“अरे, दीपिका तुम…” घंटी की आवाज़ सुनकर मेघना ने दरवाज़ा खोला तो सामने दीपिका को देखकर हर्ष मिश्रित स्वर में वह कह उठी।
“दीदी, चाहकर भी मैं आपसे मिलने का समय नहीं निकाल पा रही थी। आज थोड़ा समय मिला तो चली आयी।”
“मैं समझ सकती हूँ। अंदर आओ…बताओ तुम कैसी हो, चाचीजी कैसी हैं? शिवेंद्र ने चाचाजी से पूछा था तो उन्होंने कह दिया कि अभी मत आओ, जब आवश्यकता होगी तब तुम्हें बुला लेंगे।”
“दीदी, पापा भी आपकी मजबूरी समझते हैं। मेरे आने से पहले तो सब आपने ही किया था। पापा ने दीपेश और क्रिस्टीना को भी यहाँ आने से यह कहकर मना कर दिया कि अभी दीपिका है, जब वह चली जाये तब तुम आ जाना। दीदी, पापा भी गलत नहीं हैं, सब एक साथ आ जाएँगे तो बेकार भीड़ ही बढ़ेगी, करेगा तो कोई एक ही। यही सोचकर दीपेंद्र और बच्चे भी नहीं आए। वैसे भी जितने लोग उतना ही इंफेक्शन का डर, ऊपर से उनके रहने का इंतज़ाम। फेफड़ों का ट्रांसप्लांट है, सावधानी भी आवश्यक है। वैसे भी नयी जगह, नया माहौल…सारी ज़िम्मेदारी पापा की ही होती।“
“तुम ठीक कह रही हो दीपिका… सच, घर में कोई बीमार हो तो सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जाती है। अगर गृहलक्ष्मी ही बीमार पड़ जाये तो स्थिति की कल्पना ही मुश्किल लगती है। चाचाजी ने सब सँभाल लिया वरना बहुत ही मुश्किल होती। चाचीजी जल्दी से स्वस्थ हो जाएँ, यही कामना है। बहुत थकी-थकी लग रही है। तू बैठ, मैं चाय बनाकर लाती हूँ,” कहते हुये मेघना किचन की ओर चल दी।
“दीदी, पापा तो अस्पताल में माँ के साथ ही रहते हैं किंतु मैं आती-जाती रहती हूँ। इंफेक्शन के डर से मैं भी माँ के कमरे में अभी तक नहीं गयी हूँ, जाती भी हूँ तो बाहर से ही देखकर आ जाती हूँ या पापा विडियो कॉल करके माँ से बातें करवा देते हैं। माँ तीन दिन पश्चात डिस्चार्ज होकर घर आ जाएँगी इसलिये आज घर को सैनिटाइज़ करवा रहे हैं। सैनिटाइज़ करने वाली एजेंसी ने सात‑आठ घंटे घर को बंद रखने के लिये कहा है अतः सोचा आज आपसे मिल आती हूँ। कल से घर को माँ के अनुसार व्यवस्थित करना पड़ेगा, फिर आने का समय मिले या न मिले। वैसे भी इस शहर में आपके अलावा हमारा है ही कौन? पापा तो यही कहते रहते हैं कि हम यहाँ मेघना की वजह से ही आये हैं,” मेघना के पीछे आते हुये दीपिका ने कहा।
“यह तो चाचाजी का बड़प्पन है। हमने तो कुछ नहीं किया, सब वही कर रहे हैं।”
“दीदी, आप ऐसा क्यों कहती हैं? जितना आपने और जीजू ने माँ-पापा के लिए किया, उतना तो मैं और दीपेश भी नहीं करपाते। जब पापा को पता चला कि हैदराबाद में कृष्णा इंस्टीटियूट ऑफ मेडिकल साइंस फेफड़ों के ट्रांसप्लांट के लिये न केवल अच्छा है वरन् उसका सक्सेस रेट भी अधिक है, तब पापा ने आपसे अस्पताल के बारे में पता लगाने के लिए कहा। तब आपने ही ‘किम्स अस्पताल’ की सारी डिटेल्स पापा को भेजी थीं, आपके अनुमोदन पर ही पापा ने मेरठ से यहाँ आने का निर्णय लिया। पापा-माँ के मेरठ से आने से पहले आपने ही पापा-माँ के लिये घर ढूँढा, उनके अनुसार उसे पूरी तरह सेट किया। पापा जब पहली बार माँ को डॉक्टर को दिखाने गये थे तब आप और जीजू ही तो साथ में गये थे। यहाँ तक कि जब ऑपरेशन के समय माँ को खून की आवश्यकता पड़ी थी तब आपने और जीजू ने ही तो खून दिया ही था अतिरिक्त खून के लिए डोनर का भी इंतज़ाम किया। सच तो यह है दीदी, अगर आप यहाँ न होतीं तो पापा हैदराबाद आते ही नहीं… शायद दिल्ली में ही ऑपरेशन की सोचते। आप मानें या न मानें, पापा को मुझसे और देवेश से अधिक आप पर भरोसा है।”
“अपने ही तो अपनों के काम आते हैं। इसमें एहसान मानने की क्या बात है? माँ-पापा के पश्चात चाचा-चाची ही तो मेरे सब कुछ हैं अगर उन्होंने मुझे अपना प्यार न दिया होता तो मैं पता नहीं कहाँ और कैसी जिंदगी जी रही होती!” कहते हुये मेघना की आँखें छलछला आयीं।
“दीदी, आप गैर नहीं, हमारी अपनी ही तो हैं। माँ-पापा ने अपना कर्तव्य निभाया, कोई अहसान नहीं किया,” दीपिका ने उसकी मनःस्थिति समझते हुये कहा।
“दीपिका तुम, कब आयीं? बहनजी कैसी हैं?” सासूमाँ ने अपने कमरे से बाहर आते हुये पूछा।
“आंटीजी, वह दो-तीन दिनों में डिस्चार्ज होकर घर आ जाएँगी।”
“यह तो बहुत अच्छी खबर है। मैं तो रात-दिन यही प्रार्थना करती रहती हूँ कि ईश्वर उन्हें जल्दी से जल्दी ठीक करे।”
“माँजी, आप चाय पीएँगी, मैं बना रही हूँ।” मेघना ने पूछा।
“नहीं बेटा, तुम तो जानती ही हो कि मैं ज़्यादा चाय नहीं पीती,” कहते हुये उन्होंने डायनिंग टेबिल पर रखा अपना चश्मा उठाया और पेपर लेकर बाहर बरामदे में चली गयीं। यह उनका रोज़ का नियम है।
मेघना ने चाय के साथ उसकी पसंद का खाखरा उसके सामने रखा।
“दीदी, खाखरा…बहुत दिनों बाद खाऊँगी।”
“क्यों, क्या तुम्हारे अमेरिका में नहीं मिलता?”
“वहाँ भी अब सब मिलने लगा है पर बच्चों को अब इंडियन फूड कहाँ पसंद आता है! उन्हें तो बस वेस्टर्न फूड ही चाहिये। सच तो यह है दीदी, दीपेंद्र भी अब पूरी तरह अमेरिकन ही हो गये हैं। शेफाली और शशांक को तो उनके वहाँ पैदा होने के कारण अमेरिकन नागरिकता मिल गयी है। दीपेंद्र ने भी अमेरिका की नागरिकता के लिये अप्लाई कर दिया है। वह मुझसे भी अमेरिकन नागरिकता के लिए अप्लाई करने के लिये कह रहे हैं पर मेरा मन नहीं करता। अभी भी न जाने क्यों मुझे ऐसा लगता है कि एक न एक दिन दीपेंद्र का मन परिवर्तित होगा और हम भारत लौट आएँगे।”
मेघना, दीपिका के मन का द्वंद्व समझ सकती थी पर उसके हाथ में कुछ नहीं था जो भी निर्णय करना था, उन्हें ही करना था। मन बदलने के लिये उसने उससे शेफाली और शशांक के बारे में पूछना शुरू किया…बहुत सी कही-अनकही बातें उनके बीच होती रहीं। खाना भी हो गया किंतु दीपिका का मन बातों से नहीं भरा…बचपन से लेकर अब तक यादों की न जाने कितनी पोटली खुल चुकीं थीं, आखिर कई वर्षो के अंतराल के पश्चात् उन दोनों बहनों को यूँ निश्चिंतता से बैठने और बातें करने का अवसर मिला था। इस बीच न जाने कितनी बार वे हँसी और न जाने कितनी बार उनकी आँखें बरसने को आतुर हुईं। अंततः शाम की चाय पीकर दीपिका ने कैब बुक कराते हुए उससे कहा, “दीदी, अभी जाने का तो मन नहीं कर रहा है किंतु अब चलती हूँ। कामवाली भी आने वाली होगी, साफ‑सफाई करवाकर, घर को थोड़ा व्यवस्थित करना शुरू करूँ।”
“दीपिका, अगर मेरी आवश्यकता हो तो बता देना, संकोच मत करना, मैं आ जाऊँगी,” दीपिका के चलते ही उसने कहा।
“अवश्य दीदी। आप ही हमारा सम्बल हैं।”
दीपिका को विदा करके घर के अंदर प्रवेश करते ही, वह आराम करने के इरादे से पलंग पर लेट गयी। दीपिका के साथ यादों की पोटली से निकलती अनेक यादों में से एक याद…एक घटना को वह सायास दबाकर रखे हुये थी। वह उसके जाते ही बाहर आने को आतुर हो उठी। उसे वह पल याद आये जिन्होंने उसकी जिंदगी ही बदल दी थी…
याद आया उसे वह भयानक कार एक्सीडेंट…जिसका ज़ोरदार धमाका आज भी उसे थरथरा देता है। उस समय वह मात्र दस वर्ष की थी। गर्मी की छुट्टियों में पापा और चाचा ने हरिद्वार, ऋषिकेश, देहरादून, मसूरी घूमने का कार्यक्रम बनाया था। दिल्ली से दोनों परिवार अपनी-अपनी गाड़ियों से चल पड़े। हफ्ते भर उन्होंने खूब मस्ती की। हरिद्वार में हर की पैड़ी में गंगास्नान किया। ऋषिकेश में लक्ष्मण झूला, गीता भवन, देहरादून में सहस्त्रधारा तथा मसूरी में कैम्टीफॉल देखा। मसूरी झील में बोटिंग भी की। मसूरी की माल रोड पर घूमते हुए उसे ठंड लगने लगी थी जिसके कारण उसने स्वयं को मम्मी के आँचल में छिपा लिया तथा उनसे चिपककर चलने लगी। उसे मम्मी के पल्लू में छिपा देखकर, छोटे होने के बावजूद पुलक उसे मम्मी की पूँछ कहकर चिढ़ाने लगा किंतु वह क्या करती, उसे स्वेटर पहनने के बावजूद ठंड लग रही थी। अंततः उनके लौटने का दिन आ गया। पापा गाड़ी चला रहे थे। दिल्ली पहुँचने ही वाले थे कि धुँधलका छाने लगा। सड़क के किनारे बने ढाबे के पास पापा ने खाने के लिये गाड़ी रोकी। माँ ने मना किया कि अँधेरा हो रहा है हमें दिन ही दिन में दिल्ली पहुँच जाना चाहिये पर पापा ने कहा, “सीमा, खाना खाकर चलते हैं वरना तुम्हें घर जाकर खाना बनाना पड़ेगा। तुम भी थकी होंगी। आज तुम भी आराम कर लो, कल से घर सँभाल लेना।”
बात तो सच थी। माँ ने पापा की बात स्वीकार कर ली। उनकी गाड़ी को रुका देखकर, चाचा ने भी गाड़ी रोक दी। पापा ने अपना मंतव्य चाचा को बताया तो वह भी तैयार हो गये। खाना खाकर वे फिर चल पड़े। अभी कुछ ही दूर पहुँचे थे कि सामने से एक ट्रक आता दिखाई दिया। ट्रक जैसे ही पास आया, अचानक सड़क पर एक गाय आ गयी। उसने गाय को बचाने के लिये कट लिया तो वह दीपिका की कार से टकरा गया। चीख पुकार मच गयी… कार में अँधेरा, असहनीय दर्द…जब वह होश में आयी तो उसने स्वयं को अस्पताल के बैड पर लेटे पाया। उसके पास चाची बैठी थीं। उसके सिर में पट्टी बँधी थी तथा हाथ में बैंडेज…
उसे होश में आया देखकर चाची ने पूछा, “बेटी, तू कैसी है?”
“चाची, आप…माँ-पापा कहाँ हैं? पुलक कहाँ हैं? मैं यहाँ कैसे?” अचानक उसकी आँखों के सामने पूरा दृश्य कौंध गया।
“बेटा, वे भी ठीक हैं। तू ठीक है न…” कहते हुये चाची ने उसके सिर पर प्यार से हाथ फेरा।
“चाची, आप सच कह रही हैं न…हमारी कार का एक्सीडेंट हुआ था। माँ-पापा और पुलक कहाँ हैं?” वह भयावह दृश्य याद आते ही उसने पलंग से उतरकर चाची को झकझोरते हुये कहा। इसके साथ ही एकाएक उसे अपने हाथ और सिर में दर्द महसूस हुआ। वह वहीं बैठ गयी।
उसकी स्थिति देखकर चाची ने उसे अपने अंक में भर लिया। उनकी छलछलाती आँखों को देखकर वह सब समझ गयी थी। उस समय वह मात्र दस वर्ष की थी। उस एक्सीडेंट ने उसके माँ-पापा के साथ उसके छह वर्षीय भाई पुलक को भी छीन लिया था। पूरी घटना उसके मन में ऐसे पैठ गयी है कि इतने वर्षो पश्चात् भी उसे ऐसा लगता है कि मानो कल की ही बात हो। ठीक होने पर उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर दिया गया। चाचा-चाची उसे मेरठ अपने साथ ले आये। चाचा-चाची उसे भरपूर प्यार देने की कोशिश करते किंतु उसका मनमस्तिष्क इस स्थिति के लिये स्वयं को तैयार नहीं कर पा रहा था। दीपिका उससे चार वर्ष छोटी थी जबकि दीपेश दो वर्ष छोटा था। चाचाजी ने उसका उनके स्कूल में ही दाखिला करवा दिया। धीरे-धीरे चाचा-चाची के प्यार तथा दीपिका और दीपेश के साथ ने उसके दिल के घावों में मलहम लगाना प्रारम्भ कर दिया था। सच कहें तो समय ने उसे इस नयी स्थिति के साथ ढालने के लिये मजबूर कर दिया या इसके अतिरिक्त उसके पास कोई अन्य उपाय ही नहीं था। सबसे बड़ी बात यह थी चाचाजी-चाचीजी ने उसे कभी अपने माँ-पापा की कमी महसूस नहीं होने दी। उन्होंने उसमें तथा अपने बच्चों दीपिका और दीपेश में कोई भेद-भाव नहीं किया, अपना बच्चा समझकर ही उन्होंने उसकी परवरिश की थी। साथ ही दीपिका और दीपेश ने भी उसे बड़ी बहन जैसा ही मान दिया।
समय के साथ उसने बी.टेक कर लिया वहीं दीपिका को मेडिकल में एडमिशन मिल गया। दीपेश बी.टेक करके एम.एस. करने अमेरिका चला गया। चाचा-चाची ने उसका विवाह मल्टिनेशनल कम्पनी में कार्यरत शिवेंद्र से कर दिया। वह हैदराबाद आ गयी। उसे भी अपनी योग्यतानुसार वहीं नौकरी मिल गयी। उनकी ज़िंदगी सीधी सपाट राह पर चल पड़ी। शिवेंद्र के माँ-पापा यहीं थे अतः वह हैदराबाद से बाहर जाना ही नहीं चाहते थे अतः वे हैदराबाद के वासी हो गये।
कुछ ही दिनों में दीपिका का विवाह भी कार्डियोलॉजिस्ट दीपेंद्र से हो गया। वह बहुत ही महत्वाकांक्षी थे। वे आगे की पढ़ाई के लिए अमेरिका चले गये। उन्होंने अमेरिका को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया। दीपिका भी वहीं काम करने लगी। दीपेश ने एम.एस. करने के पश्चात् वहीं नौकरी कर ली। बाद में उसने वहीं की एक लड़की क्रिस्टीना से विवाह भी कर लिया। चाचा-चाची दीपिका और दीपेश के अमेरिका में बस जाने से खुश नहीं थे किंतु वे बच्चों की उड़ान में बाधक नहीं बनना चाहते थे अतः मन में संतोष कर लिया। दीपेश और दीपिका ने उनसे वहीं उनके साथ रहने का आग्रह किया किंतु वे वर्ष में छह महीने से अधिक वहाँ रह नहीं सकते थे। उनके आग्रह पर वे दो बार हो भी आये थे पर उन्हें वहाँ का दाना-पानी, आबोहवा पसंद नहीं आयी। उनका कहना है उस देश में भले ही ढेरों सुख-सुविधाएँ हों, पर हमारे देश की मिट्टी में जो रिश्तों की गर्माहट है, एक दूसरे के लिये जो प्रेम है, वह वहाँ नहीं है। कुछ दिन रहने के लिये वह देश अच्छा है पर हम जैसे लोग सदा वहाँ नहीं रह पाएँगे। कभी-कभी वह उनके पास जाकर, उनके दिल के घाव को भरने की कोशिश करती किंतु वह भी अपने पारिवारिक दायित्वों से बंधी हुई थी।
इस बीच पता चला कि चाचीजी की तबियत ठीक नहीं चल रही है। उनको साँस लेने में परेशानी होने लगी है। वह भी उनकी तरफ से चिंतित रहने लगी थी क्योंकि इसके पहले उन्हें इस तरह की कोई बीमारी नहीं थी। अब यह अचानक आयी बीमारी…उस पर वे दोनों अकेले। अपने पालकों के प्रति चिंता थी अतः अब वह हर दूसरे तीसरे दिन उनसे बात कर उनका हालचाल लेने लगी। एक दिन उसने फोन किया तो चाचाजी ने कहा, “बेटी, आज मैं तेरी चाची को अस्पताल लेकर गया था। डॉक्टर ने कुछ टेस्ट लिखे हैं, कल तक रिर्पोट मिल जानी चाहिये। सारी रिर्पोट लेकर परसों फिर डॉक्टर के पास जाएँगे, देखो डॉक्टर क्या बताते हैं!”
“सब ठीक ही होगा चाचाजी, आप चिंता न करें,” उसने कहा।
“अच्छा बेटी, फोन रखता हूँ,” कहकर चाचाजी ने फोन काट दिया।
वह पहले भी कम ही बातें करते थे। उसकी चाचीजी से ही सारी बातें होती थीं किंतु बीमारी के कारण अब चाचीजी से भी कम ही बातें हो पाती थीं। दो दिन पश्चात् उसने चाचीजी का हाल जानने के लिये फोन किया। फोन चाचाजी ने ही उठाया…
“चाचाजी, आज आप चाचीजी की रिर्पोट लेकर, उन्हें दिखाने डॉक्टर के पास जाने वाले थे। डॉक्टर ने चाची के बारे में क्या बताया?”
“बेटी, उनको सारकोडाइसिस नामक बीमारी हो गयी है।”
“सारकोडाइसिस! यह कौन सी बीमारी है?” उसने आश्चर्य से पूछा।
“बेटी, डॉक्टर कह रहे थे कि इस बीमारी में प्रभावित हिस्से में सूजन युक्त कोशिकाएँ एक साथ जमा होने लगती हैं जिसके परिणाम स्वरूप वहाँ गाँठ बनने लगती है। शरीर के जिस हिस्से में यह गाँठे बनती हैं, उस हिस्से के आकार में बदलाव होने लगता है। इसके साथ ही शरीर के उस भाग की कार्यप्रणाली में अंतर आने लगता है। यह बीमारी शरीर के किसी भी भाग जैसे फेफड़े, आँख, लीवर, स्किन, हृदय को संक्रमित कर सकती है। कभी-कभी इसका असर मस्तिष्क पर भी होता है। इस बीमारी ने तुम्हारी चाची के फेफड़े को संक्रमित किया है अतः इनको साँस लेने में परेशानी हो रही है।”
“चाचाजी, मैं आ जाऊँ,” उन्हें परेशान देखकर उसने कहा।
“बेटी, तू आकर क्या करेगी? जो करना है वह तो डॉक्टर ही करेगा। वैसे मिलना हो तो आ जा, तेरा ही घर है। अच्छा फोन रखूँ, तेरी चाची को दवा देनी है,” कहकर उन्होंने फोन रख दिया था।
चाचाजी बहुत परेशान लग रहे थे… वह दिलासा देने के अतिरिक्त कर भी क्या सकती थी। चाचीजी का दिल्ली के एम्स में इलाज चल रहा था। कभी लगता था कि वह ठीक हो रही हैं तो कभी लगता था कि उनका स्वास्थ्य गिरता जा रहा है। अब उनको अकेले घर छोड़ने में भी चाचाजी को डर लगने लगा था क्योंकि एक दिन वह चलते-चलते गिर गयीं, उनकी कलाई में चोट आयी। डॉक्टर को दिखाया तो माइनर फ्रेक्चर निकला। तीन हफ्ते के लिये प्लास्टर चढ़ गया। फ्रेक्चर का समाचार सुनकर वह और शिवेंद्र गये किंतु बच्चों और सासू माँ को छोड़कर वे भी कितने दिन रहते। चाचाजी ने चाचीजी की देखभाल के लिये दिन में एक नर्स को रख लिया।
इसी बीच चाचाजी सेवानिवृत्त हो गये। चाचीजी की हालत और बिगड़ने लगी थी। कुछ दूर चलने में ही उनकी साँस फूलने लगती, उन्हें रुकना पड़ता था। उनकी हालत को देखकर चाचाजी उन्हें दिखाने ले गये। डॉक्टर ने उनके फेफड़ों का सी.टी. स्कैन तथा पी.एफ.टी. टेस्ट करवाया गया तो पता चला कि उनका एक फेफड़ा पूरी तरह खराब हो गया है तथा दूसरा अस्सी प्रतिशत ही ठीक है। डॉक्टर ने दवाओं के साथ उन्हें ऑक्सीजन सिलेंडर रखने की सलाह दी जिससे कभी ऑक्सीजन लेवल कम हो, तो ऑक्सीजन तुरंत दी जा सके।
इसी बीच कोरोना शुरू हो गया। चाचा-चाचीजी ने सावधानी के लिये घर से निकलना बंद कर दिया। नर्स को भी हटाना पड़ा। चाची के स्वास्थय के कारण चाचाजी उनकी सहायता करने की कोशिश करते किंतु चाचीजी को चाचाजी का काम करना अच्छा नहीं लगता था। वह भी उनके साथ काम करने के लिये उठ जातीं किंतु शीघ्र ही थककर बैठ जातीं। ऐसे ही क्षणों में एक बार जब उसने फोन किया तब उन्होंने कहा, “बेटी, तेरे चाचाजी घर का सारा काम करते हैं। मैं चाहकर भी कुछ नहीं कर पाती, अगर कुछ करने की कोशिश करती हूँ तो इतनी हाँफने लगतीं हूँ कि तुम्हारे चाचाजी को ऑक्सीजन लगानी पड़ जाती है। उनका हाथ बँटाने के चक्कर में मैं उनका काम और बढ़ा देती हूँ। मैं उन पर बोझ नहीं बनना चाहती बेटा, पर क्या करूँ? मैं ज़िंदा लाश बनती जा रही हूँ। ईश्वर ने मुझे ज़िंदा ही क्यों रखा है?” कहते हुए वह हाँफने लगीं।
“बेटी, इसकी बात पर ध्यान मत देना। ये तो ऐसे ही परेशान होती रहती है। थोड़ा बहुत घर का काम कर देता हूँ तो इसे बुरा लगने लगता है। बेटी, इस उम्र में अगर हम एक दूसरे का साथ नहीं देंगे, केयर नहीं करेंगे, तो कौन करेगा? देख, तुझसे बात करते-करते हाँफने लगीं…कितनी बार कहा है इतना टेंशन लेना उचित नहीं है। अब तू ही इसे किसी दिन समझाना। अच्छा फोन रखता हूँ, ऑक्सीजन लगा दूँ,” कहते हुये चाचाजी ने फोन रख दिया।
उस दिन वह अनकिये अपराध के लिये अपराधबोध से भर उठी थी। घीरे-धीरे चाचीजी की तबीयत और गिरने लगी। कोरोना के बढ़ते केसेस के कारण इन्फेक्शन के डर से चाचाजी उन्हें अस्पताल भी नहीं ले जाना चाहते थे। डॉक्टर को दिखाने न जा पाने की वजह से जब दवाएँ खत्म होतीं तब डाक्टर द्वारा लिखी दवाएँ मंगवा लेते। वही दवाइयाँ चलती रहीं। ऐसे ही एक वर्ष गुजर गया। एक दिन चाचीजी खाना खाकर उठीं तो साँस ही नहीं ले पा रहीं थीं, उनकी ऐसी दशा देखकर चाचाजी ने उन्हें ऑक्सीजन सिलेंडर लगा दिया। ऑक्सीजन लेवल देखा तो वह 80 दिखा रहा था। ब्लडप्रेशर नापा तो वह भी कम था। अब उन्हें अस्पताल ले जाने के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय ही नहीं था। चाचाजी ने एम्बुलेंस बुलवाई और उन्हें अस्पताल लेकर गये। फिर से एक बार सारे टेस्ट हुये। इस बार फेफड़े की क्षमता और कम हो गयी थी। डॉक्टर ने कह दिया कि अब फेफड़ों के रिप्लेसमेंट के अतिरिक्त अन्य कोई उपचार नहीं है। ऑक्सीजन के जरिये जीवन को लम्बा तो खींचा जा सकता है किंतु ज़िंदगी नहीं जी जा सकती।
रिप्लेसमेंट करवाना इतना आसान नहीं है वह भी फेफड़ों का… फेफड़ों के रिप्लेसमेंट की सफलता का आँकड़ा भी कम है इसके अतिरिक्त डोनर भी मिलना चाहिये। किडनी के रिप्लेसमेंट में तो किसी ज़िंदा आदमी की भी किडनी ली जा सकती है क्योंकि एक किडनी पर भी इंसान ज़िंदा रह सकता है जबकि फेफड़ा किसी मृत व्यक्ति का ही लिया जा सकता है। आखिर चाचाजी के पूछने पर माँ का इलाज करने वाले डॉक्टर ने बताया कि भारत में कई अस्पतालों में फेफड़ों का रिप्लेसमेंट होता है किंतु फेफड़ों के रिप्लेसमेंट के लिये हैदराबाद का ‘किम्स अस्पताल’ अच्छा है तथा उसका सक्सेस रेट भी अच्छा है। मेघना और शिवेंद्र हैदराबाद में ही हैं, सोचकर अंततः चाचाजी ने चाचीजी के फेफड़ों का रिप्लेसमेंट ‘किम्स अस्पताल’ में ही कराने का निर्णय करते हुए उससे तथा शिवेंद्र से अस्पताल के बारे में पता लगाने के लिये कहते हुए चाची की सारी रिपोर्ट भी मेल पर उन्हें भेज दीं। वह और शिवेंद्र किम्स अस्पताल गए। सम्बन्धित विभाग में सम्बन्धित डॉक्टर को चाचीजी की सारी रिपोर्ट दिखाईं। सारी रिपोर्ट देखकर डॉक्टर ने कहा कि आप पेशेंट को बुला लीजिये। चैकअप के बाद ही हम निश्चिंतता से कह पाएँगे कि बीमारी दवाओं से भी ठीक हो सकती है या रिप्लेसमेंट करवाना ही पड़ेगा। अगर रिप्लेसमेंट करवाना पड़ा तब पहले तो डोनर मिलना चाहिये। कभी-कभी डोनर मिलने में भी महीनों लग जाते हैं क्योंकि अभी हमारे भारत में अंगदान की प्रथा का चलन बहुत कम है। अगर डोनर मिल गया, ऑपरेशन हो गया तब भी मरीज़ को रिकवर होने में काफी समय लग जाता है अतः उन्हें कुछ महीने यहीं रहना होगा। डॉक्टर के साथ हुई सारी बातों के साथ ऑपरेशन में होने वाले खर्च के बारे में चाचाजी को बताया तो उन्होंने कहा, “पूरी ज़िंदगी कमाया किसलिये है! तुम्हारी चाची ठीक हो जाएँ बस यही मेरे जीवन का उद्देश्य है लेकिन बेटी अपनी चाची को खर्च के बारे में कुछ मत बताना वरना वह कभी तैयार नहीं होगी। वह तो अब भी कहती रहती है… क्यों मेरे ऊपर इतना खर्च कर रहे हो? इस कष्ट से तो अच्छा है मेरा मर जाना। रोक दीजिये सारा ट्रीटमेंट, मुझे मर जाने दीजिये।”
इसके साथ ही चाचाजी ने उन्हें घर ढूँढने के लिये कहा। चाचाजी की इस पेशकश पर शिवेंद्र ने जब उनसे अपने घर रहने के लिये कहा तब उन्होंने कहा, “बेटा, तुम तो जानते हो, कितना क्रिटिकल ऑपरेशन है। महीना दो महीना की बात होती तब भी ठीक था पर तुम ही कह रहे हो कि न जाने कितने महीने लगेंगे। तुम्हारे अपने भी दायित्व हैं अतः अलग रहने व्यवस्था हो जाए तो उचित रहेगा।”
घर मिलते ही वे यहाँ आ गये। चाचीजी का ‘किम्स अस्पताल’ में चैकअप करवाया तो उन्होंने भी कहा कि इस स्थिति में फेफड़ों को रिप्लेस ही करवाना पड़ेगा। अंततः रिप्लेसमेंट की पूरी तैयारी हो गयी। पैसा एडवांस में जमा कर दिया गया। डॉक्टर ने कहा कि जैसे ही डोनर मिलेगा वह सूचित करेंगे। दीपिका ने भी आने की बुकिंग करवा ली थी। अभी उसके आने में हफ्ता भर बाकी था कि अस्पताल से फोन आया कि मरीज को जल्दी लेकर आइये, डोनर मिल गया है। चाचाजी और शिवेंद्र चाचीजी को लेकर अस्पताल गये। ऑपरेशन की पूरी तैयार कर ली गयी। जब डॉक्टर ने डोनर का फेफड़ा चैक किया तब उसे लगा कि यह फेफड़ा मरीज़ को लगाने के लिये उपयुक्त नहीं है। चाचीजी घर लौट आयीं। जब उसे शिवेंद्र ने यह बात बताई तो सुनकर बहुत अच्छा लगा…सच मेडिकल प्रोफेशन सिर्फ मरीज़ को लूटने या कमाई का ज़रिया ही नहीं है वरन् मरीज की सलामती भी चाहता है। हाँ, कुछ अपवाद अवश्य हो सकते हैं।
दीपिका के आने से अब उसका जाना कम हो गया था। सिर्फ फोन से ही हालचाल लेती रहती थी। एक दिन दीपिका का फोन आया, “दीदी, माँ को अस्पताल ले जा रहे हैं। इस बार सब ठीक हो, यही कामना है।”
“चिंता मत करो, सब ठीक होगा…हम भी पहुँच रहे हैं।”
“ईश्वर हम सबकी सुन ले…दीदी अब फोन रखती हूँ,” कहकर उसने फोन रख दिया।
वह और शिवेंद्र भी अस्पताल पहुँच गए। डॉक्टर ने 4-5 यूनिट ब्लड का इंतज़ाम करने के लिए कहा। वैसे तो ब्लड का इंतज़ाम ब्लड बैंक से मरीज़ के ब्लड ग्रुप के अनुसार किया जाता है किंतु डोनर तो चाहिए ही। उसने, शिवेंद्र और दीपिका ने तो ब्लड दिया ही, शिवेंद्र ने अपने दो मित्रों को भी बुला लिया। चाची के ऑपरेशन थियेटर में जाने के लगभग 12 घंटे के पश्चात डॉक्टर का मैसेज आया कि ऑपरेशन सफल रहा है। चाची जी को रिकवरी रूम में शिफ्ट कर दिया गया। माँ अकेली थीं अतः वह और शिवेंद्र लौट आए।
उसके पश्चात वह दीपिका से ही बातें करके चाची जी का हालचाल लेती रहती थी। दस दिन उन्हें आई.सी.यू. में रखकर प्राइवेट रूम में शिफ्ट कर दिया गया। वीडियो कॉल करके चाचाजी ने चाचीजी से उसकी बात करा दी थी लेकिन इंफेक्शन के डर से वह किसी को कमरे में नहीं आने दे रहे थे। धीरे-धीरे चाचीजी की बाहरी ऑक्सीज़न के प्रति निर्भरता कम होती जा रही थी, यह सुनकर उसे अच्छा लग रहा था। धीरे-धीरे करके आज चाचीजी के ऑपरेशन के 25 दिन हो गये हैं।
बर्तनों की आवाज़ सुनकर उसके विचारों में ब्रेक लगा…वह बाहर आयी, देखा माँजी किचन में चाय बना रही हैं।
“माँजी, आप मुझे बुला लेतीं, मैं बना देती।”
“तू सुबह से लगी है, थक गयी होगी…चाय ही तो बना रही हूँ, तेरे लिये भी बना दूँ।”
“नहीं माँजी, अभी दीपिका के साथ पी थी। आप सो रही थीं इसलिये आपको नहीं जगाया था।”
उन्हें लड़खड़ाती चाल से चाय का कप लेकर आते देखकर अचानक उसे लगा जब चाचाजी, चाचीजी के फेफड़े बदलवा सकते हैं तो वह माँजी के घुटने क्यों नहीं बदलवा सकती! आजकल वह रोज़ ही दर्द की दवा खाने लगी हैं। पिछली बार जब डॉक्टर को दिखाने गये थे तब डाक्टर ने उन्हें दर्द की दवा खाने से यह कहकर मना किया था कि दर्द की दवाओं की अधिक मात्रा किडनी को नुकसान पहुँचा सकती है। उस समय डॉक्टर ने शिवेंद्र तथा उससे कहा भी था कि आजकल तो घुटनों का ऑपरेशन आम बात है। आप माँजी का ऑपरेशन करवा दीजिये जिससे उन्हें दर्द से मुक्ति मिल सके।
उस समय शिवेंद्र और उसने अपने काम की वजह से डॉक्टर की बात पर ध्यान नहीं दिया था किंतु अब और नहीं। पिताजी की मृत्यु के पश्चात् अब माँ जी हमारी ज़िम्मेदारी हैं। वह सिसककर ज़िंदगी जिएँ, यह तो उचित नहीं हैं, जब वह और शिवेंद्र अच्छा खासा कमा रहे हैं। वह आज ही शिवेंद्र से बात करेगी।
उसकी बात सुनकर, शिवेंद्र ने अपने मित्र से बात की जिसकी माताजी के घुटनों का कुछ महीने पूर्व ही ऑपरेशन हुआ था। वह अब ठीक थीं। उस मित्र ने अपोलो अस्पताल का नाम लिया। उन्होंने माँजी का ऑपरेशन उसी अस्पताल में, उन्हीं डाक्टर से करवाने का निर्णय ले लिया। वे माँजी को डॉक्टर के पास लेकर गये। उन्होंने उनके घुटनों का एक्स रे करवाया तथा एक्स रे देखकर उन्होंने भी दोनों घुटने बदलवाने की सलाह दी। उनकी सहमति मिलते ही डॉक्टर ने उन्हें घुटने के इमप्लांट दिखाते हुए उनसे सलेक्ट करने के लिये कहा। उन्हें आश्चर्य हुआ कि दोनों घुटने के ऑपरेशन के चार्जेज़ तीन लाख से आठ नौ लाख थे। सामान्य इमप्लांट की अलग कीमत थी जबकि खिलाड़ियों के लिये लगाने वाले घुटने की अलग कीमत… जैसा घुटने का इमप्लांट उसी के अनुसार उसकी कीमत। आखिर उन्होंने फ्लैक्सीबल इमप्लांट चुना जो माँजी की उम्र के लिये डॉक्टर के अनुसार उचित था। उनके घुटना सलेक्ट करने के पश्चात डॉक्टर ने ऑपरेशन की डेट दे दी तथा एक दिन पहले एडमिट होने के लिये कहा। ऑपरेशन में होने वाले खर्चे तथा रूम के लिये अस्पताल के काउंसिलर से बात करने को कहा। उनके द्वारा सलेक्ट इमप्लांट तथा प्राइवेट रूम का पैकेज उसने छह लाख बताया।
“इतना पैसा!” मेघना ने काउंसिलर के कमरे से बाहर आते हुए कहा।
“जब फाइव स्टार की सुविधा लेंगे तब पेमेंट भी उसी के अनुसार करना पड़ेगा। तुमने देखा नहीं जैसा रूम उसी के अनुसार ऑपरेशन का खर्चा,” शिवेंद्र ने सहज भाव से कहा।
आखिर माँजी को निश्चित तिथि पर एडमिट करा दिया। एक बार फिर उनके सारे टेस्ट हुए। ई.सी.जी., इको, एक्स रे, डायबिटीज़ का टेस्ट इत्यादि। डॉक्टरों से उनके स्वास्थय के बारे में क्लेयरेंस मिलने पर अंततः माँजी के घुटने का ऑपरेशन हो गया। उन्हें दूसरे दिन ही वॉकर की सहायता से खड़ा कर दिया तथा कुछ कदम चलवाया भी…पाँच दिन के पश्चात् वह घर आ गयीं। डॉक्टर ने पंद्रह दिनों पश्चात् टाँके काटने के लिये बुलवाया। उनकी फिजियोथेरेपी अस्पताल में ही शुरू हो गयी थी, अब घर में भी होने लगी। अभी वह वॉकर से ही चल रही हैं किंतु चाल में बहुत फर्क आ गया है। अभी दर्द तो है पर माँजी बेहद खुश हैं। बच्चों की उनके प्रति चिंता ने उनके मन में खुशी भर दी है।
अभी वह खाना खाकर बैठी ही थी कि चाचाजी का फोन आ गया…वह बोले, “तुम्हारी चाची अपनी बहनजी से बातें करना चाहती हैं,” कहते हुये उन्होंने चाची को फोन दे दिया।
“कैसी है बेटी?”
“चाची, मैं ठीक हूँ। आप कैसी हैं?”
“अब मैं पहले से काफी ठीक हूँ।”
“आपको सहजता से बातें करते देखकर आज बहुत अच्छा लग रहा है।”
“बेटा, तू सच कह रही है, अब मुझे ऑक्सीजन भी नहीं लेनी पड़ रही है। यह सब डॉक्टरों की कुशलता, तुम्हारे चाचाजी की तपस्या और तुम बच्चों की मेहनत तथा मेरे शुभचिंतकों की दुआ का फल है जो मुझे नयी ज़िंदगी मिली है। अब तो मैं घर के बाहर कॉरिडोर में भी टहलने लगी हूँ।”
“चाची, यह तो बहुत अच्छा है। मैं आपसे मिलने आती पर…”
“बेटी, मैं जानती हूँ। अभी तू बहिनजी का ख़याल रख। हम दोनों ही किसी दिन आ जाएँगे। डॉक्टर ने अब बाहर निकलने की इजाज़त दे दी है।”
“चाची, हमें उस दिन का इंतज़ार रहेगा। लीजिये माँ से बातें कीजिये।”
माँ और चाची को बातें करते देखकर मेघना सोच रही थी सच आज मेडिकल साइंस ने कितनी तरक्की कर ली है। आज शरीर के लगभग हर अंग की रिपेयरिंग सम्भव है। कुछ अंग तो आर्टीफिशियल तौर पर बन जाते हैं किंतु फेफड़े, किडनी, लिवर, आँख इत्यादि के लिये डोनर चाहिये। अगर वह अनजान व्यक्ति अपना फेफड़ा डोनेट नहीं करता तो आज चाची को जीवनदान कैसे मिलता? इंसान को अपने इस नश्वर कलेवर को एक दिन छोड़कर जाना ही है, अगर इस कलेवर के कुछ अंग किसी के काम आ जाएँ तो वह इंसानी जीवन की पूर्णता ही होगी। वह आज ही अंगदान के फॉर्म के लिये शिवेंद्र के साथ सम्बंघित संस्थाओं से भी बात करेगी। देर आए दुरुस्त आए…वैसे भी शुभ कार्य में देरी नहीं करनी चाहिये।
