“अगर टाइम पर नहीं आ सकते तो कोई प्रोग्राम ही क्यों बनाते हो?”
“इंतज़ार का मज़ा कुछ और ही होता है,” वह हँसा।
उसने गुस्से में फोन काट दिया तो दुबारा फोन आया। उसने उठाया नहीं। रात के साढ़े नौ हो चुके थे। कब से तैयार होकर बैठी है वह। इंतज़ार करते-करते एक उकताहट मन को घेर लेती है। ऐसा लगता है मानो उदासी की परतें धीरे-धीरे मन पर चढ़ रही हैं।
कितने यत्न से तैयार हुई थी वह। ग्रे सिल्क की साड़ी पहनी थी जिस पर सिल्वर बार्डर और बूटियाँ लहरा रही थीं। प्योर सिल्क की नज़ाकत ही कुछ और होती है, एकदम रेशमी छुअन… शरीर पर जब फिसलती है तो एक सिहरन सी दौड़ जाती है। उसने बहुत प्यार से साड़ी पर हाथ फेरा। यह उसकी माँ की निशानी है, इसलिए बहुत ही सहेजकर रखती है। उसे जब भी छूती है, लगता है कि माँ का स्पर्श उसके साथ है।
सुशांत को आते-आते ग्यारह बज ही जाएँगे। यानी बारह बजे से पहले वे पार्टी में पहुँचने से रहे। माना पार्टी सुबह चार बजे तक चलती रहेगी, पर इंतज़ार या उससे उत्पन्न खीझ की वजह से थकान उस पर हावी हो गयी थी। हद होती है लापरवाही की। दोस्तों और ऑफिस में अपने मस्त और केयरफ्री अंदाज़ के लिए लोकप्रिय सुशांत की यह आदत उसे बहुत खलती है।
“अरे मस्त रहो, क्यों इतना टेंशन लेती हो? ज़िंदगी जीने के लिए होती है,” यह जुमले अकसर उसकी ज़ुबान पर रहते हैं। वह जब भी कहती, ‘केयरफ्री रहना अच्छी बात है, पर उस चक्कर में दूसरों के सेंटीमेंट्स को हर्ट करना सही नहीं है,’ तो वह ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगता।
“माय डियर वाइफ, ईमोशनल होने से काम नहीं चलता। सेंटीमेट्स केवल एक लबादे की तरह होते हैं, तन और मन दोनों को ही एक बोझ तले दबाए रहते हैं। थ्रो दैम आउट।”
कभी उसे लगता है कि सुशांत सही ही कहता है। ये संवेदनाएँ नाहक ही उसके मन में मकड़ियों की तरह जाले बुनती रहती हैं। एक सोच हावी होती है और फिर दूसरी, तीसरी… काश वह भी सुशांत की तरह मस्त रहना सीख पाती।
पिछले बीस सालों के साथ में वह जानती है कि सुशांत को उसकी परवाह है, वह उसका ख्याल रखता है और प्यार भी करता है। फिर भी कई बार उसका व्यवहार उसे ‘शायद’ की सीमा में बाँध लेता है। आखिर क्यों नहीं वह एक सीधी राह पर चल पाती है। एक बेटा है जो हॉस्टल में रहकर इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है, सुशांत एक अच्छा पति, पिता और ज़िम्मेदार इनसान है, फिर कमी कहाँ है?
साड़ी को बहुत सहेजकर उसने साड़ी कवर में लपेटकर रख दिया। बीच-बीच में वह उसकी तहों को उलटती-पलटती रहती है…कहीं चिर न जाए। ‘तभी तो कहता हूँ कि ये सेंटीमेट्स तुम्हें खुलकर जीने ही नहीं देते। पचास साल पुरानी साड़ी है, आखिर उसे भी तो रिटायर होने का मौका दो। पर तुम हो कि सहेजे जा रही हो और उसे पहनने में, उसकी साज-सँभाल करने में एक टेंशन ले लेती हो। तुम्हारे पास कितनी साड़ियाँ हैं, और जब चाहे खरीद भी सकती हो, पर यादों से चिपके रहने की तुम्हारी आदत वर्तमान से दूर धकेल देती है तुम्हें। आखिर अतीत में ठहरकर तुम किस चीज की प्रतीक्षा कर रही हो? मानो अतीत न हो गया, कोई वेटिंग रूम हो। लगता है दफन हो गयी यादों को उखाड़कर वर्तमान में रोपने की कोशिश करने में लगी रहती हो।” फिर वह अपनी चिर-परिचित हँसी बिखेर देता। कभी-कभी उसे जलन होती है सुशांत से, आखिर कैसे वह इतनी उन्मुक्तता से हँस पाता है।
यह सच है कि छोटी-छोटी बातों से भी वह परेशान हो जाती है और इस चक्कर में अकसर पुरानी बातों को नाखूनों से कुरेद-कुरेद कर अपने खुशहाल जीवन में इस तरह बिखेर देती है कि वर्तमान उसमें दब सा जाता है। कभी सुशांत से तकरार हो जाती तो वह फौरन उसे याद दिलाती, दो साल पहले तो तुमने कुछ और कहा था। क्यों बदल लेते हो तुम अपनी ही कही बात। तब सुशांत समझाता, “दो साल पहले न जाने किस संदर्भ में वह बात कही होगी। जैसे स्थितियाँ हों, वैसे बदलाव भी लाने पड़ते हैं। सिम्पल सी थ्योरी है अपनी तो कि स्थान, काल, पात्र के अनुसार इनसान को अपने को ढाल लेना चाहिए। तुम भी ट्राई करो, सुखी रहोगी। सारा दिन खाली रहती हो घर पर, कोई हॉबी ज्वाइन कर लो।” सुशांत ने जब सलाह दी थी तो वह जलभुन गयी थी।
“तुम घर सँभालने के बारे में जानते ही कितना हो। घर पर होते ही कितने समय हो। मेरी आधी ज़िंदगी तो तुम्हारा वेट करते ही बीत गयी है। कभी-कभी लगता है कि घर तुम्हारे लिए सिर्फ वेटिंग रूम है। रात को आते हो, सुबह की प्रतीक्षा में उसे बिताते हो और निकल जाते हो। मेरे लिए तो तुम्हारे लिए जैसे वक्त ही नहीं है।” उस दिन हँसा नहीं था वह। “आगे से ध्यान रखूँगा।” बस इतना ही कहा था।
चाहे वह कुछ भी कह ले, पर वह क्या नहीं समझती इस बात को। सुशांत कोई मौज-मस्ती करने तो देर तक बाहर नहीं रहता है। जब बेटा कहता है कि पापा इज़ ए सेल्फ-मेड मैन तो सुशांत ही नहीं, वह भी गर्व से भर जाती है। बिना माँ-बाप का बच्चा रिश्तेदारों के आसरे बड़ा हुआ और जब जवान हुआ तो निकल पड़ा खुद ही अपनी मंज़िल तलाशने के लिए। छोटे-बड़े हर तरह के काम सुशांत ने किए। धीरे-धीरे वह दवाइयों का एक बड़ा सप्लायर बन गया। फिर दो दवाई फैक्ट्री भी खोल लीं। बेशक आज वह इस मुकाम पर पहुँच गया है जहाँ उसे कुछ खरीदने से पहले प्राइज टैग देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती, लेकिन अपने फलते-फूलते साम्राज्य को सँभालने में वह आज भी लगा रहता है।
पौने ग्यारह हो गए थे। उसकी आँखें नींद से बोझिल होने लगी थीं। गुस्सा, खीझ और अकेलापन…सब एक साथ उस पर हावी हो गये थे। एक बार उसका मन हुआ कि वह बेटे को फोन करे, लेकिन वह भी उसे ही समझाता है। “माँ, अगर पापा आपको टाइम नहीं दे पाते तो इसलिए नहीं कि वह ऐसा करना नहीं चाहते हैं। बस उनका काम ही ऐसा है। ज़रा सोचो वह कितने थकते होंगे। वह सब कुछ हमारे लिए ही तो कर रहे हैं। इसलिए शिकायत करने के बजाय आप खुद को थोड़ा ज्यादा बिज़ी कर लो।”
सुशांत को देर होती है तो इंतज़ार करते हुए घर में ही इधर से उधर चक्कर काटती रहती है। बीच-बीच में फोन मिलाकर पूछती रहती है कि कब आ रहे हैं। अचानक उसके मन में ख्याल आया उसे तो छोटी-छोटी बातों पर खीझ हो जाती है, तो क्या जब वह सुशांत को काम के बीच में तंग करती है, उसे बुरा नहीं लगता होगा। सुशांत ने कभी भी उसे इस बात के लिए टोका नहीं कि वह इतनी बार उसे फोन न किया करे।
कार का हॉर्न सुनायी दिया। नजरें फिर घड़ी की ओर गयीं। ग्यारह बजकर दस मिनट। दरवाज़ा खोला और बेड पर आकर ऐसे लेट गयी मानो कितनी देर से सो रही थी। “माई डियर वाइफ, अभी तक तैयार भी नहीं हुईं? वैसे वहाँ तो अभी पार्टी शुरू भी नहीं हुई है। अरे रंग तो हमारे पहुँचने के बाद ही चढ़ेगा न,” सुशांत खिलखिलाया और तैयार होने लगा।
“मुझे कहीं नहीं जाना। मज़ाक समझ लिया है क्या तुमने इसे। कितनी देर से तैयार होकर तुम्हारा इंतज़ार कर रही थी। मैं इंतज़ार करते-करते थक गयी हूँ। इस वेटिंग रूम में तो तुम जैसे रात बिताने आते हो।”
“तुम इसे वेटिंग रूम कह लो, पर मैं तो इसे अपना और तुम्हारा घर ही मानता हूँ। तुम मेरी पत्नी हो, इसलिए मैं तुम्हें प्यार करता हूँ, तुम मेरे बेटे की माँ हो, इसलिए मैं तुम्हारी इज्जत करता हूँ। लेकिन अगर तुमको लगता है कि मैं इसे वेटिंग रूम समझता हूँ तो जान लो कि यह ऐसा वेटिंग रूम है जहाँ लोग, अनजाने, अपरिचित सी मुद्रा बनाए बैठे नहीं रहते हैं, जहाँ लोग अपनी ट्रेन आते ही बिना कुछ कहे चले नहीं जाते हैं। यहाँ तो हम साथ-साथ है, बेशक बहुत समय साथ नहीं गुजार पाते, पर फिर भी भरोसा तो रहता है कि मैं लौटकर तो यहीं आऊँगा।”
कुछ देर दोनों के बीच एक मौन पसरा रहा। सुशांत की गम्भीरता उसे खली। अचानक सुशांत की तीव्र हँसी की लहर पूरे कमरे में फैल गयी। “बहुत हो गया। अब बस उठो और तैयार हो जाओ।”
उसने वही कांजीवरम की साड़ी निकाली जो इस बार शादी की सालगिरह पर सुशांत ने उसे दी थी। एकदम चटकदार गुलाबी रंग पर हरे रंग की बूटियाँ बनी थीं। चौड़े बॉर्डर वाला पल्लू जमीन पर लहराया। सुशांत ने उसके गालों को चूम लिया।
समाप्त
