पुस्तक अंश: रूम नंबर 1504 – सुछंदा डे

रूम नंबर 1504 - सुच्छंदा डे | एम्बर ग्लो

दिल्ली का एक पाँच सितारा होटल हर रोज से थोड़ा अधिक व्यस्त था। मेहमानों का आना-जाना, थोड़ा शोर-शराबा, थोड़ी हलचल, होटल स्टाफ की व्यस्तता जैसा कि हर रोज होता है। होटल के रूफ टॉप का खास बैंक्वेट हॉल थोड़ा ज्यादा व्यस्त था क्योंकि एक बड़ी राजनैतिक पार्टी के प्रमुख नेता अमर प्रताप सिंह के छोटे बेटे विक्रम की सगाई देश के एक बड़े उद्योगपति की बेटी के साथ थी। अनेक राजनैतिक नेता, देश के कई बड़े उद्योगपति, कुछ और बड़ी हस्तियों का समागम इस कमरे में था। शराब की बोतलें मिनटों में खत्म हो रही थीं। गिलासों के टकराने की आवाज के साथ कुछ बड़े व्यावसायिक और राजनैतिक निर्णय हो रहे थे।

हॉल के बाहर पुलिस का पहरा भी था, आखिर कई विशिष्ट मेहमानों से होटल भरा पड़ा था। इंस्पेक्टर दीपक शर्मा ने चारों ओर की सुरक्षा व्यवस्था पर कड़ी नजर रखी हुई थी। इस के अलावा, एक और छोटी पार्टी भी होटल के गार्डन में चल रही थी। संगीतमय माहौल था। अचानक एक धम से आवाज हुई और वो संगीतमय वातावरण चीख से गूँज उठा।

बीच गार्डन में एक लाश पड़ी हुई थी जो कहीं ऊपर से गिरी थी। चारों ओर हड़कंप मच गया। नीचे ड्यूटी कर रहे हवलदार ने इंस्पेक्टर को फोन किया तो इंस्पेक्टर दीपक भागते हुए नीचे आया। लाश का चेहरा देखकर उसका सर घूम गया। मन ही मन उसने अपनी किस्मत को गालियाँ दी। अब रात यहीं गुजरने वाली थी। उसने सब इंस्पेक्टर विवेक से कहा – “विवेक यहाँ से सबको हॉल में ले जाओ। कोई भी स्टाफ या गेस्ट बाहर नहीं जाना चाहिए। हेडक्वार्टर में खबर करो कि अमर प्रताप सिंह के बड़े बेटे विशाल सिंह का मर्डर हो गया है। दिस इस गोइंग टू बी अ हाई प्रोफाइल केस।”

“मर्डर?”

“अंधे हो क्या, दिख नहीं रहा कि मृतक के सीने में गोली भी लगी है तो यह निस्संदेह मर्डर का केस है।”

“सर, ऊपर सिंह साहब की पार्टी में किसी को पता नहीं है। वहाँ भी खबर करनी पड़ेगी।”

“तुम यहाँ नजर रखो मैं जाता हूँ ऊपर।” कहकर दीपक ने एक गहरी साँस ली और सोचने लगा कैसे ये खबर मंत्री जी तक पहुँचाई जाए।

इस बीच दीपक ने एक टीम को ऊपरी मंजिल चेक करने के लिए कहा ताकि पता चले कि विशाल सिंह को कहाँ से गिराया गया है। रूफ टॉप पर पहुँच के उसने पहले मंत्री जी के खास आदमी केशव मेहता को ढूँढा। वो हाथ में ग्लास लिए विपक्ष के किसी नेता के साथ कुछ साँठगाँठ में लगा था।

दीपक हिम्मत कर के उसके पास गया और कहा, “सर, आपसे दो मिनट बात करनी है…”

“क्या इंस्पेक्टर, क्यों बेकार में डिस्टर्ब कर रहे हो!”

“सर जरूरी नहीं होता तो मैं आपको परेशान नहीं करता।”

“ठीक है बताओ!”

“सर, प्लीज मेरे साथ दो मिनट बाहर आइए।”

अनिच्छा के साथ मेहता बाहर आया, “कहो क्या कहना है!”
“सर विशाल सिंह जी का मर्डर हो गया है!”

केशव मेहता का सारा नशा एक ही क्षण में उतर गया। “क्या बक रहे हो!”

दीपक ने उसे पूरी जानकारी दी। केशव सिर पकड़ कर बैठ गया। वो सोच में पड़ गया कि वह इतने हाई प्रोफाइल मेहमानों को कैसे सँभाले और उससे भी बड़ी बात मंत्री जी को कैसे बताये। एक गहरी साँस लेकर केशव ने हिम्मत की और फिर वो किसी तरह अमर प्रताप सिंह को बाहर ले के आया।

केशव ने किसी तरह खुद को काबू करते हुए कहा, “हुकुम, आप एक बार बैठ जाइए, आपसे कुछ कहना है!”

“क्या हुआ है, बताइये मेहता जी?”

“हुकुम, वो वो…, एक दुर्घटना हो गई है…”

“दुर्घटना, क्या हुआ?”

“हुकुम, वो विशाल भैया…”

“विशाल, क्या हुआ विशाल को? थोड़ी देर पहले ही तो वो यहाँ था।”

“हुकुम, आप एक बार नीचे चलिये।”

“नीचे, क्यों?”

“हुकुम, प्लीज मेरे साथ आइए!”

अमर प्रताप के चेहरे पर चिंता की लकीरें आ गयीं। तेज कदमों से वो दीपक और केशव के साथ लिफ्ट की ओर चल दिये। इतनी देर में नीचे पुलिस की गाड़ियों, एम्बुलेंस और मीडिया के वैन का जमघट लग चुका था। घटनास्थल पर पहुँच कर अमर प्रताप ने जैसे ही विशाल की निष्प्राण देह देखी वो लड़खड़ा कर वहीं गिरने लगे। दीपक ने उन्हें सँभाला और एक कुर्सी पर बिठाया। वो वहीं फफक कर रो पड़े। केशव उन्हें सहारा और सांत्वना देने लगा।

इतने में हवलदार ने आकर दीपक से आ कर कहा “सर, डी सी पी साहेब आ गए हैं।”

“कौन से डी सी पी साहेब?”

“सर, डी सी पी ठाकुर।”

दीपक ने अपना सिर पीटते हुए कहा “आज तो साली किस्मत ही खराब है!”

सब इंस्पेक्टर विवेक ने पूछा “क्या हुआ सर?”
“डी सी पी क्राइम ब्रांच सिद्धांत ठाकुर, उसके साथ काम करना मतलब अपनी जान हाथ में लेकर चलना। मैंने इससे कड़क, होशियार और खड़ूस अफसर आज तक नहीं देखा!”

डी सी पी सिद्धांत ठाकुर के गाड़ी से उतरते ही सभी की निगाहें अपने आप ही उस तरफ़ मुड़ गयीं। कद छह फुट, शरीर पर घंटों व्यायाम करने का परिणाम उसके ब्लेजर पहनने के बाद भी दृश्यमान था। गौर वर्ण, भूरी आँखें जो इतनी तीक्ष्ण कि सामने वाले को दृष्टि से ही भेद दे। फौजियों की तरह कटे हुए बाल, चेहरा कठोर और गंभीर। चाल और हावभाव में कृतित्व का बोध जैसे पूरे परिवेश पर उसका आधिपत्य हो। उम्र लगभग तैंतीस लेकिन वहाँ खड़ी किशोरी कन्याओं से लेकर बुजुर्ग महिलाओं तक उसे मुग्ध नजरों से निहार रही थीं।

सारे पुलिस कर्मी उसे देखते ही सावधान की मुद्रा में आ गए। दीपक ने एड़ियाँ जोड़ कर सावधान की मुद्रा में आते हुए कहा, “जय हिंद सर, इंस्पेक्टर दीपक गुप्ता, ड्यूटी इंचार्ज सर!”

“अगर आप ड्यूटी इंचार्ज हैं तो आपकी उपस्थिति में यह मर्डर कैसे हुआ?”

“सर वो मैं…” दीपक हकलाता हुआ मन ही मन सिद्धांत को गाली देने लगा।

दीपक पर तीक्ष्ण दृष्टि डालते हुए सिद्धांत ठाकुर ने पूछा “स्थिति का ब्यौरा दीजिए ।”

दीपक ने पूरी घटना और स्थिति से उसे अवगत कराया। दीपक की बात सिद्धांत ने ध्यान से सुनी।

सिद्धांत ने अपनी क्राइम ब्रांच की टीम की ओर देख कर कहा “आप लोग टेक ओवर कीजिए। राहत , तुम सीसीटीवी फुटेज चेक करो और देखो कि विशाल सिंह को आखिरी बार कहाँ देखा गया। और सबसे पहले तो इस मीडिया को यहाँ से हटाओ। पाँच मिनट बाद मुझे ये यहाँ नहीं दिखने चाहिए।” कहकर वो विशाल सिंह के शव की ओर बढ़ गया।

उसने पास बैठ कर गौर से शव को देखा और अपने साथ के इंस्पेक्टर वीर से नोट करने का इशारा किया, “मुझे कुछ स्ट्रगल के निशान दिख रहे हैं। हाथ और चेहरे पर नाखूनों के निशान हैं। शराब पी हुई है। कोट का दूसरा बटन टूटा है। फोटोग्राफ लो बटन का। गोली सीधे सीने पर लगी है। पॉइंट ब्लैंक रेंज से शूट किया है। शायद, 45 कोल्ट है, फॉरेंसिक टीम को कन्फर्म करने बोलो।”

“जी सर!”

वो उठ के जाने लगा फिर अमर प्रताप की तरफ़ देख कर रुक गया और कहा “सर, मुझे आपके बेटे की मौत का बहुत अफसोस है!”

“ऑफिसर, जिसने भी यह किया है उसे पकड़ कर मेरे सामने लाओ!”

“मैं पूरी कोशिश करूँगा कि गुनाहगार पकड़ा जाए। आशा है आप और आपका परिवार इसमें सहयोग करेगा।”

“तुम्हें जो भी करना है करो लेकिन गुनाहगार बच के नहीं निकलना चाहिए।”

“डोन्ट वरी सर।”

तब तक राहत वहाँ आ गया। सिद्धांत ने उसकी ओर बढ़ते हुए कहा “क्या खबर है राहत?”

“सर, आखिरी बार विशाल सिंह को 8 बज कर 43 मिनट पर रूम नंबर 1504 में जाते हुए देखा गया है।”

सिद्धांत ने दीपक की तरफ देखा। दीपक ने कहा, “सर, सूट 1501 से 1506 मंत्री जी के परिवार और कुछ खास लोगों के लिए बुक थे।”

“लाश कितने बजे गिरी?”

“सर, नौ बज कर चार मिनट पर।”

“हम्म 21 मिनट बाद। लेट्स गो टू रूम नंबर 1504। इंस्पेक्टर दीपक, नीचे इकट्ठे लोगों के बयान लीजिए। राहत होटल के मैनेजर से मास्टर की कार्ड लो।”

सिद्धांत और उसकी टीम पंद्रहवीं मंजिल पर पहुँची। इस मंजिल पर केवल लक्जरी सूट ही थे। लिफ्ट से निकलकर बायीं ओर 1501 से 1503 और दाहिनी ओर 1504 से 1506। सिद्धांत ने अपने ग्लव्स पहने, होलस्टर से रिवॉल्वर निकाल के हाथ में लिया और दबे कदमों से 1504 के सामने पहुँचा। उसने दरवाजे को धीरे से धक्का दिया तो दरवाजा बंद था। सिद्धांत ने राहत को इशारा किया तो राहत ने मास्टर कार्ड से दरवाजा खोला।

सिद्धांत की पैनी निगाहों ने कमरे का जायजा लिया। दरवाजे खुलते ही लिविंग स्पेस था। ठीक सामने बालकनी थी और उसका दरवाजा खुला हुआ था। अक्तूबर महीने की हवा के सर्द झोंके अंदर आ रहे थे। सिद्धांत ने होंठों पर उंगली रख कर सबको खामोश रहने का इशारा किया। उसके बाद उसने कानों की ओर इशारा करके ध्यान से सुनने को कहा। हवा की आवाज के बावजूद एक क्षीण आवाज आती सुनाई दी जैसे कोई बड़बड़ा रहा हो। ध्यान से सुनने के बाद महसूस हुआ कि आवाज सामने रखे सोफ़े के पीछे से आ रही है। सिद्धांत ने राहत को बायीं ओर से जाने का इशारा किया और खुद दाहिनी ओर से घूम के जाने लगा।

राहत और सिद्धांत एक साथ दोनों ओर से उस शख्स को घेरने के लिए पहुँचे। पर देखा तो वहाँ एक लड़की बैठी थी। दाहिने हाथ में रिवाल्वर था जो वो बालकनी की ओर ताने हुए थी और कुछ बुदबुदा रही थी।

राहत ने अपनी बंदूक उसकी तरफ करते हुये उससे कहा, “मैडम, गन फेंक दीजिए।”

उस लड़की ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। राहत ने फिर कहा, “मैडम…”

सिद्धांत और राहत ने आँखों में इशारा किया और सिद्धांत ने पीछे से उसका हाथ पकड़ कर बंदूक उसके हाथ से ले ली। वह लड़की जैसे किसी बेहोशी में थी और बड़बड़ाते हुए कह रही थी, “मुझे छोड़ दो प्लीज मुझे छोड़ दो…”

सिद्धांत ने उसे पकड़ा तो वो उसकी बाँहों में बेसुध हो गई। सिद्धांत की निगाह जैसे ही उसके चेहरे पर पड़ी उसकी आँखें बड़ी हो गईं और उसके हाथ काँपने लगे।


आखिर रूम नम्बर 1504 में क्या हुआ था? सिद्धांत को कमरा नंबर 1504 में कौन दिखा था? सिद्धांत उसे देखकर आश्चर्यचकित क्यों रह गया? आखिर किसने की थी विशाल सिंह की हत्या? क्यों हुई थी विशाल सिंह की हत्या?

जानने के लिए पढ़ें सुछंदा डे की लिखी रहस्यकथा ‘रूम नम्बर 1504’

पुस्तक विवरण:

रूम नम्बर 1504 - सुछंदा डे | एम्बर ग्लो

दिल्ली के एक आलीशान होटल में एक अजीबोगरीब हत्या… और उसके सबूत इशारा करते हैं रूम नम्बर 1504 की ओर। मामले की जाँच की जिम्मेदारी है आईपीएस अधिकारी सिद्धांत ठाकुर पर, एक बेहद कड़क, कर्तव्यनिष्ठ और सिद्धांतों पर अडिग पुलिस अधिकारी। लेकिन हत्या के सुरागों के साथ-साथ उसके सामने यह कौन है , जो अनजाने ही उसके अतीत के बंद दरवाज़ों को फिर से खोल रहा है। जैसे-जैसे हत्या की गुत्थियाँ सुलझती जाती हैं, वैसे-वैसे सिद्धांत के अपने जीवन की उलझी हुई गाँठें भी खुलने लगती हैं। अतीत और वर्तमान की परतें एक-एक कर हटती हैं, और हर नया सच उसे एक ऐसी हकीकत के सामने खड़ा कर देता है, जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

प्रकाशक: एम्बर ग्लो | पुस्तक लिंक: अमेज़न | किताब ले लो


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