साक्षात्कार: उपन्यास ‘ऐ ज़िंदगी’ की लेखिका सुछन्दा डे से बातचीत

उपन्यास 'ऐ ज़िंदगी' की लेखिका सुछन्दा डे से बातचीत

पेशे से सुछन्दा डे आई टी के क्षेत्र से संबंधित हैं लेकिन उनका मन शब्दों में रमता है। ‘ऐ ज़िंदगी’ उनका हालिया प्रकाशित उपन्यास है। इसी उपन्यास और उनके लेखन पर हमने यह बातचीत की है। आप भी पढ़ें:


प्रश्न: एक बुक जर्नल में आपका स्वागत है। सर्वप्रथम तो पुस्तक के लिए हार्दिक बधाई। पुस्तक पर बात करने से पहले पाठकों को कुछ अपने विषय में बताएँ।

सभी पाठकों को मेरा नमस्कार एवं अभिवादन। अपने बारे में बात करूँ तो जैसा कि मेरे नाम से स्पष्ट है कि मैं मूलतः बंगाल से हूँ। लेकिन मेरा जन्म, परवरिश और शिक्षा-दीक्षा सभी मध्यप्रदेश में हुई है। और यही कारण है कि हिंदी से मेरा बड़ा गहरा नाता है। पेशे से मैं एक आई टी प्रोफेशनल हूँ और भोपाल के मौलाना आजाद नैशनल इंस्टिट्यूट ऑफ टेक्नॉलजी से मैंने एम.सी.ए किया है। फिलहाल, भारत के एक अग्रिम सॉफ्टवेयर कम्पनी में एक वरिष्ठ पद पर कार्यरत हूँ और अपने परिवार के साथ गुड़गाँव में रह रही हूँ।

प्रश्न: साहित्य से आपका जुड़ाव कैसे हुआ?

पाठक गण शायद सोचे कि रूखे सूखे आई टी की दुनिया के इंसान का साहित्य से नाता कैसे हो गया। तो साहित्य से मैं शायद तब से जुड़ी हूँ, जब मेरा अक्षर ज्ञान भी नहीं हुआ था। बचपन में नानी से सुनती कहानियों से साहित्य से परिचय हुया। उसके बाद चम्पक, नंदन और चंदा मामा जैसी किताबों में पढ़ी कहानियों कि दुनिया मुझे बहुत ज्यादा भाने लगी। चाहे वो पंचतंत्र की कहानियाँ हो या फिर विक्रम और बेताल की। और थोड़ी सी बड़ी हुई तो बंगला अक्षर ज्ञान हुआ और यहाँ से मिला बंगला साहित्य का विशाल समुद्र। तब से लेकर अब तक यह जुड़ाव निरंतर जारी है।

प्रश्न: वह कौन से लेखक और रचनाएँ थीं जिन्होंने लिखे हुए शब्दों के प्रति आपके मन में आकर्षण जगाया?

मेरा सौभाग्य है कि मुझे हिंदी, अंग्रेजी और बंगला, तीनों भाषाओं का साहित्य पढ़ने का मौका मिला। प्रेमचंद और महादेवी वर्मा से लेकर कृश्न चंदर तक, एनिड ब्लाइटन और सर आर्थर कॉनन डॉयल से लेकर जेफ्री आर्चर और डैन ब्राउन तक, रवींद्रनाथ ठाकुर, शरतचंद्र से लेकर सुनील गंगोपाध्याय और सत्यजित राय तक सभी को पढ़ा है। हर लेखक और हर भाषा की अपनी विशेषता है।

हिंदी के कवियों जैसे मैथलीशरण गुप्त, सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद और महादेवी वर्मा की कविताओं से मुझे एक कोमल अनुभूति मिली। अभी भी मुझे उनकी बहुत सी कविताएँ याद हैं। वहीं बंगला साहित्य से मैंने सीखा, किस तरह बिना अतिशयोक्ति के, वास्तविकता को बनाए रखते हुए और समाज के बहु आयामों को छूते हुए कहानियाँ लिखी जा सकती है। वहीं अंग्रेजी के उपन्यासों में मिला रहस्य, रोमांच और रोमांस।

लेकिन जिनकी लेखनी से मैं सबसे अधिक प्रभावित हूँ वो हैं श्री सत्यजित राय। जी हाँ, दुनिया उन्हें एक फिल्म मेकर के रूप में जानती है लेकिन शायद बहुत कम लोगों को पता है कि वो एक बेहतरीन लेखक थे। और मूल रूप से किशोर साहित्य के। उम्र के उस दौर मे, जब हम बाल्यावस्था से किशोर अवस्था में प्रवेश करते हैं, उस वक्त मैंने यह साहित्य पढ़ा। उनकी डिटेक्टिव सीरीज़ फेलूदा, उनकी साइंस फिक्शन प्रोफेसर शंकु और उनकी लिखी कुछ छोटी कहानियाँ। वो सारी मेरे दिमाग में तेरह से सोलह साल की उम्र में कुछ ऐसी छायीं कि उनका खुमार आज तक नहीं उतरा है।

जाने अनजाने कुछ चीजे मेरी आदत बन गयी जो मैं अपनी लेखनी में लाने की कोशिश करती हूँ। जैसे किसी जगह या किसी नए पात्र का विवरण, ताकि पाठक जो मन में छवि बनाए वो आपकी छवि से मिलती जुलती हो। लेखन के बीच में कुछ छोटे-छोटे सामान्य ज्ञान के तथ्य देना। एक सीधी साधी आम भाषा का प्रयोग और सबसे ऊपर, अपने लेखन को वास्तविकता के करीब रखना ताकि उसकी तार्किक व्याख्या हो सके।

प्रश्न: लेखन का खयाल कब मन में आया? क्या आपको अपनी पहली लिखी रचना याद है?

स्कूल, कॉलेज में कई छोटे प्रबंध और कविताएँ लिखी थी, जो स्कूल मैगजीन में छपी थी। दो रचनाएँ जो मुझे उस समय की याद है वो था एक व्यंग्य जिसका शीर्षक था ‘आप क्या बनना चाहते हैं’ जिसमे एक व्यंगयात्मक तरीके से बताया गया था कि दुनिया में नेता बनने में सबसे ज़्यादा फायदा है। दूसरी रचना थी एक कविता तो आज की स्त्रियों की स्थिति दर्शाती थी।

लेकिन कॉलेज के बाद जब कॉर्पोरेट की दुनिया में कदम रखा और कलम की जगह कीबोर्ड उठाया तो बस लिखने से नाता टूट सा गया। फिर काम, घर परिवार में जैसे सब कहीं पीछे छूट गया। हाँ, पढ़ना हमेशा जारी रहा क्योंकि किताब पढ़े बिना तो मुझे नींद ही नहीं आती।

कोविड के दौरान, थोड़ा वक्त मिला, बच्चे बड़े हो चुके थे। ऐसे में एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर पढ़ते‑पढ़ते लगा कि मैं भी लिख सकती हूँ। और तब एक छोटी सी कहानी से शुरुआत की और अब तक इक्कीस छोटी बड़ी कहानियाँ और उपन्यास लिख चुकी हूँ। पहली कहानी जो प्रोफेशनल तौर पर एक ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर लिखी थी वो थी ‘हमसफ़र’

प्रश्न: अच्छा, ऐ ज़िंदगी के विषय में बताएँ? इसका विचार मन में कैसे आया?

ऐ ज़िंदगी मूलतः एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अपने ही गुणों को पहचानने में अक्षम है और उसने बस अपने रंग रूप के बारे में खुद ही एक धारणा बना रखी है। फिर उसके जीवन में एक शख्स आता है जो उसे उसकी खूबियों से परिचय करवाता है। जब लिखने बैठी तो कहानी को ज्यादा गम्भीर न रखते हुए उसे थोड़ा हास्य का पुट देने की कोशिश की। लिखते हुए किरदार अपने आप ही विकसित होते चले गए।

प्रश्न: ‘ऐ ज़िंदगी’ में मुख्य किरदारों को छोड़कर आपका सबसे पसंदीदा किरदार कौन सा है और कौन सा किरदार ऐसा है जिसे आप असल जीवन में मिलना नहीं चाहेंगी और क्यों?

‘ऐ ज़िंदगी’ में मुख्य किरदार तनु और अग्नि को छोड़ दिया जाए तो तनु के पिता गिरिराज रघुवंशी का किरदार मुझे पसंद है। वो इसलिए क्योंकि वो हमेशा अपनी बेटी के साथ खड़े मिलते है। उसे अच्छे से समझते हैं। अगर कोई कड़ा कदम भी उठाते हैं तो उसके हित में ही उठाते है।

और अगर ऐसे किरदार की बात करूँ जिसे मैं क्या कोई भी नहीं मिलना चाहेगा वो हैं तनु की बुआ यानी गीता। वो स्वार्थी है, बड़बोली है, अपने भाई और भाभी की भलमनसाहत का फायदा उठाती है और यही नहीं अपने घमंड और लालच के चले अपने पति का घर भी छोड़ चुकी है।

प्रश्न: पुस्तक लिखते हुए क्या कभी कलम ने साथ देना भी छोड़ा? इस राइटर्स ब्लॉक से आप कैसे उभरीं?

ईश्वर की दया से अभी तक ऐसी कोई स्थिति आयी नहीं। हाँ, किसी किसी दिन व्यावसायिक और पारिवारिक उलझनों में दिमाग थक जाता है और लिखने का मन नहीं होता, उस दिन अपनी थकान को दूर करने के लिए कुछ अच्छा पढ़ कर अपनी ऊर्जा वापिस एकत्रित कर लेती हूँ।

प्रश्न: पुस्तक का कौन सा हिस्सा लिखना आपके लिए अधिक कठिन था और क्यों?

इस पुस्तक का क्लाइमैक्स यानी अंत लिखना सबसे मुश्किल था। कई अंत सम्भव थे, और मन में उन्हें लेकर कई विचार कि अंत कैसा रखा जाए। अग्नि और तनु का भविष्य कैसा होना चाहिए? क्या उसे अपने दादा या नाना को माफ करना चाहिए या नहीं? क्योंकि मुझे हर अंत के पीछे एक तर्क चाहिए था। अंत में मैंने सुखद अंत का ही चुनाव किया और तनु के द्वारा उन तर्कों को भी पाठकों के सामने रखने की कोशिश की।

प्रश्न: आजकल आप क्या पढ़ रही हैं? क्या हाल फिलाहल में पढ़ी गयी कुछ अच्छी पुस्तकों का नाम आप पाठको से साझा करना चाहेंगी?

फिलहाल मैं डैन ब्राउन का नया उपन्यास ‘द सीक्रेट्स ऑफ सीक्रेट्स (The Secret of Secrets)’ पढ़ रही हूँ। यह उनकी रॉबर्ट लैंगडन सीरीज़ का नया उपन्यास है।

अभी हाल फिलहाल पढ़ी गई कहानियों में मैं जेफ्री आर्चर के उपन्यास ‘अ मैटर ऑफ हॉनर (A matter of Honor)’ का ज़िक्र करना चाहूँगी। यह पुस्तक मैंने बीसवीं बार बार पढ़ी और यह मेरी सबसे पसंदीदा किताबों में से एक है।

इसके अलावा चित्रा देव की ‘ठाकुरबाड़ीर अंदरमहल’ यह एक बहुत ही खूबसूरत बंगला रचना है जिसमें रवींद्रनाथ ठाकुर के परिवार की स्त्रियों का वर्णन है। पुस्तक में रवींद्रनाथ ठाकुर की दादी से शुरू करके सारा आली खान (शर्मिला टैगोर की नातिन ) तक का ज़िक्र है। पुस्तक पढ़ते हुए यह समझ आता है कि क्यों यह परिवार उस दौर में बंगाल के सबसे अग्रणीय बौद्धिक परिवार में था। उस समय इस परिवार की स्त्रियाँ किस तरह से सबसे अलग थीं। बहुत ही खूबसूरत किताब है। अगर किसी को इसका अंग्रेजी या हिंदी अनुवाद मिले तो अवश्य पढ़ना चाहिए।

तीसरी किताब जो पढ़ी है वो है गॉर्डन रामसे की ‘कुकिंग फॉर फ्रेंड्स’। जो नहीं जानते उन्हे बता दूँ, कि गॉर्डन रामसे दुनिया के सबसे प्रसिद्ध शेफ में से एक हैं।

प्रश्न: आजकल आप क्या लिख रही हैं? क्या आप पाठकों से कुछ साझा करना चाहेंगी?

इस समय मैं तीन नये उपन्यास लिख रही हूँ:

पहला उपन्यास रिश्तों की उलझने दिखाता हुआ एक गम्भीर विषय पर आधारित है।

दूसरा उपन्यास कुछ दोस्तों की कहानी है जो ज़िंदगी की दौड़ में अपना यौवन और अपनी दोस्ती कहीं पीछे छोड़ आए हैं और क्या होता है जब वो फिर मिलते हैं।

तीसरा उपन्यास एक रोमांटिक कॉमेडी है, जो पहले लिखी एक कहानी का प्रीक्वेल है।

प्रश्न: आखिर में आप पाठकों को कोई संदेश देना चाहें तो वो क्या होगा?

एक लेखक के रूप में मैं पाठकों से बस इतना कहना चाहती हूँ कि किताबों को सिर्फ कहानी समझकर मत पढ़िए, उन्हें महसूस कीजिए। हर किरदार के पीछे एक अधूरी सच्चाई, एक छुपा हुआ दर्द या एक अनकहा सपना होता है। जब आप पढ़ते हैं, तो आप सिर्फ शब्द नहीं, किसी के अनुभव, किसी की सोच और कभी-कभी किसी की पूरी जिंदगी को अपने भीतर जगह दे रहे होते हैं।

पढ़ते समय बेशक सवाल कीजिए, असहमत भी होइए, लेकिन पढ़ना बंद मत कीजिए। क्योंकि पढ़ना ही वो रास्ता है जो हमें दूसरों की दुनिया में ले जाकर खुद को थोड़ा और समझने का मौका देता है।

और अंत में, अगर किसी कहानी ने आपको ज़रा-सा भी छुआ है, तो उसे अपने तक मत रखिए… उसे दूसरों के साथ भी बाँटिए, और उन्हे भी पढ़ने के लिए प्रोत्साहित कीजिए।


तो यह थी लेखिका सुछन्दा डे से हमारी बातचीत। उम्मीद है यह बातचीत आपको पसंद आयी होगी। ऐ ज़िंदगी लेखिका का नवीनतम उपन्यास है जो कि साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है।

ऐ ज़िंदगी

ऐ ज़िंदगी | सुछंदा डे | साहित्य विमर्श प्रकाशन

कहते हैं, ज़िंदगी तब सबसे दिलचस्प होती है जब वो आपकी सोच से कुछ अलग ही हो। और यही हुआ तुहिना, उर्फ़ तनु के साथ। पढ़ी-लिखी, सधी-सँभली, लेकिन अपने ही रंग-रूप को लेकर हमेशा झुँझलाने वाली तनु को सजना-सँवरना बोरियत लगता है। उसे पसंद है किताबों की खुशबू, बाइक की रफ्तार और बहस का रोमांच! लेकिन जब उसकी ज़िंदगी में आता है अग्नि, एक सीधा-सादा सब्ज़ी वाला, तब सब कुछ गड़बड़ा जाता है… या फिर सब सही हो जाता है। ‘ऐ ज़िंदगी’ है एक ताज़ा, मुस्कुराहट भरी कहानी खुद तनु कि ज़ुबानी, जहाँ प्यार न तो फिल्मों जैसा है, न परियों जैसा, बस थोड़ा अनोखा, थोड़ा हक़ीक़त जैसा।

पुस्तक लिंक: अमेज़न | साहित्य विमर्श प्रकाशन


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Author

  • विकास नैनवाल

    विकास नैनवाल को अलग अलग तरह के विषयों पर लिखना पसंद है। साहित्य में गहरी रूचि है। एक बुक जर्नल नाम से एक वेब पत्रिका और दुईबात नाम से वह अपनी व्यक्तिगत वेबसाईट का संचालन भी करते हैं।

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