मैं आई.सी.यू. के ठंडे, शांत माहौल में बेटी नूपुर की साँसों की आवाज़ सुन रही हूँ। हरी रोशनियों के उठते-गिरते ग्राफ वाला कार्डियक-मॉनिटर उसके दिल का हिसाब नोट कर झपक रहा है। अभी-अभी नाइट-ड्यूटी-नर्स बहुत कुछ चेक करके मुझे टूटी-फूटी हिंदी में आश्वस्त करते हुए कह गयी है।
“रिलैक्स मिसेस बक्शी, तुमारा डॉटर ठिक हे। जस्ट ऑब्जरवेशन के लिए आई.सी.यू. में राखा हे।”
सिस्टर को एक फीकी मुस्कान मैंने सौंपी ज़रूर। लेकिन क्या ऐसे वक्त, जबकि बेटी आई.सी.यू. में हो कोई माँ रिलैक्स हो सकती है? मेरे कानों में डॉ. शाह के शब्द गूँज-गूँज कर टूट रहे हैं, ‘अगले बारह घंटों तक कुछ कहा नहीं जा सकता। पचास प्रतिशत यह सम्भावना है कि वह खतरे से बाहर आ जाए। और पचास यह कि उसकी ज़िंदगी खतरे की बलि चढ़ जाए।’
पति अनिल के होंठ कसमसाए, फड़के और आँखें जैसे बोल पड़ी थीं ‘कैसे डॉक्टर हैं ये? इतना दो टूक बोल रहे हैं।’ डॉक्टर पर आया गुस्सा मुझ पर निकला था, “अब इस तरह रो-रोकर अपशगुन मत करो।” मैंने जैसे-तैसे अपने आप को सँभाला। फिर बेटे तपन को गले लगाकर समझाया।
“पापा आज ही टूर से लौटे हैं। घर पर उन्हें परेशान मत करना। मुझे यहीं नूपुर के पास रुकना होगा। तुम कल होने वाले टेस्ट की तैयारी अपने आप कर लेना। मेरे अच्छे बच्चे, राजा बेटे।”
“यस मम्मी।” तपन के मुँह से ऐसी आज्ञाकारी वाणी मैंने पहले कभी सुनी न थी। विपदा उन बातों को मिनटों में सिखा देती है जिसे ममता लम्बे समय तक सिखाने का सोचती रहती है। मैंने उसे फिर दुलारा और अनिल के साथ घर भेज दिया। उन दोनों के जाते ही मैं निपट अकेली हो गयी। साथ रह गए बेफिक्र नींद की आगोश में ज़िंदगी और मौत से खामोश जद्दोजहद करती लाड़ली बेटी नूपुर और मेरा अपना मन। मन, जो बातों, घटनाओं, विचारों, यादों के घटा-टोप में तर्क की छतरी खोल-बंद-खोल कर रहा है।
मैं बैंक से लौटी थी तो रोज की तरह चहकती, फुदकती नूपुर की नूर भरी मुस्कुराहट ने मेरी सारी थकान हवा कर दी। ज़िंदगी से छनछनाती छह साल की बेटी की उपस्थिति ने मानो मुझे रिचार्ज कर दिया। मैं फटाफट कपड़े बदलकर घर के कामों में जुटने को तैयार हो गयी। तभी पीछे से गले में नन्ही बाहें डाल उसने पूछा था, “मम्मी, मैं सोनू के साथ बालकनी में बार्बी-बार्बी खेल लूँ?”
फ्लेट में रहते हुए बच्चों को खेल का मैदान कहाँ नसीब होता है? बालकनी का कोना, जहाँ दर्शक दीर्घा में नीला आसमान अकेला मुस्कुराता है, उसी में बच्चियाँ अपने खिलौनों, कल्पनाओं और सपनों से खेल लेती हैं। मुझे पता है आज सोनू आयी है तो टी‑पॉट-बार्बी की पैकिंग खुलकर रहेगी। पिछले दो महिनों से नूपुर इसके लिए कसमसा रही थी। फिर भी मैंने पूछा, “नुप्पू, पहले बताओ होमवर्क कितना बचा है?”
“मम्मी, कर लिया है। सिर्फ दो सम बचे हैं। डिनर के पहले पक्का कर लूँगी। मैं प्रॉमिस करती हूँ आज कार्टून नेटवर्क नहीं देखूँगी।” उसने ‘मम्मी हाँ कहेगी’ के आत्मविश्वास से चमकती आँखों से मुझे देखा था।
“अच्छा ठीक है।” मेरी स्वीकृति के शब्दों को सुनने के लिए दोनों बच्चियाँ रुकी नहीं। तत्क्षण बालकनी की ओर लपक लीं। उनकी दौड़ में खुशी के साथ यह भाव भी था कि ‘कौन जाने मम्मी / आंटी को कुछ और बात याद आ जाए और वे मना कर दें।’
लेकिन बालकनी में काल जैसे अदृश्य बहेलिया बन जाल फेंक छिपा बैठा था। पाँच मिनट के अंदर सब कुछ घट गया। क्या‑से‑क्या हो गया। किसे पता था जो हाईटेंशन लाइन कॉलोनी के अंतिम सिरे के आगे जाने-माने पार्षद भैया की एंसीलरी यूनिट के लिए कॉलोनी की सँकरी सड़कों पर गढ़े, बिजली के खम्भों से गुज़रती हुई हमारी बालकनी के करीब से खींची गयी है, खतरे का पैगाम लेकर आएगी। नियम कायदे होते हैं साबुत काग़ज़ों पर। ज़िंदगी में सत्ताधारी से ज्यादा, सत्ता-चमचे कानून की चिंदियाँ जेब में लिए घूमते हैं, बेफिक्र। इतनी पॉवरफुल लाइन अलबत्ता रिहायशी क्षेत्रों से गुज़ारनी ही नहीं चाहिए। और अगर इसे निकालना ही पड़े तो कम-से-कम दस फीट ऊपर से निकालना चाहिए।
कॉलोनाइज़र ने अपने सोर्सेस का दुरुपयोग किया और प्रोजेक्टेड बाल्कनियाँ बनायी। नेता ने अपने और बड़े कॉन्टैक्ट्स का फायदा उठाया और हाईटेंशन लाइन खिंचवायी। नूपुर ने मम्मी के अच्छे मूड से लाभ उठाना चाहा लेकिन उसकी उंगलियाँ हानि के तारों में उलझ गयी। टी-पॉट बार्बी का बॉक्स निकालते हाथों को झूलती हाईटेंशन लाइन छू गयी।
वो तो भला हो सोनू का कि नूपुर को खिंचाते देख वह चीख उठी। भला हो तपन का कि वह दौड़कर तुरंत बालकनी में पहुँच गया और उसने पूरी ताकत से छोटी बहन को चादर से खींचकर ड्राइंग रूम के फर्श पर लिटा दिया। नूपुर का शरीर स्लेटी हो गया और हाथ काले। तभी अनिल आ गए और हम उसे तत्काल ‘चाइल्ड केयर’ अस्पताल ले आए।
अगर सोनू चीखती नहीं और नूपुर को पकड़ लेती तो? अगर तपन को भी कुछ हो जाता तो?? अगर अनिल उसी वक्त ना आ पाते तो??? डॉक्टर के शब्दों में से दूसरा पचास प्रतिशत मुझे दैत्याकार नज़र आ रहा है। मैं सो नहीं सकूँगी आज की रात। आँखों में सारी रात गुज़ारना क्या होता है? यह आज सही-सही समझ आ रहा है।
क्या भगवान मेरी परीक्षा ले रहे हैं? लेना भी चाहिए। याद नहीं क्या मुझे! मैंने ही पहली गर्भावस्था के वक्त गणेश चतुर्थी पर हाथ जोड़कर भगवान से बेटा चाहा था। मिला भी। मैं गर्वित हुई थी। पुलकित भी। चाल में एक तरह की ठसक आ गयी थी और फिर नूपुर के वक्त? मन के चोर, मन के सिपाही सभी भ्रष्ट हैं। याद है मुझे। अच्छे से याद है। मैंने दयालु भगवान से फिर चाहा था इस बार बेटा या बेटी कुछ भी चलेगा। क्यों चाहा था मैंने ऐसा? सौ प्रतिशत बेटी क्यों नहीं माँगी थी? कदाचित मैं बेटे में सुरक्षित भविष्य की मृगतृष्णा देख रही थी। या बेटी की परवरिश में अतिरिक्त सतर्कता की ज़िम्मेदारी से बचना चाह रही थी।
क्या इसलिए मुझे भगवान ने इस पचास प्रतिशत की खाई के किनारे रात गुज़ारने को खड़ा कर दिया है? मैं गलत थी। मेरी ख़्वाहिश गलत थी। मैं स्वयं स्त्री होकर, एक बेटे की माँ होकर दूसरी बार में भी कन्या की चाह पचास प्रतिशत ही कर रही थी। ऊपर-ऊपर मैं कहती थी मैं पहली संतान ही बेटी चाहती थी। लेकिन सिर्फ मेरा दिल जानता है कि असल में मैंने क्या चाहा था? जब तक माँ के दिल में बेटी के लिए सम्मान और ललक नहीं जागेगी तब तक स्त्री स्वातंत्र्य के सारे आंदोलन बेकार हैं।
आज मेरा मन मेरे ही मन को धिक्कार रहा है। अपने बहते आसुँओं को पोछने की कोई इच्छा नहीं हो रही मेरी। बह जाने दूँ मन का कलुष इसी रास्ते। सामने नन्हीं बेटी नूपुर सोई है। मशीनें अपना काम कर रही हैं। घड़ियाँ अपना। और मेरा मन अपना।
बेटी के पिछले जन्मदिन की सुबह मुझे याद आयी। मच्छरदानी में सिर घुसाकर ममता के अतिरेक में मैंने उसे उठाया था।
“नूपुर उठो। आज तुम्हारा जन्मदिन है। हैप्पी बर्थडे। नूपुर बेटा। मेरा राजा बेटा। गुड मॉर्निंग। सुप्रभात।” बेटा‑बेटा कर मैं उसे लगातार चूमती रही। छह बार इस गाल पर। छह बार उस गाल पर। मुझे लगा था वह इस अतिरिक्त लाड़, प्यार और दुलार भरी गुड मॉर्निंग से किलक उठेगी। झूम कर गले में लटूम जाएगी। गोदी में चढ़ाए रखने को जिदियाएगी। लेकिन उसने मुझे परे छिटका दिया था।
“यह क्या मम्मी बेटा-बेटा लगा रखा है। मैं आपकी बेटी हूँ। बेटा नहीं। मम्मी, मुझे बेटी पुकारो न!” उसकी आवाज़ में शास्त्रीय गायकी-सा खरापन था। ग़ज़ब का आत्मसम्मान। छह साल की नूपुर के इस छोटे से कथन ने मुझे भीतर तक हिला दिया। बड़ी हार का एहसास दिया। उसके चेहरे के निखालिस आत्मविश्वास में मेरी आँखें चुंधिया गयीं। यह हम ही होती हैं। हम स्त्रियाँ। हम माँऐ जो कन्या के बेटी होने के फक्र को बचपन से जाने‑अनजाने दफन करने का सिलसिला चलाती हैं। जिसके चलते बड़ी होकर बेटियाँ जब माँ बनने को होती हैं फिर वे भी बेटा ही चाहती हैं। पुत्र-चाह की यह विकट बेल हमारी ही लगाई हुई है।
“आज ज़्यादा प्यार आ रहा था ना तुझ पर इसलिए बेटा पुकार लिया।” मैंने अंदरूनी ग्लानि की गीली मिट्टी की तगारी को भरसक ताकत से अलग हटा मरियल-सी सफाई दी।
“तब और भी गलती की। कभी तपन भैया पर ज्यादा प्यार आए तो उन्हें बेटी तो नहीं पुकारती हो आप। बोलो?” उसने मुझे पुन: निरुत्तर कर दिया।
“अच्छा बाबा, गलती हो गयी। हैप्पी बर्थडे प्यारी बिटिया। मेरी परी। मेरी राजदुलारी। मेरी गुड़िया। मेरी रानी। मेरी सब कुछ।” मैंने पुत्रीवत विशेषणों की बौछार के साथ उसे चूमा और सीने से लगा लिया। एक पल में नैसर्गिक प्यार और लगाव का आकाश-सा उसकी आँखों में उतर आया। ‘थैंक यू मेरी प्यारी मम्मी’ कह वह मुझसे लिपट गयी थी।
आत्मग्लानि की स्वीकृति से मेरे बहते आँसू अब कुछ थमने लगे हैं।
“मम्मी मैं कहाँ हूँ? मेरी टीपॉट बार्बी? और सोनू?” नूपुर बोली तो मुझे ध्यान आया मैं अस्पताल में हूँ।
‘हे भगवान, तूने मुझे माफ कर दिया!’ मैंने मन-ही-मन अपने आप से कहा।
“नुप्पू, मेरी बच्ची! अपन अस्पताल में हैं। कल शाम तुम्हें बिजली का तेज़ झटका लगा था।”
“अच्छा” नूपुर की आँखों में वही झिलमिल परिचित नूर उतर आया और होठों पर मुस्कुराहट।
“हाँ, मेरी प्यारी बेटी” कह मैंने उसके कपाल को चूमा। इस चुम्बन में आत्म अवलोकन की तपन थी। तभी पर्दा हटा अनिल और तपन अंदर आए। नूपुर की स्निग्ध मुस्कराहट ने उनके संशयों को भी पोंछ डाला। कमरे में पचास प्रतिशत की आशावादी धूप बिखर गयी।
समाप्त
(लेखिका किसलय पंचोली की कहानी ‘मम्मी, मुझे बेटी पुकारो ना!’ साहित्य विमर्श प्रकाशन से प्रकाशित संग्रह ‘गेट से बाहर फ्रायड’ में संगृहीत है। यहाँ प्रकाशन की इजाजत से यह कहानी लगायी जा रही है। )
पुस्तक विवरण:

‘गेट से बाहर फ्रायड’ लेखिका किसलय पंचोली की 14 कहानियों का संग्रह है। यह कहानियाँ हैं:
‘गेट से बाहर फ्रायड’, ‘घड़ी भर में…’, ‘यश और यासिर’, ‘खरोंच’, ‘मम्मी, मुझे बेटी पुकारो ना!’, ‘कुंड’, ‘प्रत्याशित ‘हाँ’’, ‘लिफ्ट’, ‘बाशा में कड़कड़ाती ठंड की एक रात’, ‘आह से…’, ‘नव संस्कार’, ‘पानी-पानी’, ‘कौन बनेगा डायरेक्टर’, ‘अलमारी का एक खाना’
यह कहानियाँ हमारे मन के प्रश्नों का उत्तर खोजती नजर आती हैं। जैसे: क्या वाकई श्राप लगता है? या वास्तव में वरदान मिलते हैं? क्या दो तरफा मानवीय रिश्ते हमें कुछ सिखाते हैं? क्या प्यार में एक सार्वभौमिक सत्य की सुगंध, छुअन और अनुभूति स्वत: होती है? और जब होती है तो कायनात भी साथ देती है? क्या समय के साथ यथा स्थिति को स्वीकार लेना हमें हल्का बनाता है? या हमारा कनफ्यूजन बढ़ता है? कैसे किसी सर्व हिताय संदेश के प्रति जनमानस को जागरुक करने के लिए कहानी एक महत्वपूर्ण टूल हो जाती है? जीवन, पानी और प्रदूषण के अंतर्संबंध कहां तक जाते हैं? क्या पुत्र मोह माँ को भी बायस्ड करता है?अमूमन पत्नियों को ही टेकन फॉर ग्रांटेड क्यों लिया जाता है? ग्लानि को सुन लिया जाना कितना जरूरी है? समय के साथ रिश्तों में कैसा अवमूल्यन होता है? क्या अपनी बात को समझने की कोई कला होती है? किसी मानसिक द्वंद्व से उबरने पर कैसा लगता है? क्या प्राणायाम आसन और धर्म का आपस में कोई सम्बंध है? आज बुढ़ापे की आम त्रासदी क्या है और क्या उसका कुछ इलाज है?
पुस्तक लिंक: अमेज़न | साहित्य विमर्श प्रकाशन
