पुस्तक अंश: फैटल फॉलआउट: एक गलती घातक परिणाम

फैटल फॉलआउट: एक गलती घातक परिणाम | Sharmishtha Shenoy | विकास नैनवाल | साहित्य विमर्श प्रकाशन

‘फैटल फालआउट: एक गलती, घातक परिणाम’ लेखिका शर्मिष्ठा शेनॉय की अंग्रेजी पुस्तक ‘फैटल फालआउट’ का हिंदी अनुवाद है। यह विक्रम राणा शृंखला का उपन्यास है। उपन्यास का अनुवाद विकास नैनवाल द्वारा किया गया है और उपन्यास को साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। एक बुक जर्नल पर पढ़ें ‘फैटल फालआउट: एक गलती, घातक परिणाम’ का ये शुरुआती अंश:

प्रस्तावना

गाड़ी में बजते रेडियो मिर्ची के जिंगल को गुनगुनाती गौरी एयरपोर्ट से घर की ओर निकल पड़ी। रात का समय था और सड़कें लगभग खाली थीं। ऐसे वक्त में गौरी को अपनी फॉक्सवैगन बीटल को हाइवे पर दौड़ाने में मज़ा आता था। वो इसमें खो सी जाती थी।

यही कारण था कि उसने पीछे से आती गाड़ी पर तब तक ध्यान नहीं दिया जब तक कि वह उसके काफी नजदीक नहीं आ गयी। उस गाड़ी के ड्राइवर ने अपनी कार की हेडलाइटों को फ्लैश करते हुए उसे रुकने का इशारा लेकिन गौरी ने उसे नजरअंदाज कर अपनी गाड़ी की गति बढ़ा दी। लेकिन इसका उसका पीछा करने वाले पर कोई असर होता न दिखा। उसने इतनी तेजी से अपनी गाड़ी का डिपर देना शुरू कर दिया था कि गौरी की आँखें लगभग चुँधिया गयी थी। डर ने अब उसके जहन में अपना फन उठा लिया था। वह इतना तो भली भाँति समझती थी कि एक सुनसान हाइवे पे अकेले होना किन‑किन खतरों में उसे डाल सकता था। कई अनजाने डरावने ख्याल उसके मन में आए बिना न रह सके। इन ख्यालों का ही असर था कि उसने अपनी गाड़ी का एक्सेलरेटर दबाया और एक हाथ बढ़ाकर अपना मोबाइल थाम लिया।

“प्लीज़…प्लीज़ जल्दी फोन उठाओ…” दूसरी तरफ जब फोन की रिंग बजते हुए सुनायी देने लगी तो वह बुदबुदायी। काफी देर तक फोन यूँ ही बजता रहा। निराश हो उसने फोन रखने का मन बना ही लिया था कि उधर से फोन उठा लिया गया।

“क्या हुआ गौरी?” फोन उठते ही दूसरी तरफ मौजूद व्यक्ति बोला।

बिना कोई भूमिका बाँधे गौरी घबरायी आवाज में बोली, “एक कार मेरा पीछा कर रही है। वो पागलों की तरह डिपर दिये जा रहा है और उससे मेरी आँखें चुँधिया रही हैं। मुझे समझ नहीं आ रहा कि मैं क्या करूँ? मुझे बहुत ज्यादा डर लग रहा है।”

“कुछ भी हो जाए तुम गाड़ी मत रोकना।” उधर से बोला गया।

“और घबराओ मत। हाइवे से हटने की कोशिश करो। क्या कहीं नजदीक कोई एक्ज़िट नजर आ रहा है?”

गौरी ने आँखें मिचमिचाते हुए सामने आते साइन बोर्ड को पढ़ने की कोशिश की। “हाँ, विकाराबाद जाने वाला एक एक्ज़िट दो किलोमीटर बाद आने वाला है।” यह देख उसे राहत की एक लहर-सी अपने शरीर में महसूस हुई। ‘चलो कुछ तो उसके फ़ेवर में हो रहा था,’ उसने सोचा।

“ठीक है,” दूसरे तरफ से आती आवाज बोली। वह आवाज इतनी शांत और आत्मविश्वास से लबरेज थी कि उसके असर से गौरी अब कुछ‑कुछ शांत हो चुकी थी। उसने आगे कहा, “उस एक्ज़िट को ले लेना। वहाँ तुम इस गाड़ी के खिलाफ शिकायत दर्ज कर सकती हो। क्या तुम्हें गाड़ी की नंबर प्लेट दिखाई दे रही है?”

“नहीं, यहाँ बहुत अँधेरा है। लेकिन मुझे लगता है कि वह कोई बड़ी गाड़ी है।”

“ठीक है, तुम घबराओ मत। सबसे पहले तुम्हें खुद को बचाने पर ध्यान देना है। उसे बाद में देख लेंगे। तुम जितनी जल्दी हो सके उतनी जल्दी टोल बूथ पर पहुँचो।”

“ठीक है…मैं पहुँचने की…” उसका वाक्य पूरा भी नहीं हो पाया था कि उसे बीप-बीप की आवाज सुनायी देने लगी। फोन का नेटवर्क जा चुका था।

“भगवान मेरी मदद करना…” गौरी अपनी जान की रक्षा के लिये भगवान से प्रार्थना सी करते हुए बोली। इस दौरान वह अपने बाएँ हाथ से फोन हिलाकर नेटवर्क पाने की व्यर्थ कोशिश कर रही थी और दायें हाथ से 140 की स्पीड से चल रही अपनी गाड़ी का स्टीयरिंग सँभाले हुए थी। उस गाड़ी ने अभी भी उसका पीछा नहीं छोड़ा था बल्कि उसने भी अपनी गति बढ़ा दी थी। फोन का नेटवर्क भी न मिलने की जैसे कसम खाए बैठा था। उसने झल्लाकर फोन को बगल वाली सीट पर पटका और अपना पूरा ध्यान गाड़ी चलाने पर केंद्रित कर दिया। सामने ही उसे टीएसपीए और विकाराबाद का एक्ज़िट नजर आया। उसके घबराये चेहरे पर मुस्कान उभरने की कोशिश भर हुई।

‘भगवान का शुक्र है। कुछ ही और मिनटों में मैं सेफ होऊँगी।’ उसने झटके से एक्ज़िट की तरफ अपनी गाड़ी को मोड़ते हुए सोचा।

लेकिन पीछा करने वाला शातिर था। वो समझ चुका था कि शिकार बचने की कोशिश कर रहा है और ऐसा होने देने का उसका कोई इरादा दिखाई नहीं दे रहा था। उसने बिजली की तेजी से अपनी गाड़ी की गति बढ़ाई और उसके बगल में अपनी गाड़ी इस तरह से ले आया कि गौरी को साइड रेलिंग के नजदीक अपनी गाड़ी ले जाकर अपनी गति धीमी करनी पड़ी। गौरी का ऐसा करना था कि उसका पीछा करने वाला उसके आगे आ गया और उसने गाड़ी ऐसे लाकर रोक दी कि गौरी का अब उसके बगल से गुजरना मुश्किल था। उसके ऐसा करते ही गौरी ने आखिरकार कार को पहचाना और झटके से गाड़ी के ब्रेक दबा दिए जिससे कि गाड़ी का इंजन बंद पड़ गया।

ड्राइवर अपनी गाड़ी से उतरा और उसकी खिड़की पर आकर मुस्कराकर बोला, “हैल्लो गौरी, कैसी हो? मैंने तुम्हारी गाड़ी पहचान ली थी और उसके पीछे आ गया। मैं तुम्हें रुकने का इशारा कर रहा था। तुम रुकी क्यों नहीं?”

उस आदमी का चेहरा उसकी गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी के कारण अभी भी अँधेरे में था। गौरी को समझ नहीं आ रहा था कि वह कौन है। उसने अपनी आँखें सिकोड़कर उसे देखा । फिर जैसे-जैसे वह आदमी उजाले में आया तो उसकी आँखें आश्चर्य से बड़ी होती चली गयी। वह उसे पहचान चुकी थी और अब आश्चर्यचकित हो उसे घूरे जा रही थी। इससे पहले कि वह कुछ करती उस आदमी ने तेजी से कार का दरवाजा खोल दिया। उसके हाथ में एक बंदूक थी जो कि गौरी को अब दिखाई देने लगी थी। बंदूक देखते ही गौरी की घिग्घी बँध गयी और शब्दों ने उसके गले से निकलने से मना कर दिया।

“बाहर निकल छिनाल!” वह गुर्राते हुए बोला।

गौरी जानती थी उसके पास उस आदमी के आदेश को मानने के सिवाय कोई दूसरा चारा नहीं था। वह धीरे-धीरे गाड़ी से बाहर निकली। उसका शरीर डर के कारण किसी सूखे पत्ते सा काँप रहा था।

“हाथ उठा।”

गौरी ने अपने हाथ उठा दिए।

उसकी उँगलियों के महंगे जेवर और हाथ पर मौजूद सुनहरी रोलैक्स हेडलाइट की रोशनी में चमचमा उठी।

“वो मुझे दे,” उसके हाथों की ओर इशारा कर उसने आदेश दनदनाया।

गौरी उसका आदेश मानने को विवश थी। वह अपने जेवर और घड़ी निकालने लगी। भय में डूबा हुआ उसका दिमाग बस यही सोचने की कोशिश कर रहा था कि उस आदमी का अगला कदम क्या होगा? उसने मन में भगवान से प्रार्थना जरूर की लेकिन न जाने क्यों उस वक्त उसे लग रहा था कि जैसे उसके भगवान उससे बहुत दूर हैं।

उन महंगी चीजों को अपने जेब में डालकर उस आदमी ने गौरी की कलाइयों को बाँधा और उसे अपनी गाड़ी में धकेला। जैसे ही वह आदमी उसके साथ बैक सीट में आने को हुआ तो गौरी की आँखें अपने आने वाले हश्र का ख्याल कर अपनी कटोरियों से बाहर आने को उतावली सी हो पड़ी। साथ ही उसके गले से एक घुटी-घुटी सी आवाज़ निकल पड़ी।

“प्लीज़ मुझे जाने दो….” वह घिघियायी। उसकी आँखों से निकलती आँसुओं की धारा उसके चेहरे पर बहने लगी थी।

“ज्यादा चूचपड़ करी तो मैं तुम्हारा काम तमाम कर दूँगा,” वह आदमी उसके चेहरे के आगे गन लहराकर उसे धमकाते हुए बोला।

उसकी प्रार्थनाओं को नजरंदाज करके उसने उसे सीट पर पीछे को धकेला और फिर उसके ऊपर चढ़ गया।

गौरी ने अपनी आँखें भींच ली। उसे मालूम था कि वो बेबस थी। इस दौरान वह अपने साथ होती ज्यादतियों को किसी तरह से अपने जेहन में दर्ज न होने देने की कोशिश करती रही। जब उस आदमी ने अपनी मनमर्जी उसके साथ कर ली तो गौरी आगे आने वाले अपेक्षित हमले का सोचकर सकुचाकर पीछे को हो गयी।

लेकिन यह हैरानी की ही बात थी कि उस आदमी से उसे छोड़ दिया और कार से बाहर आकर बोला, “चल खुद को ढक ले!”

गौरी ने किसी तरह अपने कपड़े ठीक किए। सुबकती हुई वह गाड़ी से बाहर निकली और गिड़गिड़ायी, “प्लीज़ मुझे जाने दो। मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी।”

उस आदमी ने उसे ऐसे देखा जैसे वह सोच‑विचार कर रहा हो और फिर आखिरकार वह बोला, “मैं कैसे इस बात का यकीन कर लूँ?”

गौरी को कुछ उम्मीद बँधी। उसने अपने हाथों को गिड़गिड़ाते हुए जोड़ा और बोली, “मैं कसम खाकर कहती हूँ कि मैं किसी से कुछ नहीं कहूँगी।”

उस आदमी के चेहरे पर ऐसे भाव आए जैसे वह इस बारे में सोच रहा हो। जब गौरी ने देखा कि उसकी बातों का असर उस पर हो रहा है तो वह और जोरों से अपनी जान की भीख माँगने लगी। सच पूछो तो गौरी अब तक अपनी जान बचने की उम्मीद छोड़ चुकी थी। इसलिये वह तब हैरान होने से खुद को न रोक पायी जब गर्दन हिलाते हुए उस आदमी ने कहा, “ठीक है। अगर ऐसा है तो तुम जा सकती हो।”

एक पल को गौरी को अपनी किस्मत पर भरोसा नहीं हुआ। लेकिन वह यह मौका चूकना नहीं चाहती थी इसलिये वह पलटी और उसने अपनी गाड़ी की तरफ दौड़ना शुरू कर दिया। वह अपनी जान बचाने के लिये इतनी आतुर थी कि यह भी न देख पायी कि उस आदमी ने अपनी गन उठा ली थी। गौरी अभी कुछ ही कदम आगे बढ़ी थी कि उस आदमी ने बिना कोई हड़बड़ी दिखाए गोली चला दी। गोली गौरी के सिर के पीछे लगी और वह किसी कटे पेड़ की तरह गिर गयी।

उस बियाबान एग्जिट रोड पर रिवॉल्वर की दबी हुई गूँज को किसी ने नहीं सुना और उसके अनिन्द्य शरीर से प्राण कूच कर गये…


पुस्तक परिचय:
फैटल फालआउट - शर्मिष्ठा शेनॉय | साहित्य विमर्श प्रकाशन | अनुवाद: विकास नैनवाल

गौरी एक मॉडल और एक उभरती हुई अदाकारा थी। वो फिल्मों में नाम कमाना चाहती थी। एक फिल्मी खिताब जीतना चाहती थी। उसकी नयी फिल्म के रिलीज़ होते ही उसका यह सपना पूरा भी हो जाना था।

पर कौन जानता था कि उसका सफर शुरू होने से पहले ही खत्म कर दिया जाएगा। एक खिताब जीतने से पहले ही उसे मिटा दिया जाएगा। एक गलती का ऐसा घातक परिणाम निकलेगा।

किसी ने बेदर्दी से गौरी को खत्म कर दिया था। उसकी लाश झरने पर उसकी गाड़ी के नज़दीक पायी गयी थी।

आखिर किसने किया था उसका कत्ल? आखिर क्यों हुआ था उसका कत्ल? क्या कातिल पकड़ा जा सका?

लेखिका: शर्मिष्ठा शेनॉय | अनुवाद: विकास नैनवाल | प्रकाशक: साहित्य विमर्श प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न

(नोट: यह पुस्तक अंश प्रकाशक साहित्य विमर्श प्रकाशन की अनुमति से यहाँ पर प्रयोग किया जा रहा है )


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