बात बहुत पुरानी है। शायद तब इस धरा पर इंसानों का अस्तित्व भी नहीं था। उस समय नंदन वन और सुंदर वन एक दूसरे के पड़ोसी थे। नंदन वन में शेरों का राज था और सुंदर वन में बाघों का। शेर और बाघ दोनों एक-दूसरे के जंगल पर अपना एकक्षत्र राज स्थापित करना चाहते थे किंतु किसी के भी किसी से कम न होने के कारण किसी एक की जीत सम्भव नहीं हो रही थी। यह लड़ाई कई पीढ़ियों से चली आ रही थी। और कई पीढ़ियों तक चलती रहती अगर शेरों को एक उपाय न सूझा होता।
अचानक से सुंदर वन के बाघों की मौज हो गयी। उनकी गुफा के बाहर हर रोज़ उन्हें एक शिकार बँधा हुआ मिलने लगा था। कभी बकरा, तो कभी भैंसा, तो कभी हिरण। जब भी बाघ अपनी गुफा से शिकार के लिए बाहर निकलते तो मुहाने पर ही उन्हें एक जानवर मिल जाता जो लगभग अधमरी हालत में होता था। बाघ उसे बड़ी ही आसानी से खींच कर अपनी गुफा में ले जाते और मौज उड़ाते थे।
यह प्रक्रिया कई वर्षों तक अनवरत चलती रही। मुफ़्त में भोजन मिलने का सिलसिला बाघों के बच्चों के सुंदर वन का राजा बनने के बाद भी जारी रहा।
फिर एक दिन अचानक जैसे यह सब शुरु हुआ था वैसे ही बंद हो गया। बाघ जब गुफा से बाहर निकले तो वहाँ उनके लिए कोई भोजन मौजूद नहीं था। वे थोड़ा आगे गये तो उन्हें जंगली भैसों का एक झुंड दिखा। उन्होंने आव देखा न ताव सीधे उन पर हमला करने चल पड़े। वे तो यह भी नहीं जानते थे कि शिकार किया कैसे जाता है। वर्षों से उन्हें बैठे-बैठाए भोजन जो मिल रहा था। उन्होंने अपने पूर्वजों से शिकार का गुण सीखा ही नहीं था। ऐसे नौसिखिये बाघ जब भैसों से उलझने गए तो उन्हें मुँह की खानी पड़ी।
थके-माँदे और चोटिल बाघ चुपचाप अपनी गुफा में लौट आये। कुछ दिनों तक तो उन्होंने शिकार करने का प्रयत्न भी किया किंतु कभी भी सफल न हो सके। भूख और कमज़ोरी के कारण उनकी हालत बेहद खराब हो चली थी।
कुछ दिनों बाद सुंदर वन के जानवरों ने नंदन वन के शेरों को आते देखा। शेर बड़े आराम से बाघों की माँद में दाखिल हुए और उसके बाद सुंदर वन में कभी भी बाघ दिखाई नहीं पड़े। अब सुंदर वन में भी शेरों का ही राज चलता था।
उसके बाद से आज तक शेर ही जंगल का राजा होता आया है।
समाप्त
