कहानी: कार्य‑कुशलता – विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

कहानी: कार्य‑कुशलता - विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक

1

शहर में रिश्वत का बाज़ार गर्म था। कोतवालसाहब तथा इंचार्ज कोतवाली खूब चाँदी काट रहे थे। इसी कारण शहर में अनेक प्रकार के अपराध बढ़ रहे थे। स्थान-स्थान पर जुए के अड्डे स्थापित थे। इन अड्डों से पुलिस को मासिक आय होती थी। बदमाश तथा गुंडे बात पड़ने पर अलानिया कहते थे कि, “पुलिस तो हमारी नौकर है।” संध्या का समय था। नगर के एक बाज़ार में, जहाँ भले आदमियों के मध्य में वेश्याओं के घर भी थे खूब चहल‑पहल थी। जहाँ वेश्याएँ होती हैं वहाँ गुंडे‑बदमाश भी आते‑जाते रहते हैं। अतः इस समय वहाँ शहर का एक प्रसिद्ध गुंडा अपने दो अनुचरों के साथ मंडरा रहा था। कभी वह किसी तम्बोली को दुकान पर खड़ा हो जाता, कभी किसी वेश्या के मकान के सामने खड़ा होकर वेश्या से इशारेबाज़ी करता, कभी किसी दुकानदार से गप-शप करने लगता था। इस समय वह एक तम्बोली की दुकान पर खड़ा हुआ पान बनवा रहा था। इसी समय उस हल्के के चीफ़ साहब उधर से निकलें। गुंडे को देख कर वह उसके पास पहुँचे और बोले, “क्या अकेले ही अकेले पान खाओगे गुरू!”

गुरू ने घूमकर चीफ़ साहब की तरफ देखा और कहा, “आओ! देना भई चीफ़ साहब को चार पान और एक सिगरेट। कहाँ चले?”

“कहीं नहीं। ऐसे ही चले आये।”

“हरामखोरी को निकले होगे। शाम का समय है।”

चीफ़ साहब हँसकर बोले, “दुनियाँ ही हरामखोरी पर उतर आयी है तब हम क्या उल्लू हैं जो हलालखोरी को पकड़े बैठे रहें।”

गुंडा हँस कर बोला, “ठीक कहते हो।”

इसी समय सामने के छज्जे पर से एक युवती वेश्या ने तम्बोली को पुकार कर कहा, “लछमन भइया। आठ पान और एक डिब्बी सिगरेट भेज दो।”

गुंडा हँस कर बोला, “क्यों लछमन भइया, तुम्हारी बहिन है?”

यदि और कोई ऐसी बात कह देता तो लछमन बिगड़ उठता; क्योंकि वह भी बदमाश था; परंतु गुरू के सामने बोलने का साहस उसमें नहीं था। इस कारण वह मुस्कराकर बोला, “वाह गुरू ऐसी कहोगे! हमारी बहिन ससुरी काहे को है। और वैसे तो पराई औरत माँ-बहिन के बराबर ही होती है।”

“यह कहो! आजकल तो बड़े साधू बने हुए हो। लेकिन एक बात तो बताओ यह कौशल्या किसी के पास नौकर है क्या?”

“अभी नयी आयी है। हमारी जान में तो अभी कहीं नौकर नहीं है।”

“तब भी ससुरी इतनी लम्बी-चौड़ी बात करती है। इसे किसी दिन ठीक करना है। ऊपर चढ़ जाऊँगा और दो सौ जूते गिन कर मारूंँगा—सारी नखरेबाज़ी भूल जाएगी। अभी हमें पहचानती नहीं है।”

“अब पहचान लेगी।” चीफ़ साहब बोले।

“और आप बोलियेगा नहीं। चीफ़ साहब यह बताये देता हूँ।”

“हमें क्या मतलब है। ससुरी को जूतों से मारो या चाहे जो करो।”

“और बोलना तो हम से पूछ लेना—हम तुम्हें कुछ पैदा करा देंगे।”

“अच्छी बात है। हमारा इतना ख़याल रखते हो—यही क्या कम है।”

“ख़याल रखना ही पड़ता है। तुम हमारे नौकर हो।”

चीफ़ साहब बेहयाई की हँसी हँसकर बोले, “ठीक कहते हो। हम पब्लिक के नौकर तो हई हैं।”

“पब्लिक जाय चूल्हे-भाड़ में। हम पब्लिक की हैसियत से थोड़े हो कहते हैं। हम तो इसलिए कहते हैं कि हम तुम लोगों को तनखाह देते हैं—हर महीने कलदार!”

“अच्छा ऐसा ही सही—जैसे तुम खुश रहो।”

यह कहकर चीफ साहब सिगरेट धकधकाते हुए चल दिये।


2

सुपरिंटेंडेंट पुलिस (कप्तान साहब) मि. रोबिंसन एक अच्छे अफ़सर समझे जाते थे। न्यायप्रिय आदमी थे। हिंदुस्तानी भाषा बहुत साफ़ बोलते थे। सहसा यह भान नहीं होता था कि कोई यूरोपियन बोल रहा है।

प्रातःकाल के नौ बजे थे। कप्तान साहब शहर के दो रईसों से वार्तालाप कर रहे थे। एक रईस महोदय कह रहे थे, “हुज़ूर के होते हुए अगर शहर की यह हालत हो तो बड़े ताज्जुब की बात है।”

“हमको इस बात का खुद बहुत ख़याल है और हम जल्दी ही कोई इंतज़ाम करते हैं।”

“पुलीस के अमाल से हुज़ूर की बदनामी होती है और हुज़ूर की बदनामी सुनकर हम लोगों को बड़ी तकलीफ़ पहुँचती है क्योंकि हम लोग जानते हैं कि हुज़ूर बहुत इंसाफ-पसंद और नेक हाकिम हैं।”

“शुक्रिया! हम स्कॉटलैंड यार्ड (लंदन की कोतवाली) के आदमी हैं पंडित साहब! स्कॉटलैंड यार्ड अपनी ईमानदारी और कारगुज़ारी के लिए दुनिया भर में मशहूर है।” कप्तान साहब ने कहा।

“ऐसे ही हाकिमों की तो यहाँ ज़रूरत है।”

“लेकिन यहाँ की पुलिस से हम परेशान हैं। कॉन्स्टेबिल से लेकर डी.एस.पी. तक सब रिश्वतखोर हैं। मेरा मतलब है कि ज़्यादा तादाद में रिश्वतखोर हैं। बहुत कम आदमी ऐसे हैं जो रिश्वत नहीं लेते।”

“हुज़ूर तो खुद ही सब बात जानते हैं, हुज़ूर को हम क्या बतावेंगे। लेकिन अगर हुज़ूर पुलिस की मदद से कोई कार्यवाई करना चाहेंगे तो ठीक न होगा क्योंकि पुलिस का शायद ही कोई आदमी इस काबिल निकले कि जिसके भरोसे हुज़ूर कोई काम करके कामयाबी हासिल कर सकें।”

“यह बात हम भी समझते हैं। देखा जायगा।”

“गुंडे अलानिया भले आदमियों की आबरू लेने को तैयार हो जाते हैं और पुलिस खड़ी देखा करती है। अभी परसों का मामला है। शहर का एक गुंडा जिसे छन्नो गुरू कहते हैं एक तवायफ के कमरे पर चढ़ गया और उसने उसे मारते‑मारते बेदम कर दिया। उसने चौकी पर रिपोर्ट की तो चीफ़ साहब ने उलटे उसी पर इल्जाम रख कर उससे पचास रुपये ले लिए। दूसरे दिन वह बेचारी यहाँ से भाग गयी। यह हालत है। हालाँकि वह रंडी थी लेकिन हुज़ूर, जुल्म तो किसी पर भी न होना चाहिए, चाहे वह रंडी हो या शरीफ! इसी तरह गुंडों के हौसले बढ़ जाते हैं और वह शरीफों पर भी हाथ साफ करने लगते हैं।”

“बिलकुल दुरुस्त है। हम सब इंतज़ाम जल्दी ही कर देंगे। आप इतमीनान रक्खें।”

“हुज़ूर से ऐसी ही उम्मीद है।”

“लेकिन इस बात का ज़िक्र किसी से मत कीजिएगा।”

“ऐसा कभी हो सकता है। हुज़ूर की बात किसी से भी नहीं कही जायगी।”

“तो बस आप खातिर जमा रखिए हम अच्छी तरह इंतज़ाम करेंगे, हम अपनी बदनामी नहीं बरदाश्त कर सकते।”

“बेशक ! कोई भी नेक आदमी अपनी बदनामी बरदाश्त न करेगा।”

“अच्छा अब इजाज़त हो—हुज़ूर का बहुत वक्त लिया।”


3

रात के दो बजने का समय था। इसी समय एक तंग तथा अँधेरी गली से एक मुसलमान स्त्री बुर्के से अपना शरीर तथा मुख छिपाये निकली। इस गली के सामने सड़क पर दो कॉन्स्टेबिल भाले लिए एक बंद दुकान के चबूतरे पर बैठे थे। बुर्कापोश स्त्री गली से निकल कर उनकी और आयी और एक मुसलमानी मुहल्ले का नाम लेकर बोली, “—किधर है?”

कॉन्स्टेबिल ने पूछा, “तुम वहाँ रहती हो?”

“हाँ”

“यहाँ इतनी रात को क्यों आयी थी।”

स्त्री कुछ क्षण विचार कर के बोली, “अब यह क्या करोगे पूछ के रास्ता बता दो।”

“हूँ ! तब तो मामला कुछ गड़बड़ है। अब तो तुम्हें बताना पड़ेगा।”

स्त्री ने खुशामद की लेकिन कॉन्स्टेबिल किसी तरह न माने। स्त्री बोली, “अच्छा सब बता दूँगी।”

दोनों कॉन्स्टेबिल उसे लेकर चौकी पहुँचे। चीफ़ साहब पड़े सो रहे थे उन्हें जगाकर सब वृत्तांत कहा, “सच बताओ।”

स्त्री बोली, “यहाँ एक आदमी से मेरा ताल्लुक है उसी के पास आयी थी।”

“हूँ—जिना करके आई थी। अच्छा इसे बंद करो—सबेरे थाने पर पेश करेंगे।”

स्त्री ने खुशामद की, पर चीफ़ साहब न माने। अंत में उसने अपने हाथ से एक सोने की चूड़ी उतार कर दी तब चीफ़ साहब राज़ी हुए।

स्त्री आगे चली। कुछ फासले पर उसे एक और कॉन्स्टेबिल मिला। उसने भी उसे टोका। स्त्री ने उससे भी यही कहा कि वह अपने प्रेमी से मिलने आयी थी।

कॉन्स्टेबिल बोला, “चलो थाने पर।”

“थाने पर न ले जाओ—यह लो।”

यह कहकर स्त्री ने पाँच रुपये कॉन्स्टेबिल की ओर बढ़ाये। कॉन्स्टेबिल ने एक लप्पड़ स्त्री के मुख पर मारकर कहा, “रिश्वत देती है हरामजादी। हम रिश्वत लेते हैं? ऐसी रिश्वत हम हराम समझते हैं—चल थाने।”

कॉन्स्टेबिल स्त्री को थाने पर ले गया। दारोगा जी को जगा कर उनके सामने स्त्री को पेश किया। वहाँ भी स्त्री ने वही कथा सुनाई। दारोगाजी ने उसे हवालात में बंद करने का हुक्म दिया। स्त्री ने दो सोने की चूड़ियाँ उतार कर दारोगा जी को दी।

दारोगा जी चूड़ियां देखकर बोले, “सोने की ही हैं न, कलई तो नहीं है?”

“हुज़ूर के साथ ऐसा धोखा नहीं कर सकती, एक दिन का काम थोड़ा ही है।” यह कहकर स्त्री चल दी।

स्त्री के जाने के बीस मिनट बाद ही पुलिस कप्तान मि. राबिंसन ने थाने पर छापा मारा। उसी समय एक डी.एस.पी. ने चौकी पर छापा मारा। दोनों जगह चूड़ियाँ बरामद हुई। चीफ कॉन्स्टेबिल तथा थानेदार साहब गिरफ़्तार कर लिये गये।

चूड़ियों के भीतर की ओर कप्तान साहब के नाम के प्रथमाक्षर अत्यंत महीन खुदे हुए थे।

दूसरे दिन कप्तान साहब ने अपने बंगले पर उस कान्स्टेबिल को तलब किया जिसने स्त्री के लप्पड़ मारा था। उस से कप्तान साहब बोले, “हमने तुमको चीफ कान्स्टेबिल बनाया। ऐसी ही ईमानदारी से काम करते रहना।”

कॉन्स्टेबिल ने सेल्यूट कर के कहा, “हुज़ूर के एकबाल से हमेशा ऐसी ही ईमानदारी और वफादारी से काम करूँगा।”

कॉन्स्टेबिल चलने लगा तो कप्तान साहब बोले, “लेकिन एक बात का ख़याल रखना। आयंदा किसी औरत के इतने ज़ोर का लप्पड़ मत मारना।”

कॉन्स्टेबिल चला गया। उसके जाने के बाद कप्तान साहब अपनी पत्नी से जो उनके निकट ही बैठी थी अँग्रेजी में बोले, “बड़े जोर का लप्पड़ मारा था इसने मेरा गाल अब तक दर्द कर रहा है।”

मेम साहब हँस कर बोलीं, “ताकतवर आदमी है। आयंदा ज़रा बचकर काम करना।”

कप्तान साहब हँस कर बोले, “अगर दूसरा लप्पड़ मारता तो मुझे वहीं अपने को प्रकट कर देना पड़ता।”

“तब तो इसकी शकल उस समय देखने के योग्य होती।”

“बेचारा ख़ौफ़ से अधमरा हो जाता।”

दोनों खिलखिला कर हँसने लगे।

समाप्त


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Author

  • विश्वम्बरनाथ शर्मा 'कौशिक'

    जन्म: 10 मई 1899 (अम्बाला)

    विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ (1891-1945) हिंदी के कथाकार थे। इनका जन्म पंजाब के अम्बाला शहर में हुआ था। शुरुआत में वह राग़िब के लेखकीय नाम से उर्दू कविताएँ लिखा करते थे और ज़माना पत्रिका में उनकी कई कविताएँ और लेख प्रकाशित हुए थे। फिर सरस्वती पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रभाव से हिंदी में लेखन करने लगें। 'रक्षाबंधन' उनकी पहली कहानी थी जो कि सरस्वती पत्रिका में 1903 में प्रकाशित हुई थी। वह अपनी आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी कहानियों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में 300 से ऊपर कहानियाँ लिखी थीं।

    कहानी संग्रह:
    रक्षाबंधन, कल्प मंदिर, चित्रशाल, प्रेम-प्रतिज्ञा, मणिमाला, कल्लोल

    निधन: 10 दिसम्बर 1945 (कानपुर)

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