नाना पाटेकर ने अपने निभाए किरदारों के माध्यम से भारतीय फिल्म जगत में अपना एक अलग मुकाम बनाया था। उन्होंने दर्शकों के मन पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ी थी। उनकी फिल्मों और उनके जीवन को याद करते हुए नीलेश विक्रम ने यह लेख लिखा है। आप भी पढ़ें:
नाना पाटेकर का नब्बे के दशक में उदय एक नए एंग्री यंग मैन के रूप में हुआ और नई पीढ़ी के कई अभिनेताओं ने उनके स्टाइल को अपने अपने तरीके से पर्दे पर पेश किया।
भारतीय सिनेमा में कुछ अभिनेता ऐसे होते हैं, जो पर्दे पर केवल किरदार नहीं निभाते, बल्कि उसे अपनी आवाज़, आँखों और व्यक्तित्व से एक अलग पहचान दे देते हैं। नाना पाटेकर उन्हीं अभिनेताओं में से एक हैं। उनका अभिनय शोर से नहीं, असर से पहचाना जाता है। संवाद बोलने का उनका अंदाज़, चेहरे के बदलते भाव और भीतर तक उतर जाने वाली आवाज़ दर्शकों के मन में लम्बे समय तक बनी रहती है।
नाना पाटेकर का सफर आसान नहीं था। बचपन से ही उन्हें संघर्ष करना पड़ा। अपने बचपन और युवा अवस्था में जो अनुभव उन्होंने प्राप्त किए वे ही नाना का किरदार गढ़ने के लिए उत्तरदायी रहे। नाटक देखने का शौक जो उन्हें अपने पिता से मिला उसने उनके अंदर के कलाकार को जागृत कर दिया।
हिंदी सिनेमा में अपनी पहचान बनाने से पहले उन्होंने मराठी रंगमंच और फिल्मों में काम किया। गमन (1978) से उनके हिंदी फिल्मी सफर की शुरुआत हुई। सिंहासन (1979) और भालू (1980) जैसी शुरुआती मराठी फिल्मों ने उनके अभिनय के अनुभव को विस्तार दिया। इसके बाद आज की आवाज़ (1984) में उनकी मौजूदगी दिखाई दी, लेकिन वास्तविक पहचान के लिए उन्हें अभी लम्बा रास्ता तय करना था।
1986 की फिल्म ‘अंकुश’ नाना पाटेकर के करियर का एक अहम मोड़ साबित हुई। इसमें उन्होंने एक ऐसे युवा का किरदार निभाया, जिसकी निराशा और गुस्से के पीछे व्यवस्था से उपजी हताशा थी। यह सिर्फ एक व्यक्ति की कहानी नहीं थी, बल्कि उस युवा वर्ग की छटपटाहट भी थी, जो अपने आसपास के अन्याय भरे माहौल से परेशान और बैचेन था। इसी दौर की मराठी फिल्म ‘माफीचा साक्षीदार’ ने भी उनके अभिनय-सफर को आगे बढ़ाया।
‘सलाम बॉम्बे’ (1988) जैसी चर्चित फिल्म में उनकी मौजूदगी ने उनके काम को व्यापक पहचान दिलायी।
फिर आई ‘परिंदा’ (1989), जिसने नाना पाटेकर को हिंदी सिनेमा के सबसे यादगार अभिनेताओं की कतार में खड़ा कर दिया। अंडरवर्ल्ड डॉन अन्ना के रूप में उनका अभिनय इतना प्रभावशाली था कि उनका किरदार फिल्म के अन्य सभी चरित्रों पर हावी हो गया। इस फिल्म के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
अन्ना का किरदार सिर्फ एक खलनायक नहीं था। उसमें प्रभुत्व का अहंकार और क्रूर, मनोरोगी व्यक्तित्व का ऐसा मेल था, जिसने दर्शकों को असहज भी किया और प्रभावित भी। यही नाना की विशेषता थी। वे अपने किरदार को अच्छा या बुरा बताने के बजाय उसे विश्वसनीय बना देते थे।
1991 में ‘प्रहार: द फाइनल अटैक’ के साथ नाना पाटेकर ने निर्देशन की ज़िम्मेदारी भी सँभाली और एक सैनिक कमांडो की भूमिका निभाई। फिल्म के लिए उन्होंने सैन्य प्रशिक्षण लिया। यह उनके काम के प्रति अनुशासन और गम्भीरता का उदाहरण था। उनके लिए अभिनय केवल कैमरे के सामने खड़े होकर संवाद बोलना नहीं, बल्कि निभाये जा रहे पात्र की दुनिया को समझना और उसके अनुरूप खुद को तैयार करना था। कारगिल युद्ध में सीमा पर एक वास्तविक सैनिक के रूप में बिताए गए समय को उनके व्यक्तित्व के विराट स्वरूप का एक अंश मानना ही उचित होगा।
‘अंगार’ (1992) में उनके खलनायक वाले अभिनय को फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। इसके बाद तिरंगा (1993) में राजकुमार के साथ उनकी मौजूदगी ने दर्शकों को एक अलग तरह का एक्शन अनुभव दिया।
फिर ‘क्रांतिवीर’ (1994) आयी, जिसमें उन्होंने प्रताप नारायण तिलक की भूमिका निभायी। यह किरदार अन्याय के सामने खड़े आम नागरिक के गुस्से और व्यवस्था के प्रति उसके सवालों की आवाज़ बन गया। इस फिल्म के लिए नाना को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार मिला।
उनके संवादों का असर केवल उनके शब्दों में नहीं था। उनकी आवाज़ में मौजूद बेचैनी, ठहराव और आक्रोश नके संवादों को एक भावनात्मक ताकत देते थे। वे दर्शकों को सिर्फ कहानी नहीं सुनाते थे, बल्कि उन्हें उस कहानी के भीतर खड़ा कर देते थे।
नाना पाटेकर को अक्सर उनके तीखे संवादों और आक्रामक भूमिकाओं के लिए याद किया जाता है, लेकिन उनके अभिनय का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
‘अग्नि साक्षी’ (1996) में उनका अभिनय एक जटिल और बेचैन करने वाले किरदार के रूप में सामने आया। इसी वर्ष ‘खामोशी: द म्यूज़िकल’ में उन्होंने एक ऐसे पिता की भूमिका निभाई, जो सुन और बोल नहीं सकता, लेकिन अपनी बेटी के प्रति उसका प्रेम गहरा है। इस फिल्म में उनकी भावनात्मक अभिव्यक्ति ने साबित किया कि अभिनय की सबसे प्रभावशाली भाषा कभी-कभी शब्दों से आगे निकल जाती है।
‘गुलाम-ए-मुस्तफा’ (1997), ‘युगपुरुष’ (1998) और ‘गुलज़ार’ के निर्देशन में बनी ‘हू तू तू’ (1999) जैसी फिल्मों ने उनके अभिनय को अलग-अलग सामाजिक और मानवीय परिस्थितियों से जोड़ा। 1998 की एक और महत्वपूर्ण फिल्म ‘वजूद’ में वे एक उपेक्षित कलाकार, जो एक तरफा प्रेम में है, के मनोविज्ञान को दर्शकों से रूबरू करवाते है।
‘कोहराम’ (1999) में अमिताभ बच्चन के साथ उनकी मौजूदगी भी उल्लेखनीय रही। आगे ‘गैंग’ (2000), ‘तरकीब’ (2000) और ‘वध’ (2002) जैसी फिल्मों में उन्होंने अपराध, रहस्य और नैतिक उलझनों से जुड़े किरदार निभाये।
‘अब तक छप्पन’ (2004) में साधु आगाशे के रूप में वे एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट बने। यह किरदार कानून, अपराध और नैतिकता के बीच फँसे व्यक्ति की जटिलता सामने लाता है।
इसके बाद ‘अपहरण’ (2005) में उनकी भूमिका ने सत्ता, अपराध और राजनीतिक व्यवस्था के सम्बंधों को उजागर किया। इस फिल्म के लिए उन्हें फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ खलनायक पुरस्कार मिला।
‘टैक्सी नंबर 9211’ (2006) में जॉन अब्राहम के साथ उनकी जोड़ी ने उनके अभिनय का एक अलग रंग दिखाया। यहाँ उनका अंदाज़ गम्भीरता से हटकर हास्य की ओर बढ़ता है। ।
2007 की फिल्म ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के रूप में नाना पाटेकर ने दर्शकों को खूब हँसाया। अंडरवर्ल्ड की दुनिया से आया यह किरदार अपने अंदाज़, गुस्से, भावुकता और मज़ेदार संवादों के कारण लोकप्रिय हुआ। अनिल कपूर के मजनू भाई के साथ उनकी केमिस्ट्री ने फिल्म को एक अलग पहचान दी।
एक गम्भीर अभिनेता के भीतर हास्य की कितनी मज़बूत सम्भावना हो सकती है, उन्होंने ये भी सिद्ध किया इसी फिल्म की अपनी भूमिका से। आज सोशल मीडिया पर उनके किरदारों से जुड़े संवाद और मीम्स नई पीढ़ी के बीच भी दिखाई देते हैं।
नाना पाटेकर किसी एक छवि में बँधकर रहने वाले अभिनेता नहीं थे। अभिनेता की छवि के बाद उनकी दूसरी जो छवि हमें दिखाई देती है वो है एक सहज, ग्रामीण व्यक्ति की छवि, जिसे अपनी जड़ों से प्यार है और जो अपने समाज की व्यथा को अपना दुख समझता है।
वर्तमान परिदृश्य में लोकप्रियता अक्सर कुछ सेकंड के वीडियो, वायरल संवाद और सोशल मीडिया की छवि से तय होती है। ऐसे समय में नाना पाटेकर का अभिनय याद दिलाता है कि स्थायी प्रभाव केवल दिखावे से पैदा नहीं होता। उसके लिए अनुभव, मेहनत, संवेदना और अपने काम के प्रति ईमानदारी ज़रूरी है।
उनके किरदारों में गुस्सा है, लेकिन वह केवल शोर नहीं है। उसमें अपमान, अन्याय, अकेलापन और कभी-कभी बेबसी भी छिपी होती है। उनकी खामोशी भी कई बार संवाद से अधिक कहती है। यही वजह है कि उनके अभिनय को केवल पुराने दौर की लोकप्रियता मानकर नहीं देखा जा सकता। वह आज भी मानवीय व्यवहार और सामाजिक उलझनों को समझने का अवसर देता है।
नाना पाटेकर ने पारम्परिक नायक की परिभाषा को कई बार चुनौती दी। उनके किरदार हमेशा आदर्श नहीं होते वे कमज़ोर, सख्त, विरोधाभासी और कभी-कभी गलत भी होते हैं। लेकिन इसी कारण वे वास्तविक लगते हैं। भले ही नाना द्वारा निभाए अन्ना, प्रताप तिलक, साधु आगाशे और उदय शेट्टी के किरदार अलग अलग हैं लेकिन इसके बावजूद इन सबके बीच केवल एक समानता है और वो ये कि हर किरदार में नाना एक अनोखे अंदाज़ में सामने आते है।
फिल्म ‘थोड़ा सा रूमानी हो जायें’ (1990), में नाना पाटेकर ने नटवरलाल उर्फ़ ‘बारिशकर’ के रूप में एक यादगार भूमिका निभायी थी। उनका किरदार साधारण अर्थों में नायक नहीं, बल्कि लोगों की सोच को झकझोरने वाला एक अनोखा व्यक्तित्व है। अपने संवादों, अंदाज़ और कल्पनाशीलता के जरिए वह निराशा में डूबे लोगों के भीतर उम्मीद जगाने की कोशिश करता है।
नाना पाटेकर की अभिनय शैली इस किरदार को अलग पहचान देती है। उनकी संवाद अदायगी में व्यंग्य, गम्भीरता और एक खास किस्म की सहजता दिखाई देती है। वे बारिश लाने का दावा करने वाले व्यक्ति को केवल हास्य का पात्र नहीं बनने देते, बल्कि उसके माध्यम से मानवीय विश्वास, नेतृत्व और सामूहिक कल्पनाशक्ति के सवाल भी सामने लाते हैं।
बारिशकर के रूप में नाना पाटेकर यह एहसास कराते हैं कि कभी-कभी किसी समाज को बदलने के लिए केवल संसाधनों की नहीं, बल्कि नयी सोच और उम्मीद जगाने वाले व्यक्तित्व की भी जरूरत होती है। यही इस भूमिका की खूबसूरती और नाना पाटेकर के अभिनय की खासियत है और उनकी अभिनेता के अतिरिक्त दूसरी छवि का संकेत है। उनके सामाजिक कार्यों में इसकी झलक स्पष्ट: दिखाई देती है।
मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने नाम फाउंडेशन के माध्यम से महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित ग्रामीण इलाकों, जल संरक्षण और किसान समुदाय के लिए काम किया। उनकी इस पहल ने जल संकट से जूझ रहे लोगों और किसानों की समस्याओं की ओर लोगों का ध्यान खींचा।
यहाँ उनके व्यक्तित्व का वही दूसरा पक्ष दिखाई देता है जो अभिनेता से भिन्न है। अब वह कलाकार जो पर्दे पर व्यवस्था से सवाल करता है वो नहीं है बल्कि वास्तविक जीवन में लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील रहने की कोशिश करने वाला इंसान है। उनकी दोनों छवियाँ मिलकर उनके व्यक्तित्व की व्यापक तस्वीर प्रस्तुत करती हैं।
उनका व्यक्तित्व एक बेबाक अंदाज वाले असाधारण अभिनेता और परोपकारी, सहज इंसान का ऐसा संगम है जिसकी गूँज उनके किरदारों के माध्यम से लम्बे समय तक बॉलीवुड में सुनाई देती रहेगी।
