दवाओं का एजेंट केवलकृष्ण कैसे बना उपन्यासकार ‘राजहंस’ – योगेश मित्तल

दवाओं का एजेंट केवलकृष्ण कैसे बना उपन्यासकार 'राजहंस'

विजय कुमार मलहोत्रा के पास राणा प्रताप बाग में अंदरूनी रोड पर सड़क के मुहाने पर काफी बड़ी जगह थी।

उसी पते पर विजय कुमार मलहोत्रा ने विजय पॉकेट बुक्स की नींव रखी।

विजय कुमार मलहोत्रा की अशोक पॉकेट बुक्स के स्वामी बसंत सहगल से अच्छी दोस्ती थी। अक्सर उन दोनों का राणा प्रताप बाग स्थित विजय पॉकेट बुक्स के ऑफिस में अथवा शक्ति नगर स्थित बसंत जी की बैठक में जमावड़ा होता। संयोगवश मैं गिनती के उस खुशकिस्मतों में हूँ, जिसे दोनों जगह बैठने का अवसर मिला।

विजय पॉकेट बुक्स जब शैशवावस्था में थी, अशोक पॉकेट बुक्स एक नामी प्रकाशन संस्था थी। इसका एक खास कारण यह भी था कि उन दिनों उपन्यासकारों में गुलशन नंदा एक प्रसिद्ध और प्रतिष्ठित नाम था और अशोक पॉकेट बुक्स ने गुलशन नंदा के कई उपन्यास प्रकाशित किये थे, जिनके कॉपीराइट भी उन्हीं के पास थे और आये दिन गुलशन नंदा के उपन्यासों के रिप्रिन्ट होते रहते थे, जिसके कारण बहुत कुछ छापने की आवश्यकता ही नहीं पड़ती थी।

मैंने सुरेंद्र मोहन पाठक की आपबीती की शृंखला नहीं पढ़ी, किंतु यकीन है कि शृंखला पूरी होने से पहले उसमें मेरा ज़िक्र भी आना चाहिए और बसंत सहगल का भी।

मुझे याद नहीं कि अशोक पॉकेट बुक्स में सहगल साहब ने सुरेंद्र मोहन पाठक को छापा या नहीं छापा, किंतु दोनों की दोस्ती मशहूर रही थी तथा शाम की बहुत सी महफ़िलों में दोनों ने परस्पर जाम टकराये थे।

और मैं तो बहुत बार उनके साथ घंटों बैठने लकी स्ट्राइक का धुआँ उड़ाने और कॉफी या पैग के घूँट साथ-साथ भरने का साथी रहा था। मनोज पॉकेट बुक्स और राजा पॉकेट बुक्स में पाठक साहब की एंट्री भी मेरी तिकड़म के बाद हुई थी, किंतु वह किस्सा फिर कभी…।

अभी हम दवाओं के एजेंट केवलकृष्ण कालिया के उपन्यासकार बनने का किस्सा बता रहे हैं, पर यह किस्सा विजय पॉकेट बुक्स का ज़िक्र किये बिना सम्भव नहीं है।

विजय कुमार मलहोत्रा ने पॉकेट बुक्स खोलने की योजना का ज़िक्र बसंत सहगल से किया तो बसंत सहगल ने उनसे कहा कि कुछ स्क्रिप्ट उनके पास भी पड़ी हैं। उनमें कुछ जासूसी थीं और दो स्क्रिप्ट ऐसी थीं, जो डाकुओं की पृष्ठभूमि पर थीं, किंतुु उर्दू में थीं।

बसंत सहगल उर्दू भी बखूबी पढ़ लेते थे। उन्होंने विजय कुमार मलहोत्रा से कहा दोनों स्क्रिप्ट उन्होंने पढ़ी हैं। बहुत अच्छी हैं, किंतुु उन्हें डाकुओं की पृष्ठभूमि के उपन्यास पसंद नहीं।

बसंत सहगल ने विजय कुमार मलहोत्रा को एक यह बात भी बताई कि वो दोनों स्क्रिप्ट एक नये लेखक ने लिखी हैं, जो वास्तव में दवाओं की एक कम्पनी का एजेंट है।

विजय कुमार मलहोत्रा भी उर्दू पढ़ लेते थे। बेशक पढ़ने में वक़्त कुछ ज्यादा लगता था। उन्होंने भी उर्दू की वे दोनों पांडुलिपियाँ पढ़ीं।

उन्हें भी अच्छी लगीं और उन्होंने बसंत सहगल से उस दवाओं के एजेंट को भेजने को कहा।

बसंत सहगल ने दवाओं के उस एजेंट केवलकृष्ण कालिया को विजय पॉकेट बुक्स भेजा। विजय कुमार मलहोत्रा ने केवलकृष्ण से कहा कि वह सामाजिक उपन्यास लिखे।

केवलकृष्ण कालिया उर्फ राजहंस
लेखक केवलकृष्ण कालिया उर्फ राजहंस

उन दिनों स्टार पॉकेट बुक्स में राजवंश ट्रेडमार्क के अंतर्गत आरिफ मारहरवी के उपन्यास खूब धूम मचा रहे थे।

राजवंश एक ‘बेस्ट सेलर’ नाम था। विजय कुमार मलहोत्रा ने राजवंश की तर्ज़ पर एक नाम राजहंस रखा और एक नाम रघुराज के नाम की स्टाइल आर्टिस्ट से लिखवाकर फाइनल की और वह स्टाइल तथा रघुराज व राजहंस नाम और ट्रेडमार्क रजिस्टर्ड करवाये, जैसी कि शुरुआत हिंद व स्टार पॉकेट बुक्स, मनोज पॉकेट बुक्स पहले ही कर चुके थे।

विजय कुमार मलहोत्रा ने केवलकृष्ण को यकीन दिलाया कि राजहंस नाम में उसी के उपन्यास छापे जाएँगे। उपन्यास के बैक कवर पर राजहंस के रूप में उसकी फोटो भी छापी जायेगी और प्रत्येक उपन्यास के पारिश्रमिक के रूप में एक ऐसी अच्छी रकम भी देने का वायदा भी किया, जिससे केवलकृष्ण को दवाओं के एजेंट की नौकरी न करनी पड़े।

केवलकृष्ण ने नौकरी छोड़ दी और पूरा समय उपन्यास लिखने में लगाने लगा, किंतुु आरम्भ में केवलकृष्ण उर्दू में ही लिखते थे। उनके उपन्यास का हिंदी में अनुवाद करवाना पड़ता था, किंतुु केवलकृष्ण को हिंदी भी आती थी। विजय कुमार मलहोत्रा की सलाह पर केवलकृष्ण ने हिंदी में लिखना शुरु कर दिया।

विजय कुमार मलहोत्रा ने केवलकृष्ण के लिखे दोनों उपन्यास रघुराज नाम से छापे।

उनमें रामबली नाम का एक हीरो था, केवलकृष्ण के आरम्भिक दोनों उपन्यास रघुराज के लिए से ही छपे, लेकिन रामबली सीरीज़ के लिये तीसरा उपन्यास विजय कुमार मलहोत्रा ने बड़े लम्बे अंतराल के बाद मुझसे लिखने को कहा था, जब मैंने सवा सौ पेज का मैटर लिख लिया तो अचानक विजय कुमार मलहोत्रा ने मुझे उपन्यास लिखना रोक देने को कहा और मैंने जितना मैटर लिखा था, पढ़ने के लिए मँगाया।

मैंने वह मैटर विजय कुमार मलहोत्रा जी को दे दिया, तब उन्होंने बताया कि यह सीरीज़ आगे लिखवाने का इरादा उन्होंने इसलिए बदल दिया, क्योंकि रामबली सीरीज़ के वह उपन्यास केवल ‘राजहंस’ नाम में रिप्रिन्ट करवाना चाहता है तो अगर आगे भी यह सीरीज़ वही लिखेगा।

मुझे यह नहीं मालूम कि रामबली सीरीज़ के वे उपन्यास राजहंस नाम से छपे या नहीं छपे।

पर हाँ, दवाओं के एक एजेंट केवलकृष्ण को विजय कुमार मलहोत्रा ने विजय पॉकेट बुक्स में उपन्यासकार ‘राजहंस’ बना दिया।

शायद इसे ही किस्मत कहते हैं।

बाद में केवलकृष्ण और विजय पॉकेट बुक्स के विजय कुमार मलहोत्रा में एक विवाद ने भी जन्म लिया और उसका अंजाम पॉकेट बुक्स के सबसे चर्चित मुकदमे ने लिया। पर वो किस्सा फिर कभी।

समाप्त


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Author

  • योगेश मित्तल

    25 मार्च 1957 को दिल्ली के चांदनी चौक के पत्थरवालान में जन्में योगेश मित्तल के बचपन के कुछ वर्ष सिविल लाइन्स, शाहदरा में व्यतीत हुए। शाहदरा के बाद उन्होंने कुछ वर्ष चुरू, राजस्थान में गुज़ारे। उसके बाद 1963 से 1968 तक वे अपने परिवार के साथ कलकत्ता में रहे और फिर 1969 में दिल्ली आकर दिल्ली में ही बस गए। तब से लेकर अब तक वह दिल्ली में ही रहते आये हैं।

    कलकत्ता में रहते हुए ही योगेश मित्तल की पहली कविता व कहानी 1964 में कलकत्ता के दैनिक समाचार पत्र 'सन्मार्ग' के 'बालजगत' स्तम्भ में छपी।

    1969 में दिल्ली आने के पश्चात उनकी रचना जब गर्ग एंड कम्पनी की पत्रिका 'गोलगप्पा' में छपी तो वो प्रकाशक ज्ञानेंद्र प्रताप गर्ग की नज़र में आये। इसके पश्चात शुरू हुआ लेखन का सिलसिला आज पाँच दशक से भी ऊपर का समय गुजरने के बाद भी अनवरत ज़ारी है।

    लेखन की पहली पारी में योगेश मित्तल का अधिकतर लेखन ट्रेड नाम के लिए किया गया है। उपन्यास लेखन के अतिरिक्त उन्होंने खेल पत्रकारिता, कॉमिक बुक लेखन और सम्पादन के क्षेत्र में भी कार्य किया।

    अपने लेखन की दूसरी पारी में अब अपने नाम से उनकी पुस्तकें प्रकाशित हो रही हैं।  प्रेतलेखन, वेद प्रकाश शर्मा: यादें बातें और अनकहे किस्से, शैतान: जुर्म के खिलाड़ी नीलम जासूस कार्यालय से और  चांदी की चोंच, लड्डू मास्टर की भैंस, लोमड़ी का दूल्हा, काठ की अम्मा लायंस पब्लिकेशंस से प्रकाशित हुई हैं।

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