पुस्तक टिप्पणी: उस पार का मर्द – आबिद सुरती

उस पार का मर्द - आबिद सुरती
कहानी:

रघुबीर सिंह और लाखन की दुश्मनी ने पूरे गाजरा गाँव को बर्बाद कर दिया था। कभी रघुबीर सिंह गाजरा गाँव में तूती बोलती थी पर अब रघुबीर सिंह अकेला था। लाखन सिंह ने उसके पूरे परिवार का खात्मा कर दिया था। अब रघुबीर सिंह पुलिस के घेरे में समय बिताने को मजबूर था।

लाखन सिंह ने कसम खायी थी कि वो रघुबीर सिंह के पूरे परिवार का खात्मा कर देगा।

अब उसकी कसम को खत्म होने के केवल रघुबीर सिंह ही बचा था।

लाखन सिंह की रघुबीर सिंह से क्या दुश्मनी थी?
क्या वो अपनी कसम को पूरा कर पाया?

टिप्पणी

‘उस पार का मर्द’ लेखक आबिद सुरती का लिखा उपन्यास है। उपन्यास का यह संस्करण 2012 में प्रकाशित हुआ था। आबिद सुरती वैसे तो अपने रचे किरदार ‘ढब्बू जी’ के लिए जाने जाते हैं पर पहले भारतीय कॉमिक बुक हीरो में से एक को बनाने का श्रेय भी उन्हें जाता है। यह किरदार ‘बहादुर’ था जो कि भारतीय कॉमिक बुक के शुरुआती नायकों में था। बहादुर का प्रथम कॉमिक बुक दिसम्बर 1976 में इंद्रजाल द्वारा प्रकाशित किया गया था। बहादुर के कथानक की पृष्ठभूमि चम्बल और वहाँ रहने वाले डकैत थे। लेखक ने बहादुर के कॉमिक बुकों के लिए इस समस्या पर शोध भी किया था यह उन्होंने अपने कई साक्षात्कारों में बताया है। प्रस्तुत उपन्यास ‘उस पार का मर्द’ की पृष्ठभूमि भी चम्बल और उधर आस-पास का इलाका है। ऐसे में उसी शोध से यह उपन्यास भी निकला होगा ऐसा सोचना गलत नहीं होगा। वैसे बहादुर के साथ इस उपन्यास की एक और समानता है लेकिन उसके विषय में मैं लेख के अंत में बात करूँगा।

अभी तो कथानक पर आऊँ तो उपन्यास की शुरुआत में ही पाठको को यह पता लगता है कि डकैत लाखन सिंह और ठाकुर रघुबीर सिंह के बीच में दुश्मनी है और लाखन ने रघुबीर के पूरे परिवार को खत्म कर दिया है। अब केवल परिवार में रघुवीर ही बचा है। फिर जैसे‑जैसे उपन्यास आगे बढ़ता तो पाठक को पता लगता जाता है कि रघुबीर और लाखन के बीच दुश्मनी क्यों हुईं और कैसे लाखन ने रघुबीर के पूरे परिवार को खत्म करने की प्रतिज्ञा ली और उसे कैसे पूरा किया।

जैसे कि अब आपको अंदाजा हो गया होगा कि उपन्यास के केंद्र में रघुबीर और लाखन ही हैं। रघुबीर गाँव के सबसे ताकतवर लोगों में से एक था। अपनी ताकत को बनाए रखने के लिए वो कुछ ऐसा काम करता है कि उस कार्य के परिणाम स्वरूप ऐसी चीजें घटित होती हैं कि उसके पूरे परिवार का खात्मा हो जाता है। उपन्यास के शरुआत में आपको रघुबीर से थोड़ी सहानुभूति होती है। उसके साथ जो घटित हुआ वो सचमुच हृदयविदारक रहता पर जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है आपको उन घटनाओं के कारण पता चलते हैं। फिर आपकी सहानुभूति भी थोड़ा‑थोड़ा उसके प्रति कम होने लगती है। कई बार ताकत के मद में व्यक्ति इतना अंधा हो जाता है कि उसे लगने लगता है वह किसी भी गलत को सही बना सकता है पर इसका कई बार कितना खतरनाक खामियाज़ा भुगतना पड़ जाता है यह रघुबीर के किरदार से देखा जा सकता है।

उपन्यास का दूसरा मुख्य किरदार लाखन है। वह चम्बल का एक खूँखार डकैत है जिससे आस-पास का इलाका थर्राता है। 1950 से 2000 के शुरुआती दशकों के बीच चम्बल में डकैतों का आतंक था। वह चम्बल और उसके आस-पास के इलाके में मौजूद गाँव में लूटपाट किया करते थे। यह लोग अक्सर गाँव के ही होते थे और विभिन्न कारणों से डकैतों के गिरोहों में शामिल हुए थे। कभी ताकत के लिए और कभी गाँव के ताकतवर लोगों के सताये जाने के चलते। कई बार इसलिए डकैतो को कुछ लोग अपराधी भी समझते थे और कुछ लोग सिस्टम के सताये लोग जिन्होंने सिस्टम के खिलाफ आवाज़ उठाई थी क्योंकि सिस्टम ने उन्हें वो न्याय नहीं दिया था जिसकी सिस्टम से उन्हें आस थी। लाखन ऐसे ही सिस्टम का सताया आदमी है। जब एक आदमी अपनी ताकत से गलत को सही साबित करके उसके परिवार को गहरा आघात पहुँचाता है तो वह एक प्रतिज्ञा ले लेता है। पर प्रतिज्ञा लेने के बाद वह एक ऐसे रास्ते पर निकल पड़ता है जिसमें चलते हुए वह उस आदमी से भी जघन्य अपराध करने लगता है जिससे वह बदला लेना चाहता था। कैसे एक बार व्यक्ति गलत रास्ते पर निकलता है वो फिर आगे बढ़ता चला जाता है यह लाखन के किरदार में दिखता है। लाखन एक दुर्दांत डाकू है जो अपने मकसद को पाने के लिए कुछ भी कर सकता है। पर लेखक ने यह दर्शाया है कि उसके अंदर मनुष्यता बाकी है जिसे वह दबाने की कोशिश करता रहता है। ऐसे में लेखक ने उसे पूर्णतः स्याह न दर्शाकर उसके मानवीय पहलुओ को भी उजागर किया है। हालाँकि उपन्यास कहीं भी उसका महिमंडन नहीं करता है और उसने कितने लोगों की दुनिया उजाड़ी है यह दिखलाकर उससे हर तरह का नायकत्व छीन लेता है।

चूँकि लाखन डकैत है तो उसका गिरोह के लोग भी उपन्यास के पात्र हैं। इं किरदारों के माध्यम से एक गिरोह में किस तरह से विभिन्न डाकुओं के बीच समीकरण बदलते रहते हैं यह लेखक ने दर्शाया है। कैसे व्यक्ति भले ही सरगना हो पर उसे अपने ही भीतर घात करने वालों से बचकर रहना पड़ता है वह इधर दिखता है।

प्रस्तुत उपन्यास के दोनों ही मुख्य किरदारों की खास बात ये है कि आपको कभी-कभी इनके लिए सहानुभूति होती है पर जैसे-जैसे इनके कार्य आपको दिखते जाते हैं तो यह सहानुभूति कम ही होती जाती है। इनसे जुड़े इनके परिवारों के लिए ज़रूर आपको दुख होता है। लेखक ने इन किरदारों को इस तरह से गढ़ा है कि कौन नायक और कौन खलनायक यह फर्क करना उतना आसान नहीं है। शायद दोनों ही खलनायक हैं बस बड़ा खलनायक कौन है यह पाठक को देखना होता है।

इन दोनों मुख्य किरदारों के अतिरिक्त किवन साहब नामक एक किरदार उपन्यास में मौजूद है। वह एक पुलिस अफ़सर हैं जो लाखन को पकड़ना चाहता है। उसे लाखन से नफरत नहीं है क्योंकि वो उसे ज़िंदा ही पकड़ना चाहता है। वहीं रघुबीर को बचाने की ज़िम्मेदारी भी उस पर है। वह यह कार्य कैसे करता है और इस काम में उसकी हार जीत कैसे होती है यह भी इधर दिखता है। लाखन और किवन के बीच कुछ दाँव पेंच भी होते दिखते हैं जो कि कथानक के रोमांच को बढ़ाते हैं।

इन किरदारों के अतिरिक्त उपन्यास में गाँव में रहने वाले कुछ और किरदार मौजूद हैं। इनमें लाखन और रघुवीर के घर वाले हैं तो गाँव के कुछ ऐसे लोग भी जिन्होंने डकैतों के कारण अपना परिवार खोया है। एक बुजुर्ग जिसने अपने बेटे को डकैतों के कारण खो दिया उसका चित्रण आपके मन को छू जाता है।

उपन्यास वर्तमान से शुरु होता है और फिर बैक फ़्लैश में कहानी पूरी कहानी पता चलती है और आखिर में वापस वर्तमान में आता है। मौत का डर किस तरह से आखिर में व्यक्ति पर तारी हो जाता है यह देखने को मिलता है। वहीं ‘मर्द’ बनने की परिभाषा कैसे दो परिवारों और उनकी खुशियों का समूल नाश कर देती है यह भी दिखता है।

अक्सर डाकुओं को केंद्र में रखकर लिखे गए उपन्यास में लेखक डाकुओं और नायक की इनके साथ भिड़ंत को रोमांच पैदा करने के लिए प्रयोग करते हैं। पर इधर लेखक ने ऐसा नहीं किया है। उन्होंने वह वो यथार्थवादी त्रासिदी दिखाई है जिनसे ऐसे किरदारों और उनसे जुड़े लोगों को आखिर में गुज़रना पड़ता है। वहीं जो एकाकीपन और खालीपन लाखन और रघुबीर को भुगतना पड़ता है वह इस राह के कटु यथार्थ को दर्शाता है।

ऊपर मैंने जिक्र किया था कि प्रस्तुत उपन्यास की आबिद सुरति द्वारा रचे किरदार बहादुर से एक और समानता दिखती है। वह यह है कि कॉमिक बुक्स के विषय में जब मैं पढ़ रहा था तो वहाँ मुझे ये जानकारी मिली कि बहादुर का एक साथी लखन भी था जो पूर्व में एक डकैत रहा था। इस जानकारी को पाने के बाद मैंने ये सोचे बिना नहीं रह पाया कि कहीं इस उपन्यास का लाखन ही वो लखन तो नहीं है? ऐसा इसलिए भी क्योंकि इधर भी आखिर में लाखन आत्मसमपर्ण कर देता है और फिर उसे अपने कृत्यों पर पछतावा भी रहता ही है। ऐसे में ऐसी सम्भावना तो है। क्या आपने बहादुर के कॉमिक बुक पढ़ें हैं? क्या आपको इस विषय में कुछ पता है। अगर हाँ, तो मुझे इस चीज से ज़रूर अवगत करवाइएगा।

बाकी अंत में यही कहूँगा कि ‘उस पार का मर्द’ चम्बल की डकैतों के ऊपर लिखा एक पठनीय उपन्यास है। किरदार यथार्थ के निकट प्रतीत होते हैं और उपन्यास आपको बाँधकर रखता है।

प्रकाशक: नवरंग साहित्य | पुस्तक लिंक: अमेज़न


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