पुस्तक अंश: सुशीला सदन – पराग डिमरी

सुशीला सदन - पराग डिमरी | नोशन प्रेस

‘सुशीला सदन’ लेखक पराग डिमरी की सातवीं पुस्तक है। यह एक निम्न वर्गीय महिला सुशीला के अपने घर के बनाने की जद्दोजहद को दर्शाने के बहाने, उस जीवन की झलक भी दिखलाती है जो शायद आज के समय में भौतिक चमक-दमक के आकर्षण के चलते अब दिखनी धुँधली , या बदरंग सी हो गयी है। आजकल मोबाइल, नेट वाली दुनिया से ही हम लोग सब कुछ चाहने लगा गए हैं, अपने आस पड़ोस वाली दुनिया को भुला बैठे हैं। एक बुक जर्नल पर हम ‘सुशीला सदन’ का यह शुरुआती अंश आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। आप भी पढ़ें:


सुशीला सदन - पराग डिमरी  | Sushila Sadan - Parag Dimri

एक मुठ्ठी आसमान

महकपुर की जयसिंह कालोनी के एक घर ‘सुशीला सदन’ में पिता और बड़े बेटे के बीच, रविवार के दिन, दोपहर में भोजन उपरांत,एक तरह से एकपक्षीय, किंतु लम्बी बातचीत चली।

बेटा यह ही बताने, कहने, सुनाने पिता को आया था कि यह घर, जहाँ वो लोग बरसों से रह रहे हैं, जिसका स्वामित्व पिता के नाम है,अब से उसका समझा जाना चाहिए। सरकारी कागजों में भी पिता को इस सम्बंध में उचित कानूनी औपचारिकताएँ पूरी करके, तुरंत ही इसे अंजाम दे देना चाहिए।

बड़े बेटे का इस कहने के पीछे तर्क, आधार यह था कि वो शिक्षा और नौकरी पाने में पिता के लिए स्वावलंबी, मितव्ययी सिद्ध हुआ था। पिता को न तो उसकी शिक्षा, और न ही उसके नौकरी पाने में कुछ ज्यादा खर्चा, भागदौड़ करनी पड़ी थी।

इसके उलट छोटे भाई को प्राईवेट इंस्टीट्यूट से एम बी ए कराने, और फिर मजबूरी में उसके इंटरप्रेन्योर बनने, और वहाँ दो, दो असफल धंधे कराने मे भी पिता ने खूब पैसा बहाया, जिसमें भागीदारी, हिस्सा, दावा बड़े भाई का भी था।

उसके बाद छोटे भाई के दोनों धंधों में असफलता के चलते चली कोर्ट कचहरी,और फिर लेनदारों के साथ सैटलमेंट में पिता ने भारी खर्चा किया, शहर में अपने दूसरे प्लॉट को भी बेच डाला, उन सबमें भी बड़े भाई की हिस्सेदारी,दावा था। बड़े भाई ने तीनों ही मामलों में पिता को कुछ भी, कैसा भी खर्चा करने से रोका, टोका नहीं, कुछ दस्तावेजों पर जहाँ उसे साइन करने थे, वहाँ आँख मूँदकर साइन भी कर दिए। कारण यही था वो भी छोटे भाई की पढ़ाई-लिखाई में तरक्की चाहता था। जब धंधे में ऊँच-नीच के चलते पैदा हुई दुश्वारियों के कारण छोटे भाई की जेल की सलाखों के पीछे जाने की नौबत आ गयी थी, तब भी उसने पिता के द्वारा छोटे भाई को बचाने के लिए पैसा खर्च करने पर, कोई अंकुश जैसा लगाने की कोशिश नहीं की, अपनी तरफ से भी कुछ पिता को दिया, यह सोचकर ही कि जिस परिवार के घर के सामने कभी पुलिस की जीप तक नहीं रुकी, कोई पुलिस वाला‌ घर के आसपास मंडराया तक नहीं,वहां पुलिस कैसे किसी घर के सदस्य को गिरफ्तार करने पहुँच जाती।

अब उस त्याग, बल्कि बहुवचन वाले तीन त्यागों की क्षतिपूर्ति, या मुआवजा, इस तरह से बड़े भाई के लिए आभार ज्ञापन के साथ किया जाना चाहिए कि— छोटे भाई का प्रापर्टी में कोई हिस्सा नहीं रहना चाहिए, और‌ अब सब कुछ,बड़े भाई के नाम पर ही तुरंत फुरत में कर दिया जाना चाहिए।

अपने कहने के समर्थन में, एक और तर्क पेश करते हुए बेटे ने एक पर्चे में टेबल, और चार्ट बनाकर पिता को दिखाया कि प्रापर्टी उसके नाम हो जाने के बाद भी, आँकड़ों में तो वो नुकसान में ही रहेगा। प्लॉट जब बेचा गया तो मार्केट में मंदी के चलते सेंटीमेंट्स डाउन थे, आज की पीक वैल्यू के हिसाब से 40% कीमत में प्लॉट को बेच दिया गया, क्यूँकि परिवार को अपनी अस्मिता, सम्मान बचाने के लिए क्विक मनी चाहिए था, तो उस समय जो रेट मिला, उस पर कुछ निगोशिएट या बारगेन करने में टाइम कंज्यूम करना फेमिली अफोर्ड नहीं कर सकती थी, तो उस पहले ऑफर वाले रेट पर ही प्लॉट को बेच डाला गया था।

पहले उसने कुछ नहीं कहा, चुपचाप पिता को अपनी मनमर्जी के मुताबिक खर्च करने दिया।अब उसके ऐवज में उसके बिलकुल जायज चाहने पर, छोटे भाई और पिता की तरफ से कोई भी ऐतराज नहीं उठाया जाना चाहिए, और इसे कानूनी अंजाम देने में देरी भी नहीं की जानी चाहिए।

बड़ा बेटा अपना खुद का धंधा (स्टार्ट अप) शुरू करने जा रहा था, उसे बैंक से बिजनेस लोन लेने के लिए अपनी किसी प्रापर्टी को गिरवी रखना था, इसलिए इस घर का उसके नाम हो जाना, उसके लिए बहुत बड़ी जरूरत बन चुका था।

ससुर या ससुराल पक्ष से से यहाँ कोई हैल्प लेने के पक्ष में वो था नहीं।

घर पुश्तैनी नहीं था, बल्कि पिता ने अपनी कमाई से उसे अपना बनाया था, इसलिए पिता के पास कानूनी तौर पर भी अधिकार था कि वो इसे, जिसे चाहें, सौंप ‌दे, उसके नाम कर दे।

बेटा इसे भी बड़ी विनम्रता के साथ कहता, दोहराता रहा कि ऐसा कर देने से पापा बाकी कुछ नहीं बदलना, पिता का उसके साथ रहना जारी रहेगा, और वो अपनी पेंशन से जितना मर्जी छोटे भाई को देते रहें, उसे इससे भी कोई दिक्कत नहीं। छोटा भाई भी, बड़े भाई के परिवार, पिता के साथ घर में रहने के लिए स्वतंत्र रहेगा, और घर का नाम भी ‘सुशीला सदन’ ही रहेगा।

मुलाकात का समापन इस बात के साथ किया, “पापा मुझे प्लीज़, आप ग़लत मत समझिएगा, प्लीज़ पापा।” फिर गर्दन पर हाथ रखकर, कुर्सी से उतरकर पापा के घुटनों पर हाथ रखकर, पाँवों के पास वाली जमीन पर बैठ गया।

हिंदुस्तानियों में अंग्रेजी राज के चलते, हासिल ‘प्लीज़”’शब्द को बहुत गहरा, असरदार,मारक समझा जाता है, इतना कि कुछ भी उल्टा सीधा कर दें, बस प्लीज़ कहना है, और सब कुछ ठीक हो जाना है, माफी मिल जानी है। यहाँ तक कि किसी का खून भी कर दे, तो जज से यूँ भी दरखास्त करने लग जाएँगे, “मीलार्ड, संसार की जनसंख्या इतनी ज्यादा हो चुकी है, एक नॉट सो गुड को दुनिया से रुखसत कर भी दिया तो क्या, आप प्लीज़ इस एंगल से ही केस पर जजमेंट सुनाइएगा। कौरवों, पांडवों के बीच महाभारत का युद्ध भी नहीं होता, यदि युधिष्ठिर ने दुर्योधन से प्लीज़ करके हस्तिनापुर का राजपाट वापस माँगा होता।”

पिता को बड़ी औलाद की तरफ से ऐसा अंदेशा पहले से ही था, अंदेशा आज साक्षात होनी में बदल गया। अब बिलकुल स्पष्ट हो चुका था कि घर, परिवार के मुखिया, उसे खून, पसीने की कमाई से खड़ा करने वाले के नाम पर न रहकर, परिवार के एक स्वार्थी सदस्य के नाम होने जा रहा है।

एक बेटा अपने फर्ज से
जो पीछे हट गय
ऐसा लगा बाप को
एक हाथ उसका
आरी में आकर
कट, बँट गया

दो भाइयों में, जो एक ज्यादा योग्य, सफल, वो परिवार में हावी होने की कोशिश करता है। शादी से पहले तक तो यह भाव उतना उग्र नहीं रहता। माँ बाप पर रही कभी पूर्ण, फिर आंशिक निर्भरता, उनकी संगत, छत्रछाया में परवरिश, शैशवास्था से लेकर जवानी तक का सफर भी तय किया रहता है, तो परिवार के साथ समन्वय करने की भावना सक्रिय, जीवंत, और परिजनों के प्रति व्यवहार में मृदुलता, दिखावटी, असली, या दोनों का मिश्रण बना रहता है। शादी के बाद, जहाँ पत्नी का प्रवेश उनके जीवन में हो जाता है, जो निज वादी, संकुचित सोच से पीड़ित हो, तो उसे भड़काने (उसके हिसाब से आँखें खुलवाने लगती है ) लगती है कि उसका शोषण किया जाता रहा है, जिसका उसे इससे पहले अहसास तक नहीं हो पाया। आज जो उसने पा रखा है, वो उससे कहीं ज्यादा पाने के काबिल है। उसकी कम्प्लीट तरक्की तभी हो पाएगी, जब वो फेमिली, फेमिली वालों से अलग रहेगा, खुद के कैरियर ग्राफ पर रेस में भागने वाले घोड़े की तरह फोकस रखेगा। उसका यह सब कहना, समझाना उन‌ समय ज्यादा असरकारी हो जाता है, जब मर्द उस सुख को भोगना चाहता है, उससे ठीक पहले, या उसके बाद, जब उसका भोग ले चुका होता है, जो उसे समाज के नैतिक दायरों के फेर में, कानूनी, नैतिकता की कसौटी में, बगल में लेटे हुए से ही मिल सकता है।


उस वन टू वन माई वे,और हाई-वे, कम्युनिकेशन वाली पिता पुत्र मुलाकात के बाद, जहाँ पिता को कहा गया कि जल्द से जल्द सम्पत्ति का हस्तांतरण, अपने नाम से, बड़े बेटे के नाम कर दिया जाए। पिता गहन चिंतन में डूबा रहा, खूब सोच विचार करता रहा। आसपास वाली दुनिया से उखड़ा सा रहा, अक्सर कुछ करते हुए भी स्थिरता में आकर, अचानक से एक अलग ही संसार में चला जाता था। निचोड़, विचार मंथन का नतीजा यही निकला कि यदि बड़े बेटे की बात पर अमल न किया जाए, तो शर्तिया परिवार ने टूट, बिखर जाना है। बहू का एक भाई वकील भी है, जिसे महकपुर वाले लम्पट वकील या नुकीली कील भी कहने से चूकते नहीं थे। उसके परिवार में माता-पिता का प्रेम विवाह हुआ था, भाई और बहन ने भी लव मैरिज की थी, उसकी ही लव मैरिज नहीं थी, क्योंकि लव मैरिज के लिए दिल की मौजूदगी शरीर में चाहिए होती है। उसके पास दिल की जगह भी दिमाग ही था, और वो शायराना, आशिकाना नही, बल्कि बहुत शातिरपना उसके दिल या दिमाग के, हर एक कोने में भरा हुआ था। पैसे का महत्व उसके जीवन में सर्वोपरि था, चाहे कहीं से, अपनों से या परायों से, कहीं से भी आये, आने चाहिए। अपनी शादी में फोटोग्राफर के ‘चीज’ बार बार कहने पर भी वो चेहरे पर मुस्कान नहीं ला पा रहा था। फिर फोटोग्राफर ने किसी के समझाने पर ‘मोटी फीस’ कहा, तुरंत ही बड़ी सी कुटिल‌ हँसी उसके चेहरे पर विराजमान हो गयी।

उसे पिता ने, हालिया कई बार बेटे, या जीजा के पास आते जाते भी देखा, और बेटा उसे बाहर गेट तक विदा करने भी आता था, और गेट पर भी ढेरों बातें हुआ करती थी, फिर दोनों मुस्कराते हुए एक दूसरे को टाटा, बाय-बाय‌ किया करते थे। इससे पहले इस ढंग तरीके से अलविदा किया जाना साले का, जीजा के द्वारा नहीं किया जाता था। बल्कि जीजा यह ख्वाहिश जाहिर करता रहता था कि काश उसका साला (रिश्ता), किंतु असलियत में वाकई साला (अपशब्द), उसकी जिंदगी में नहीं होता तो शादी के बाद की लाइफ और ज्यादा बढ़िया रहती।

पिता इस परिस्थिति से अपने लिए परेशान नहीं था, किंतु ‌छोटे के लिए हद से ज्यादा हो रखा था। पिता के जाने के पश्चात, उसका साया उसके उपर से उठ जाने के पश्चात, वो घर वाली दुनिया, बाहर वाली दुनिया, दोनों का ही आसानी से शिकार बन सकता था।

कोर्ट कचहरी की लड़ाई लड़ने के योग्य तो बिलकुल भी नहीं था। उसके पक्ष वाले सयाने वकीलों ने ही उसे बड़े भाई के केस जीतने से पहले ही लूट लेना था। पिता की प्राथमिकता उसे इस दुनिया की चुनौतियों के लिए तैयार करना भी रहनी चाहिए, जिसे की उसने नजरअंदाज किया था, यहाँ पर उसके द्वारा ज्यादा माथापच्ची नहीं की गयी थी।

वो इतना अच्छा था कि कलयुग में सतयुग का प्राणी भी लोग उसे मज़ाक में कह देते थे। दूसरा एक और मजाक उसके लिए कि हमारे विनोद भाई को हलवाई हल्दीराम ने भी नौकरी से निकाल दिया क्योंकि वो जलेबी भी गोल टेढ़ी बनाने के बजाय, सीधी ही बनाने लगता था।

इसके अलावा एक और बिलो दी बैल्ट किस्सा विनोद के लिए, लड़कों के क्लोज सर्किट ग्रुपों में खूब सुनाया जाता था। चमेली नाम की एक सुंदर,सुशील, सुसंस्कृत लड़की का हृदय विनोद पर मचलने लग गया था। बसंत ऋतु का प्रकोप उफान पर था, उसी दौरान एक ढलती हुई शाम को एक हरे भरे बाग में, विनोद‌ से उसका मिलना हुआ। वहाँ आसपास दूर दूर तक कोई नहीं, आसमान में काले बादल छा रखे थे, ठंडी हवा चल रही, और मोरों के कूंकने की आवाज भी सुनाई दे रही थी। ऐसे वातावरण में चमेली का मन अनियंत्रित हो उठा, उसके वश में न रहा।उसने अपने शरीर से सारे वस्त्रों को पृथक कर दिया, आँखें बंद कर के, और हाथों को जोड़ कर बोली,”विनोद आज इस चमेली का सब कुछ तुम्हें अर्पित है, इनके साथ जैसा तुम चाहो, वैसा कर सकते हो।” और गुनगुनाने भी लगी, “दूरी ना रहे कोई आज इतने करीब आओ, मैं तुम में समाँ जाऊ, तुम मुझ में समाँ जाओ, साँसों की हरारत से तन्हाई पिघल जाये, जलते हुए होंठों का अरमान निकल जाये, चाहत की घटा बनकर तुम यूँ मुझ पे बरस जाओ, मैं तुम में समाँ जाऊ, तुम मुझ में समाँ जाओ”

यह स्वैछिक प्रपोजल सुनकर विनोद ने उसकी धरती पर पड़ी हुई सलवार से नाड़ा निकाला, और चमेली को बहुत बड़ा वाला धन्यवाद देकर,वहाँ से उल्टे पाँव वापस घर आ गया क्योंकि उसके एक पायजामे का नाड़ा कहीं गुम हो रखा था, काफी ढूँढने के बाद भी मिल नहीं रहा था, अब उस पायजामे को उसे नाड़ा युक्त जो‌ करना था। नाड़े और इलास्टिक के इस्तेमाल पर विनोद का यही मानना था कि नाड़ा बाँधने से उसे, उसके द्वारा भी चीजों को नियंत्रित करने का अहसास मिलता है, नहीं तो दूसरे ही उसकी जिंदगी में सब कुछ कंट्रोल कर रहे हैं, ऐसा ही वो महसूस करता आया है। इलास्टिक से तो‌, उसने यहाँ भी कुछ किया ही नहीं, ऐसा ही लगना है।

चमेली किसी तरह से नाड़ा विहीन सलवार को सम्हालते हुए घर‌ वापसी कर पाई, उसके बाद से उसके लिए एक कहावत में शब्दों का परिवर्तन हो गया ‘गधा क्या समझे, चमेली की महक।’
सब कुछ सीखा हमने,न सीखी होशियारी, सच है दुनिया वालों, के हम हैं अनाड़ी,
और विनोद तो टाप नोच कैटेगरी का या सुपर अनाड़ी जैसा था।

दुनियादारी की समझ वाली किताब में वो कोरे पन्ने जैसा था, मौजूदा दौर के तौर-तरीकों में कुछ करने के लिए अनूकूल नहीं, बल्कि बिलकुल ही अनफिट सा था।

जब उसने बिजनेस किया, तो‌ एक के साथ, ऐसे एग्रीमेंट में उसके कहने पर कि सब कुछ वही है, जो उसे बताया गया था, बिना एग्रीमेंट पढ़े ही साइन कर दिए थे। जब उसे इसके चलते आगे चलकर भारी दिक्कतों का सामना करना पड़ा, और बाप, उनके वकील ने भी ऐसा किए जाने पर उसे उलाहनें दी तो उसका जवाब यही था कि उसने अपनी माँ की कसम खाते हुए कहा था कि जो उन दोनों के बीच बातें हुई थी, वो सब ही एग्रीमेंट में है, आखिरकार कोई कैसे अपनी माँ की झूठी कसम खा सकता है।

आजकल की दुनिया के हिसाब से उसका कसूर यही था दुनिया के चंट चालाक, शातिर गुणों वाले लगभग सभी गुनाहगारों की सूची में, वो कसूरों, गुनाहों से दूर रहने के कारण, अपना नाम उनकी वाली दुनिया में शामिल करने में असफल रहता था।


एक रात को डेढ़ बजे के आसपास पिता नींद से उठ बैठे, सपने में उन्हें अपनी स्वर्गीय पत्नी सुशीला दिखाई दी, वो बिलकुल वैसी ही थी, जैसे की बीमार पड़ने से पहले नजर आती थी। उसने उनसे यही कहा, “आप परेशान क्यों हो रहे हैं, आपने हद से ज्यादा ही परिवार के लिए किया है। जिंदगी की शाम में, अब आप विनोद को भी संसार रुपी नदी में हाथ पाँव झटकने के लिए छोड़ दीजिए। जिम्मेदारियों को निभाना ही उसे परिपक्व बनाएगा, जिंदगी के सिर्फ साल बढ़ने से ही,आदमी समझदार नहीं हो जाता। जब तक वो‌ संघर्षों से दो चार नहीं हो जाता, तब तक उसने इस दुनिया के लायक नहीं बन जाना। विनोद को अब आप अपनी चिंताओं, सरंक्षण के दायरे से बाहर निकाल दीजिए, इसे वास्तविक, वर्तमान वाले जीवन के अनुभव से सरोकार कराने वाले स्कूल में प्रवेश करने दीजिए, वहाँ फीस बहुत ज्यादा है, और दिल को बार बार छलनी करना पड़ेगा, इस वाले स्कूल की फीस को भरने के लिए। माँ के साथ साथ, अब पिता की निगाहबीनी, से भी उसे जुदा, दूर हो जाना चाहिए, मेरे भोले बाबा उसका भी कल्याण करेंगे।”

पिता को उसके बाद बाकी रात को नींद नहीं आयी। पिता को इस समझ ने घेरना शुरू कर दिया कि:-

पूत को वो क्या छोड़ कर जा रहे हैं, इससे भी कहीं ज्यादा जरुरी है कि पूत अपने लिए कुछ अर्जित करने के लायक बन सके, उसे इतना योग्य बना कर ही काम धंधे वाली सांसारिक दुनिया में छोड़ना वाजिब रहेगा। अब समय आ गया है कि पिता कुछ तुरंत, ठोस धरातल पर भी करे, चूँकि पूत सपूत तो, का धन संचय


नतीजा कुछ दिनों पश्चात एक और बातचीत उस परिवार में पिता पुत्र के मध्य ‌सम्पन्न होने जा रही थी। परिवर्तन कुछ दिन पूर्व वाले की तुलना में, यही था कि पिता से कुछ दिनों पहले बड़े बेटे ने बात की थी, और अब पिता छोटे बेटे से बात करने जा रहे थे, इसने भी एक पक्षीय साबित होना था, सिर्फ दोनों सिरे में ही बदलाव नजर आना था। आज पिता ने कहना था, बेटे ने सुनना था, आजकल की रीत के बिलकुल विपरीत जहाँ औलादें कहती, सुनाती हैं, और बाप को ख़ून का घूँट पीकर के, सब कुछ चुपचाप सुनना ही पड़ता है।


(सुशीला सदन बनने की कथा क्या थी? उसे बनाने के लिए किया गया सुशीला के संघर्ष कैसा था? आखिर पिता और उनके छोटे बेटे में क्या बातचीत हुई? इस बातचीत का क्या नतीजा निकला? सुशीला सदन आखिर में किसका हुआ? इन सब सवालों के उत्तर तो आपको यह पुस्तक पढ़कर ही पता चलेंगे।)

पुस्तक विवरण:

एक तरफ सुशीला सदन जहाँ कथा की नायिका सुशीला के महकपुर की जय सिंह कॉलोनी में एक 200 गज के घर बनने की कहानी हैं वहीं दूसरी तरफ यह नायिका, उसके परिवार और उसके पड़ोस में मौजूद बाकी लोगों की ज़िंदगियों का दस्तावेज भी है। घर बनाने के लिए नायिका द्वारा किए जा रहे संघर्ष के साथ-साथ उनके नज़दीकी सभी लोगों की ज़िंदगियाँ और इनके बीच का आपसी बनते-बिगड़ते समीकरणों से यह कथा गुँथी हुई है।

यहाँ वो सब कुछ है, जो मानव, मानवीय पहलुओं, संवेदनाओं से जुड़ा है। सुख-दुख, हँसना-रोना और लोगों की नज़रों से ढका छुपा प्रेम भी यहाँ चलता हुआ दिखता है।

यह धनाढ्य लोगों की नहीं बल्कि अपनी छत के नीचे, दो रोटी चैन से खाने के लिए जद्दोजहद में जुटी रहने वाली ज़िंदगियों से जुड़ी कहानी है।

पुस्तक लिंक: अमेज़न

(नोट: पुस्तक का यह अंश लेखक की अनुमति से यहाँ प्रकाशित किया जा रहा है।)


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