कहानी: अवसरवाद – विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’

कहानी: अवसरवाद - विश्वम्भरनाथ शर्मा 'कौशिक'

1

रायबहादुर साहब अपने हवाली-मवालियों सहित विराजमान थे। इसी समय एक अन्य महोदय पधारे। इन्हें देखकर रायबहादुर साहब मुस्कराकर बोले, “आओ भई वर्माजी! कहो क्या समाचार है?”

“समाचार अच्छे हैं, गांधी-जयंती की सजावट हो रही है।”

“भई एक बात समझ में नहीं आती। गांधी-जयंती तो प्रतिवर्ष आती है, परंतु इस बार जितनी धूमधाम है उतनी पहले कभी नहीं हुई। इस बार की जयंती में क्या खसूसियत है?” रायबहादुर साहब ने पूछा।

एक सज्जन बोले, “भई यह तो कोई काँग्रेस वाला ही बता सकता है।”

“भई वजह कुछ भी हो, लेकिन लोगों में उत्साह खूब है।”

“उत्साह तो हुआ ही चाहे और होना भी चाहिए।”

“गांधीजी जब पचास वर्ष के हुए थे तब कुछ हुआ था?”

“खयाल नहीं पड़ता। उस दफा तो अवश्य हुआ होगा।”

“हमें तो खयाल नहीं पड़ता कि कुछ हुआ था।”

“पिछली बातों को छोड़िये। इस बार आप रोशनी करेंगे?”

“आप लोग सलाह दीजिए।”

“इसमें सलाह की क्या आवश्यकता—जैसी आपकी श्रद्धा हो!“

“रोशनी करें तो सजावट भी करें।”

“हाँ फाटक-वाटक बनवाना चाहिए।”

रोशनी न करेंगे तो—।”

“तो क्या?”

“लोग बुरा मानेंगे।”

“और आगे काँग्रेस मिनिस्ट्री भी आ रही है—यह याद रखिये।”

रायबहादुर साहब बोले, “अरे यारो कोई ऐसा डौल नहीं लग सकता कि हमें काँग्रेस एसेम्बली के लिए खड़ा कर दे।”

“इसकी केवल एक तरकीब है।”

“वह क्या?”

“रायबहादुरी का खिताब त्याग दीजिये ओर जयंती पर खूब सजावट और रोशनी कीजिए।”

“रायबहादुरी का खिताब त्यागने को बात गलत है।”

“बिना खिताब छोड़े तो काँग्रेस आपको खड़ा नहीं करेगी।”

“कहीं ऐसा न हो कि दोनों दीन से गये पाँड़े न हलवा मिला न माँड़े। खिताब भी छोड़े और एसेम्बली की सीट भी न मिले।”

“हिंदू सभा की ओर से खड़े होने पर भी खिताब त्यागना पड़ेगा।”

“एक काम कीजिए कि खिताब तो त्याग दीजिए और काँग्रेसियों से मेल बढ़ाइये। प्रयत्न कीजिये—बिना प्रयत्न किए कुछ न होगा।”

“खिताब छोड़ते बड़ा कष्ट होता है।”

“सो तो होता होगा—बड़े कष्ट से मिला भो तो होगा।”

“क्या पूछते हो। न जाने कितना रुपया खर्च हुआ और कितनी दौड़-धूप की गयी तब कहीं यह खिताब मिला है।”

“इसमें कोई सन्देह नहीं, परन्तु यदि एम० एल० ए० बना चाहिए तो खिताब छोड़ना ही पड़ेगा।”

“कोई ऐसी तरकीब नहीं निकल सकती कि खिताब न छोड़ना पड़े और एसेम्बली में भी पहुँच जाय।”

“हमारी समझ में तो ऐसी कोई तरकीब नहीं निकल सकती।”

“खिताब छोड़ने पर हाकिम लोग नाराज़ हो जायँगे।”

“हाँ नाराज तो अवश्य होंगे, पर आपका क्या कर लेंगे?”

“अरे भई कभी कोई काम पड़ा तो कलस्टर साहब बात भी न करेंगे।”

“यदि आप एम० एल० ए० हो गये तो हुक्काम लोग आपको खुशामद करेंगे—यह भी तो देखिये।”

“हाँ यह बात तो पक्की है।”

“तो बस फिर हटाइये झगड़ा।”

“अच्छा आज ज़रा इस पर विचार कर लें।”


2

रायबहादुर साहब ने खूब सोच-विचार करके खिताब छोड़ देना ही निश्चय किया। अतः उन्होंने रायबहादुरी का खिताब त्याग दिया। एक दिन नगर-निवासियों ने एक स्थानीय पत्र में यह समाचार बड़े आश्चर्य के साथ पढ़ा कि रायबहादुर सम्पत्तिलाल ने अपना खिताब वापस कर दिया और काँग्रेस में सम्मिलित हो गये।

इस समाचार के प्रकाशित होते ही सम्पत्तिलाल के पास बधाइयाँ आने लगीं। कुछ काँग्रेसी बधाई देने गये। सम्पत्तिलाल ने उनकी बड़ी खातिर की। इस प्रकार काँग्रेसी लोगों का आवागमन सम्पत्तिलाल के यहाँ हो गया और घनिष्ठता उत्पन्न हो गयी। अब सम्पत्तिलाल खद्दरधारी हो गये।

क्रमशः यह नियम हो गया कि कदाचित ही कोई ऐसा अशुभ दिन जाता हो जब कि चार-छह काँग्रेसी सम्पत्तिलाल के यहाँ भोजन न करते हों। दो चार ने तो समय ताक लिया था। सम्पत्तिलाल के यहाँ भोजन के समय पहुँच जाते थे।

एक दिन सम्पत्तिलाल बोले, “यदि एसेम्बली के लिए हम खड़े हों तो कैसा।”

“वाहवा! बड़ा अच्छा रहे आप जैसों को तो जाना हो चाहिए।”

“परंतु काँग्रेस हमें अपना केंडीडेट चुन लेगी?”

“आप ने इतना त्याग किया है, खिताब छोड़ा, खद्दर धारण किया, अब तो आपको चुनने में कोई आपत्ति न होना चाहिए।”

“आप लोग प्रयत्न करें तो सम्भव हो सकता है।”

“काँग्रेसी भाई आपस में परामर्श करके बोले, “एक काम कीजिए! प्रांत के दो बड़े नेताओं को अपने यहाँ निमंत्रित कीजिए।”

“निमंत्रित करने का कोई अवसर भी तो होना चाहिए।’

“अवसर तो गांधी-जयंती के रूप में आ रहा है। खूब सजावट, रोशनी, इत्यादि कीजिए। उसी में कोई ऐसी बात रख दीजिये कि जिसमें उनको बुलाया जा सके।”

“वही तो सोचना है।”

“केवल मीटिंग रखने से तो काम चलेगा नहीं।”

“कोई उद्घाटन हो तो काम बन जाय।”

“न हो गांधी जयंती के स्मारक रूप एक गांधी पुस्तकालय ही स्थापित कर दीजिए।”

“यह काम सब से सरल है।”

“हाँ यह हमारे लिए सरल है। अपने किसी मकान का थोड़ा भाग पुस्तकालय के लिए दे दें और हमारे यहाँ अपना निजी पुस्तकालय हई है वह उठवा कर वहाँ रखवा दें।”

“वाहवा! यह तो बड़ी सरलता-पूर्वक हो जायगा।”

“तो फिर इसके लिए अभी से तैयारी की जाय।”

चार दिन पश्चात स्थानीय पत्रों में समाचार निकला।

श्री सम्पत्तिलाल जी की उदारता! हमारे नगर के गण्यमान रईस श्री सम्पत्तिलाल जी, जो अपना रायबहादुरी का खिताब त्याग कर काँग्रेस में सम्मिलित हो गए हैं गांधी-जयंती के पुण्यावसर पर ‘गांधी पुस्तकालय’ की स्थापना करेंगे। पुस्तकालय का उद्घाटन किसी प्रांतीय नेता द्वारा होगा।

यह समाचार निकलने के बाद प्रान्तीय नेताओं के पास दौड़ होने लगी। कुछ खाऊ वीर काँग्रेसमैनों की बन आयी! सेकेंड क्लास का किराया तथा होटल-खर्च लेकर प्रांतीय नेताओं के पास जाने लगे। एक बार के जाने में कार्य नहीं हुआ, तीन-तीन चार-चार बार जाना पड़ा। कभी कोई नेता मिला नहीं, कभी अस्वस्थ मिला, कभी सोच कर उत्तर देने को कहा।

अंततोगत्वा काफी दौड़ धूप होने के पश्चात एक नेता महोदय को पुस्तकालय का उद्घाटन करने के लिए राज़ी कर लिया।

भूतपूर्व रायबहादुर साहब ने खूब सजावट की। रोशनी का प्रबंध भी अच्छा किया। गांधी-जयंती वाले दिन बड़े धूमधाम से पुस्तकालय का उद्घाटन कार्य सम्पन्न किया गया। पार्टी भी हुई जिसमें नगर के सभी काँग्रेसी तथा अन्य प्रतिष्ठित नागरिक सम्मिलित हुए।

नगर काँग्रेस कमेटी के एक पदाधिकारी ने सम्पत्तिलाल जी से कहा, “अब आपके एम० एल० ए० होने में कोई संदेह नहीं रहा।”

सम्पत्तिलाल जी बड़े प्रसन्न! उनकी कोठी निठल्ले काँग्रेसियों का अड्डा बन गया। जब देखिए दो-चार डटे हैं और राजनीति पर बहस तथा वार्तालाप हो रहा है।

राजनीति को छोड़कर अन्य किसी विषय पर बात करना हराम था! कभी गांधी जी पर बात हो रही है, कभी नेहरू जी की चर्चा चल रही है, कभी पटेल की मीमांसा हो रही है, कभी ब्रिटिश सरकार की भावी नीति पर अटकलें लगायी जा रही हैं, कभी कम्यूनिस्टों को कोसा जा रहा है, कभी नौकरशाही की आलोचना हो रही हैं! राजनीति सम्बन्धी कोई ऐसा विषय या विख्यात व्यक्ति न होगा जिस पर इन लोगों की अपनी निजी राय न हो। भोजन करने बैठे हैं—एक कौर खाकर जब तक पांँच मिनिट राजनीति पर बात न हो जाय तब तक दूसरा कौर उठाना हराम। इन लोगों की संगत में सम्पत्तिलाल भी अपने को नेता समझने लगे। स्थानीय पत्रों में आपके छोटे-मोटे वक्तव्य भी निकलने लगे। किसी दिन काँग्रेस को वोट देने की अपील निकल रही है, किसी दिन अनाज और कपड़े की दिक्कत पर सम्पत्तिलाल जी वक्तव्य दे रहे हैं, किसी दिन लार्ड वेवल को समझा रहे हैं, किसी दिन ब्रिटिश सरकार का मार्ग प्रदर्शन कर रहे हैं, किसी दिन हिंदूसभा पर, किसी दिन कम्यूनिस्टों पर—इस प्रकार प्रायः नित्य ही सम्पत्तिलाल जी का कोई न कोई वक्तव्य प्रकाशित होता रहता था। जनता ने भी जाना कि भूतपूर्व रायबहादुर साहब नये मुसलमान की भाँति प्याज़! प्याज़!! चिल्ला रहे हैं।


3

इधर ज्यों ज्यों चुनाव के नॉमिनेशन की तारीख निकट आती जाती थी, सम्पत्तिलाल का उत्साह बढ़ता जाता था। खाऊवीर काँग्रेसमैनों की दौड़ लग रही थी। कोई इलाहाबाद की यात्रा करता था, कोई लखनऊ, कोई बम्बई इत्यादि तक पहुँचा। इस प्रकार सम्पत्तिलाल जी के लिए बड़ी दौड़-धूप हो रही थी।

एक दिन सम्पत्तिलाल जी को सूचना दी गयी कि “आपके नाम की प्रांतीय काँग्रेस-कमेटी ने सिफारिश कर दी है।”

सम्पत्तिलाल जी अपने अकाँग्रेसी अंतरंग मित्रों में बैठकर कहते, “जान पड़ता है एसेम्बली में जाना ही पड़ेगा।”

“अच्छा है! हम लोगों को बल मिल जायगा।”

“मेरी तो विशेष इच्छा नहीं थी, परंतु प्रांतीय काँग्रेस-कमेटी बहुत जोर डाल रही है। उसने तो एक प्रकार से मुझे भेजना निश्चित भी कर लिया है।”

“देखा आपने, खिताब छोड़ने से यह बात हुई।”

“खिताब तो मैं स्वयं ही छोड़ना चाहता था अब आज कल राष्ट्रीय दृष्टि से इन खिताबों का कोई मूल्य नहीं रहा।”

“इसमें क्या संदेह है। परंतु एम० एल० ए० होकर हमारा खयाल रखिएगा।”

“और तो हमारी कोई इच्छा नहीं, हमारे लड़के को कोई बढ़िया नौकरी दिलवा दीजिएगा।”

“हमें तो कोई सरकारी ठेका-वेका दिलवा देना!“

सम्पत्तिलाल बोले, “आप लोगों के लिए तो जा ही रहा हूँ अन्यथा मुझे अपने लिए क्या आवश्यकता है!“

“आपको किस बात की कमी है। आप तो जो कुछ करेंगे परोपकार के लिए ही करेंगे।”

“परोपकार और देश-सेवा—यही मेरे दो लक्ष्य हैं।”

परंतु जब चुनाव की नामावली प्रकाशित हुई तो उसमें सम्पत्तिलाल जी का नाम न था। सम्पत्तिलाल तो मानों आकाश से गिरे।

काँग्रेस वालों से पूछा, “यह क्या गड़बड़ हुआ?”

“क्या बतावें! कुछ समझ में नहीं आता।”

“आप लोग तो कह रहे थे कि आपका नाम आ जायगा।”

“अजी कुछ कहा नहीं जाता। सब मामला तय हो गया था, न जाने बीच में क्या घपला हो गया।”

भूतपूर्व रायबहादुर साहब की सब आशाएँ मिट्टी में मिल गयीं। काँग्रेसियों का आना-जाना भी कम हो गया। काँग्रेसियों के सम्बन्ध में भूतपूर्व रायसाहब की राय अब बहुत अधिक अच्छी नहीं है।

सुना गया है कि सम्पत्तिलाल जी आजकल अपना समय राम-भजन में अधिक व्यतीत करते हैं।


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Author

  • विश्वम्बरनाथ शर्मा 'कौशिक'

    जन्म: 10 मई 1899 (अम्बाला)

    विश्वम्भरनाथ शर्मा ‘कौशिक’ (1891-1945) हिंदी के कथाकार थे। इनका जन्म पंजाब के अम्बाला शहर में हुआ था। शुरुआत में वह राग़िब के लेखकीय नाम से उर्दू कविताएँ लिखा करते थे और ज़माना पत्रिका में उनकी कई कविताएँ और लेख प्रकाशित हुए थे। फिर सरस्वती पत्रिका के संपादक महावीर प्रसाद द्विवेदी के प्रभाव से हिंदी में लेखन करने लगें। 'रक्षाबंधन' उनकी पहली कहानी थी जो कि सरस्वती पत्रिका में 1903 में प्रकाशित हुई थी। वह अपनी आदर्शोन्मुखी यथार्थवादी कहानियों के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने अपने जीवनकाल में 300 से ऊपर कहानियाँ लिखी थीं।

    कहानी संग्रह:
    रक्षाबंधन, कल्प मंदिर, चित्रशाल, प्रेम-प्रतिज्ञा, मणिमाला, कल्लोल

    निधन: 10 दिसम्बर 1945 (कानपुर)

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