पुस्तक टिप्पणी: मौत की नींद | किंग कॉमिक्स |

मौत की नींद | किंग कॉमिक्स

पुस्तक विवरण:

फॉर्मैट: पेपरबैक | पृष्ठ संख्या: 32 | प्रकाशक: किंग कॉमिक्स

टीम

सम्पादक: विवक मोहन | लेखिका: नाजरा खान | कला दिग्दर्शक: विनोद कुमार | चित्र: सुनीता तँवर | इंकिंग: आदिल खान

कहानी

पंद्रह वर्षीय राहुल अवस्थी के साथ अजीब से चीजें हो रही थीं। वह अपने सपने में जिस व्यक्ति की मृत्यु घटित होते हुए देखता वह असल में मर जाता था।

आखिर किसकी मृत्यु देखी थी राहुल अवस्थी ने?

उसके सपने से इन मौतों का क्या लेना देना था?

क्या खत्म हुई राहुल की ये मौत की नींद?

टिप्पणी

‘मौत की नींद’ किंग कॉमिक्स द्वारा प्रकाशित थ्रिल सीरीज की कॉमिक बुक है। 32 पेज की इस कॉमिक बुक की कहानी राहुल के सोने और नींद में देखे गए एक सपने से शुरू होती है। हैरानी की बात ये है कि ये सपने उसके परिवार के सदस्यों से ही जुड़े होते है और उन सपनों में देखी गई मृत्यु असल ज़िंदगी में भी हो जाती है।

ये सपने राहुल को क्यों आ रहे हैं? और उसके परिवार वालों का इन सपनों से क्या सम्बंध है? इन प्रश्नों के उत्तर ये कॉमिक बुक आपको देती है। चूँकि कॉमिक बुक 32 पृष्ठ की है तो आपको ये सब जानने के लिए ज़्यादा इंतजार भी नहीं करना पड़ता है।

अगर कॉन्सेप्ट के तौर पर देखा जाए तो कहानी का कॉन्सपेट रोचक है। कहानी इस तरह से बुनी गई है कि आपके सामने कई सवाल कहानी की शुरुआत में ही आकर खड़े हो जाते हैं जिनके उत्तर पाने की लालसा आपसे कॉमिक बुक के पृष्ठ पलटवा लेती है।

पर जैसे जैसे आप इसे पढ़ते जाते हैं लेखिका द्वारा जिस हिसाब से इन सवालों का उत्तर दिया गया है वो कहानी को कमज़ोर करता चला जाता है।

कहानी का सबसे महत्वपूर्ण भाग राहुल की नींद है और उसमें दिखते सपनों के माध्यम से हत्याओं पता चलना है। पर यह हत्याएँ लभभग तभी होती हैं जब सपना दिख रहा होता है। ऐसे में किरदारों के पास उन हत्याओं को रोकने का कोई जरिया नहीं रहता है। बस राहुल सो न पाए यही उनके हाथ में होता है। यह रोमांच का तत्व कम कर देता है। अगर किरदारों के पास कुछ हाथ पैर मारने का समय होता तो शायद बेहतर होता। रोमांच कहानी में अधिक होता।

फिर इन सपनों के गुण भी कहानी की ज़रूरत के अनुसार बदलते रहते हैं। मसलन राहुल पृष्ठ पाँच में सोफ़े पर लेटा हुआ है और कोई बड़बड़ाहट नहीं करता। पर पृष्ठ 13 में जब एक दो हत्याएँ हो चुकी होती हैं तो वो एक बार फिर से सोफ़े में लेटा होता है तो बड़बड़ाहट करने लगता है जिससे उसकी माँ को इशारा मिल जाता है कि राहुल के साथ क्या दिक्कत हो सकती है।

कॉमिक पढ़ते हुए पाठक को ये पता लग ही जाता है कि राहुल पर किसी आत्मा का साया है। आत्मा राहुल और उसके परिवार से बदला क्यों लेना चाहती थी ये भी पता चलता है पर ये सब काम राहुल के नींद में जाते ही क्यों होता है इसका कोई मजबूत कारण नहीं दिया गया है। जो हत्याएँ कॉमिक्स में हुई उनके होने और राहुल के सोने के बीच कोई ऐसा संबंध नहीं था कि राहुल सोता ही तो ही हत्याएँ होती। अगर एक पल के लिए मान ले कि राहुल के सोने से ही आत्मा उसके शरीर से अलग हो सकती थी तो ऐसा भी नहीं था क्योंकि कॉमिक बुक में आगे जाकर आत्मा राहुल के शरीर से अलग होती है। ऐसे में नींद और मौत के सम्बंध को लेखिका न्यायोचित नहीं ठहरा पाती हैं। मुझे लगता है कॉमिक बुक में एक जगह पाठक को ये पता चलता है कि आत्मा ये सब क्यों कर रही है। इसी जगह पर नींद और मौत के बीच का कारण बता देते तो बेहतर होता।

कहानी में संयोगों की अधिकता भी कहानी को कमजोर कर देती है। मसलन, राहुल की माँ मिसेज अवस्थी को राहुल पर मौजूद आत्मा के प्रभाव के विषय में संयोग से पता लगता है। जो डॉक्टर मेहरा भूत प्रेत पर विश्वास नहीं करता उसका जरूरत पड़ने पर ऐसा दोस्त निकल आता है जो कि तंत्र मंत्र का विशेषज्ञ रहता है। साथ ही जिस तरह डॉक्टर मेहरा एक अनजान बालक के अपनी जान खतरे में डालता है वो भी इतना जमता नहीं है। आखिर क्यों कोई ऐसा किसी आम मरीज के लिए करेगा?? अगर मेहरा की कोई बैकस्टोरी होती जिसमें पाठक को ये पता चलता कि क्यों मेहतरा एक अनजान मरीज के लिए अपनी जान लगाने को तैयार है तो बेहतर होता।

कॉमिक बुक के आर्ट की बात करें तो आर्ट अच्छा है। हाँ, अस्पताल के बाहर डॉक्टर मेहरा को सफेद कोट में देखना थोड़ा अटपटा लगता है। सफेद कोट की जगह कोई अलग कोट दिखाते तो बेहतर होता। इतना टाइम तो उसे ही मिल ही गया था अस्पताल से निकलते हुए कि वो कोट वहीं छोड़कर आता।

अंत में यही कहूँगा कि अगर कॉमिक बुक में रोमांच थोड़ा अधिक होता, संयोगों की गिनती कम होती और लेखिका नींद और मौत होने के बीच कोई मजबूत कारण दे पाती तो शायद कॉमिक बहुत ज्यादा बेहतर बन जाती। अभी तो एक रोचक कॉन्सेप्ट पर लिखी एक कमजोर कॉमिक बन कर ये रह जाती है।

अगर इसे नहीं भी पढ़ेंगे तो जायद कुछ खोएँगे।


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Author

  • विकास नैनवाल

    विकास नैनवाल को अलग अलग तरह के विषयों पर लिखना पसंद है। साहित्य में गहरी रूचि है। एक बुक जर्नल नाम से एक वेब पत्रिका और दुईबात नाम से वह अपनी व्यक्तिगत वेबसाईट का संचालन भी करते हैं।

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