लघु-कथा: डकैत – गजानन रैना

लघु-कथा: डकैत - गजानन रैना

यू पी की सीमा के पास यह गाँव था। जिउती अपने पति हरखू की खटिया से लगी बैठी थी। वो बुखार में तपता बेसुध पड़ा था।

स्थानीय डाक्टर, जो वास्तव में एक कम्पाउंडर था, अभी-अभी कह कर गया था कि सुबह तक शहर न ले जाये जाने पर हरखू की जान को खतरा हो सकता था।

बादलों ने गम्भीर गर्जन किया।

जिउती ने ठंडी साँस ली। कुल सौ सवा सौ रुपये पास थे, कैसे ले जाये पति को शहर! गाँव में जीप तो उपलब्ध थी, लेकिन भाड़ा ही पूरा नहीं पड़ना था।

क्या करे, कहाँ जाये!

बारिश कभी भी तेज़ हो सकती थी। थोड़ी ही देर पहले झींसी पड़ रही थी जो अभी रुकी हुई थी।

एक तो रात में यूँ ही जल्द कोई गाँव से बाहर जाने को तैयार नहीं होता था, ऊपर से ऐसा खराब मौसम!

उस इलाके में दुर्दांत डकैत सहदेवा का आतंक था। अनिंद्य सुंदरी जिउती का रात के वक्त निकलना सुरक्षित नहीं था, लेकिन और चारा ही क्या था।

जिउती को एकाएक खयाल आया, एक दर था, जहाँ से उसे पैसे की मदद और सुरक्षित यात्रा की सुविधा, दोनों मिल सकते
थे, गाँव के जमींदार कुँवर चंद्रमोहन सिंह।

युवा जमींदार परम विलासी था लेकिन सूरत ऐसी मनमोहिनी‌ थी कि लड़कियाँ खुद ही उस पर पतंगों की तरह गिरती थीं।
हवेली में जाने का मतलब था शेर के मुँह में कदम रखना, लेकिन और कोई चारा भी तो नहीं था।

उसने पति का कम्बल व्यवस्थित किया, बगल से रुलदू बूढ़े को आवाज़ दे बुला कर उसे तम्बाकू की पुड़िया और हुक्का दे कर पति के पास बिठाया और घर से निकली।

बादल ज़ोर से गरजे।

वो हवेली पर पहुँची तब तक बूँदाबांदी शुरू हो चुकी थी। चार पाँच बंदूकधारी हवेली के सामने के प्रांगण में इधर-उधर बैठे हुए थे।

औरत देख कर किसी ने उसे टोका नहीं। बरामदे में पहुँच कर उसने एक नौकरानी से अपना मंतव्य बताया।

वो जिउती को खड़ा छोड़ अंदर चली गयी। कोई दस मिनट बाद वो लौटी। उसने जिउती को पीछे आने का इशारा किया।

वे एक विशाल शयनकक्ष में पहुँचे, नौकरानी उसे एक कुर्सी पर बिठा चली गई।

जिउती मंत्रमुग्ध उस परम ऐश्वर्यशाली शयनकक्ष को देखती रही।

आहट हुई तो उसने गर्दन मोड़ कर देखा। युवक जमींदार सामने खड़ा था।

चंद्रमोहन पुरुषोचित सौंदर्य का अनुपम उदाहरण था।

“आज हमारी ड्योढी के भाग कैसे जगे, जिउती? क्या हुक्म है?” वो बोला।

सकुचाई जिउती ने सारी बात कही।

सब सुन कर चंद्रमोहन ने लम्बी साँस ली, “समझ गया। एक मिनट ठहर।”

उसने पर्स निकाला और सारे रुपये निकाल लिये। उसने पास की एक मेज़ पर रुपये रख दिये, “ये पंद्रह हज़ार रुपये हैं। तेरा काम मज़े में हो जायेगा। मैं नहा कर आता हूँ। इत्मीनान से बैठ।”

जिउती की तनती भौंहों को देख वो हँसा, “या न चाहिए हों तो चली जाना, कोई रोकेगा नहीं। मैं ज़ोर ज़बरदस्ती में यकीन नहीं रखता।”

वो चला गया। जिउती किंकर्तव्यविमूढ़ बैठी रही ।

जिउती ने सामने पड़े रुपयों पर एक निगाह डाली। वो हरखू को बचा लेगी इन रुपयों से, ठीक।

लेकिन उसका स्वाभिमानी पति क्या बर्दाश्त कर पायेगा यह घटना?

वो तो उसको किसी का देखना भी बर्दाश्त नहीं कर सकता था।

उसका प्राणों से प्यारा पति, जिसने दस बरस पुरानी शराब की लत जिउती के एक बार रोने पर छोड़ दी थी।

उसका हरखू, जिसने अकेले पीटा था चंद्रमोहन के तीन तीन लठैतों को, एक बेहूदी बात कहने पर।

वो एक अनजाने आवेश में उठी और बाहर निकल गयी।

बारिश तेज़ हो चुकी थी, पहले से घबरायी जिउती गहन अंधकार में राह भटक गयी।

बिजली जोर से कड़की तो‌ उसने पाया कि हड़बड़ाई वो गाँव की जगह जंगल में कदम रख चुकी थी।

जिउती घबरायी लेकिन उसने हिम्मत न हारी। वो उसका स्वभाव ही नहीं था।

उसने साथ लायी प्लास्टिक की चादर सर से ओढ़ कर कंधों से लपेट ली और अपने अंदाज से एक राह पकड़ी और बढ़ी।

लेकिन आज दिन उसके खिलाफ था,वो जैसे-जैसे बढ़ी, जंगल में ही धँसती गयी।

एक सुनसान मोड़ पर एक विराट पीपल के पेड़ के नीचे उसे एक चिंगारी दिखी।

वो लम्बे कदम बढ़ा कर जहाँ पहुँची, वहाँ एक निहायत सफेद बालों और दाढ़ी वाले महात्मा विराजमान थे।

वे गाँजे की चिलम का एक विलंबित कश खींच रहे थे। उसके उन तक पहुंचने तक उन्होंने धुयें की एक यथेष्ट लंबी लकीर मुंह से छोड़ी।

“क्या कष्ट है, बेटी?” उन्होंने गूँजती आवाज़ में कहा।

जिउती ने अपनी रामकहानी कह दी।

बाबा जी ने एक और लम्बा कश लिया और झोली में हाथ डाल कुछ ढूँढने लगे।

जिउती को किसी जंतर-मंतर की उम्मीद थी, लेकिन बाबा जी ने नोटों की गड्डियाँ बरामद कीं।

“ये रख, बीस हजार हैं। आगे देखेंगे,” बाबा जी के श्रीमुख से निकला।

जिउती ने भावविह्वल हो उनके चरण पकड़ लिये।

जिउती ने आँसू भरी आँखों से बाबा जी को देखा। “आपने बहुत बड़ा उपकार किया है इस गरीब औरत पर, महाराज। लाज बचा ली हमाई,” वो भरे गले से बोली।

बाबा जी ने इन्कार में सर हिलाया। वे सफेद बालों का विग और दाढ़ी उतार कर झोले में रख रहे थे।

“हमने क्या किया! तूने किया, जो किया तूने किया। तू वहाँ से निकल न आती तो तेरी लाज कौन बचा सकता था। तूने पैसे छोड़ कर अपनी आबरू बचायी। यह तेरा फैसला था। तूने किया यह। नहीं तो, क्या हम और क्या कोई! क्या कर लेता? शाबाश, बेटा।”

जिउती ने अब ध्यान से उनका चेहरा देखा।‌ वो चालीस-बयालीस साल का,पत्थर से कठोर चेहरे वाला आदमी था।

तभी अँधेरे से दस-बारह लोग भूतों की तरह प्रकट हुये।

पत्थर जैसे चेहरे वाले उस आदमी ने स्नेह से जिउती का सर थपथपाया और आगंतुकों को इशारा किया, “चलो, सब कोई आगे बढ़ो।
लखना, तू इस लड़की को जंगल के बाहर छोड़ कर हम लोगों से रामदीन काछी के बाग के पास मिल।”

वे लोग आगे बढ़ गये।

इलाके का सबसे बड़ा डकैत सहदेवा अपने नये अभियान पर निकल चुका था।

समाप्त


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Author

  • गजानन रैना

    गजानन रैना का जन्म फिरोजपुर, पंजाब में  हुआ था। वह वाराणसी में पले, बढ़े हैं। काशी हिन्दू विश्व विद्यालय से स्नातकोत्तर हैं। वह पढ़ने, लिखने, फिल्मों  व संगीत के शौकीन हैं और इन पर यदा कदा अपनी खास शैली में लिखते भी रहते हैं।

    फ्रीलांस अनुवाद व संपादन आय का जरिया ।

    हॉबी ज्योतिष।

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