वरिष्ठ लेखक समीर गांगुली पिछले चार दशकों से अधिक समय से लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं। वह नये और अनूठे विषयों को पाठकों के समक्ष लाने के लिए जाने जाते हैं। हाल ही में उनका किशोर उपन्यास ‘सब अच्छा होगा: एक बड़ी-सी डॉक्टर की छोटी-सी कहानी‘ साहित्य विमर्श प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। उनके इसी उपन्यास पर हमने लेखक समीर गांगुली से यह बातचीत की है। आप भी पढ़ें
प्रश्न: नमस्कार समीर जी, एक बुक जर्नल में आपका स्वागत है। सर्वप्रथम को नवीन पुस्तक के प्रकाशन के लिए हार्दिक बधाई। ‘सब अच्छा होगा: एक छोटी-सी डॉक्टर की बड़ी-सी कहानी’ के विषय में पाठकों को कुछ बताएँ।
उत्तर: धन्यवाद विकास जी! इस पुस्तक को प्रकाशित होने में करीब दो-ढाई साल का समय लग गया। इस बीच कुछ नया भी लिखा जा चुका है। बहरहाल, अपने पूर्व-लेखन की समीक्षा करते समय मैंने पाया कि पिछले कुछ उपन्यास आंशिक रूप से या पूर्णत: फैंटेसी उपन्यास थे। इसलिए सोच लिया था कि इस बार फैंटेसी से बचना है। दूसरी बात थी कि सभी उपन्यासों के मुख्य किरदार बच्चे थे, सो एक चुनौती यह भी ली कि इस बार किशोर उपन्यास के पात्र बच्चे न होकर बड़े होंगे। लेकिन कहानी किशोरों को आकर्षित करने वाली होगी।

प्रश्न. पुस्तक को लिखने का विचार कैसे आया? कोई विशेष बात जिसने पुस्तक लिखने के लिए उत्प्रेरक का कार्य किया हो?
उत्तर: यह उपन्यास अस्पताल की पृष्ठभूमि पर एक अंडरवेट डॉक्टर और हैवीवेट पेशेंट के आपसी रिश्ते पर केंद्रित कहानी है। मेरे लिए दो चीजें लेखन में उत्प्रेरक का काम करती हैं—एक, अच्छा पढ़ना और दूसरा— बारीकी से अवलोकन। लगता है अस्पताल में किसी रोगी या डॉक्टर को देखकर यह विचार उपजा हो। लेकिन लेखन के इतने लेवल होते हैं कि कई बार मूल कारण या उत्प्रेरण को अलग से देखना संभव नहीं हो पाता।
प्रश्न: अक्सर किशोर या बाल साहित्य जब लेखक लिखते हैं तो मुख्य किरदारों को उतनी ही उम्र का बनाते हैं जिसके कि मुख्य पाठकवर्ग होता है। पर आपकी पुस्तक के दोनों किरदार वयस्क हैं। कुछ इस विषय में बताएँ। ये निर्णय आपने क्यों लिया?
उत्तर: हाँ, यह सायास लिया गया निर्णय है। दरअसल मैं लेखन में किसी पैटर्न या ढर्रे के बनने को पसंद नहीं करता। मुझे यह लेखक की खूबी नहीं लगती कि उसके स्टाइल को पाठक भाँप ले। मैं अपने लेखन में अन-प्रेडेक्टिबल बनना चाहता हूँ।
प्रश्न: लेखन को इस तरह अप्रत्याशित बनाने के कुछ फायदे या नुकसान भी तो होते होंगे? क्या आपने इन्हें महसूस किया है?
उत्तर: हाँ, दोनों बातें हैं। अलग तरह से लिखने की कोशिश करना कोई दबाव नहीं है। मन से आता है। शायद अपनी सोच ही इस तरह की है। बाल साहित्य लेखन मेरे लिए अपना शुद्धिकरण है। यह मन को निर्मल बनाता है। संतुष्टि देता है। मान्यता भी दिलाता है। हाँ, दूसरा पक्ष यह है कि हमारी रचनाओं को आकलन की कसौटी पर सम्पादक या निर्णायक की ‘सोच-समझ-नीति-नियत’ के मापदंड से होकर गुजरना पड़ता है। वहाँ कई बार उन रचनाओं को उचित मान नहीं मिलता, जिन्हें लिखते समय आप काफी आनंदित थे और सोच रहे थे कि बच्चे उसे पसंद करेंगे।
प्रश्न: अच्छा पुस्तक से आपके तरफ चलते हैं। साहित्य के प्रति अनुराग आपके मन में कैसे जागृत हुआ? क्या घर में साहित्य का माहौल था?
उत्तर: मेरा बचपन देहरादून के रायपुर नामक एक टाउनशिप में हुआ। बचपन तिलस्मी था। यार-दोस्त गप्पबाज थे और आसपास के लोगों, जगहों में कहानियाँ छिपी थी। जगहों के नाम ही देख लीजिए— प्रेमनगर, तपोवन, रांझावाला, आठ नम्बर गाँव। मेरी माँ भी महा-किस्सेबाज थी। हम भाई-बहनों को कहानी में इतनी अतिश्योक्ति डालकर सुनाती थी कि मजा आ जाता था। पिताजी बांग्ला साहित्य के अनुरागी थे। उस समय हमारे घर में बांग्ला की मशहूर पत्रिका ‘देश’ आती थी।
प्रश्न: वह कौन से लेखक थे जिनकी रचनाओं ने किस्से कहानियों के प्रति आकर्षित किया??
उत्तर: शुरूआत सम्भवत: मौखिक रचनाओं यानी लोक कथाओं से हुई। माँ और दादी के मुख से ‘ठाकुरमार झूली’ की बांग्ला लोक कथाएँ सुनी। बाद में रवींद्र नाथ टैगौर, शरद्रचंद्र की रचनाओं ने एक अच्छा पाठक बनने में मदद की।
प्रश्न: आपके मन में लिखने का खयाल कब आया? क्या आपको अपनी पहली लिखी रचना याद है?
उत्तर: पढ़ना-लिखना सीखा, तो पिताजी ने घर में हिंदी अखबार ‘नवभारत टाइम्स’ लगवा दिया। यह मेरे अखबार से जुड़ाव का पहला कदम था। उसमें बाल जगत नाम से बच्चों की रचनाओं का एक पेज था। उसमें पहली रचना प्रकाशित हुई थी। तब शायद 15/16 वर्ष की उम्र रही होगी। उससे जुड़ा एक वाकया सुनाता हूँ। सर्दियों की एक सुबह जब भयानक पाला पड़ा था और गड्ढों में ठहरे पानी पर काँच जैसी परत चढ़ गयी थी। एक गिद्ध ज़मीन पर आ गिरा। वह बुरी तरह ज़ख्मी था। हमारे मोहल्ले के शर्मा जी के पुत्र पप्पू को लगा कि वह मरने वाला है। इसलिए उसकी मुक्ति के लिए उसे कोई प्रार्थना सुनायी जानी चाहिए। वह घर से प्रार्थना की एक किताब ले आया। गिद्ध को नहलाया गया और सब बच्चों ने मिलकर प्रार्थना शुरू की। थोड़ी देर में गिद्ध मर गया। मैंने इसकी एक रिपोर्ट बनाकर नवभारत टाइ्म्स में भेज दी। मैंने यह सवाल उठाया था कि गिद्ध प्रार्थना— पाठ से तर गया या ठंड से मर गया। यह एक बाल सुलभ जिज्ञासा थी। यह रिपोर्ट छपी और पप्पू तीन दिन तक मुझे पीटने के लिए ढूँढता रहा। यह मेरी पहली रचना का पारिश्रमिक था।
प्रश्न: हा हा हा ये तो बड़ा रोचक वाक्या है। लेखन के अपने जोखिम हो सकते हैं ये जल्द ही आपको पता चल गया था। वैसे अखबारों के इतर प्रथम प्रकाशित रचना कौन सी थी? कहाँ प्रकाशित हुई थी?
उत्तर: इंटरमीडिएट में आने तक बच्चों की पत्रिकाएँ खूब पढ़ने लगा था। जेब खर्च बच्चों की पत्रिकाओं को खरीदने में खर्च हो जाती थी। कबाड़ी बाजार पत्रिकाओं को पाने का सुलभ स्रोत था। बुजुर्ग कबाड़ी भी काफी उदारता दिखाते थे। एक बार चम्पक पढ़ने के बाद ना जाने क्यों लगा कि इससे बेहतर तो मैं लिख सकता हूँ। बस इसी उत्साह में दो कहानियाँ लिखकर चम्पक को भेज दी। उन कहानियों के नाम थे— कौवे का दुख; और पहले,सोचो-समझो,फिर करो। दोनों रचनाएँ चम्पक के एक ही अंक में छप गयीं। बस यहीं से शुरूआत हुई। लेकिन, उसके बाद अस्वीकृतियों का एक लम्बा सिलसिला चला, जिसने ‘मैं बेहतर हूँ’ वाला अहंकार निकाल दिया।
प्रश्न: वापस पुस्तक पर आते हैं। अपनी लेखन प्रक्रिया के विषय में बताएँ। विचार के आने बाद आपकी लेखन प्रक्रिया क्या रहती है। इस पुस्तक के लिए क्या प्रक्रिया रही थी?
उत्तर: मेरे मन में कई बार यह प्रश्न उत्पन्न हुआ है कि मैं लिखता क्यों हूँ?
और तमाम सम्भावित जवाबों को खारिज करते हुए मुझे हर बार यही जवाब मिलता है कि आनंद पाने के लिए।
मैंने विधिवत लेखन सन 1973-75 के दौरान किया। शुरुआत बाल साहित्य से की। कुछ समय बाद उस समय की प्रतिष्ठित बाल पत्र पत्रिकाओं में छपने का सिलसिला शुरू हो गया। इनमें से कुछ पत्रिकाएँ थीं—चम्पक, पराग, लोटपोट, मेला, बालक, मधु मुस्कान तथा दैनिक समाचार पत्रों के रविवारीय परिशिष्ट। जल्द ही एक बाल साहित्यकार के रूप में पहचान भी बनने लगी।
उसी दौरान एक बार पराग के दफ्तर में जाना हुआ। याद नहीं उस समय सम्पादक कौन होंगे, शायद यह सन 1980 के आसपास का समय होगा। सम्पादक से मुलाकात करने से पहले मैं उप-सम्पादक की मेज़ के दूसरी तरफ बैठा था। वो एक आकर्षक, शालीन महिला थीं। उन्होंने मुझसे कहा, “समीर, अब तुम्हारा थोड़ा बहुत नाम होने लगा है। देखना अब जल्द ही तुम बड़ों के लिए लिखने लगोगे। शायद उसमें नाम भी कमाओगे। दरअसल नये लेखक बाल साहित्य को लेखन की सीढ़ी के रूप में इस्तेमाल करते हैं।और इससे बाल साहित्य का बहुत नुकसान हो रहा है। उनकी बात मुझे दिल तक छू गयी। पच्चीस-छब्बीस साल का नवलेखक थोड़ा भावुक भी होता है। सो मैंने उसी पल खुद से और उनसे वादा किया कि मैं हमेशा केवल बाल साहित्य ही लिखूँगा।
चलिए अब मूल मुद्दे पर आते हैं। यानी मेरे लिखने की प्रक्रिया। मैं लेखक चाहे जैसा भी होऊँ, पढ़ाकू अच्छा हूँ और अकसर बिना किसी पूर्वाग्रह के। विचारधारा या सोच या जॉनर के प्रति भी कोई पूर्वाग्रह नहीं। शुरुआती दौर में यानी जब 25-40 की उम्र का था, तब नियम बना रखा था कि रोज़ कम से कम एक कहानी तो पढ़नी ही है और हफ्ते में एक उपन्यास तो पढ़ना ही है। उस दौर, बल्कि उस दौर में हिंदी, बांग्ला और अंग्रेजी के क्लासिक्स को खोज खोज कर पढ़ा। कई अन्य विदेशी भाषाओं जैसे कि रूसी, चीनी, जर्मन, जापानी आदि के अनुवाद पढ़े। इससे समझ का दायरा बढ़ा। भाषा की नयी-नयी शैलियों और विषयों से परिचय हुआ।
इससे एक और फायदा यह हुआ कि सामान्य या औसत लेखन से प्रभावित होना छूट गया।
मैं अक्सर अपने लिखे से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हो पाता हूँ। कई बार कहानी या उपन्यास के छपने के बाद लगता है, इसे दूसरी तरह से लिखा जाना चाहिए था। कुछ पात्रों की उलट-पुलट भी दिमाग में आती है। शुक्र यह है कि मैं शुरू से ही पढ़े हुए उपन्यासों को याद नहीं रख पाता हूँ। इसे मैं ‘Unlearning’ यानी दिमाग को खाली करने का तरीका कह सकता हूँ। वैसे यह भुलक्कड़पन नहीं है। अपने लिखे के साथ भी ऐसा ही होता है। मेरी लिखी करीब 30-35 कहानियों का मेरे पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। कुछ कहानियाँ अचानक से याद आती है, लेकिन उन्हें मैं खो चुका हूँ। लेकिन उनके प्रति मन में कोई मोह भी नहीं है,क्योंकि मैं सोचता हूँ कि अगर वे उत्कृष्ट कोटि की होती तो पाठक उसे याद रखते, वह पब्लिक डोमेन में कहीं न कहीं तो उपलब्ध होती। हाँ, कुछ खोई रचनाओं ने फिर से द्वार पर दस्तक दी है।
प्रश्न: इन फिर से मिली रचनाओं का अब क्या करने वाले हैं? क्या पाठकों को समक्ष वो फिर से आएँगी?
उत्तर: ज़्यादातर रचनाएँ नहीं मिली है। जो मिली, उसमें से कुछ में कमियाँ नज़र आयी, सो उन्हें छोड़ दिया। बहुत पहले शरद जोशी जी ने ‘हिंदी एक्सप्रेस’ में मेरा एक बाल उपन्यास ‘छतरी उड़ गयी’ दो अंकों में छापा था। वो उन्हें बहुत पसंद भी आया था क्योंकि वह बच्चों के लिए अगर तरह-तरह के अजीबोगरीब देश की कहानी थी तो बड़ों के लिए—अँधेर नगरी, झूठिस्थान जैसे देशों की एक निरीह खरगोश की यात्रा के रूप में प्रतीकात्मक व्यंग रचना थी। उन्होंने खुद यह रचना एक बड़े प्रकाशक नेशनल पब्लिशिंग हाउस को प्रकाशन के लिए भिजवायी थी। प्रकाशक ने मुझे पत्र के द्वारा उसे चार भाषाओं में प्रकाशित करने की बात भी कही थी, लेकिन उस दौरान मेरी नौकरी मुंबई में लग गयी और यहाँ आकर मैं विज्ञापन जगत से जुड़ गया और इसके तिलस्म में वो बात भूल गया। लेकिन अब मैंने उसी आधार पर इसे दोबारा नये रूप में लिखा है जो अब छप कर आने वाला है।
प्रश्न: चलिए फिर से किताब पर आते हैं। सोनाली और राधिका देवी के अलावा भी यहाँ काफी किरदार हैं। मुख्य किरदारों के अतिरिक्त कौन सा किरदार आपको पसंद है और क्यों?
उत्तर: जी हाँ, मैंने ‘सब अच्छा होगा’ लिखते समय हर किरदार में खुद को देखा है। हर पात्र में मैं स्वयं मौजूद हूँ अपनी अच्छाइयों, बुराइयों, खूबियों और खामियों के साथ। इसलिए सबको निरपेक्ष भाव से देखता हूँ और छोटे से छोटे पात्र को भी अपना अंश मानकर उसे पसंद करता हूँ।
प्रश्न: उपन्यास का कोई पहलू या किरदार जिसके विषय में आपको ऐसा लग रहा हो कि कुछ कहना या लिखना छूट गया?
उत्तर: लिखने के बाद उसके मोह से मैं अक्सर निकल जाता हूँ। लिखते समय ही उचित शोध करने की कोशिश करता हूँ, ताकि ऐसे पछतावे ना हों। हाँ, पाठक और लेखक मित्रों से इस बारे में सुझाव जरूर मिलते हैं और उन्हें ध्यान में रखता हूँ।
प्रश्न: उपन्यास का अंत कुछ ऐसे मोड़ पर होता है जिसमें एक मुख्य किरदार के जीवन की एक महत्वपूर्ण समस्या अभी भी बची है? तो क्या इन किरदारों से दोबारा मुलाकात हो सकती है?
उत्तर: कुछ अंदाज़ा लगाने का काम पाठकों पर भी छोड़ना चाहिए। सब कुछ कह दिया तो दायरा सीमित हो जाता है। अभी तक तो मैं भी अनिश्चय की स्थिति में हूँ कि ये पात्र मुझे फिर कभी मिलेंगे या नहीं।
प्रश्न: अच्छा, ऐसा देखने में आता है कि आप अलग अलग और नये विषयों और अलग अलग जॉनरो पर लेखन करते हैं। लेखन के लिए विषय और जॉनर आप कैसे चुनते हैं?
उत्तर: लेखन भी मेरे लिए भोजन जैसा आनंददायक है। जैसे कि अलग-अलग प्रांतों का, अलग-अलग देशों का और अलग-अलग शैलियों का खानपान पसंद है, वैसे ही लेखन में विविधिता पसंद है। दुनिया भर के श्रेष्ठ लेखक विभिन्न जोनर में लिखते हैं। वे एक तरफ अगर विज्ञान कथा लिखते हैं तो दूसरी ओर भूत कथा भी लिखते हैं। मैं इसे लेखक की क्रिएटिविटी की रेंज मानता हूँ और अगर मैंने अब तक कुछ शैलियों पर कलम नहीं चलायी है, तो इसे अपनी कमी के रूप में देखता हूँ। जब आपकी समझ का प्लेटफॉर्म व्यापक होता है तो उस पर तरह-तरह के विषयों को आने, ठहरने तथा जाने के लिए जगह मिलती है। अक्सर कहानी का कोई विचार एक काँटे की तरह आता है जो या तो अपने आप निकल जाता है या फिर पक कर आपको तकलीफ देने लगता है। फिर उसे कहानी या उपन्यास का रूप देकर निकालने से ही मुक्ति मिलती है।
प्रश्न: ये तो आपने सही कहा। हाल ही में आपको मिशन ग्रीन वार के लिए हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य सम्मान से भी नवाजा गया। कुछ उस विषय में बताएँ।
उत्तर: जी हाँ, प्रकाशन विभाग से प्रकाशित ‘मिशन ग्रीन वॉर’ को 2025 का प्रतिष्ठित हरिकृष्ण देवसरे बाल साहित्य पुरस्कार मिला है। यह एक साइंस फैंटेसी है। जो कि कृषि क्षेत्र की अनंत चुनौतियों और असीम सम्भावनाओं की पृष्ठभूमि पर लिखा गया है।

सन 1983 में ‘मेला’ में प्रकाशित मेरे विज्ञान कथा उपन्यास ‘ज़ेड ज़ुइंग की डायरी’ की विषय-वस्तु अंतरिक्ष पर केंद्रित थी। उस उपन्यास को उस दौर में खूब सराहा गया था। इसलिए अब मैं ज़मीनी हकीकत पर एक विज्ञान कथा लिखना चाहता था। लेकिन यहाँ संकट यह था कि कृषि पर कहानी कहीं उबाऊ न हो जाए, इसलिए मैंने इसे एक थ्रिलर का रूप देकर लिखा। अच्छी बात यह है कि पुरस्कार के साथ-साथ यह चर्चित भी हुआ और पहला संस्करण समाप्त होने के बाद अब इसके दूसरे संस्करण का इंतज़ार है।
प्रश्न: सम्मान एक लेखक के लिए आप कितना महत्वपूर्ण मानते हैं। क्या वो लेखन में मदद करता है?
उत्तर: पुरस्कार या सम्मान के मामले में मैं बहुत नीचे पायदान में हूँ। मुझे कुल मिलाकर अभी तक 3 या 4 ही पुरस्कार मिले हैं। जबकि कुछ लेखकों के परिचय वाला फ्लैप बताता है कि उन्हें 100 से अधिक राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं। पुरस्कार से लेखक और पुरस्कार दोनों का सम्मान बढ़ना चाहिए। हिंदी में पुरस्कार के लिए लिखने को उत्साहित करने वाले पुरस्कार हैं ही कहाँ?
मुझे तो पुरस्कार का न मिलना भी लेखन या बेहतर लेखन की तरफ प्रोत्साहित करता है। जब अच्छे लेखक पुरस्कार से वंचित होते हैं तो निर्णायकों की समझ पर भी सवाल उठाए जाते हैं।
प्रश्न: आप काफी समय से लेखन क्षेत्र में सक्रिय हैं। आपने लेखन क्षेत्र में इस दौरान क्या क्या फर्क देखे हैं?
उत्तर: प्रिंट मीडिया सिमटता जा रहा है और ऑडियो तथा ऑडियो-विज्युअल मीडिया विकल्प के रूप में सामने नहीं आ रहा है। इसलिए बाल साहित्य के क्षेत्र में उदासीनता सी नजर आती है। अस्सी और नब्बे के दशक की बात करूँ तो उस समय किताबें और पत्र-पत्रिकाएँ मनोरंजन का मुख्य साधन हुआ करती थी। तब एक ओर जहाँ लेखकों के बीच तगड़ी प्रतियोगिता थी तो अवसर भी बहुत सारे थे। तब लेखक गजब की कहानियाँ कविताएँ लिख रहे थे, उनमें विषय की व्यापकता थी। रचनाएँ थोपी हुई नहीं लगती थी। आज के दौर में मुझे लगता है कि लेखक पढ़ना और रुचि लेकर अच्छी किताबें खरीदना ज़रूरी नहीं समझते। विभिन्न भारतीय तथा विदेशी भाषाओं में लिखे जा रहे बाल साहित्य पर चर्चा की तो उम्मीद ही नहीं की जा सकती। लेखन से नयी पीढ़ी भी नदारद है। रचनाओं के मूल्यांकन का स्तर भी वैसा ही है।
प्रश्न: कौन से बदलाव लेखन के लिए अच्छे हुए हैं और वो कौन से बदलाव हैं जो आपको लगता है नहीं होने चाहिए थे?
उत्तर: लेखन में बदलाव मेरे लिए व्यक्तिगत चीज़ है। मैं अब किताबें पढ़ने के साथ ओटीटी पर फिल्में,सिरीज देखने , ऑडियो प्लेटफॉर्म पर कहानी सुनने की तरफ भी मुड़ा हूँ। कुछ एनजीओज़ की बाल साहित्य के नाम पर एलीट भूमिका मुझे नागवार लगती है।
प्रश्न: लिखने का आपका रुटीन क्या होता है?
उत्तर: मेरा लिखने-पढ़ने का कोई रूटीन नहीं है।
प्रश्न: आपने विपुल लेखन किया है। आपकी कौन सी ऐसी रचनाएँ हैं जो आपके दिल के ज्यादा नजदीक हैं और क्यों?
उत्तर: जिस दिन यह संतोष हो जाएगा, उस दिन लिखना छोड़ दूंगा। अभी वह आकलन करने का समय नहीं आया है।
प्रश्न: आपकी लिखी कुछ रचनाएँ जिन्हें आप चाहते हों कि पाठक वर्ग पढ़ें?
उत्तर: मेरी हर रचना मेरे लिए चुनौती होती है। मैं अनावश्यक लिखना ही नहीं चाहता। इसलिए अपेक्षा करता हूँ कि मैं जो भी लिखूँ, उसे पाठक पढ़ना चाहे। बस, एक जज़्बा है कि पहले से बेहतर लिखूँ और कुछ ऐसा लिखूँ जिस पर दूर-दराज़ बैठा आम बाल पाठक मुस्कराते हुए पढ़े।
प्रश्न: अच्छा ऊपर आपने बताया था कि एक उप-सम्पादक की बात सुनकर आपने ये फैसला किया था कि आप वयस्कों के लिए नहीं लिखेंगे। केवल बच्चों और किशोरों के लिए लिखेंगे? क्या अब भी अपने इस फैसले पर कायम है या वयस्कों के लिए कुछ लिखने की योजना है।
उत्तर: नहीं, बाल साहित्य में ही बहुत कुछ है अपने को व्यक्त करने के लिए। मैं पूरी तरह से बाल साहित्य को ही समर्पित रहना चाहता हूँ। इसलिए मैं गर्व से कहता हूँ कि मेरे बहुत से लेखक मित्र बाल साहित्य भी लिखते हैं लेकिन मैं बाल साहित्य ही लिखता हूँ। कमर्शियल दबाव के कारण बड़ों के लिए छुटपुट लेखन किया है वो चाहे रेडियो के स्पांसर प्रोग्राम (विक्रम बेताल, जागो ग्राहक जागो, गीतों भरी कहानी, हवा महल) के रूप में हो या फिर टेलीविजन के लिए टेलीफिल्म या धारावाहिक के रूप में। यह भी सच है कि आज हिंदी के बाल साहित्यकार को गम्भीरता से नहीं लिया जाता, लेकिन इसके लिए क्या हम खुद ज़िम्मेदार नहीं हैं? क्या मैं अभी तक कोई ऐसी किताब लिख पाया हूँ, जो बच्चे ढूँढ कर पढ़ना चाहेंगे, जिसे बड़े लोग संदर्भित करना चाहेंगे। जिसे पढ़कर उन्हें भी लगे कि वाह कुछ नया, अनोखा और खूबसूरत कहा है? कहने का मतलब यही है कि मैं बाल साहित्य में बहुत गुंजाइश देखता हूँ, इसलिए इसी वर्ग को केन्द्र में रखकर हर वर्ग के लिए रोचक बाल साहित्य लिखना चाहता हूँ।
प्रश्न: आप खुद भी काफी पढ़ते हैं। हाल ही में पढ़ी गई कुछ पुस्तकें जो आपको पसंद आई हो? क्या आप कुछ के नाम पाठकों से साझा करना चाहेंगे?
उत्तर: वाह मन की बात है यह तो—जापानी लेखक सोसुक नात्सुकावा का ‘द कैट हू सेव्ड बुक्स‘, ह्यु लाफ्टिंग की डॉक्टर डूलिटिल सिरीज हाल ही में पढ़ी हैं।मज़ेदार किताबें हैं। युवा लेखक मित्र सबुज हालदार ने अपनी हॉरर कहानियों/उपन्यासों के साथ मेरे प्रिय बांग्ला बाल साहित्यकार शीर्षेन्दु मुखोपाध्याय की एक किताब ‘पागला साहेबेर कबर’ भिजवायी है। सबुज हालदार की ‘मुरांग’ पढ़ना शुरू किया है। उसकी लेखन शैली से चमत्कृत हूँ।
प्रश्न: आप आजकल क्या लिख रहे हैं? कोई विषय जिस पर लिखने का मन हो? पाठक आगे क्या पढ़ने की उम्मीद लगा सकते हैं?
उत्तर: शब्द कृपणता का अभ्यास कर रहा हूँ। कम से कम शब्दों में छोटे से छोटे बच्चों के लिए कुछ लिखने की कोशिश कर रहा हूँ। एक विज्ञान कथा लिखने का मन बना रहा हूँ।
तो यह थी लेखक समीर गांगुली से हमारी बातचीत। उम्मीद है आपको यह पसंद आयी होगी। बातचीत पर अपनी राय आप टिप्पणियों के माध्यम से भी दे सकते हैं।
सब अच्छा होगा: एक छोटी-सी डॉक्टर की बड़ी-सी कहानी

राधिका देवी और डॉक्टर सोनाली नदी के उन दो छोरों की तरह थे जिनका मिलना सबको असम्भव सा लगता था। एक तरफ राधिका देवी लम्बी-चौड़ी भारी-भरकम गुस्सैल और दबंग महिला थीं जिनसे अस्पताल का हर कर्मचारी डरता था। वो ऐसी मरीज़ थीं जिनके सामने अस्पताल का कोई भी कर्मचारी, फिर वो डॉक्टर हो या नर्स, नहीं पड़ना चाहता था।
वहीं दूसरी ओर डॉ. सोनाली एक दुबली-पतली छोटे कद की कमज़ोर सी दिखने वाली युवती थी जिसे देखकर लगता ही नहीं था कि वो डॉक्टर है। उसका रौब तो बच्चे भी नहीं मानते थे तो बड़े कहाँ ही मानते। सभी को लगता था कि वो डॉक्टर बनने के काबिल नहीं है।
ऐसे में जब डॉक्टर सोनाली को राधिका देवी का ख़याल रखने को कहा गया तो सभी की आशंका थी कि ये अस्पताल की चाल थी डॉक्टर सोनाली को निकलवाने की। सभी जानते थे कि राधिका देवी के सामने डॉक्टर सोनाली टिकने नहीं वाली थी। उससे गलती होनी ही थी और इसी बहाने से डॉक्टर सोनाली को निकाल दिया जाना था।
आखिर क्या हुआ जब डॉक्टर सोनाली और राधिका देवी आमने सामने आये? क्या डॉक्टर सोनाली राधिका देवी का इलाज ढंग से कर पायी या अस्पताल वालों की आशंका सही साबित हुई?
प्रकाशन: साहित्य विमर्श प्रकाशन | पुस्तक लिंक: अमेज़न | साहित्य विमर्श प्रकाशन
