‘स्टॉप प्रेस’ लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक का हालिया पुनः मुद्रित हुआ उपन्यास है। यह उनकी सुनील शृंखला का उपन्यास है। उपन्यास प्रथम बार 1995 में राजा पॉकेट बुक्स से प्रकाशित हुआ था। फिर इसका नवीन संस्करण 1999 में डायमंड पॉकेट बुक्स से आया और उसके बाद से लेकर अब तक यह आउट ऑफ प्रिंट रहा है। हाल ही में साहित्य विमर्श प्रकाशन ने स्टॉप प्रेस को पुनः प्रकाशित किया है। एक बुक जर्नल आपके लिए स्टॉप प्रेस का शुरुआती अंश यहाँ प्रस्तुत कर रहा है। उम्मीद है यह अंश आपको पसंद आएगा:
चार बजे के करीब सुनील ने ‘ब्लास्ट’ के ऑफिस में कदम रखा तो ‘ब्लास्ट’ का न्यूज एडिटर राय उसे रिसैप्शन पर ही मिल गया।
“अच्छा हुआ तुम आ गये।” – सुनील पर निगाह पड़ते ही वो चैन की साँस लेता हुआ बोला – “वर्ना मैं तो तुम्हारी तलाश मे निकल रहा था।”
“क्या कहने!” – सुनील व्यंग्यपूर्ण स्वर में बोला – “जब से न्यूज एडिटर बने हो, कभी कुर्सी से उठे हो जो आज…”
“तुम्हें मलिक साहब याद कर रहे हैं।”
सुनील सकपकाया। मलिक साहब ‘ब्लास्ट’ के मालिक और एडिटर-इन-चीफ थे। उनके बेटे राजेन्द्र मलिक की मौत के बाद से सुनील को याद नहीं पड़ता था कि कभी उन्होंने उसे ऐसी शिद्दत से याद किया हो।
“क्या माजरा है, भगवन?” – वो बोला।
“ठीक से पता नहीं।” – राय बोला – “अलबत्ता वो थापर वाली स्टोरी की बाबत मेरे से सवाल कर रहे थे।”
“ओह!”
“जाओ मिल के आओ।”
“हाँ, जरूर।”
“कोई मेरे जानने लायक बात हो तो लौट के मेरे पास आना।”
“ठीक है।”
राय घूमा और उस गलियारे की तरफ बढ़ गया जिसमें उसका आफिस था।
सुनील एक क्षण रिसैप्शन पर ठिठका खड़ा रहा, फिर वो रिसैप्शन पर मौजूद रेणु की तरफ घूमा।
रेणु मुस्करायी।
“तूने मुझे नमस्ते कर दी?” – सुनील बोला।
“नहीं तो।” – वो कुटिल भाव से बोली।
“भूल गयी होगी!”
“खामखाह!”
“लेकिन करेगी तो सही!”
“क्यों भला?”
“भई, मैं मैं हूँ। ‘ब्लास्ट’ का बड़े वाला संवाददाता। यानी कि चीफ रिपोर्टर।”
“चीफ लगा लेने से कद नौ फुट हो जाता है?”
“हाँ। अब नमस्ते कर नहीं तो मैं…”
“नहीं तो क्या?”
“नहीं तो मैं रो-रो के जान दे दूँगा।”
रेणु की बेसाख्ता हँसी छूटी।
सुनील भी हँसा।
“बातें बनाना तो कोई तुमसे सीखे।” – वो बोली।
“और मुझे आता क्या है?”
“अब जाओ पहुँचो अपने मुकाम पर वर्ना नौकरी छूट जायेगी।”
“अरे, किसकी माँ ने सवा सेर सोंठ खाई है जो सुनील भाई मुलतानी की नौकरी…”
“ठीक है। फिर तो इधर मेरे पास आ के बैठो ताकि दिल से दिल की बातें हो सकें। ताकि हम दास्ताने-दिले-हयात सुन-सुना सकें। ताकि ये गिला न रहे कि…”
“मैं…मैं जाता हूँ।”
“नहीं, नहीं। जल्दी क्या है! चाय-वाय पी के जाना। बातों में डिनर का टाइम तो जरूर ही हो जायेगा, फिर खाना भी खाकर जाना।”
“वो…वो क्या है कि…”
“क्या है?”
“मैं अभी लौट के बताता हूँ।”
फिर रेणु के मुँह खोल पाने से पहले ही वो भीतर की तरफ लपक पड़ा।
अगले ही मिनट वो मलिक साहब के विशाल कक्ष में उनके सामने खड़ा था।
“गुड आफ्टरनून, सर।” – वो अदब से बोला।
मलिक साहब ने सामने फैले पड़े कागजात पर से सिर उठाया, अपने बाईफोकल्स में से सुनील की तरफ झाँका और बोले – “गुड आफ्टरनून। हाउ आर यू?”
“फाइन, सर। थैंक्यू फार आस्किंग, सर।”
“बैठो।”
“थैंक्यू, सर।”
सुनील उनकी विशाल टेबल के सामने पड़ी कुर्सियों में से एक पर बैठ गया।
“थापर वाले केस में क्या प्रोग्रेस है?” – मलिक साहब ने पूछा।
“अच्छी प्रोग्रेस है, सर।” – सुनील तत्पर स्वर में बोला – “अभी तक तो, आप जानते ही हैं कि, हमने जो कुछ छापा है, इशारों वाली ज़ुबान में छापा है लेकिन जब सम्बन्धित व्यक्ति इशारा नहीं समझ रहा
और अपनी तरफ से कोई सफाई नहीं पेश कर रहा तो अब तो सब कुछ तफसील से, बाकायदा नाम लेकर छापना होगा।”
“इशारा तो वो बाखूबी समझ रहा है। तभी तो फोन पर धमकी देता है कि अगर उसकी बाबत हमारे अखबार में कुछ छपा तो वो अखबार के दफ्तर को फूँक के रख देगा, खबर के लिये जिम्मेदार रिपोर्टर को गोली से उड़ा देगा, वगैरह, वगैरह।”
“ईजीअर सैड दैन डन।”
“मैंने सुना है कि उस आदमी का दादागिरी पर जोर है और वो गुण्डे-बदमाशों से घिर के रहना पसन्द करता है।”
“आपने एकदम ठीक सुना है। मेरी अपनी तफ्तीश भी ये ही कहती है कि ये आदमी – दिलीप थापर – विलासी प्रवृति का आदमी है। शराब, शबाब का रसिया है। हर तरह के जुए का शौक रखता है…”
“मालेमुफ्त दिलेबेरहम।”
“ऐग्जैक्टली, सर।”
“सुना है उसके दिमागी तवाजन में भी कोई नुक्स है!”
“कोई बड़ी बात नहीं। ताकत के घमण्ड में डूबे आदमी का सनकी या नीमपागल या दोनों ही होना कोई बड़ी बात नहीं।”
“बल्कि पागल भी!”
“यस, सर। कोई पागल ही ‘मार दूँगा, फूँक दूँगा, बरबाद कर दूँगा’ वाली ज़ुबान किसी नेशनल डेली से बोल सकता है।”
कुछ क्षण खामोशी रही।
उस दौरान सुनील ने कई बार बेचैनी से पहलू बदला।
“मैंने तुम्हें ये बताने के लिये बुलाया था” – फिर मलिक साहब ने चुप्पी तोड़ी – “कि ये, दिलीप थापर, अब अपनी कोई सफाई पेश करने का ख्वाहिशमंद हो उठा मालूम होता है।”
“अच्छा!”
“हाँ। आज सुबह उसका मेरे पास फोन आया था। तब भाषा तो उसने पटाखे की तरह धमकी वाली ही बोली थी लेकिन उस फोन कॉल का जो एण्ड रिजल्ट था, वो ये था कि वो इस स्टोरी की बाबत ‘ब्लास्ट’ के किसी जिम्मेदार आदमी से मिलने को तैयार था।”
“आई सी।”
“स्टोरी क्योंकि विस्फोटक साबित हो सकती है इसलिये मेरी खुद की ख्वाहिश भी यही थी कि सम्बन्धित व्यक्ति का, दिलीप थापर का, वर्शन सुनने के बाद ही इसे छापा जाता।”
“मैं खुद ऐसा ही चाहता था लेकिन वो तो बात सुन के राजी नहीं था। मैं कई बार फोन पर…”
“अब राजी है। मैंने उससे तुम्हारी अप्वायन्टमैंट फिक्स की है। वो” – मलिक साहब ने एक उड़ती निगाह वाल क्लॉक पर डाली – “पाँच और छ: बजे के बीच अपनी कोठी पर तुम्हारा इन्तज़ार करेगा। जानते हो न कि वो कहाँ रहता है?”
“जी हाँ। नार्थ शोर पर। यहाँ से तीस मील का फासला है।” – फिर सुनील ने भी घड़ी पर दृष्टिपात किया – “मैं टाइम पर पहुँच जाऊँगा।”
“वो तो तुम पहुँच ही जाओगे लेकिन तुमने ये नहीं पूछा कि मैंने तुम्हें क्यों बुलाया है!”
“फरमाइये।”
“वो खून-खराबे की धमकियाँ देने वाला आदमी है। वो जानता है कि उसकी असलियत पर, उसके विरसे पर सवालिया निशान लगाने वाले आदमी तुम हो। ऐसे आदमी से अकेले मिलने जाना क्या मुनासिब होगा?”
“सर, धमकी देने में और उस पर खरा उतरकर दिखाने में बहुत फर्क होता है। अगर उसकी मंशा मेरे खिलाफ या ‘ब्लास्ट’ के खिलाफ कोई खतरनाक कदम उठाने की होती तो अब तक क्या वो इन्तज़ार कर रहा होता? तो क्या अब वो मुझे इन्टरव्यू देने के लिये तैयार हो जाता?”
“वो सिरफिरा है…”
“जिस पर कि कभी-कभी समझदारी का भी दौरा पड़ता है, जैसे कि आज पड़ा है। ऐन वैसे ही जैसे कभी-कभी समझदारों पर पागलपन का दौरा पड़ता है। सर, उस आदमी ने बाकायदा आपको फोन कर के मेरे से अप्वायन्टमैंट फिक्स की है। ऐसे हालात में वो मेरे से कोई बदसलूकी करना अफोर्ड नहीं कर सकता।”
“लेकिन…”
“सर, मैं अखबारनवीस हूँ। जहाँ खबर है, वहाँ पहुँचना मेरा कारोबार है, मेरा फर्ज है, मेरा धर्म है। मैं अपने साथ दस बाडीगार्ड लेकर खबर सूँघने जाना अफोर्ड नहीं कर सकता। यूँ सिर्फ मेरी कमजोरी उजागर होगी। ये जाहिर होगा कि मैं डरता हूँ। मैं अपनी ऐसी इमेज बनना अफोर्ड नहीं कर सकता जिससे ये स्थापित हो कि मैं इस धन्धे के काबिल नहीं। डर के कहीं अखबारनवीसी होती है! डर के कहीं किसी के पीछे पड़ा जाता है!”
“यू आर टैलिंग मी?”
“आई…आई एम सॉरी, सर।”
“बट यू विल बी केयरफुल?”
“यस, सर।”
“हूँ।”
फिर खामोशी छा गयी।
सुनील ने कई बार बेचैनी से पहलू बदला।
मलिक साहब ने अपनी आँखों से अपना चश्मा उतारा, उसे रूमाल से पोंछा और उसे वापिस अपनी नाक पर व्यवस्थित करते हुए बोले – “मेरा एक ही बेटा था जिसने अपनी करतूतों की वजह से ‘ब्लास्ट’ के उजले दामन पर लगे धब्बों को अपने खून से धोया, जिसने ‘ब्लास्ट’ की गरिमा और मर्यादा को बरकरार रखने के लिये अपनी जान दे दी, जिसने अपनी जान देकर ये साबित कर के दिखाया कि वो एक अखबारनवीस बाप का निर्भीक बेटा था। सुनील, मैं बहुत बूढ़ा हो गया हूँ। अब मैं कोई ऐसा दूसरा झटका बर्दाश्त नहीं कर सकूँगा।”
“मुझे कुछ नहीं होगा, सर।” – सुनील भर्राये कण्ठ से बोला – “आपकी, आपके अखबार की छत्रछाया में मुझे कुछ हो ही नहीं सकता। मैंने आपसे सत्यमेव जयते का सबक सीखा है। जो सत्य के रास्ते पर हो, उसकी हार कैसे हो सकती है! सच्चे का बोलबाला और झूठे का मुँह काला होता कितनी बार ‘ब्लास्ट’ की आँखों से दुनिया देख चुकी है और कितनी बार अभी और देखेगी, ये क्या किसी से छुपा है! कलम का सिपाही क्या तोप-तलवार से खौफ खा सकता है!”
“वो ठीक है लेकिन…”
“खींचो न कमानों को, न तलवार निकालो। जब तोप मुकाबिल हो, अखबार निकालो। ये बात क्या अब सच नहीं रही? जब नेपोलियन जैसा आदमी अखबार से डरता था तो किसी दिलीप थापर की अखबार के सामने क्या औकात है!”
मलिक साहब खामोश रहे।
“और फिर आप ये क्यों कहते हैं कि आपका एक बेटा था? मैं, यहाँ मेरे कलीग पत्रकार, क्या हम सब आपके बेटे नहीं?”
मलिक साहब के गले की घण्टी उछली, उन्होंने एक बार जोर से थूक निगली और फिर एकाएक बदले स्वर में बोले – “यू आर एब्सोल्यूटली राइट, माई ब्वाय। नाओ गैट अलांग, यू आर गैटिंग लेट फार युअर अप्वायन्टमैंट।”
सुनील तत्काल उठ खड़ा हुआ।
“और सुनो।” – मलिक साहब बोले।
“यस, सर।”
“अच्छी खबर लेना उस…उस दिलीप थापर के घोड़े की।”
तत्काल सुनील के होठों पर मुस्कराहट आयी, उसने एक क्षण को मलिक साहब से निगाह मिलायी और फिर उनके सिर से ऊपर कहीं झाँकता हुआ उत्साहपूर्ण स्वर में बोला – “यस, सर।”
अपनी दस हार्स पावर की इटैलियन मोटरसाइकल एम. वी. आगस्ता अमेरिका पर सुनील नार्थ शोर की ओर उड़ा जा रहा था।
उस घड़ी उसके जेहन में दिलीप थापर से सम्बन्धित स्टोरी और उससे सम्भावित मुलाकात के अलावा कुछ नहीं था।
(कौन था ये दिलीप थापर? उसके खिलाफ ब्लास्ट में क्या खबरें प्रकाशित हुई थीं? सुनील से हुई थापर की मुलाकात का क्या नतीजा निकला? जानने के लिए पढ़ें लेखक सुरेन्द्र मोहन पाठक की सुनील सीरीज़ का उपन्यास ‘स्टॉप प्रेस’।)
पुस्तक विवरण:

एक जिद्दी पत्रकार!
एक संदिग्ध वारिस!
एक पूर्वाग्रहग्रस्त बिचौलिया!
और करोड़ों के विरसे की दौलत का खेल।
इस जुगलबंदी से जन्मी एक परफेक्ट कहानी। लेकिन हर परफेक्ट कहानी पर पड़ा होता है, झूठ का घना पर्दा!
‘ब्लास्ट’ के चीफ रिपोर्टर सुनील चक्रवर्त्ती ने जब पर्दा फ़ाश शुरू किया
तो खेल खतरनाक हो गया – कत्ल तक पहुँचा
पुस्तक लिंक: साहित्य विमर्श प्रकाशन | अमेज़न
