लघु-कथा: समुद्र-संतरण – जयशंकर प्रसाद

लघु-कथा: समुद्र-संतरण - जयशंकर प्रसाद

क्षितिज में नील जलधि और व्योम का चुम्बन हो रहा है। शांत प्रदेश में शोभा की लहरियाँ उठ रही है। गोधूली का करुण प्रतिबिम्ब, बेला की बालुकामयी भूमि पर दिगंत की तीक्षा का आवाहन कर रहा है।

नारिकेल के निभृत कुंजों में समुद्र का समीर अपना नीड़ खोज रहा था। सूर्य लज्जा या क्रोध से नहीं, अनुराग से लाल, किरणों से शून्य, अनंत रसनिधि में डूबना चाहता है। लहरियाँ हट जाती हैं। अभी डूबने का समय नहीं है, खेल चल रहा है।

सुदर्शन प्रकृति के उस महा अभिनय को चुपचाप देख रहा है। इस दृश्य में सौंदर्य का करुण संगीत था। कला का कोमल चित्र नील-धवल लहरों में बनता-बिगड़ता था। सुदर्शन ने अनुभव किया कि लहरों में सौर-जगत् झोंके खा रहा है। वह उसे नित्य देखने आता; परंतु राजकुमार के वेष में नहीं। उसके वैभव के उपकरण दूर रहते। वह अकेला साधारण मनुष्य के समान इसे देखता, निरीह छात्र के सदृश इस गुरु दृश्य से कुछ अध्ययन करता। सौरभ के समान चेतन परमाणुओं से उसका मस्तक भर उठता। वह अपने राजमंदिर को लौट जाता।

सुदर्शन बैठा था किसी की प्रतीक्षा में। उसे न देखते हुए, मछली फँसाने का जाल लिये, एक धीवर-कुमारी समुद्र-तट के कगारों पर चढ़ रही थी, जैसे पंख फैलाये तितली। नील भ्रमरी-सी उसकी दृष्टि एक क्षण के लिए कहीं नहीं ठहरती थी। श्याम-सलोनी गोधूली-सी वह सुंदरी सिकता में अपने पद-चिह्न छोड़ती हुई चली जा रही थी।

राजकुमार की दृष्टि उधर फिरी। सायंकाल का समुद्र-तट उसकी आँखों में दृश्य के उस पार की वस्तुओं का रेखा-चित्र खींच रहा था। जैसे; वह जिसको नहीं जानता था, उसको कुछ-कुछ समझने लगा हो, और वही समझ, वही चेतना एक रूप रखकर सामने आ गयी हो। उसने पुकारा, “सुंदरी!”

जाती हुई सुंदरी धीवर-बाला लौट आयी। उसके अधरों में मुस्कान, आँखों में क्रीड़ा और कपोलों पर यौवन की आभा खेल रही थी, जैसे नील मेघ-खंड के भीतर स्वर्ण-किरण अरुण का उदय।

धीवर-बाला आकर खड़ी हो गयी। बोली, “मुझे किसने पुकारा?”

“मैंने।”

“क्या कहकर पुकारा?”

“सुंदरी!”

“क्यों, मुझमें क्या सौंदर्य है? और है भी कुछ, तो क्या तुमसे विशेष?”

“हाँ, मैं आज तक किसी को सुंदरी कहकर नहीं पुकार सका था, क्योंकि यह सौंदर्य-विवेचना मुझमें अब तक नहीं थी।”

“आज अकस्मात् यह सौंदर्य-विवेक तुम्हारे हृदय में कहाँ से आया?”

“तुम्हें देखकर मेरी सोई हुई सौंदर्य-तृष्णा जाग गयी।”

“परंतु भाषा में जिसे सौंदर्य कहते हैं, वह तो तुममें पूर्ण है।”

“मैं यह नहीं मानता, क्योंकि फिर सब मुझी को चाहते, सब मेरे पीछे बावले बने घूमते। यह तो नहीं हुआ। मैं राजकुमार हूँ; मेरे वैभव का प्रभाव चाहे सौंदर्य का सृजन कर देता हो, पर मैं उसका स्वागत नहीं करता। उस प्रेम-निमंत्रण में वास्तविकता कुछ नहीं।”

“हाँ, तो तुम राजकुमार हो! इसी से तुम्हारा सौंदर्य सापेक्ष है।”

“तुम कौन हो?”

“धीवर-बालिका।”

“क्या करती हो?”

“मछली फँसाती हूँ,” कहकर उसने जाल को लहरा दिया।

“जब इस अनंत एकांत में लहरियों के मिस प्रकृति अपनी हँसी का चित्र दत्तचित्त होकर बना रही, तब तुम उसके अंचल में ऐसा निष्ठुर काम करती हो?”

“निष्ठुर है तो, पर मैं विवश हूँ। हमारे द्वीप के राजकुमार का परिणय होने वाला है। उसी उत्सव के लिए सुनहली मछलियाँ फँसाती हूँ। ऐसी ही आज्ञा है।”

“परंतु वह ब्याह तो होगा नहीं।”

“तुम कौन हो?”

“मैं भी राजकुमार हूँ। राजकुमारों को अपने चक्र की बात विदित रहती है, इसलिए कहता हूँ।”

धीवर-बाला ने एक बार सुदर्शन के मुख की ओर देखा, फिर कहा, “तब तो मैं इन निरीह जीवों को छोड़ देती हूँ।”

सुदर्शन ने कुतूहल से देखा, बालिका ने अपने अंचल से सुनहली मछलियों की भरी हुई मूठ समुद्र में बिखेर दी; जैसे जल-बालिका वरुण के चरण में स्वर्ण-सुमनों का उपहार दे रही हो। सुदर्शन ने प्रगल्भ होकर उसका हाथ पकड़ लिया, और कहा, “यदि मैंने झूठ कहा, तो?”

“तो कल फिर जाल डालूँगी।”

“तुम केवल सुंदरी ही नहीं, सरल भी हो।”

“और तुम वंचक हो,” कहकर धीवर-बाला ने एक निश्वास ली, और संध्या के समय अपना मुख फेर लिया। उसकी अलकावली जाल के साथ मिलकर निशीथ का नवीन अध्याय खोलने लगी। सुदर्शन सिर नीचा करके कुछ सोचने लगा। धीवर-बालिका चली गयी। एक मौन अंधकार टहलने लगा। कुछ काल के अनंतर दो व्यक्ति एक अश्व लिये आये। सुदर्शन से बोले, “श्रीमन्, विलम्ब हुआ। बहुत-से निमंत्रित लोग आ रहे हैं। महाराज ने आपको स्मरण किया है।”

“मेरा यहाँ पर कुछ खो गया है, उसे ढूँढ़ लूँगा, तब लौटूँगा।”

“श्रीमन्, रात्रि समीप है।”

“कुछ चिंता नहीं, चंद्रोदय होगा।”

“हम लोगों को क्या आज्ञा है?”

“जाओ।”

सब लोग गये। राजकुमार सुदर्शन बैठा रहा। चाँदी का थाल लिये रजनी समुद्र से कुछ अमृत-भिक्षा लेने आयी। उदार सिंधु देने के लिए उमड़ उठा। लहरियाँ सुदर्शन के पैर चूमने लगीं। उसने देखा, दिगंत-विस्तृत जलराशि पर कोई गोल और धवल पाल उड़ाता हुआ अपनी सुंदर तरणी लिए हुए आ रहा है। उसका विषय-शून्य हृदय व्याकुल हो उठा। उत्कट प्रतीक्षा-दिगंत-गामिनी अभिलाषा-उसकी जन्मांतर की स्मृति बनकर उस निर्जन प्रकृति में रमणीयता की-समुद्र-गर्जन में संगीत की सृष्टि करने लगी। धीरे-धीरे उसके कानों में एक कोमल अस्फुट नाद गूँजने लगा। उस दूरागत स्वर्गीय संगीत ने उसे अभिभूत कर दिया। नक्षत्र-मालिनी प्रकृति हीरे-नीलम से जड़ी पुतली के समान उसकी आँखों का खेल बन गयी।

सुदर्शन ने देखा, सब सुंदर है। आज तक जो प्रकृति उदास चित्र बनकर सामने आती थी, वह उसे हँसती हुई मोहनी और मधुर सौंदर्य से ओतप्रोत दिखाई देने लगी। अपने में और सबमें फैली हुई उस सौंदर्य की विभूति को देखकर सुदर्शन की तन्मयता उत्कंठा में बदल गयी। उसे उन्माद हो चला। इच्छा होती थी कि वह समुद्र बन जाय। उसकी उद्वेलित लहरों से चंद्रमा की किरणें खेलें और वह हँसा करे। इतने में ध्यान आया उस धीवर-बालिका का। इच्छा हुई कि वह भी वरुण-कन्या सी चंद्रकिरणों से लिपटी हुई उसके विशाल वक्षस्थल में विहार करे। उसकी आँखों में गोल धवल पालवाली नाव समा गयी, कानों में अस्फुट संगीत भर गया। सुदर्शन उन्मत्त था। कुछ पद-शब्द सुनाई पड़े। उसे ध्यान आया कि मुझे लौटा ले जाने के लिए कुछ लोग आ रहे हैं। वह चंचल हो उठा, फेनिल जलधि में फाँद पड़ा। लहरों में तैर चला।

बेला से दूर—चारों ओर जल—आँखों में वही धवल पाल, कानों में अस्फुट संगीत। सुदर्शन तैरते-तैरते थक चला था। संगीत और वंशी समीप जा रही थी। एक छोटी मछली पकड़ने की नाव आ रही थी। पास जाने पर देखा, धीवर-बाला वंशी बजा रही है और नाव अपने मन से चल रही है।

धीवर-बाला ने कहा, “आओगे?”

लहरों को चीरते हुए सुदर्शन ने पूछा, “कहाँ ले चलोगी?”

पृथ्वी से दूर जल-राज्य में; जहाँ कठोरता नहीं; केवल शीतल, कोमल और तरल आलिंगन है; प्रवंचना नहीं, सीधा आत्मविश्वास है; वैभव नहीं, सरल सौंदर्य है।

धीरव-बाला ने हाथ पकड़कर सुदर्शन को नाव पर खींच लिया। दोनों हँसने लगे। चंद्रमा और जलनिधि भी।

समाप्त


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Author

  • जयशंकर प्रसाद

    जन्म: 30 जनवरी 1889
    निधन: 15 नवम्बर 1937

    जयशंकर प्रसाद छायावादी युग के प्रमुख स्तम्भों में से एक थे। वह कवि, नाटककार, और् उपन्यासकार थे।

    प्रमुख रचनाएँ: छोटा जादूगर (कहानी), इंद्रजाल(कहानी), कंकाल (उपन्यास), तितली (उपन्यास) इत्यादि।

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