ये हैं हिंदी में वर्ष 2025 में प्रकाशित हॉरर विधा की कुछ पुस्तकें

वर्ष 2025 में पाठकों को खौफ के नये सफर पर ले जाने आयी हिंदी की ये पुस्तकें; आपने कितनी पढ़ी हैं?

हॉरर कथाएँ मनुष्य को हमेशा से ही आकर्षित करती रही हैं। यह सिहरन पैदा करने वाले किस्से एक तरह का रोमांच पैदा करते हैं और व्यक्ति इसी रोमांच की तलाश में हॉरर विधा की पुस्तकों तक भी जाता है। वर्ष 2025 में हिंदी में भी काफी रचनाएँ हॉरर विधा में प्रकाशित हुई हैं। उनमें से कुछ रचनाओं की सूची हम आपके समक्ष यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।

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लेख: ज़ारी रहेगा लोकप्रिय लेखन लेकिन... - पराग डिमरी

लेख: ज़ारी रहेगा लोकप्रिय लेखन लेकिन… – पराग डिमरी

लेखक पराग डिमरी उस पीढ़ी के हैं जिन्होंने हिंदी लोकप्रिय साहित्य का स्वर्णिम काल देखा है। अपने इस लेख में वह न केवल उस स्वर्णिम काल का वर्णन कर रहें हैं बल्कि इस विधा के धीरे धीरे कम होने के कारणों पर रोशनी डालते हुए और मौजूदा स्थिति से भी पाठक को अवगत करा रहे हैं। आप भी पढ़ें:

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साहित्य का आधार - प्रेमचंद

साहित्य का आधार – प्रेमचंद

साहित्य क्या है? साहित्य और प्रोपागैंडा में क्या फर्क है? वह क्या है जो साहित्य से प्रोपोगैंडा को जुदा करता है? इन्हीं सब बातों को साफ करते हुए प्रेमचंद ने 1932 में ये लेख लिखा था। आप भी पढ़ें:

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बातचीत करने की कला - प्रेमचंद

बातचीत करने की कला – प्रेमचंद

बातचीत करना भी एक कला है। हर कोई सुरुचिपूर्ण बातें न कर पाता है और न बातों से श्रोताओं को बाँध ही पाता है। कैसे इस कला का धीरे-धीरे लोप हो रहा है और इसके क्या नुकसान होते हैं। किस तरह इस कला में प्रवीण बना जा सकता है और इसके क्या फायदे हो सकते हैं ये दर्शाते हुए प्रेमचंद ने यह लेख लिखा था। आप भी पढ़ें:

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कहानीकला - प्रेमचंद

कहानी कला – प्रेमचंद

कहानी कैसी होनी चाहिए? कहानी लिखते समय कौन सी बातें ध्यान में रखनी चाहिए? यही लेखक प्रेमचंद द्वारा अपने इस लेख में बताया गया है। आप भी पढ़ें:

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पॉकेट बुक्स में ट्रेडमार्क लेखकों की शुरुआत - योगेश मित्तल

पॉकेट बुक्स में ट्रेडमार्क लेखकों की शुरुआत – योगेश मित्तल

पॉकेट बुक्स में जितने लेखकों ने अपने नाम से लिखा है उससे अधिक लेखकों ने प्रकाशकों के लिए भूत नाम या ट्रेडनाम से लिखा है। आखिर ये चलन कब शुरु हुआ? इसी पर रोशनी डाल रहे हैं श्री योगेश मित्तल जिन्होंने कई प्रकाशकों के लिए ट्रेड नाम से सेकड़ों उपन्यास लिखे हैं। आप भी पढ़ें:

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मेरी पहली रचना - प्रेमचंद

मेरी पहली रचना – प्रेमचंद

कथासम्राट प्रेमचंद की पहली रचना कौन सी थी? अपने बचपन में उन्होंने क्या क्या पढ़ा था? यह सब वह इस लेख में बता रहे हैं। आप भी पढ़ें:

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असली केशव पंडित और उसका बेटा - योगेश मित्तल

असली केशव पंडित और उसका बेटा – योगेश मित्तल

केशव पंडित लेखक वेद प्रकाश शर्मा के सबसे मकबूल किरदारों में से एक था। इसकी प्रसिद्धि का अंदाजा ही इस बात से लगाया जा सकता है कि आगे जाकर केशव पंडित की प्रसिद्ध को भुनाने के लिए प्रकाशकों ने इसका ट्रेडनाम के तरह प्रयोग तो किया ही साथ ही केशव पंडित के परिवार वालों के नाम पर भी उपन्यास प्रकाशित किए। पर असली केशव पंडित कौन था? इस पर लेखक योगेश मित्तल यह लेख प्रकाश डालता है। आप भी पढ़ें।

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लेख: सम्पादकों के लिए स्कूल - महावीर प्रसाद द्विवेदी

लेख: सम्पादकों के लिए स्कूल – महावीर प्रसाद द्विवेदी

‘सम्पादकों के लिए स्कूल’ महावीर प्रसाद द्विवेदी का लेख है जो 1904 में तब प्रकाशित हुआ था जब अमेरिका में सम्पादकों के लिए पहला स्कूल खुलने की खबर आयी थी। इसमें वह बता रहे हैं इस स्कूल में क्या क्या होने वाला था और एक कुशल सम्पादक को क्या क्या पता होना चाहिए। आप भी पढ़ें:

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लंदननामा: अंग्रेज़ी ज़ुबान में हिंदुस्तानी लफ्ज़ – हॉब्सन-जॉब्सन

लंदननामा: अंग्रेज़ी ज़ुबान में हिंदुस्तानी लफ्ज़ – हॉब्सन-जॉब्सन

अंग्रेजी भाषा ने कई हिंदुस्तानी शब्दों को आत्मसात किया है। ये शब्द अब अंग्रेजी में भी धड़ल्ले से प्रयोग किये जाते हैं। हालाँकि इनके उच्चारण में हुए बदलावों के कारण कई बार इनका रूप भी बदल भी जाता है। इन्हीं शब्दों से जुड़ी रोचक जानकारी संदीप नैयर इस लेख में दे रहे हैं। आप भी पढ़ें:

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कथा संरचना: पहली पंक्ति का महत्व - प्रवीण कुमार झा

कथा संरचना: पहली पंक्ति का महत्व – प्रवीण कुमार झा

गल्प लेखन में प्रथम पंक्ति का अपना अलग महत्व होता है। अलग -अलग लेखक किस तरह से पहली पंक्ति का प्रयोग करके उससे विभिन्न भाव जागृत करते हैं यह प्रवीण कुमार झा अपने इस लेख में बता रहे हैं। लेखन से जुड़े और लेखन की इच्छा रखने वालों को इस लेख से काफी कुछ सीखने को मिलेगी।

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लंदननामा: इंग्लिश ज़ुबान पर हिन्दुस्तानी ज़ायका - संदीप नैयर

लंदननामा: इंग्लिश ज़ुबान पर हिन्दुस्तानी ज़ायका – संदीप नैयर

लेखक संदीप नैयर पिछले कई वर्षों से ब्रिटेन में रह रहे हैं। लंदननामा के अंतर्गत वह ब्रिटेन और यूरोप की संस्कृति को साझा करते है। भारतीय मसालों ने किस तरह ब्रिटेन के भोजन को प्रभावित किया है यह वह इस लेख में बता रहे हैं। आप भी पढ़िए।

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