कहानी: बैल की बिक्री – सियारामशरण गुप्त

कहानी: बैल की बिक्री - सियारामशरण गुप्त

कई साल से फसल बिगड़ रही थी। बादल समय पर पानी नहीं देते थे। खेती के पौधे अकाल वृद्ध होकर असमय में ही मुरझा रहे थे। परंतु महाजनों की फसल का हाल ऐसा ना था। बादल ज्यों-ज्यों अपना हाथ खींचते, उनकी खेती में त्यों-त्यों नये अंकुर निकलते थे।

सेठ ज्वालाप्रसाद उन्हीं महाजनों में से थे! विधाता के वर से उनका धन अक्षय था। जिस किसान के पास पहुँच जाता, जीवन-भर उसका साथ न छोड़ता। अपने स्वामी की तिजोरी मे निरंतर जाकर भी दरिद्र की झोंपड़ी की माया उससे छोड़ी न जाती थी!

मोहन वर्षों से ज्वालाप्रसाद का ऋण चुकाने की चेष्टा मे था, परंतु चेष्टा कभी सफल न होती थी। मोहन का ऋण दरिद्र के वंश की तरह दिन‑पर‑दिन बढ़ता ही जाता था। इधर कुछ दिन ज्वालाप्रसाद भी कुछ अधीर-से हो उठे थे। रुपये अदा करने के लिए वे मोहन के यहाँ आदमी‑पर‑आदमी भेज रहे थे।

समय की खराबी और महाजन की अधीरता के साथ मोहन को एक चिंता और थी। वह थी जवान लड़के, शिबू की निश्चिंतता। उसे घर के काम‑काज से सरोकार न था। बिलकुल ही न था, यह नहीं कहा जा सकता। भोजन करने के लिए यथा-समय उसे घर आना ही पड़ता था। बाप, मजूरी के पैसे लाकर किस जगह रखता है, इसके ऊपर दृष्टि रखनी पड़ती थी। पता मिल जाने पर बीच-बीच में उन्हें सफाई के हाथ से उड़ाना भी पड़ता था। ऐसे ही और बहुत काम थे। दो-चार बार उसे बैलगाड़ी किराए के लिए चलानी पड़ी थी। सम्भव है, यह बेगार चलकर और अधिक करनी पड़ती। परंतु हाल मे ही यह सम्भावना भी असम्भव हो गयी है। अचानक एक दिन दो-चार घंटे की बीमारी से हाल मे ही उसका बैल चल बसा (मर गया) था। इस प्रकार ईश्वर ने उसके स्वच्छंद विचरण के पथ में एक सुविधा और कर रखी थी। घर वालों के साथ उसका वही सम्बंध जान पड़ता था, जो खेती के साथ उन बादलों का होता है, जिनके दर्शन ही नहीं होते। यदि कभी होते भी है तो आये हुए धान्य को खेत मे ही सड़ा देने भर के लिए।

परंतु बादल चाहे जैसी शत्रुता रखें, खेती के लिए उनसे प्यारी वस्तु और कोई नहीं होती। मोहन भी शिबू का विचार इसी दृष्टि से करता था। सोचता था, अभी बच्चा है। हमेशा ऐसा ही थोड़े रहेगा। जब वह शिबू की कोई बात आयी-गयी कर जाता तब उसे अपने मृत पिता की याद आ जाती। उसने भी अपने पिता को कम नहीं खिझाया (सताया) था। पिता के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का सबसे बड़ा साधन कदाचित् बच्चे को प्यार करना ही है! शिबू का यथेच्छाचार क्षमा करते समय प्रायः मोहन का ह्रदय गद् गद हो उठता था।

उस दिन कलेवा (नाश्ता) करके शिबू बाहर निकल रहा था। मोहन ने पीछे से कहा, “लल्लू! आज मुझे एक जगह काम पर जाना है। बैल की सार (बैल के रहने की जगह) करके तुम उसे पानी पिला देना।”

शिबू ने पिता की ओर मुड़कर कहा, “मुझसे यह बेगार न होगी। मुझे भी एक जगह जाना है।”

मोहन जानता था कि काँच की तरह सीधी गरमी दिखाकर इसे झुकाने की इच्छा रखना मूर्खता है। विनती के स्वर मे बोला, “बेटा, मुझे काम है; नहीं तो तुमसे क्यों कहता? कौन बहुत देर का काम है।”

शिबू उसी तरह अविचल कंठ से बोला, “थोड़ी देर का काम हो या बहुत देर का, मुझे वाहियात कामों की फुरसत नहीं हैं।”

मोहन झुँझला पड़ा। क्रुद्ध होकर बोला, “कैसा है रे! बैल को पानी पिलाना वाहियात काम बताता है। किसानी न करेगा तो क्या बाबू बनकर डाकखाने में टिकट बेचेगा?”

“ठीक तो कहता हूँ, नाराज़ क्यों होते हो? कितनी बार कहा—इसे बेच दो, अकेला बँधा-बँधा खा रहा है। सार साफ करो, पानी पिलाओ, भूसा डालो। इधर-से-उधर बाँधों, उधर-से इधर। मुझे यह अच्छा नहीं लगता। किसी काम आता हो तो बात भी है।”

“चुप रह! घर में जोड़ी न होती तो इतनी बातें बनाना न आता। बैल किसान के हाथ-पैर होते हैं। एक हाथ टूट जाने पर कोई दूसरा भी कटा नहीं डालता। मैं इसका जोड़ मिलाने की फ़िक्र मे हूँ; तू कहता है—बेच दो। दूर हो, जहाँ जाना हो चला जा। मैं सब कर लूँगा।”

“जा तो रहा ही हूँ। मैं कुछ ऐसा दबैल नहीं हूँ,” हँसकर कहता हुआ शिबू घर के बाहर हो गया। मोहन कुछ देर ज्यों का त्यों खड़ा रहकर, बड़बड़ाता हुआ उठा और जाकर बैल को थपथपाने लगा। शिबू ने उसकी जो अवज्ञा की थी मानों उसकी क्षति-पूर्ति करने के लिए अपने ह्रदय का समस्त प्यार ढालने लगा।

उस दिन मोहन ने सार की सफाई और अच्छी तरह की। बैल को पानी पिलाने ले गया। तो सोचा इसे नहला दूँ। उजड्ड लड़के ने बैल का जो अपमान किया था, उसे वह अंतस्तल तक से धो देना चाहता था। नहला चुकने पर अपने अँगोछे से पानी पोंछा, बाँधने की रस्सी को भी पानी से धोना न भूला। सार में बाँधकर भूसा डाला। तब भी मन की ग्लानि दूर न हुई, तो भीतर जाकर रोटी ले आया और टुकड़े-टुकड़े करके उसे खिलाने लगा। वह कहा करता था कि जानवर अपनी बात समझा नहीं सकते, परंतु बहुत-सी बातें आदमियों से आधिक समझते हैं। इसलिए वह अनुभव कर रहा था कि बैल उसके प्रेम को अच्छी तरह ह्रदयंगम कर रहा है।

इस तरह आज इतना समय लग गया, जितना लगाना न चाहिए था। यह बात उसे उस समय मालूम हुई जब ज्वालाप्रसाद के आदमी ने आकर बाहर से पुकारा, “मोहन है?”

मोहन सुनकर सन्न-सा खड़ा रह गया। उसे शिबू पर गुस्सा आया! अगर वह पाजी बैल का उसार कर देता तो वह इस आदमी को घर थोड़े मिलता। शंकित मन से बाहर निकल कर बोला, “कौन, रामधन भैया! आओ, कुछ खा पी लो।”

रामधन ने रूखाई से कहा, “हमें फ़ुरसत नहीं है। इसी समय मेरे साथ चलो। तुम-जैसे छँटे हुए आदमी से भी किसी का पाला न पड़ा होगा। तुम्हारे पीछे फिरते-फिरते पैरों मे छाले पड़ गये, परंतु मालिक साहब के दर्शन ही नहीं होते।”

सचमुच रामधन के पैरों में छाले पड़े हुए थे, इसीसे उसका मिजाज ठीक न था । परंतु छाले पड़ने का कारण मोहन के पीछे फिरना नहीं था । एक चमार आसामी ने मुफ्त में जूते बनाकर कुछ दिन के लिए उससे छुट्टी पाने का वचन लिया था । उन जूतों ने रामधन को चलने-फिरने से ही कुछ दिन के लिए छुट्टी देकर अपने निर्माता का लेन-देन बराबर कर देना चाहा। रामधन इस समय उसी चमार को नये-नये शब्दों में याद करता चला आ रहा था । मोहन ने देखते ही समझ लिया, मामला ठीक नहीं है। चुपचाप भीतर से लाकर अँगोछा कंधे पर डाला और उसके पीछे हो लिया ।

रास्ते मे मोहन ने फसल खराब होने की बात शुरू की। किसानों का गुज़ारा किस तरह हो रहा है, इस बात की ओर संकेत किया। एक पैसे का सुभीता नहीं है, यह भी स्पष्टतः कहा। रामधन मुँह भारी किए हुए सुनता रहा। मानो उसके मुँह में भी छाले पड़ गये थे। जब उत्तर देना नितांत आवश्यक हो गया, तब संक्षेप मे कह दिया, “मालिक से कहना।”

मोहन ने कहा, “हमारे मालिक तो—”

“चुप रह दुष्ट!” रामधन ने कहा। कहने का अभिप्राय यह था—मालिक मैं नहीं हूँ। उच्चारण-भंगिमा का अभिप्राय यह था—मालिक हूँ तो मैं। “बड़ी देर की बकबक लगाए है। चुका नहीं सकता तो कर्जा लिया ही किस लिए था?”

रामधन के साथ वह ज्वालाप्रसाद की कोठी पर जा पहुँचा।

ज्वालाप्रसाद ने अपने स्वर मे संसार-भर का प्रभुत्व भर कर कहा, “वादे बहुत हो चुके। अब हमारे रुपये अदा कर दो, नहीं तो अच्छा न होगा!”

मोहन ने कहा, “मालिक की बातें! खाने को मिलता नहीं रुपये कहाँ से आएँ?”

बातों-ही-बातों मे ज्वालाप्रसाद की जीभ की ज्वाला बेहद बढ़ उठी। ‘मुर्ख’, ‘बेईमान’ आदि जितनी उपाधियों से एकदम वह निरीह मंडित हो उठा।

मोहन घर न जा सका। रुपये अदा कर दो और चले जाओ, बस इतनी ही बात थी।

शिबू ने तीसरे पहर घर आकर देखा—दद्दा नहीं है। मालूम हुआ—सवेरे ज्वालाप्रसाद के आदमी के साथ गये थे। दोपहर की रोटी खाने भी नहीं आये।

शिबू झपाटे के साथ घर से निकलकर ज्वालाप्रसाद के यहाँ जा पहुँचा। पिता को मुँह सुखाए, पसीने-पसीने एक जगह बैठा देखा। बोला, “चलो। आज रोटी नहीं खानी है?”

आवाज़ सुनकर दूर से ज्वालाप्रसाद ने कहा, “कौन है, शिबुआ? दाम लाया या यों ही लिवाने आ गया।”

शिबू ने अपने कर्कश कंठ को और भी कर्कश करके कहा, “अपनी रुपहट्टी लोगे या किसी की जान? अरे, कुछ तो दया होती! बूढ़े ने सवेरे से पानी तक नहीं पिया। तुम कम से कम चार दफ़े भोजन ठूँस चुके होगे।”

मोहन लड़के का ढंग देखकर घबरा उठा। बोला, “अरे ढोर, कुछ तो समझ की बात कर। किससे किस तरह बोलना चाहिए, आज तक तुझे यह शऊर न आया।”

“न आने दो। चलो, उठो। मैं तुम्हें यहाँ कसाई की गाय की तरह मरने न दूँगा। रामपुर की हाट (बाज़ार) मे सोमवार को बैल बेचकर उनकी कौड़ी-पाई चुका दूँगा।” कहकर शिबू ने पिता का हाथ पकड़ा और उसे झकझोरता हुआ साथ ले गया।

ज्वालाप्रसाद हत् बुद्धि होकर ज्यों का त्यों बैठे रहे। उन्होंने शिबू के जैसा निर्भय आदमी न देखा था। उनके मुँह पर ही उन्हें कसाई बनाया गया! गुस्सा की अपेक्षा उन्हें डर ही आधिक मालूम हुआ। वे भी उसी हाट में रामपुर जा रहे थे। आजकल डाकुओं का बड़ा ज़ोर था। वह शिबुआ भी तो कहीं डाकुओं में नहीं है। कैसा ऊँचा पूरा हृष्ट-पुष्ट है! बोलने में किसी का डर नहीं; चलने में किसी का बंधन नहीं। दिन-भर फिर किसी काम में ज्वालाप्रसाद का मन नहीं लगा। बार-बार उसका तेज तृप्त चेहरा उन्हें याद आता रहा।

दो दिन में ही पड़ने लगा—मानो मोहन बहुत दिन का बीमार हो। दिन-भर वह बैल के विषय में ही सोचा करता। रात को उठकर कई बार बैल के पास जाता। दिन में और लोगों के सामने अपना प्रेम पूर्णरूप से प्रकट करते हुए उसे संकोच होता है। रात के एकांत में उसे अवसर मिलता, बैल के गले से लिपटकर प्राय: वह आँसू बहाने लगता। यदि कभी शिबू उसका यह आचरण देख लेता तो उसे ऐसा जान पड़ता मानों वह कोई अपराध कर रहा है।

हाट जाने के एक दिन पहले उसने शिबू से कहा, “एक बात बेटा, मेरी मानना। बैल किसी भले आदमी को देना जो उसे अच्छी तरह रखे। दो‑चार कम मिले तो ख़याल न करना।”

शिबू बिगड़कर बोला, “तुम्हारी तो बुद्धि बिगड़ गयी है। जब देखो ‘बैल-बैल’ की रट लगाये रहते हो। मैं मर जाऊँ तो भी शायद तुम्हें बैल के जितना रंज (दुःख) न हो। बैल जिये या भाड़ मे जाये, मुझसे कोई मतलब नहीं जो ज़्यादा दाम देगा, मैं उसी को बेच दूँगा। हमारा ख़याल कौन रखता है? मैं भी किसी का न रखूँगा। उस कसाई के रुपये उसके मत्थे मार दूँ, मैं तो इतना ही चाहता हूँ, बस।”

मोहन चुपचाप सुनता रहा। थोड़ी देर बाद एक गहरी साँस लेकर वहाँ से हट गया।

जिस समय बैल की रस्सी खोलकर शिबू हाट के लिए जा रहा था, वहाँ मोहन न था। किसी काम के लिए जाने की बात कहकर वह पहले ही बाहर चला गया था।


बैल बेच कर शिबू घर लौट रहा था। रुपये उसकी अंटी में थे तो भी आज उसकी चाल मे वह तेज़ी नहीं थी, जो जाते समय थी। न जाने कितनी बातें उसके भीतर आ-जा रही थी। बैल के बिना उसे सूना-सूना मालूम हो रहा था। आज के पहले वह यह बात किसी तरह न मानता कि उसके मन में भी उस क्षुद्र प्राणी के लिए इतता प्रेम था। मनुष्य अपने आपके विषय में जितना अज्ञानी है, कदाचित् उतना और किसी विषय में नहीं है। बार-बार उसे बैल की सूरत याद आती। उसके ध्यान में आता मानो बिदा होते समय बैल भी उदास हो गया था। उसकी आँखों मे आँसू छलक आये थे। बैल का विचार दूर करता तो पिता का सूखा हुआ चेहरा सामने आ जाता। बैल और पिता मानों एक ही चित्र के दो रुख थे। लौट-फिरकर एक के बाद दूसरा उसके सामने आ जाता था। आह, उसका पिता इस बैल को कितना प्यार करता था! उसे अनुभव होने लगा कि वह बैल उसका भाई ही था। एक ही पिता के वात्सल्य-रस से दोनों पुष्ट हुए थे। जो पिता जानवर के लिए इतना प्रेमातुर हो सकता है, वह उसके लिए न जाने क्या करेगा? सोचते-सोचते उसका हृदय पिता के लिए आर्द्र हो उठा। हाय! वह अब तक अपने ऐसे स्नेहशील पिता को भी न पहचान सका। उसके हृदय का औद्दत्य आज अपने-आप पराजित हो गया था।

घने वन की छाती पर, पत्थर की पक्की सड़क, दोनों ओर के वृक्षों की छाया का उपभोग करती हुई, निर्जन और बस्ती की परवाह न करके, बहुत दूर तक चली गयी थी। दूर-दूर तक आदमी का चिन्ह तक दिखाई न देता था। बीच-बीच में कुछ हिरन छलाँगें मारते हुए सड़क पार कर जाते थे। अचानक शिबू ने देखा—एक जगह बहुत-सी बैलगाड़ियाँ ढिली हुई है। एक ओर की निर्जनता के आधार पर ही दूसरी ओर की सघनता अवलम्बित है। मानो यही दिखाने के लिए ऊँची सड़क के दोनों ओर लगातार नीची खंदकें चली गयी थी। दो-तीन सौ आदमी उन खंदियों मे चुपचाप दूर तक श्रेणीबद्ध बैठे हुए थे। शिबू ने समझा, सड़क पर साहूकार के आदमी हैं। कुछ वसूल कर लेने के लिए इन आदमियों को परेशान कर रहे है। साहूकार का विचार आते ही उसका गर्वित हृदय विद्रोही हो उठा। विचारों की शृंखला छिन्न-भिन्न हो गयी। वह तेज़ी से चलने लगा।

“कौन है, खबरदार, खड़ा रह!”

शिबू ने देखा—पुलिस के सिपाहियों की पोशाक मे बंदूकें लिए हुए पाँच आदमी हैं। मुँह कपड़े से इस तरह बाँधे हुए हैं कि सूरत साफ दिखाई न दे सके। बीच सड़क पर एक कपड़ा बिछा हुआ है। उस पर रुपये, पैसे और गहनों का ढेर लगा है। शिबू को समझने मे देर नहीं लगी—डाकू हैं, सिपाही नहीं। दिन-दहाड़े यहाँ लूट हो रही है। सड़क के नीचे खंदियों में जो लोग बैठे हैं वे लुट चुके हैं। डाकुओं के धन के साथ मानो उनकी गति और वाणी भी अपहृत कर ली है।

“हाँ, तो,” एक डाकू फिर से कड़ककर बोला, “कौन है, चला ही आ रहा है? खड़ा हो जा। रख दे जो कुछ तेरे पास हो।” शिबू ने देखा—अब रुपये जाते हैं। उसे रुपयों का मोह कभी न था। रुपया-पैसा उड़ाना ही उसका काम था! परंतु ये रुपये—ये रुपये किस तरह आये हैं, यह बात वह अभी-अभी अनुभव करता आ रहा था। एक क्षण के हिस्से में उसे पिता का सूखा हुआ चेहरा याद आया और दूसरे क्षण उस महाजन का जिसने रुपये चुकाने के लिए उन्हें तीसरे पहर तक भूखा-प्यासा रोक रखा था। ज़्यादा विचार करने का अवसर न था। वह छाती तान कर खड़ा हो गया। बोला, “मैं रुपये नहीं दूँगा।” बोलने वाला डाकू शिबू का सुदृढ़ कंठ-स्वर सुन स्तम्भित हो गया। इतने आदमी अभी‑अभी लूटे गए हैं; इस तरह तो कोई नहीं कह सका।

दूसरा डाकू बंदूक का कुंदा मारने के लिए उस पर झपटा। शिबू ने बंदूक के कुंदे को इस तरह पकड़ लिया जिस तरह सँपेरे साँप का फन पकड़ लेते हैं। अपने को आगे ठेलता हुआ वह बोला, “तुम मुझे मार सकते हो, परंतु रुपये नहीं छीन सकते। ये रुपये मेरे पिता के कलेजे के खून में तर हैं। मेरे जीते-जी महाजन के सिवा इन्हें कोई नहीं ले सकता।” यह कहकर शिबू ने अपने पूरे वेग के साथ निकल जाना चाहा। तब तक पाँचों डाकुओं ने घेरकर उसे पकड़ लिया। वह उच्च कंठ से फिर चीत्कार कर उठा, “छोड़ दो, मैं रुपया नहीं दूँगा।”

शिबू का चीत्कार सुनकर लुटे हुए लोग खंदियों में उठकर खड़े हो गये। देखने लगे—कौन है, जो प्रत्यक्ष मौत का सामना कर रहा है।

डाकुओं ने एकदम देखा—वे केवल पाँच और दो-तीन सौ आदमी उनके विपक्ष में उठ खड़े हुए हैं। उन्हें विस्मय करने का भी अवसर न मिला कि उन्होंने बंदूक के बल पर एक-एक दो-दो करके इतने आदमी कैसे लूट लिए हैं। यदि ये उजडु की तरह बिगड़ खड़े हों, तो कौन इनका सामना कर सकता है! भय और साहस संक्रामक वस्तुएँ हैं। शिबू का साहस देख कर उधर लुटे हुए लोगों का भय भी दूर हो रहा था। देखने तक का समय न था, परंतु डाकुओं ने स्पष्ट देख लिया—एक साथ सब लोगों के भाव बदल गये हैं। उन लोगों में से कुछ खंदियाँ पार करके सड़क तक भी नहीं आ सके कि डाकू बंदूकें हाथ में लिए हुए द्रुतगति से सड़क के नीचे उतर गये। लूट का माल उठाने में समय नष्ट करने की अपेक्षा अपने प्राण लेकर भागना ही उन्हें आधिक मूल्यवान प्रतीत हुआ। थोड़ी ही देर में वे लोग आँखों से ओझल हो गये।

लोगों ने आकर शिबू को चारों ओर से घेर लिया। अधिकांश स्त्री-बच्चे और पुरूष अब तक भय के मारे काँप रहे थे। रोग की तरह दूर हो जाने पर भी भय शरीर को कुछ समय के लिए नि:शक्त कर रखता है। स्त्रियाँ शिबू को आशीर्वाद दे रही थीं, “बेटा, तेरी हजारी उम्र हो!” परंतु शिबू इस समय भी अपने आपे मे न था। वह सोच रहा था कि इनमें अधिकांश ऐसे आदमी हैं, जो रुपये के लिए बुरे-से बुरे काम कर सकते हैं। रुपया ही इनका सब-कुछ है। उसी को इन्होंने इस प्रकार कैसे लुट जाने दिया?

भीड़ में से एक आदमी निकलकर शिबू के पास आया। बोला, “कौन है, शिबू माते? तुमने आज इतने आदमियों को…. ।”

शिबू ने देखा—ज्वालाप्रसाद है। शरीर पर धोती के सिवा कोई वस्त्र नहीं। डाकुओं ने रूपये-पैसे के साथ उसके कपड़े भी उतरवाकर रखवा लिए थे। उसे देखते ही उसका मुँह घृणा से विकृत हो उठा। अंटी से रुपये निकालकर उसने कहा, “बड़ी बात, शिबू माते तुम्हें आज यहीं मिल गये। लो, अपने रुपये चुकते कर लो। अब लुट जाए तो मैं ज़िम्मेदार नहीं।”

समाप्त


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Author

  • सियारामशरण गुप्त

    जन्म: 4 सितंबर, 1895

    सियारामशरण गुप्त का जन्म सेठ रामचरण कनकने के परिवार में चिरगाँव झाँसी में हुआ था। 1914 में उन्होंने अपनी पहली रचना मौर्य विजय लिखी। 1910 में इनकी पहली कविता ‘इंदु’ प्रकाशित हुई थी। उन्होंने कविताएँ, खंड काव्य, उपन्यास, निबंध, नाटक इत्यादि विधाओं में लेखन किया।

    वह प्रसिद्ध हिंदी कवि मैथलीशरण गुप्त के अनुज थे।

    प्रमुख रचनाएँ:
    खंड काव्य: मौर्य विजय (1914), अनाथ (1917), आर्द्रा (1927), विषाद (1925), दूर्वा दल (1924), आत्मोत्सर्ग (1931), पाथेय (1933), मृण्मयी (1936), बापू (1937), उन्मुक्त (1940), दैनिकी (1942), नकुल (1946), सुनन्दा और गोपिका।
    कविता संग्रह: अनुरुपा, अमृत पुत्र
    काव्यग्रंथ: दैनिकी नकुल, नोआखली में, जय हिन्द, पाथेय, मृण्मयी तथा आत्मोसर्ग।
    कहानी संग्रह: मानुषी
    नाटक: पुण्य पर्व
    उपन्यास: अंतिम आकांक्षा, नारी और गोद।
    निबंध संग्रह: झूठ-सच

    निधन: 29 मार्च, 1963

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