयी जानकारी मिलने पर ही फिर से उस पर काम शुरु हो सकता है। लेकिन अभी ऐसा कुछ नज़र नहीं आ रहा।”
आशुतोष ने आँखें बंद कर ली…
कुछ देर यूँ ही बीते…
कहीं ये सो तो नहीं गया, बलदेव ने सोचा।
“उस दिन मैं अपनी बीवी की पार्टी में इसलिए नहीं गया था क्योंकि मेरा अपनी बीवी से झगड़ा चल रहा था। हम दोनों में दो दिनों से बात नहीं हुई थी। मेरी व्यस्तता, मेरा काम में मसरूफ़ रहना, कुछ ज्यादा ही हो गया था,” आशुतोष ने आँखें बंद किये हुए ही कहा।
ये बलदेव के लिए नयी जानकारी थी लेकिन इतने दिनों बाद वह किस काम की थी।
“आखिर तक मैं बात नहीं कर सका,” उसने आगे कहा।
दोनों के बीच कुछ देर तक खामोशी छायी रही।
“मैं चलता हूँ…” अचानक आशुतोष उठ खड़ा हुआ।
“रुको मैं तुम्हारे लिए कैब बुला देता हूँ,” बलदेव ने उसे रोकने की कोशिश की।
आशुतोष ने अपना हाथ उठाया और उसे रुकने का इशारा किया, “मैं चला जाऊँगा। थोड़ी दूर पैदल जाऊँगा फिर कैब ले लूँगा।”
लहराते हुए वह कमरे से निकल गया।
हॉल में मौजूद बच्चे उसे जाता देख रहे थे।
वो एक तालाब के सामने खड़ा था।
यहाँ कैसे आया मैं? कितनी दूर तक चलता रहा था?
वो तालाब किसी रेज़िडेंशियल कॉम्प्लेक्स के करीब था। वो वहीं बैठ गया। आसपास की बिल्डिंगों की झिलमिलाती रोशनी तालाब के पानी पर पड़ रही थी। हवाओं के चलने से रोशनी भी हिलती हुई लगती थी।
अचानक उसे ऐसा लगा कि अवंतिका पानी में झिलमिलाती रोशनी के बीच से उसे निहार रही है। इतने दिनों बाद भी वो नहीं बदली थी।मासूम सी मुस्कुराहट उसके चेहरे पर मौजूद थी। कुछ देर तक उसे वह देखता रहा। क्या कहना चाहती है अवंतिका? उसने सोचा। फिर अचानक वह तालाब के पानी के भीतर गुम हो गयी। आशुतोष के सीने में दर्द सा होने लगा।
वो तालाब में कूद पड़ा।
तालाब के किनारे में तो ज्यादा पानी नहीं था लेकिन उसे तो अवंतिका के करीब पहुँचना था। वो तालाब के बीच में पहुँचने के लिए हाथ-पाँव चलाने लगा।
आशुतोष ने बचपन में तैराकी सीखी तो थी लेकिन वह महज कुछ दूरी तक के लिए सही थी। न तो उसे तैराकी का अभ्यास था और न ही उसकी मौजूदा हालत तैराकी के अनुकूल थी।
उसे लगने लगा कि अवंतिका तालाब के बीच में फिर दिखी और एक बार फिर पानी के भीतर चली गयी। उसने पानी के भीतर गोता लगाया। भीतर… और भीतर…
हकीकतन रात का वक्त होने के कारण तालाब के भीतर स्याह अँधेरा था लेकिन आशुतोष रोहिल्ला अपने मन की आँखों से देख रहा था, और असल में इस वक्त वो तैर नहीं रहा था बल्कि पानी में डूब रहा था।
उसे पानी के भीतर अवंतिका दिखाई दे रही थी जो उसके बिलकुल करीब थी लेकिन पल-पल दूर होती जा रही थी। उसे लग रहा था कि वह अगर थोड़ा आगे और बढ़े तो अवंतिका को छू सकता है। वो अपनी अवंतिका का हाथ थाम सकता है।
वो और आगे बढ़ता जा रहा था…
फिर उसे लगा सबकुछ थम गया है… अवंतिका ठहर गयी है… वह उसे देख रहा था… साक्षात अपने सामने… उसकी वही प्यारी मुस्कुराहट अब भी उसके होंठों पर थी।
आशुतोष को बेहद बेचैनी का अनुभव होने लगा। उसके दिमाग के किसी कोने में ये बात दस्तक जरूर दे रही थी कि उसे तत्काल ऊपर आने की कोशिश करनी चाहिए लेकिन उसका दिल अवंतिका को देखते रहना चाह रहा था… आँखों से ही उसे वो दिल में बसा लेना चाह रहा था।
वो तालाब के तल में गिरा पड़ा था और लगातार तालाब का पानी निगले जा रहा था। उसकी ज़िंदगी बस अब कुछ सेंकेंडों की ही मेहमान थी।
शायद उसे भी ये पता था लेकिन दिल के किसी कोने में एक उम्मीद थी कि इस तरह से ही सही वो अवंतिका को फिर से पा सकेगा…
आशुतोष को लग रहा था कि उसका सीना अब फट जायेगा…
अब वो चाहे भी तो ऊपर आने की कोशिश नहीं कर सकता था। उसके पास कोई जान नहीं बची थी…
बस कुछ देर और मेरी जान… तेरे पास ही आ रहा हूँ…
फिर वक्त ठहर गया…
एक मजबूत हाथ ने उसे खींचना शुरू किया। ऊपर की ओर…
उसे कोई अवंतिका से दूर कर रहा था…
उसका जी चाहा कि वो उसका हाथ झटक दे… लेकिन उसके पास कोई ताकत नहीं थी। उसकी रही सही चेतना लुप्त हो गयी थी।
वो एक सफेद कमरे में था।
कमरे की दीवारें सफेद, बिस्तर सफेद, ऊपर घूम रहा पंखा सफेद…
हे भगवान… उसके कपड़े भी सफेद थे।
क्या वो मर गया था।
क्या यही स्वर्ग है?
उसे एक अनजानी सी खुशी होने लगी।
लेकिन स्वर्ग में घर्र-घर्र की आवाज के साथ घूम रहे पंखे की कल्पना करना मुश्किल लग रहा था।
दरवाज़ा खुला… भीतर एक महिला ने प्रवेश किया… सफेद कपड़ों में… वो एक नर्स थी।
नर्स ने आकर उसका टैम्पेरचर लिया। फिर उसके शरीर से लगे उपकरणों की रीडिंग ली। उसने उन रीडिंग्स को फोल्डर में रखे काग़ज़ पर नोट किया। वो बाहर निकल गयी।
अगले ही पल बलदेव खुराना ने कमरे में प्रवेश किया। उसने कुछ देर तक उसे घूरा फिर कहा, “करीब दो दिनों तक तुम बेहोश थे। भला हो मैं तुम्हारे पीछे चला गया था। पता नहीं भीतर से एक फीलिंग सी आ रही थी।”
आशुतोष रोहिल्ला खामोश रहा।
बलदेव कुछ देर ठिठका, फिर उसने कहा, “मैंने तुम्हारे दोस्त… तुम्हारे वकील दोस्त… अमित राठी को खबर की थी। वो और मैं एक ही डिसीजन पर पहुँचे हैं कि तुम्हें काउंसिलिंग की जरूरत है। तुम्हें कहीं जाने की जरूरत नहीं… सब कुछ यहीं हो जायेगा। कुछेक सेशन उस मनोचिकित्सक के साथ और फिर तुम बेटर फील करोगे।”
“मुझे किसी काउंसिलिंग या साइकियाट्रिक सेशन की जरूरत नहीं,” आशुतोष ने भावहीन लहजे में कहा।
“सुनो… ये रिक्वेस्ट नहीं है… ये मेरा हुक्म है। एक वेल विशर के तौर पर… तुम्हारे दोस्त का भी यही कहना है। इनफैक्ट उसने ही उस मनोचिकित्सक को एंगेज किया है। मेरी बात तुम्हें माननी ही होगी,” बलदेव ने दृढ़ स्वर में कहा।
रोहिल्ला खामोश रहा।
बलदेव कुछ देर तक उसे देखता रहा। फिर बाहर निकल गया।
वो बंद दरवाज़े की तरफ देखता रहा।
उसके करीब के टेबल पर काँच का एक गिलास रखा था। पानी से भरे उस गिलास को देख कर उसकी प्यास भी जागृत हुई।
उसने पानी पिया। लगा जैसे शरीर में जान आ गयी हो।
गिलास के नीचे कुछ रखा था।
एक कार्ड।
आशुतोष ने उसे उठाया। वो एक बड़े विजिटिंग कार्ड के आकार का हल्के पीले रंग का कार्ड था। जिसके कॉर्नर सुनहरे थे।
उस पर महज एक नाम था–धूमकेतु।
उसने कार्ड को उलटा किया… एक फोन नम्बर दर्ज था… उसके करीब लिखा था,
तुम्हारी परेशानी का हल मेरे पास है…
तीन साल पहले क्या हुआ था? आशुतोष की बीवी का क़त्ल किसने किया था? धूमकेतु क्या बला थी? आशुतोष को कार्ड भेजने वाला कौन था? उसे कार्ड क्यों भेजा गया था? क्या सचमुच उसकी समस्या का हल उनके पास था? वो हल क्या था?
जानने के लिए पढ़ें लेखक आनंद कुमार सिंह का उपन्यास ‘टिक टॉक टिक टॉक’
टिक टॉक टिक टॉक

कहते हैं, गुजरा वक्त लौटकर नहीं आता …लेकिन क्या हो अगर आपके पास मौका हो अपने साथ हुए एक हादसे को रोक देने और अपनी तकदीर बदल देने का? …कुछ ऐसा ही होता है आशुतोष रोहिल्ला के साथ… अपनी पत्नी की हत्या के बाद जिंदगी से बेजार हुआ आशुतोष क्या उस मौके का फायदा उठा सकेगा? …या फिर असंभव को संभव बनाने का उसका इरादा नाकाम हो जायेगा…? इस अभियान में पल-पल है मौत का खतरा… उसकी रेस समय के साथ है… घड़ी की सुइयाँ तेजी से बढ़ रही हैं… टिक टॉक टिक टॉक…
लेखक: आनंद कुमार सिंह | प्रकाशन: साहित्य विमर्श प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न | साहित्य विमर्श प्रकाशन
(पुस्तक अंश प्रकाशक की अनुमति से यहाँ लगाया जा रहा है।)
