मेरी जेब – कामता प्रसाद सिंह ‘काम’

मेरी जेब - कामता प्रसाद सिंह 'काम'

जादू का ख़ज़ाना, भानुमती की पिटारी, रहस्‍यों और भेदों को गुप्‍त रखने के लिए चोली, देखने में भोली-भाली पर कमाल का काम करने वाली यह मेरी जेब है जिस पर मुझे नाज़ है और उनको भी नाज़ है जिनकी इज़्जत यह मौके-बेमौके बचाती है। ऐसा कहने की वजह है और वह यह है कि मैं एक ऐसा आदमी हूँ जिसको जमापूँजी पर कोई भरोसा नहीं, भरोसा है तो सिर्फ जेब पर है! इसको यों भी कहिए कि मैं जो कुछ रखता हूँ पास में, पासबुक में कुछ भी नहीं रखता। इससे कभी लाभ भी होता है, कभी घटी भी होती है। सब से बड़ा लाभ यह होता है कि बैंक फ़ेल करने का न मुझे अंदेशा होता है, न चिंता होती है और घटी यह होती है कि सामने जेब में देखकर जब कोई कुछ माँग देता है तो ‘नहीं’ कहने में नहीं बनता; कुछ‑न‑कुछ अवश्‍य देना पड़ता है, चाहे मैं चाहूँ या न चाहूँ। अगल-बगल में कुछ माँगने वाले ऐसे हैं कि बराबर इस बात पर निगाह रखते हैं कि कब की हालत क्‍या है। यों तो बराबर यह ख़ाली ही रहती है और ऐसी पतली मालूम पड़ती है जैसे कोई पुराना तपेदिक का रोगी, पर कभी-कभी यह भरती है और अलग से भदैया बैग की तरह मालूम पड़ने लगती है।

कभी-कभी मैंने यह भी कोशिश की है कि सामने की जेब में नोट-रुपया इत्‍यादि न रखकर गंजी में नीचे जो जेब है उसमें रखूँ, पर वैसी हालत में मेरे मोटे पेट के साथ जब भरी जेब की संधि होती है तो रूप गर्भिणी स्‍त्री का-सा हो जाता है जो बड़ा खराब लगता है। इसलिए रुपया-पैसा फिर ऊपर ले आता हूँ। लेकिन दोस्‍त लोग इस बात की ताक में रहते हैं कि कब फिर जेब भरती है और जब मामला हसबखाह देखते हैं तो फौरन होटल चलने का आग्रह करने लगते हैं। मेरा यह भी एक स्‍वभाव है जब तक जेब में कुछ रहे मैं किसी को भी भरसक कहीं पर बिल चुकाने नहीं देता। जेब की वजह से ही कभी-कभी मित्रों को बेतरह धोखा हुआ है। भरा-पूरा समझकर होटल लिवा गये और इन्‍होंने खूब खा लिया तो बिल मेरे पास पेश हो गया। तमाम होटलों के बेरा लोगों में इस बात की शोहरत हो गयी है कि मैं खूब इनाम देता हूँ। नतीजा यह हुआ कि ये कमबख़्त भी यही कोशिश करते हैं कि बिल मैं ही चुकाऊँ क्‍योंकि उनको यह अंदेशा होता है कि अगर बिल कोई दूसरा चुकाएगा तो उनका इनाम भी बिल ही में चला जाएगा। इस तरह बिल आने पर मुझे कहना पड़ा है कि मेर पास पैसा नहीं है। “जेब तो भरी है,” दोस्‍त कहते हैं। “लेकिन रद्दी काग़ज़-पत्र से भरी है। कोई लज़्ज़त नहीं है।” मेरे यह कहने पर बिलबिलाते-बिलबिलाते उन्‍हें बिल देना पड़ता है।

कभी ऐसा भी होता है कि महीनों तक जेब ख़ाली रह जाती है। एक मित्र तो मेरे ऐसे हैं कि उन्‍होंने बाकायदा मुझे यह समझाया है कि इस तरह से जेब हरगिज़ ख़ाली नहीं रखनी चाहिए। मैंने पूछा है, “क्‍यों ख़ाली रहने में क्‍या हर्ज है?” वे बोले, “सबसे बड़ा हर्ज तो यही है कि जेबकट अगर जेब काटे और उसको कुछ न मिले तो गाली देगा कि साले भारी-भरकम ठाट में रहते हैं और जेब में एक पैसा भी नहीं रखते।” उनकी उस दलील को मैंने डिसमिस कर दिया है तो फिर बोले, “दूसरी बात यह है कि आप खर्राच आदमी हैं। घर में, बक्‍स में या बैंक में आप कुछ भी नहीं रखते। कहाँ क्‍या हो जाए कोई ठीक नहीं। मान लीजिए कही हार्ट फ़ेल कर जाए। अगर जेब में कुछ रहेगा तो कोई शरीफ़ उसी से आपके कफ़न-दफ़न का प्रबंध तो कर देगा।” उनकी यह बात मुझे कुछ जँची है। मैंने दूसरे रोज से यह प्रबंध किया है कि 100 रु. अपनी जेब में बराबर रखूँगा। यह उनको मालूम हो गया है। उसी दिन एक सौ पैंचा माँगन आ धमके हैं। “है कहाँ?” मैंने कहा। बोले, “वही कफन-दफन वाला।” मैंने कहा, “वह तो कफन-दफन के लिए है।” फिर बोले, “राम कहिए। आप आज ही मर रहे हैं थोड़े? कल तो मैं वापस ही कर दूँगा।” मैंने उनको यह रुपया दे दिया है। उनका कल अब तक नहीं आया। उन्‍होंने अब तक वापस नहीं किया। उनको शायद यह मालूम हो गया है कि मैं कब मरूँगा। मेरा ख़याल है कि वे मेरे मरने के एक रोज़ पहले उसे वापस करेंगे।

खैर, दोस्‍त न लौटावें न सही। दोस्‍त बरकरार रहें और मेरे दोस्‍त बने रहें। मरने पर कफ़न-दफ़न का इंतज़ाम न हो सही, पर एक सौ रुपया के लिए हम अपने दोस्‍त की दोस्‍ती दफ़न नहीं कर सकते।

यह तो एक बात रही, पर इसी बात की वजह से जेब मेरे लिए पहेली बन गयी है। अगर ख़ाली रहे तो जेबकट की गाली सुन और भर जाए तो दोस्‍तों की दावत कर, नहीं तो उनसे अदावत हो जाए। भरने में देर हो तो हो, खाली होने में देर हो तो अँधेर हो जाए।

इसी उधेड़बुन में पड़ा था कि उधर से स्‍टेनो बाबू आये। स्‍टेनो से सलाह ली जाए यह बात कुछ जँचती नहीं है। पर हमारे सामने ही ऐसी‑ऐसी मिसाल मौजूद है कि जब पहलवान किसी भी पहलवान को अपने लायक नहीं पाते थे तो लकड़ी के खूँटे पर ही अपना पेंच लगाते थे। एक यह भी रहे। मैंने स्‍टेनो बाबू से अपना असमंजस बयान किया। बोले, “क्‍या कहूँ, हुजूर। छोटा मुँह बड़ी बात कहने को हिम्‍मत नहीं होती। यही रहस्‍य की बात है कि जिस जेब की बदौलत दूसरे कमाते हैं आप उसी की बदौलत गँवाते हैं।”

स्‍टेनो की बात से मेरा मिज़ाज कुछ बढ़ा। मैंने कहा, “क्‍या कहा आपने? कमाते हैं? कैसे कमाते हैं?”

“जेब में बहुत-सी संस्‍थाएँ रखते हैं। धनियों से, सरकार से सहायता लेते हैं। उसको अपने काम में लगाते हैं। मैं पहले बाबा सुंदरदास के यहाँ रहता था। उनका बालिका विद्यालय क्‍या है? जेब की संस्‍था है,” वे बोले।

“क्‍या कहा आपने? बालिकाएँ जेब में पढ़ती हैं? कैसे पढ़ती हैं? कैसे अँटती हैं?”

“बालिकाएँ कहाँ हैं हुजूर! एक भी बालिका नहीं है। सिर्फ जेब में एक कार्ड रखते हैं। उस पर उनके नाम के साथ बजाप्‍ता सभापति, बालिका विद्यालय लिखा है। तभी तो कह रहा हूँ जेब की संस्‍था है। इसके अलावे जेब में बहुत-सी, तरह-तरह की दरख्‍वास्‍त रखते हैं, जब जिस मिनिस्‍टर से भेंट होती है एक उस के सामने बढ़ा देते हैं और ऑर्डर करवा लेते हैं। आप उसकी बदौलत गँवाते हैं।”

अब तो समझिए कि आँख खुल गयी। जेब को इतना महत्‍व मैंने कभी नहीं दिया था। मालूम हो गया कि जेब में एक और काम हम मज़े में ले सकते हैं। मैंने एक बार अपनी जेब की ओर देखा मनसूबे के साथ और जैसे मैंने उस की ओर देखते हुए कहा कि तू भी तैयार हो जा। अब वे दिन आ गये जब तुम्‍हारी बदौलत घटी होती थी, अब कुछ होकर रहेगा। किसी की मजाल नहीं कि तुमको महीनों खाली रख सके। जेबकट आवें, गिरहकट आवें, दोस्‍त मुँहफट आवें, अब वह लटपट लगेगी कि तुम सब के बाद भी सदा भरी रहोगी।

पर जेब ने जैसे इस आश्‍वासन पर कुछ ज्‍यादा ध्‍यान नहीं दिया। जैसे वह कह रही हो कि आप कहते हैं लेकिन मौका आता है तो सब भूल जाते हैं। जैसे वह कह रही हो कि आप मेरी इज़्जत की ओर ध्यान कभी नहीं रखते, बराबर दूसरों की इज़्जत बचाने के फेर में मुझको बेइज़्जत करते रहते हैं।

अपनी जेब से तो मैं खुद शर्मिंदा हूँ, पर क्‍या करूँ? उदार स्‍वभाव, मदद करने की आदत, दूसरों के दुख में हाथ बँटाने की चाह, यह सब जब साथ हो जाते हैं तब जेब का कुछ ख़याल ही नहीं रहता।

अपना ख़याल दूसरा है और जेब का कुछ दूसरा है। जेब की समझ में यह आता है कि उसकी शान इसमें है कि आठों याम, सुबह-शाम भरी रहे और मेरी समझ में आता है कि इंसान की शान इसमें है कि उसकी जेब खाली हो जाए, तो हो जाए, पर कोई उसके पास से खाली न लौटे। जेब की मज़बूती और कमज़ोरी का सब से बड़ा सबूत यही है कि वह कब किसके काम आयी, कब किसका कितना भला कर सकी, कब किसको कितना आराम दे सकी। इसीलिए मैं कभी-कभी घर लौटता हूँ तो उन पुर्ज़ों से जेब की उपयोगिता की माप करता हूँ जो इसमें मेरे साथ आते हैं।

बात यह होती है कि मैं अपनी जेब में फाउंटेनपेन नहीं रखता। कलम रख कर इतनी बार धोखा खा चुका हूँ कि मैंने कलम का रखना छोड़ दिया। बिना कलम बाहर निकला तो जगह-जगह आदमी मिलते हैं।

कोई कहता है, मेरे लड़के ने एम.ए. का इम्‍तहान दिया है। अगर फर्स्‍ट क्‍लास न आया तो नौकरी मिलनी दुश्‍वार है। इतना कह के मेरी ओर देखता है कि मैं उसका नाम लिख लूँ। मैं साफ कह देता हूँ कि कलम नहीं है। इसके बाद वे लड़के का नाम, पता, रोल नम्बर सब लिख के दे देते हैं और साथ-साथ परीक्षक का नाम भी। पुर्ज़ा मेरी जेब में चला आता है।

दूसरे मिलते हैं, कहते हैं, हुज़ूर ही के पास जा रहा था। पब्लिक सर्विस कमीशन में कल मेरे भाई ने इंटरव्यू दिया है! पोस्‍ट दस हैं। किसी प्रकार नवें-आठवें में भी इसका नाम आ जाता तो बेड़ा पार हो जाता। उन के नाम-पता का पुर्ज़ा भी जेब में चला आता है।

तीसरे मिलते हैं, कहते हैं कि मैंने अमुक सड़क पर मिट्टी संग्रह के लिए टेंडर दिया है। अमुक इंजीनियर के अख्‍तियार का काम है। मैं कहता हूँ सब लिख के दे दीजिए। सड़क का नाम, काम का ब्‍यौरा, अधिकारी का नाम जो टेंडर खोलेगा और टेंडर खुलने की तारीख जेब में चली आती है।

चौथे मिलते हैं, बोलते हैं, मेरे साले की बदली पटना से सहरसा हो गयी। आप की ज़बान लगेगी और मेरा काम हो जाएगा। मैं पूर्ववत लिख कर माँगता हूँ। यह पुर्ज़ा भी मेरी जेब में।

पाँचवें मिलते हैं तो कहते हैं कि उनके पिता अस्‍पताल में हैं। अगर अमुक डॉक्‍टर से जरा कह देते तो उनकी देखभाल ठीक से होती। बस वार्ड नम्बर, डॉक्‍टर का नाम, रोगी का नाम, बेड का नम्बर सब लिख कर एक पुर्ज़ा दे देते हैं। यह पुर्ज़ा भी जेब में।

गोया जेब क्‍या है अजायबघर है। डॉक्‍टर भी जेब में, इंजीनियर भी जेब में, एक्‍ज़ामिनर भी जेब में, कमिश्‍नर भी जेब में, कलक्‍टर भी जेब में, दवा भी जेब में, दारू भी जेब में, नौकरी भी जेब में, टीका भी जेब में, मिनिस्‍टर भी जेब में और न जाने क्‍या सब जेब में। जानता हूँ कि इसमें बहुत-सा अनुरोध है जो बेईमानी, बेमतलब है। न जज के यहाँ कहने जाऊँगा न इंजीनियर के यहाँ, न कमिश्‍नर के यहाँ, न कलक्‍टर के यहाँ। अगर बहुत होगा तो मिनिस्‍टर और डॉक्‍टर तक पहुँच जाऊँगा, काम हो, न हो, राम जाने। पर किससे कहूँ? क्‍या कहूँ? कहाँ-कहाँ लड़ाई मोल लूँ ! बस बेचारी जेब है जो सारा भार सहन करती है। चुप रहती है और कभी नहीं बोलती है।

कभी-कभी तो ऐसा होता है कि एकाध आदमी पुर्ज़ा लेकर कहते हैं कि ऐसा न हो कि जेब ही में रह जाए। राय होती है कि उनसे कह दूँ। अगर आप की बहुत किस्‍मत होगी तो जेब में रहेगी वरना ऐसे-ऐसे पुर्ज़े जेब में कुछ देर तक रह जाएँ तो जेब की पहाड़ का बोझ उठाना पड़ जाएगा। कभी-कभी किसी के बारे में कुछ भी नहीं कर पाता और वह एकाध रोज़ के बाद दर्याफ़्त करने आ जाता है कि क्‍या हुआ तो ऐसे वाकए में भी जेब का सहारा लेना पड़ता है। कहता हूँ कि पुर्ज़ा जेब में ही रह गया, कुर्ता धोबी के यहाँ चला गया। सोचता हूँ कि एक जेब के मत्‍थे इतना भार। अगर जेब न होती तो अनर्थ हो जाता।

लेकिन सिर्फ़ इतने मौके पर ही जेब नहीं काम देती बल्कि और भी नाज़ुक और संगीन मौके आते हैं जब काम देती है। हाँ कभी-कभी ऐसा होता है कि कोई सयाने सज्‍जन जब कुछ काम करवाने की गरज़ से कुछ देना चाहते हैं और मैं लेना चाहता हूँ तब भी शर्मिंदा होने के कारण न-न कहता हूँ तो वे ज़बर्दस्‍ती नोट का पुलिंदा जेब में रख देते हैं कि जैसे जेब से मेरा कुछ वास्‍ता ही नहीं।

वे चले जाते हैं तो फौरन नोटों को सरियाता हूँ और गिनता हूँ और जेब को धन्‍यवाद देता हूँ।

अगर मेरे हाथ में फैशन चलाना होता तो मैं फौरन पहले यह चलाता कि कुर्ता के ऊपर एक नहीं अनेक जेब हों। मेरे हाथ में सत्ता आ जाए तो मैं जेबों के लिए इतना काम करूँ कि कानून बना दूँ कि चाहे किसी की जेब हो, उसमें कुछ रखना ही पड़ेगा। हाँ, जेबों को खाली रख के उनकी बेइज़्जती नहीं की जा सकती। एक जेब भरी हो तो दूसरी खाली क्‍यों रहे? ऐसा उपाय हो कि हर जेब में कुछ न कुछ हो।

एक मन कहता है कि अगर जेब साथ न दे तो मेरे हाथ में सत्ता आ ही नहीं सकती। प्रजातंत्र में चुनाव के चक्‍कर में भी जेब का ही जादू काम देता है। जब मैं जेब के लिए ही सत्ता का आह्वान कर रहा हूँ तो जेब क्‍या इतनी मूर्ख है कि मेरा साथ न देगी।

ज़रूर साथ देगी। अपनी जेब पर मुझको भरोसा है और मैं जानता हूँ कि जब तक जीवन है इसका सहयोग मुझे सदा मिला करेगा।

जेब ज़िंदाबाद!

समाप्त


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Author

  • कामता प्रसाद सिंह 'काम'

    जन्म: 1916, भवानीपुर गाँव, औरंगाबाद (बिहार)

    औरंगाबाद (बिहार) के भवानीपुर में जन्में कामता प्रसाद सिंह ‘काम’ हिंदी के प्रसिद्ध गद्यकार रहे हैं। गाँव की पृष्टभूमि पर उनकी अधिकतर रचनाएँ आधीरत थीं। कहानी, निबंध, व्यंग्य और यात्रा संस्मरण उन्होंने लिखे हैं।

    मुख्य कृतियाँ:
    ‘मैं छोटा नागपुर में हूँ’, ‘घर , गाँव और देहात’, ‘घुमक्कड़ की डायरी’,  'कामता प्रसाद सिंह की प्रतिनिधि रचनाएँ'

    निधन: 1963

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