कहानी: ग्रामीणा – सुभद्रा कुमारी चौहान

कहानी: ग्रामीणा - सुभद्रा कुमारी चौहान

1

पंडित रामधन तिवारी को परमात्मा ने सब कुछ दिया था किंतु संतान के बिना उनका घर सूना था। धन धान्य से भरा-पूरा घर उन्हें जंगल की तरह जान पड़ता। संतान की लालसा से उन्होंने न जाने कितने जप-तप और विधान करवाए। ओर अंत में उनकी ढलती उमर में पुत्र तो नहीं पर उनके यहाँ एक पुत्री का जन्म हुआ। इस समय तिवारी जी ने खब खुले हाथों खर्च किया। सारे गाँव के प्रीति-भोज दिया। महीनों घर में ढोलक ठनकती रही। कन्या ही सही पर इसके जन्म ने तिवारी जी के निपुत्री होने के कलंक के को धो दिया था। कन्या का रंग गोरा चिट्टा, आँखें बड़ी बड़ी, चौड़ा माथा और सुंदर सी नासिका थीं। उसके बाल घने, काले और असंख्य नन्हे नन्हे छल्लों की भाँति सिर पर बड़े ही सुहावने लगते थे। उसका नाम रखा गया सोना। सोना का लालन-पालन बड़े लाड़-प्यार से होने लगा।

जब सोना सात साल की हुई तो घर ही में एक मास्टर लगा कर तिवारी जी ने सोना को हिंदी पढ़वाना प्रारम्भ किया। और थोड़े ही समय में सोना ने रामायण, महाभारत इत्यादि धार्मिक पुस्तकें पढ़ना सीख लिया। गाँव के सभी लोगों ने सोना की कुशाग्र बुद्धि की तारीफ की। इसके आगे, अधिक पढ़ाकर तिवारी जी के कन्या से कुछ नोकरी तो करवानी न थी, इसलिए सोना का पढ़ना बंद करवा दिया गया।

अब साना नौ साल की सुकुमार सुंदर बालिका थी। उसकी सुंदरता और सुकुमारता के देखकर गाँव वाले कहते, “तिवारी जी! तुम्हारी लड़की तो देहात के लायक नहीं है। इसका विवाह तो भाई! कहीं शहर में ही करना। सुनते हैं, शहर में बड़ा आराम रहता है।”

इधर तिवारी जी की बहिन जानकी जिसका विवाह, हुआ तो गाँव में ही था, किंतु कुछ दिन से वह शहर में जाकर रहने लगी थी। जब कभी शहर से चौड़े किनार की सफ़ेद साड़ी, आधी बाँह का लेस लगा हुआ जाकेट, टिकली की जगह माथे पर लाल ईंगुर की बिंदी और पैरों में काले काले स्लीपर पहिन के आती तो सारे गाँव की स्त्रियाँ उसे देखने के लिए दौड़ आती। गाँव के तरुणजीवन में उसका आदर था और बूढ़ों की आँखों में वह खटकती थी। किंतु फिर भी वह सब के लिए एक नयी चीज़ थी। जानकी के पति नारायण ने भी मिल में नौकरी कर ली थी उसे बीस रुपये माहवार मिलते थे। वह अब देहाती न था, सोलह आने, शहर का बाबू बन गया था। धोती की जगह ढीला पाजामा, कुरते की जगह कमीज, वास्कट, और कोट पहिनता, पगड़ी की जगह काली टोपी और पैरों में पम्प शू पहिनता था जब कभी गाँव में जाता कान में इत्र का फाया ज़रूर रहता कभी हिना कभी ख़श की मस्त खुशबू से बेचारे देहाती हैरान हो जाते। उन्हें अपने जीवन से शहर का जीवन बड़ा ही सुखमय ओर शांतिदायक मालूम होता।


2

इन सब बातों के देखकर और सोना की सुकुमारता का देखते हुए सोना की माँ नंदों ने निश्वय कर लिया था कि मैं अपनी सोना का विवाह शहर में ही करूँगी। मेरी सोना भी पैरों में पतले-पतले लच्छे और काले-काले स्लीपर पहिनेगी। चोड़े किनार की सफ़ेद साड़ी और लेस लगा हुआ जाकेट पहिन कर वह कितनी सुंदर लगेगी इसकी कल्पना मात्र से ही नंदो हर्ष से विह्वल हो जाती। किंतु सोना का कुछ ज्ञान न था। वह तो अपने देहाती-जीवन में ही मस्त थी। वह दिन भर मधुबाला की तरह स्वच्छंद फिरा करती। कभी-कभी वह ससय पर खाना खाने आ जाती और कभी-कभी तो खेल में खाना भी भूल जाती। सुंदर चीज़ें इकट्टी करने और उन्हें देखने का उसे व्यसन सा था। गाँव में अपनी जोड़ की कोई लड़की उसे न मिलती इसलिए किसी लड़की से उसका अधिक मेल-जोल न था। नंदो को सोना की यह स्वच्छंद-प्रियता पसंद न थी। किंतु वह सोना को दबा भी न सकती थी। वह जब कभी सोना के इसके लिए कुछ कहती तो तिवारी जी उसे आड़े हाथों लेते, कहते, “लड़की है, पराए घर तो उसे जाना ही पड़ेगा। क्यों उसके पीछे पड़ी रहती हो। जितने दिन है खेल खा लेने दो। कुछ तुम्हारे घर जन्म भर थोड़े बनी रहेगी।” लाचार नंदो चुप हो जाती।

धीरे धीरे सोना ने बारह वर्ष पूरे करके तेरहवें में पेर रखा। किंतु तिवारी जी का इस तरफ़ ध्यान ही न था। एक दिन नदो ने उन्हें छेड़ा, “सोना के विवाह की भी भी कुछ फिकर है?”

तिवारी जी चौंक से उठे, बोले, “सोना का विवाह? अभी वह है के साल की?”

किंतु यह कितने दिनों तक चल सकता था। लड़की का विवाह तो करना ही पड़ता। वैसे तो गाँव में भी कई ऐसे लड़के थे जिनसे सोना का विवाह हो सकता था। किंतु नंदो और तिवारी जी दोनों ही सोना का विवाह शहर में करना चाहते थे। शहर के जीवन का सुनहला सपना रह-रह के उनकी आँखों में छा जाता था। उन्होंने जानकी और नारायण से शहर में कोई योग्य वर तलाश करने के लिए कहा।

इधर सोना बारह साल की हो जाने पर भी निरी बालिका ही थी अब भी। वही राजा-रानी का खेल खेला जाता। सुंदर फूल पत्तियाँ अब भी इकट्टी की जातीं और तितलियों के पीछे अब भी उसी प्रकार दोड़ लगती। सोना के अंग प्रत्यंग में धीरे-धीरे यौवन का अवेश प्रारम्भ हो चुका था किंतु सोना के इसका ज्ञान न था। उसके स्वभाव में अब भी वही लापरवाही, वही अल्हड़पन और भोलापन था जो आाठ साल की बालिका के स्वभाव में मिलेगा।


3

सोना का विवाह तै हो गया। वर की आयु 22 या 23 साल की थी। वे सुंदर, स्वस्थ और चरित्रवान नवयुवक थे। एक प्रेस में नौकरी करते थे 75 रुपये माहवार तनख्वाह पाते थे। घर में एक बूढ़ी माँ के छोड़कर और कोई न था। बिहार के रहने वाले थे। कुछ ही दिनों से यू० पी० में आये थे। परदा के बड़े पक्षपाती और पुरानी रूढ़ियों के कायल थे। नाम था विश्वमोहन। जब तिवारी जी ने विश्वमोहन और उनके घर के देखा तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। विश्वमोहन, बाबू क्या पूरे साहब देख पड़ते थे। उनके घर में खिड़की और दरवाज़ों पर चिकें पड़ी हुई थीं। ज़मीन पर एक बड़ी दरी पड़ी थी जिसके बीच में एक गोल मेज़ थी। मेज़ के आस-पास कई कुर्सियाँ पड़ी थीं। जब विश्वमोहन ने तिवारी जी से चाय पीने का आग्रह किया और तिवारी जी के उनके आग्रह से चाय पीनी ही पड़ी तो वहाँ का साज सामान देखकर तिवारी जी चकित हो गये। हर्ष से उनकी आँखें चमक उठीं। सुंदर-सुंदर प्यालों में मेज़ पर चाय पीने का तिवारी जी के जीवन में पहिला ही अवसर था। चाय पीने के बाद तिवारी जी ने दो गिन्नी बरीक्षा में देकर शादी पक्की कर ली। रास्ते में नारायण बोला, “कहो तिवारी जी, है न लड़का हज़ारों में एक? है कोई तुम्हारे गाँव में ऐसा? जब कपड़े पहिन कर हैट लगा कर निकलता है तब कोई नहीं कह सकता कि साहब नहीं हैं। सब लोग झुक के सलाम करते हैं। घर में देखा? कितना परदा है। सब खिड़की दरवाज़ों पर चिके पड़ी हैं। इनकी माँ बूढी हो गयी हैं। पर क्‍या मजाल कि कोई परछाई भी देख ले। दोनों समय चाय पीते हैं, कुर्सियों पर बैठते हैं।

तिवारी जी ने हर्षोन्मत्त होकर कहा, “भाई नारायण, हम तुम्हारे इस उपकार के सदा अभारी रहेंगे। हमारे ढूँढे तो ऐसा घर-वर कभी न मिलता। हम देहात के रहने वाले शहर का हाल-चाल क्या जाने? पर तुमने मेरी सोना को अपनी लड़की सरीखी समझ कर जो उसके लिए इतनी दोड़-धूप की है और ऐसा अच्छा जोड़ मिला दिया है, इस उपकार का फल तुम्हें ईश्वर देगा।”

नारायण— अच्छा तिवारी जी अब जाकर विवाह की तैयारी करो। देखना! इन्हें खाने-पीने का कुछ कष्ट न होने पावे। शहर के आदमी हैं सब तकलीफ़ें सह लेंगे पर भूख नहीं सह सकेंगे। खाते भी अच्छा हैं देहात की मिठाई उन्हें अच्छी न लगेगी कोई शहर का ही हलवाई ले जाकर मिठाई बनवा लेना, समझे।

तिवारी जी खुशी-खुशी घर लोटे। घर आकर जब उन्होंने नंदो के सामने वर के रूप और गुण का बखान किया तो नंदो फूली न समायी। वह जैसा घर-वर सोना के लिए चाहती थी ईश्वर ने उसकी साथ पूरी कर दी। इस कृपा के लिए उसने परमात्मा के शतशः धन्यवाद दिए और नारायण को उसने कोटि कोटि मन से आर्शीवाद दिया जिसने इतनी दौड़-धूप करके मन चाहा घर और वर सोना के लिए खोज दिया था। सोना ने जब सुना कि उसका विवाह हो रहा है तब वह दौड़ कर आयी उसने मां से पूछा, “माँ! विवाह केसा होता है और क्‍यों होता है?”

माँ के सामने यह बड़ा जटिल प्रश्न था। वह समझ ही न सकी कि इसका क्या उत्तर दे किंतु चतुर जानकी ने तुरंत बात बना ली, बोली, “सोना! विवाह हो जाने पर अच्छे-अच्छे गहने कपड़े मिलते हैं इसीलिए विवाह होता है।”

सोना— “बुआ जी फिर क्या होता है?”

जानकी— “फिर सास के घर जाना पड़ता है सो मैं तुझे अपने साथ ले चलूँगी।”

“सो तो मैं पहिले ही से जानती थी, बुआ जी, कि विवाह करने पर सास के घर जाना पड़ता है। पर मैं न कहीं जाऊँगी अभी से कहे देती हूँ विवाह करो चाहे न करो,” कहती हुई सोना खेलने चली गयी।

नंदो का मातृप्रेम आँखों से आँसू बन कर उमड़ आया बोली, “अभी बचपना है बड़ी होगी तब सब समझेगी।”

जानकी—“फिर तो ससुराल से एक-दो दिन के लिए भी मायके आना कठिन हो जायगा भौजी! देखो न मैं ही चार-छै दिन के लिए आती हूँ तो रात-दिन वहीं की फिकर लगी रहती है। जहाँ गृहस्थी का झंझट सिर पर पड़ा सब खेलना-कूदना भूल जाता है। जब तक विवाह नहीं होता तभी तक का खेलना-खाना समझो।

नंदो—“जानकी दीदी! तुम लोगों की कृपा से मेरी सोना सुखी रहे। जैसे उसका नाम सोना है उसके जीवन में सोना ही बरसता रहे।”


4

सोना का विवाह हो गया। रामधन तिवारी की लड़की का विवाह गाँव भर में एक नयी बात थी। इस विवाह में मंगलामुखी के स्थान पर आगरे से भजन-मंडली आयी थी जो उपदेश के अच्छे-अच्छे भजन गा के सुनाया करती थी। गहने कपड़े सब नए फैशन के थे। लहंगों का स्थान साड़ियों ने ले लिया था। जूते थे, मोज़े थे, रुमाल थे, पाउडर की डिब्बी, सुगंधित तेल और भी न जाने क्‍या-क्‍या था जिनकी नंदो और जानकी ने कभी कल्पना तक न की थी। गाँव की औरतों को नंदो बड़ी खुशी-खुशी सब चीज़ें दिखाया करती। देखने-वाली सोना के सौभाग्य की सराहना करती हुई लौट जातीं। उनकी आँखों में आज सोना से अधिक सोभाग्यवती कोई न थी। जिस दिन सोना को ससुराल के सब गहने कपड़े पहिना कर नंदो ने पुत्री का सौंदर्य निहारा तो उसका रोम-रोम पुलकित हो उठा। किसी की नज़र न लग जाय इस डर से उसने छिपाकर बालों के नीचे एक काजल का टीका लगा दिया। जिसने सोना के देखा वही क्षण भर तक उसे देखता रहा। सोना सचमुच में साना ही थी।

विदा का समय आया। माँ-बेटी खूब रोयीं। जब सोना तिवारी जी की कमर से लिपट कर रोने लगी तो तिवारी जी का भी धैर्य जाता रहा वे भी ज़ोर से रो पड़े। सोना की विदा हो गयी। विदा के बाद तिवारी जी को पुत्री के विछोह का दुःख भी था साथ ही साथ आत्मसंतोष भी कि पुत्री अच्छे घर ब्याही गयी है सुख में रहेगी।

सोना ससुराल पहुँची; रास्ते भर तो जैसे तैसे; किंतु घर पहुँचने पर जब वह एक कोठरी में बंद कर दी गयी, और बाहर की साफ़ हवा उसे दुर्लभ हो गयी; तो उसे ससुराल का जीवन बड़ा ही कष्टमय मालूम हुआ। अब उसे गहने कपड़े न सुहाते थे। रह रह कर कोठरी से बाहर निकलकर साफ़ हवा में आने के लिए उसका जी तड़पने लगा। स्वछंद, हवा में विचरने बाली बुलबुल की जो दशा पिंजरे में बंद हाने के बाद होती है वही दशा सोना की थी। चार ही छै दिन में उसके गुलाबी गाल पीले पड़ गये, आँखें भारी रहने लगीं। एक दिन विश्वमोहन ऑफिस चले गये थे, सास सो रही थीं, सोना आँगन के बाहर के दरवाज़े के पास चली आयी। चिक को ज़रा हटा कर बाहर देखा। यहाँ देहात की सुंदरता तो न थी फिर भी साफ हवा अवश्य थी। इतने दिनों के बाद क्षण भर के ही लिए क्‍यों न हो बाहर की हवा लगते ही सोना का चित्त प्रफुल्लित हो गया। किंतु उसी समय एक बुढ़िया उधर से निकली। सोना को उसने चिक के पास देख लिया। आकर विश्वमोहन की माँ से उसने कहा, “बहू का ज़रा सम्हाल क॑ रखा करो। न साल; न छै महीने अभी से खड़ी हो के बाहर झाँकती है। यह लच्छन कुलीन घर की बहू बेटियों को शोभा नहों देते। विस्सू की अस्मा! तुम्हारी इतनी उमर हो गयी आज तक किसी ने परछाई तक न देखी ओर तुम्हारी ही ब्हू के ये लच्छन! कलजुग इसी का कहते हैं।” बुड़िया तो उपदेश देकर चली गयी पर सोना का उस दिन बड़ी डाँट पड़ी।

उसकी समझ में ही न आता था कि चिक के पास जाकर उसने कौन-सा अपराध कर डाला। फिर भी बेचारी ने नतमस्तक सबी झिड़कियाँ सहलीं। और दूसरा चारा ही क्‍या था? इसी बीच जब तिवारी जी सोना के लेने आए ते उसे ऐसा जान पड़ा जैसे किसी ने डूबते से उबार लिया हे।। पिता के देखकर वह बड़ी खुश हुई। उसने मन ही मन प्रतिज्ञा की कि अब के जाऊँगी तो फिर यहाँ कभी न आऊँगी।


5

लेकिन शहर वाले बहू को मायके में ज़्यादा रहने ही कब देते हैं? सोना को मायके आये अभी 15 दिन भी न हुए थे कि विश्वमोहन सोना को लेने के लिए आ गये। वे जब आ रहे थे, सोना उन्हें रास्ते में ही बिही के पेड़ पर चढ़ी हुई मिली। उसके साथ और भी बहुत से लड़के लड़कियाँ थीं। सोना का सर खुला था और वह बिही तोड़-तोड़ कर खा रही थी, और अपनी जूठी चिही खींच-खींच कर मारती भी जा रही और ऊपर बैठी-बैठी हँस रही थी। सोना को विश्वमोहन ने देखा, किंतु सोना उन्हें न देख सकी। पत्नी की चाल-ढाल विश्वमोहन को न सुहाई उनकी आँखों में खून उतर आया पर वे चुपचाप अपने क्रोध के पी गये। किंतु उसी समय उन्होंने मन ही मन प्रतिज्ञा की कि अब वो सेाना को मायके कभी न भेजेंगे। वे जाकर चौपाल में मोढ़े पर बैठे ही थे कि अपने बालसखा और सहेलियों के साथ सोना भी पहुँची। विश्वमोहन को देखते ही उसने हाथ की बिही फेंक दी और सिर ढँक कर अंदर भाग गयी। फिर ससुराल जाना पड़ेगा इस भावना मात्र से ही उसका हृदय व्याकुल हो उठा।

सोना फिर ससुराल आयी। अबकी बार आने के साथ ही घर का सारा भार सोना के सौंप कर सोना की सास ने घर-गृहस्थी से छुट्टी ले ली। कभी घर का काम करने का अभ्यास न होने के कारण सोना को घर के काम करने में बड़ी दिक्कत होती; इसके लिए उसे रोज़ सास की झिड़कियाँ सहनी पड़तीं। सोना ने तो खेलना, खाना, और तितली की तरह उड़ना ही सीखा था। गृहस्थी की गाड़ी में उसे भी कभी जुतना पड़ेगा यह तो उसने कभी सोचा ही न था। किंतु यह कठिनता महीने पंद्रह दिन की ही थी। अभ्यास हो जाने पर फिर सोना को काम करने में कुछ कठिनाई न पड़ती। घर में रात दिन बंद रहने की उसकी आदत न थी। बाहर जाने के लिए उसका जी सदा व्याकुल रहता। यदि कभी खिलौने वालों की आवाज़ सुनती या ‘चनाजोर गरम’ की आवाज़ उसके कान में पड़ती तब वह तड़प सी जाती। अपना यह कैदखाने का जीवन उसे बड़ा ही कष्टकर मालूम पड़ता। किंतु सोना बहुत दिनों तक अपने को न रोक सकी। वह सास और पति की आँख बचा कर गृह‑कार्य के पश्चात्‌ कभी खिड़की, कभी दरवाज़े के पास, जब जैसा मौका मिलता; जाकर खड़ी हो जाती बाहर का दृश्य, हरे हरे पेड़ और पत्तियाँ देखकर उसे कुछ शांति मिलती। बाहर ठंडी हवा को स्पर्श करके उसमें जैसे कुछ जीवन आ जाता। वह जानती थी कि खिड़की, या दरवाज़े के पास वह कभी किसी बुरे उद्देश्य से नहीं जाती, फिर भी पति नाराज़ होंगे, सास झिड़कियाँ लगावेंगी इसलिए वह सदा उनकी नज़र बचा कर ही यह काम करती। मुहल्ले वालों को यह बात सहन न हुई। कल की आयी हुई बहू, बड़े घर की बहू, सदा खिड़की-दरवाज़ों से लगी रहे। अवश्य ही यह आचरण-भ्रष्ट है। धीरे-धीरे आस-पास के लोगों में सोना के आचरण की चर्चा होने लगी। पुराने विचार वाले, पर्दा के पक्षपातियों को सोना की हरएक हरकत में बुराई छोड़ भलाई नज़र ही न आती थी। मुहल्ले के बिगड़े दिल शोहदे, सोना के दरवाज़े पर से दिन में कई बार चक्कर लगाते और आवाजें कसते।

किंतु न तो सोना का इस तरफ ध्यान होता और न उसे इसकी कुछ परवाह थी। वह तो प्रकृति की पुजारिन थी। खिड़की-दरवाज़ों के पास वह प्रकृति की शोभा देखती थी; लोगों की बातों की ओर तो उसका ध्यान भी न जाता था।

इसी बीच में किसी काम से सोना की सास को कुछ दिन के लिए गाँव पर जाना पड़ा। अब पति के ऑफिस जाने के बाद से उसे पूरी स्वतंत्रता थी। उनके ऑफिस जाने के बाद वह स्वच्छंद हिरनी की तरह फिरा करती थी। कोई रोक टोक करने वाला तो था ही नहीं, अब कभी-कभी वह चिक के बाहर भी चली जाया करती। आस-पास की कई औरतों से जान-पहचान भी हो गयी। वे लोग सोना के घर आने‑जाने लगीं। सोना भी कभी कभी लुक-छिप के दोपहर के सन्नाटे में उनके घर हो आती। सोना के बारे में; उसके आचरण के विषय में लोग कया बकते हैं सोना न जानती थी। वह तो उन्हें अपना हितैषी और मित्र समझती थी। वही लोग, जो सोना से घुल मिलकर घंटों बातचीत किया करते, बाहर जाकर न जाने क्या-क्या बकते। धीरे-धीरे इसकी चर्चा विश्वमोहन के भी कानों तक पहुँची। इन सब बातों को रोकने के लिए उन्होंने अपनी माँ की उपस्थिति आवश्यक समझी। इसलिए माँ को बुलावा भेजा। साथ ही सोना को भी समझा दिया कि वह बहुत सम्हल कर रहा करे। सास के आने पर सोना के ऊपर फिर से पहरा बैठ गया। किंतु वह तो गाँव की लड़की थी; साफ़ हवा में विचर चुकी थी। उसके लिए सख्त परदे में, बिलकुल बंद होकर रहना बड़ा कठिन था। इसलिए उसका जीवन बड़ा दुःखी था। उससे घर के भीतर बैठा ही न जाता था। ज़रा मौका पाते ही बाहर साफ़ हवा में जाने के लिए उसका जी मचल उठता और वह अपने आप को रोक न सकती। विश्वमोहन ने एकांत में उसे कई बार समझाया कि सोना के इस आचरण से उनकी बहुत बदनामी हो रही है इसलिए वह खिड़की-दरवाज़ों के पास न जाया करे, बाहर न निकला करे। एक दो दिन तक तो सोना को उनकी बाते याद रहतीं किंतु वह फिर भूल जाती और वही हाल फिर हो जाता। फिर खिड़की दरवाज़ों के पास जाती फिर बाहर की साफ हवा में जाने के लिए, प्रकृति के सुंदर दृश्यों के देखने के लिए; उसकी आँखें मचल उठतीं |

एक दिन विश्वमोहन को किसी काम से शहर के बाहर जाना था। सोना ने पति का सामान ठीक कर उन्हें स्टेशन रवाना किया। सास खाना खा चुकने के बाद लेट गयी। सोना ने अपनी गृहस्थी के काम-धंधे समाप्त करके, कंघी चोटी की, कपड़े बदले; पान बना के खाया, फिर एक पुस्तक लेकर पढ़ने के लिए खाट पर लेट गयी। पुस्तक कई बार की पढ़ी हुईं थी; दो चार पेज उलट-पलट कर देखे जी न लगा। उसी समय ठेले वाले ने आवाज़ दी ‘दो पेसे वाला’ ‘दो पैसे वाला’ ‘सब चीजें दो-दो पैसों में लो।’ किताब फेंक कर सोना दरवाज़े की तरफ़ दौड़ी। ठेले वाला दूर निकल गया था; दूर तक नज़र दौड़ाई; कहीं भीं न देख पड़ा, निराश होकर लौटने ही वाली थी कि पड़ोस ही में रहने वाला बनिए का लड़का फ़ैजू दौड़ा हुआ आया बोला, “भौजी! सुई तागा हो तो ज़रा मेरे कुर्ते में बटन टाँक दो में कुश्ती देखने जाता हूँ।”

सोना ने पूछा, “कुश्ती देखने जाते हो कि लड़ने?”

फैजू ने मुस्कुा कर कहा, “दोनों काम करने भौजी! पर पहिले बटन तो टाँक दो नहीं तो देरी हो जायगी।”

सोना सुई टागा लाकर बटन टाँकने लगी। फैजू वहीं फर्श पर सोना से ज़रा दूर हटकर बैठ गया।


6

गाड़ी तीन घंटे लेट थी। विश्वमोहन ने सोचा यहाँ बैठे बैठे क्‍या करेंगे चलें जब तक घर में ही बैठकर आराम करेंगे। सामान स्टेशन पर ही छोडकर, स्टेशन मास्टर की साइकिल लेकर विश्वमोहन घर पहुँचे। बैठक में फैजू को सोना के पास बैठा देखकर उनके बदन में आग सी लग गयी। वे क्षण भर वहीं खड़े रहे! परंतु इस दृश्य को वे गवारान कर सके। अपने गुस्से को चुपचाप पीकर अंदर आये माता के पास बैठ गये। सोना से पति की नाराज़ी छिपी न रही। ज्यों त्यों किसी प्रकार बटन टाँक कर कुरता फैजू को देकर वह अंदर आयी। सोना ने स्वप्न में भी न सोचा था कि यह ज़रा सी बात यहाँ तक बढ़ जायगी। पति का चेहरा देख कर वह सहम सी गयी। उनकी त्योरियाँ चढ़ी हुई, चेहरा स्याह, और आँखें कुछ गीली थीं। सोना अंदर आयी विश्वमोहन ने उसकी तरफ आँख उठाकर भी न देखा।

उसने डरते डरते पति से पूछा, “कैसे लोट आये?”

विश्वमोहन ने रुखाई से दो शब्दों में उत्तर दिया, “गाड़ी लेट है।”

सोना ने फिर छेड़ा, “अब कब जाओगे?”

विश्वमोहन के एक तीव्र दृष्टि पत्नी पर डाली और कठोर स्वर में बोला, “गाड़ी तीन घंटे बाद जायगी तब चला जाऊँगा।”

सोना फिर नम्रता से बोली, “तो इस प्रकार बैठे कब तक रहोगे? मैं खाट बिछाये देती हूँ आराम से लेट जाओ।”

“तुम्हें कष्ट करने की आवश्यकता नहीं में वहुत अच्छी तरह हूँ?” विश्वमोहन ने कड़े स्वर में रुखाई से कहा। सोना के बहुत आग्रह करने पर विश्वमोहन ने कमरे में पैर रखा; न वे कुछ बोल और न खाट पर ही लेटे; कुर्सी पर बैठ गये। एक पुस्तक उठाकर उसके पन्ने उलटने लगे। पढ़ने के नाम से कदाचित्‌ एक अक्षर भी न पढ़ सके हों किंतु इस प्रकार वे अपनी अंतर-वेदना को चुपचाप लहू की घूँट की तरह पी रहे थे। सोना का आचरण उन्हें हज़ार हज़ार बिच्छुओं के दंशन की तरह पीड़ा पहुँचा रहा था। पति की आंतरिक वेदना सोना से छिपी न थी वह ज़रा खिसक कर उनके पास बैठ गयी। धौरे से उसने अपना सिर विश्वमोहन के पैरों पर घर दिया बोली, “… इस बार मुझे माफ़ करो अब तुम जो कुछ कहोगे में वही करूँगी मुझ से नाराज न होओ।”

विश्वमोहन के पैरों पर जैसे किसी ने जलती हुई आग धर दी हो, जल्दी से उन्होंने अपने पैर समेट लिए और तिरस्कार के स्वर से बोले, “यह बात आज क्या तुम पहिली ही बार कह रही हो? यह मौखिक प्रतिज्ञा है हृदय की नहीं। मैं सब जानता हूँ। तुम्हारे कारण तो मैं शहर में सिर उठाने लायक नहीं रहा। जिधर जाओ उधर ही लोग तुम्हारी चर्चा करते हुए दिख पड़ते हैं। मेरे, तुम्हारे, मुँह पर कोई कुछ नहीं कहता तो क्‍या हुआ बाद में तो कानाफूसी करते हैं। तुम्हारे ऊपर तो जैसे इसका कुछ असर ही नहीं पड़ता। जो जी में आता है करती हो। भला वह शोहदा तुम्हारे पास बटन टँकवाने क्‍यों आया? क्‍या तुम इनकार न कर सकती थीं? तुम यदि शह न दो तो कैसे कोई तुम्हारे पास आवे।”

सोना ने भय-कातर दृष्टि से पति की ओर देखते हुए कहा, “ज़रा सा तो काम था। पड़ोसी-धर्म के नाते, मैंने सोचा कि कर ही देना चाहिए। नहीं तो इनकार क्‍यों नहीं कर सकती थी?”

“इसी प्रकार ज़रा ज़रा सी बातों से बड़ी बड़ी बातें भी हो जाया करती हैं। निभाया करो पड़ोसी-धर्म; मेरी इज़्ज़त का खयाल मत करना,” कहते हुए विश्वमोहन बाहर चले गये। साइकिल उठाई ओर स्टेशन चल दिए।

आहत-अपसान से सोना तड़प उठी। वह कटे हुए वृक्ष की भाँति खाट पर गिर पड़ी और खूब रोयी। रो लेने के बाद उसका जी कुछ हल्का हुआ। उसे अपने गाँव का स्वछंद जीवन याद आने लगा। देहाती जीवन की सुखद स्थृतियाँ एक-एक करके सुकवि की सुंदर कल्पना की भाँति उसके दिमाग में आने लगीं। उसे याद आया किस प्रकार जाड़े के दिनों में अलाव के पास; न जाने कितनी रात तक, बूढ़े, जवान, युवतियाँ और बच्चे सब एक साथ बैठकर आग तापते हुए पहेलियाँ बुझाते और किस्से कहानियाँ कहा करते थे। किसी के साथ किसी प्रकार का बंधन न था। नदी पर गाँव भर की बहू-बेटियाँ कैसे स्नान करने को जाती थीं और फिर सब एक साथ गाती हुई लौटती थीं; कितना सुखमय जीवन था वह। चने के खेत में नर्म-नर्म चने की भाजी तोड़ कर सब एक साथ ही किस प्रकार खाया करते थे और कभी कभी छीना‑झपटी भी हो जाया करती थी। हँसी-मज़ाक भी खूब होता था। किंतु वहाँ किसी को कुछ शिकायत न थी। अपने पड़ोसी कुंदन के लिए वह माँ से लड़भिड़ कर भी मिठाई ले जाया करती थी। नदी पर नहाने के बाद कभी-कभी कुंदन उसकी धोती भी तो धो दिया करता था। किंतु वहाँ तो इसकी कभी चर्चा भी नहीं हुई। क्रोशिये से एक सुंदर सा पोत का बटुआ बना कर सबके सामने ही तो उसने कुंदन को दिया था। जो अब तक उसके पास रखा हेगा, पर वहाँ तो इस पर किसी का भी बुरा न लगा था। वहाँ सब लोगों को सब से बोलने, बात करने की स्वतंत्रता थी। कुंदन की भाभी नयी ही नयी तो विवाह के आयीं थी, पर हम लोगों के साथ ही रोज नदी नहाने जाया करती थी, और साथ बैठकर झूला भी झूला करती थी; अलाव के पास भी बैठा करती थी। फिर मैंने कोन सा ऐसा पाप कर डाला, जिसके कारण इन्हें शहर में सर उठाने की जगह नहीं रही। यदि किसी का कुछ काम कर देना, बोलना, या बातचीत करना ही पाप है; तो कदाचित्‌ यह पाप जाने अनजाने मुझसे सदा ही होता रहेगा। मेरे कारण इन्हें पद पद पर लांछित होना पड़े, तो मेरे इस जीवन का मूल्य ही क्या है। ऐसे जीवन से तो मर जाना अच्छा है। मैं घर के अंदर परदे में नहीं बैठ सकती यही तो मेरा अपराध है न? इसी के कारण तो लोग मेरे आचरण तक में धब्बे लगाते हैं? मैं लोगों से अच्छी तरह बोलती हूँ, प्रेम का व्यवहार रखती हूँ; यही तो मुझमें बुराई है न? आज उन्हें मुझ पर क्रोध आया; उन्होंने तिरस्कार के साथ मुझे झिड़क दिया। इसमें उनका काई क़सूर नहीं है। पत्थर के पाठ पर भी रस्सी के रोज़ रोज़ के घिसने से निशान पड़ ही जाते हैं; फिर वे तो देव तुल्य पुरुष हैं। उनका हृदय तो कोमल है, इन अपवादों का असर कैसे न पड़ता? रामचंद्र जी सरीखे महापुरुष ने भी ता ज़रा सी ही बात पर गर्भवती सीता को वनवास दे दिया था। फिर ये तो साधारण मनुष्य ही हैं। इन्होंने तो जो कुछ कहा ठीक ही कहा। पर इसमें मेरा भी कौन सा दोष है किंतु जब उन्हीं के हृदय में संदेह ने घर कर लिया तो मैं तो जीती हुईं भी मरी से गयी बीती हूँ। इसी प्रकार अनेक तरह के संकल्प विकल्प सोना के मस्तिष्क में आये और चले गये।


7

तीन दिन के बाद विश्वमोहन लौटे। जाने के पहिले उनमें और सोना में जो कुछ बात-चीत हुई थी; वे उसे प्रायः भूल से गये थे। सोना के लिए अच्छी सी साड़ी, एक जोड़ी पैरों के लिए सुंदर सी स्लीपर और कुछ हेयरक्लिप लिए हुए वे घर आए; किंतु सामने ही चबूतरे पर उन्हें फैजू बैठा हुआ मिला। पास की हरी-हरी घास पर वह अपना तीतर चरा रहा था। विश्व मेाहन उसे देखते ही तिलमिला से उठे; संदेह और भी गहरा हो गया। सारी बातें ज्यों की त्यों फिर ताज़ी हो गयी। उनका हृदय बड़ा ही विचलित और व्यथित हुआ न जाने कितनी प्रकार की शंकाएँ उन्हें व्याकुल करने लगीं। उनका चेहरा फिर गम्भीर हो गया। घर आकर वे सोना से एक बात भी न कर सके। माँ से एक दो बातें कर, बिना भेजन किए ही वे ऑफिस चले गये। सोना से यह उपेक्षा न सही गयी। पिछले तीन दिनों से वह खिड़की-दरवाज़ों के पास भी न गयी थी; और उसने यह निश्चय कर लिया था कि अब वह कभी भी खिड़की-दरवाज़ों के पास न जायगी। किंतु विश्वमेहन की इस उपेक्षा ने उसके हृदय के घाव को और, भी गहरा कर दिया। सोना अब इससे अधिक न सह सकती थी। अपनी जीवन-लीला समाप्त करने का उसे काई साधन न मिला। आँगन में लगे हुए धतूरे के पेड़ से उसने दो-तीन फल तोड़ लिये और पीस कर पी गयी। कुछ द्वी क्षण बाद सोना के हाथ-पैर अकड़ने लगे, उसकी ज़बान ऐंठ गयी; और चेहरा काला पड़ गया। वह देखती थी किंतु बोल न सकती थी। इसी समय तिवारी जी आ पहुँचे, वे सोना को विदा कराने आये थे। सोना पिता को देखकर बहुत रोयी। सारे घर में भी कुहराम मच गया और देखते ही देखते सोना के प्राण पखेरू उड़ गये। यह ऐसी नींद थी जिसने सोना को सदा के लिए शांति दे दी तथा अपवादों की विषैली वायु अब उसे छू भी न सकती थी।

शाम को छै बजे विश्वमोहन ऑफिस से लौटे। घर में रोने की आवाज़ सुनकर किसी अज्ञात आशंका से उनका हृदय विचलित हो उठा। घर में आकर देखा तिवारी जी कन्या की लाश गोद में लिये हुए दहाड़ें मार-मार के रो रहे हैं। तिवारी जी इस बीच कई बार कन्या के लेने आ चुके थे किंतु विश्वमोहन ने विदा न की थी। विश्वमेहन और तिवारी जी में कोई विशेष बातचीत न हुईं, अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी। अंतिम संस्कार के बाद जब विश्वमोहन लौटे तो मेज पर उन्हें सोना का पत्र मिला—

मेरे देवता! मैं मर रही हूँ। किंतु साथ ही विश्वास दिलाती हूँ कि मैं निर्दोष हूँ। मुझे ऐसा लगता है कि या तो यह दुनिया मेरे लायक नहीं है या मैं ही इस दुनिया के योग्य नहीं हूँ। इस छल कपट से परिपूर्ण संसार में मुझे, भेजकर शायद विधाता ने भूल की थी। मुझे अपने मरने का अफसोस नहीं। कोई दुःख है तो केवल इस बात का कि में आपको कभी सुखी न कर सकी।

—अभागिनी सोना

समाप्त


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Author

  • सुभद्रा कुमारी चौहान

    जन्म: 16 अगस्त 1904
    निधन: 15 फरवरी 1948

    सुभद्रा कुमारी चौहान हिंदी की सुप्रसिद्ध कवयित्री, लेखिका और स्वतंत्रता सैनानी थीं। वह अपनी कविता झाँसी की रानी के कारण प्रसिद्ध हैं।

    काव्य संग्रह: मुकुल, त्रिधारा
    कहानी संग्रह: बिखरे मोती (1932), उन्मादिनी (1934), सीधे साधे चित्र (1947)

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