आज हम ऐसे समाज में जी रहे हैं जहाँ हर कोई अब सम्भावित मीम मटेरियल या सम्भावित वायरल कंटेंट पीस बनकर रह गया है। सब इसी फिराक में रहते हैं कि ‘कोई’ गलती करता मिले और फिर उस गलती को हम अपने कंटेंट पीस की तरह इस्तेमाल करके अधिक से अधिक लाइक, शेयर और व्यूज़ पाएँ। यह ‘कोई’ आम व्यक्ति भी हो सकता है और सेलिब्रिटी या प्रसिद्ध व्यक्ति भी। चूँकि सेलिब्रिटी और प्रसिद्ध व्यक्तियों के ट्रेंड में जाने की सम्भावना अधिक होती है तो अक्सर उन्हें ही इस प्रवृत्ति का शिकार अधिक होना पड़ता है। इसी प्रवृत्ति और उससे होने वाले असर के ऊपर लेखक गौरव कुमार निगम ने अपने यह विचार लिखें हैं। आप भी पढ़ें:
किसी सुलझे हुए इंसान ने कहा था कि बुरे वक़्त की शुरुआत उस दिन नहीं होती जब ज़िंदगी लड़खड़ाती है… असल शुरुआत उस दिन होती है, जब आपकी लड़खड़ाहट तमाशा बनकर लोगों तक पहुँच जाती है।
एक पत्रकार हैं, अपनी फील्ड के मँझे हुए खिलाड़ी माने जाते हैं और शोहरत इतनी है कि बॉलीवुड या राजनीति की छोटी मोटी सेलेब्रिटी से ज़्यादा रुतबा रखते हैं… कैमरे के इतने अभ्यस्त हैं, जैसे ताल में तैरती सुनहरी मछली।
फिर एक दिन उन्होंने अपने पेशे की सुरक्षित चौखट से बाहर कदम रखा… एक OTT सीरीज में बतौर विलेन पदार्पण कर बैठे और पाया कि किसी काम पर घंटों बहस कर लेना और खुद उस मैदान में उतरना, दो बिलकुल अलग चीज़ें हैं।
उनकी एक्टिंग देखना तो ख़राब था ही, लेकिन उससे भी ख़राब था सोशल मीडिया पर उनकी जबरदस्त, चौतरफा ट्रोलिंग। ऐसा लगा जैसे समाज किसी इनसान की असफलता का इंतज़ार पहले से करके बैठा था।
ऐसा इंसान, जिसकी अपनी फील्ड में कामयाबी बहुतों के लिए काबिल-ए-रश्क है, वो सोसाइटी में सफल होने के हर फैक्टर पर सिक्योर होने के बाद करियर में एक नया एक्सपेरिमेंट करता है जिसके फेल हो जाने पर भी उसका ऐसा कुछ नहीं खोया जो वो जब चाहे वापस हासिल ना कर सके… उसकी ब्रूटल ट्रोलिंग से सोशल मीडिया अटा पड़ा है।
लेकिन उस पूरी भीड़ में शायद ही कोई ऐसा था जिसने यह सोचा हो कि किसी स्थापित आदमी को, जिसने अपनी पहचान बनाने में दशकों लगाए हों, उसे भी कुछ नया शुरू करते वक़्त उतना ही डर लगता होगा जितना किसी नये लड़के को पहली नौकरी के इंटरव्यू में लगता है।
समाज सफलता की कहानियाँ तो बड़े प्रेम से सुनता है, लेकिन कोशिशों का सम्मान करना उसे कभी आया ही नहीं।
हम ऐसे दौर में जी रहे हैं जहाँ लोग चाहते हैं कि आप सफल हों…लेकिन पहली ही कोशिश में।
उन्हें संघर्ष प्रेरित नहीं करता, केवल परिणाम प्रभावित करते हैं।
उन्हें विश्व विजय की यात्रा में आने वाली मुश्किलों से नहीं मिलना है, उन्हें केवल विजेता चाहिए।
जंगल में दौड़ रहा कोई शेर हर शिकार नहीं पकड़ पाता।
आसमान की ऊँचाइयाँ नापता कोई बाज़ हर झपट्टे में सफल नहीं होता।
लेकिन प्रकृति में असफलता अपमान नहीं बनती। वहाँ जीव अगली कोशिश करता है।
सिर्फ इंसानों ने एक ऐसी दुनिया बना ली है जहाँ पहली चूक को ही चरित्र का अंतिम सत्य मान लिया जाता है।
शायद गलतियाँ माफ़ करने का, असफलताओं को भी एक्सेप्ट करने का सलीका करना नहीं आया है इस समाज को…।
पहली गलती को ही आखिरी बना देने की कुछ सैडिस्टिक सी प्रवृत्ति है शायद इस इंसानी समाज की।
क्या यह दूसरे की विफलताओं में अपना सुख तलाशने का विद्रूप प्रयत्न नहीं है?
और शायद इसी का नतीजा है कि परीक्षाओं में फेल होने वाले सैंकड़ों, हजारों बच्चे एक असफलता के बाद, चूक जाने के बाद समाज के चुभते हुए तानों को झेलने की जगह झूल जाना ज़्यादा आसान पाते हैं।
रिश्तों में गलत चुनाव कर बैठने वाले लोग उससे विदा लेकर आगे बढ़ जाने की जगह रोज उसी जंजाल में उलझे रहना सहज पाते हैं। जो कभी दुनिया बदलने का जज्बा रखते थे, वो अपनी नौकरी तक नहीं बदल पा रहे हैं।
आपकी एक गलती, सिर्फ एक गलती आपको इंसान से एक मीम मटेरियल बना सकती है… इंटरनेट पर दौड़ती बस एक ऐसी तस्वीर या विडियो जिसके उपहास का अधिकार सबको होगा लेकिन सुधार का उपाय शायद ही कोई बताये।
हमने एक ऐसी सभ्यता बना ली है जहाँ लोग कोशिश करने से पहले अपनी सम्भावित बेइज़्ज़ती की गणना करते हैं।
फिर हम शिकायत करते हैं कि लोग नया क्यों नहीं सोचते।
जो सोचते हैं, वे बोलते क्यों नहीं।
जो बोलते हैं, वे बदलते क्यों नहीं।
क्यूँकि इस दुनिया में गलती करना अब इंसानी नहीं, सार्वजनिक अपराध बना दिया गया है।
और जिस समाज में लोग गिरने से ज़्यादा, गिरते हुए दिख जाने से डरने लगें… वहाँ धीरे-धीरे साहस मर जाता है।
क्या रचेंगे!
और क्या बचेंगे हम!
