किस्से मैत्रीदत्त के: नया स्कूटर – आलोक सिंह खालौरी

किस्से मैत्रीदत्त के: नया स्कूटर - आलोक सिंह खालौरी

हम सभी के जीवन में कुछ लोग ऐसे आते हैं जिनके व्यक्तित्व की गहरी छाप हमारे मन मस्तिष्क पर छूट जाती है। उनके साथ रहने पर जीवन में ऐसे रोचक प्रसंग होने लगते हैं जो भले ही घटित होने के दौरान हमारी जान सुखा दें लेकिन जिन्हें भविष्य में याद करते हुए हमारे चेहरे पर मुस्कान सी आ जाती है। लेखक आलोक सिंह खालौरी के मित्र मैत्रीदत्त भी ऐसी ही शख्सियत के मालिक थे। पढ़ें मैत्रीदत्त से जुड़ा लेखक आलोक सिंह खालौरी का लिखा यह संस्मरण ‘नया स्कूटर’ – सम्पादक


मैत्रीदत्त मेरे गाँव के थे, मेरे हमउम्र थे, मेरे मित्र थे। अफ़सोस, वो अब नहीं हैं। संतोष, मैं अभी हूँ। आज यूँ ही बैठे-बैठे उनकी याद आ गयी। याद आयी तो उनसे जुड़ा एक किस्सा भी ज़ेहन की वादियों में तैर सा उठा।

मैत्रीदत्त से मेरा परिचय प्रथम बार सन् 88 में हुआ था। मैं मेरठ विश्वविधालय से कानून की पढ़ाई कर रहा था और मैत्रीदत्त शायद बीएड या एमएड कर रहे थे। मुझे उनका अधिक याद नहीं, हाँ पढ़ रहे थे बस इतना याद है। वैसे थे तो वो मेरे गाँव के ही पर बाकायदा परिचय मेरा उनसे मेरठ में ही हुआ था।

वो नंदन सिनेमा के आसपास कहीं कमरा लेकर रहते थे।

बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे मैत्रीदत्त। हालाँकि ये मेरी अकर्मण्यता रही कि मैं उन प्रतिभाओ में से सिवाय एक के किसी के भी दर्शन ना कर पाया। उनकी जो प्रतिभा मुझे दिखी वो उनकी अंग्रेजी थी। अंग्रेजी लिखने पढ़ने में वो बहुत अच्छे थे। हाँ, बोलते ना थे वो।

बहरहाल मित्र थे, आत्ममुग्ध थे पर रोचक थे। आनंद आता था उनके साथ समय गुज़ारकर। मेरी मित्रमंडली में वो एकमात्र थे जो छोटे बड़े हर मैच में अपना स्कोर काउंट करके बाकायदा अपना स्ट्राइक रेट और एवरेज लिख कर रखते थे। मोहल्ला क्रिकेट को इतनी गम्भीरता से वही खिलाड़ी ले सकता है जिसे अच्छे से ज्ञात हो कि यही अंतिम पड़ाव है उसके क्रिकेट कैरियर का।

खैर, ये किस्सा क्रिकेट का नहीं है। एक स्कूटर का है। नये स्कूटर का।

उन दिनों हम शास्त्रीनगर के ए ब्लॉक में रहा करते थे जब यह घटना घटी।

एक दिन दोपहर के समय मैत्रीदत्त कुछ मुरझायी सी अवस्था में घर पर आये। वे अकेले थे और जिस स्कूटर पर आये थे वो उनसे भी अधिक मुरझाया हुआ सा लग रहा था। हालाँकि स्कूटर बिलकुल नया था। अभी नम्बर भी ना आया था उसके पर फिलहाल मुरझाया हुआ लग रहा था।

मैत्रीदत्त और स्कूटर दोनों के मुरझाने की असल वजह ये थी कि दोनों की एक-एक साइड बाकायदा छिली और घिसटी हुई थी।

मैंने उनका स्कूटर खड़ा करवाया और उन्हें सहारा देकर अंदर लाकर दीवान पर लिटा दिया। उनके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था और शरीर में जैसे जान ही न बची थी।

“क्या हुआ सब खैरियत?, कहाँ ठोक दिया स्कूटर?” मैंने पूछा।

मैत्रीदत्त ने किसी तरह लड़खड़ाती आवाज़ में एक टेलीफोन नम्बर बताया और कहा कि इस पर फोन करके बता दो मेरा एक्सीडेंट हो गया है। वो आकर अपना स्कूटर ले जाए।

मैंने फोन करके मैत्रीदत्त का मैसेज पास कर दिया।

मैत्रीदत्त ने जैसे अपनी सारी शक्ति इसी पल तक के लिए जुटा रखी थी, मेरी फोन पर बात होते ही वो बेहोश हो गये।

मैं थोड़ा चिंतित हुआ और मैत्रीदत्त की रगड़ और घिसट का मुआयना किया। बस तीखी रगड़ थी लालिमा लिए हुये। रगड़ खाल भेदकर गोश्त या हड्डी तक ना पहुँची थी और बस खाल पर ही मर्दानगी दिखा कर शहीद हो गयी थी। मैंने उनका सिर टटोल कर देखा तो सिर गूमड़रहित पाया। अब मैं उनके बेहोश होने का कारण ना समझ पा रहा था। उनके चेहरे पर मैंने पानी के छीटें भी मारे लेकिन वो बेहोश थे और बेहोश ही रहे। मेरी चिंता बढ़ती जा रही थी। उन्हें छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकता था। मैं उनके मित्र के आने का इंतज़ार करने लगा। शायद वो ही बता पाते कि इनका क्या करना है।

बीस मिनट बाद मैत्रीदत्त के स्कूटर वाले मित्र आ गये। बड़े बदहवास से लग रहे थे, स्कूटर देखते ही उनकी आँख से आँसूँ ना निकले बस इतना भर हुआ। बाकी प्रलाप में कोई कसर ना छोड़ी उन्होंने। मुझे हर पल उनके बुक्का फाड़ कर रोने की आशंका सताती रही, पर मेरी आशंका निर्मूल निकली। स्कूटर वाले मित्र ना रोये।

हम मैत्रीदत्त के पास आये तो उन्हें हमने पूर्ववत अचेत पाया। वो मित्र बहुत कुछ कहना या शायद करना भी चाह रहा था पर मैत्रीदत्त की बेहोशी आड़े आ रही थी। स्कूटर वाला मित्र कुछ बोला तो नहीं अलबत्ता दाँत पीसे जाने की आवाज मुझे कई बार आयी।

“चलो इतना शुक्र है मैत्रीदत्त को अधिक चोट ना लगी।” मैं बोला।

स्कूटर वाला मित्र मुझे अपनी इस बात से सहमत ना लगा।

“पापा परसो खरीद कर लाये थे, मैं इनके पास आया तो ये एक चक्कर लगाने की बात कह कर ले गए।” स्कूटर वाले मित्र रुँधी आवाज़ में बोले। मैत्रीदत्त से जैसे उन्हें लेना देना ही न था। उन्हें तो स्कूटर की चिंता थी।

“एक चक्कर लगाने के लिए नंदन सिनेमा से यहाँ तीन किलोमीटर दूर निकल आये?” मैं आश्चर्य से बोला।

जवाब में मुझे फिर दाँत पीसे जाने की आवाज आयी, इस बार दाँत किटकिटाने की आवाज भी शामिल थी दाँत पीसे जाने के क्रम में।

स्कूटर वाले मित्र ने पुनः मैत्रीदत्त को देखा, वो पूर्ववत अचेत थे।

“अब इनका क्या करना है?” मैंने पूछा।

उन्होंने कंधे उचकाये। जैसे कह रहे हों मर जाएँ ये उनकी बला से। फिर वो स्कूटर की चाबी की तरफ बढ़ गए। मुझसे कुछ और कहता नहीं बना। अभी मैत्रीदत्त की चिंता दिखाना उनके घाव में नमक छिड़कने जैसा होता।

स्कूटर वाले मित्र ने चाभी उठाई और मरे मरे कदमो से चल दिये। मैं औपचारिकतावश उन्हें बाहर तक छोड़ने गया, स्कूटर वाले मित्र का एक एक पग जैसे मनो भारी हो गया था। सम्भवतः पापा और स्कूटर की भेंट कराने में अधिकतम विलम्ब कर देना चाह रहे थे। जैसे तैसे उन्होंने स्कूटर में किक मारी। स्कूटर तत्काल गर्जा। मतलब साफ़ था स्कूटर सिर्फ बाह्य रूप से कुरूप हुआ था अंदर से उसका मन बिलकुल निर्मल था।

स्कूटर वाले मित्र ने गियर डाला और अंतिम निगाह मुझ पर डाल कर स्कूटर दौड़ा दिया। उस अंतिम निगाह में करुणा, क्षोभ, क्रोध सब समाहित था।

अब मुझे मैत्रीदत्त का इलाज करवाना था। वो चिंता मुझे खायी जा रही थी।

पर जब मैं वापस आया तो देखा मैत्रीदत्त होश में आ चुका था।

“चलो शुक्र है तुम्हें होश आ गया।” मैं प्रसन्न स्वर में बोला।

“ वो बाहर जाकर क्या कह रहा था?” मैत्रीदत्त ने उत्सुक भाव से पूछा।

मुझे आश्चर्य हुआ कि मैत्रीदत्त उसके द्वारा बाहर जाकर की गयी बात को लेकर उत्सुक थे, जबकि जब वो अंदर था तब ही कौन सा उन्होंने उसकी बात सुनी होंगी। वो तो अचेत थे ना।

“नहीं कुछ नहीं।” मैं प्रत्यक्ष में बोला।

मैत्रीदत्त हल्का सा मुस्कुराये।

“कहाँ हुआ था एक्सीडेंट?” मैंने उत्सुकतावश पूछा।

“वहीं नंदन के पास ही हो गया था।” वो बोले।

“अरे तो फिर ऐसी हालत में यहाँ तीन किलोमीटर दूर क्यों आये, वहीं बुला लेते इन मित्र को।”

मैत्रीदत्त पर बहुदा हर बात का जवाब होता था पर इस बात का जवाब न दिया उन्होंने, सिर्फ मुस्कुरा भर दिये, बड़ी रहस्यमयी मुस्कराहट थी वो।

फिर मेरा छोटा भाई अतुल , अखिलेश और मित्र अनिल आ गये। हमारे घर में सौ गज की खाली ज़मीन थी जिसमें हम सभी क्रिकेट खेला करते थे।

“चलो यार क्रिकेट खेलते हैं।” इन तीनों में से किसी ने कहा तो मैत्रीदत्त भी तेज़ी से उठ गए।

मैं उन्हें देखता रह गया। अब न उनके चेहरे पर रंग उड़ा हुआ था और न उनके शरीर में कहीं कमज़ोरी दिख रही थी।

उनके चेहरे पर थी वही रहस्यमय मुस्कराहट जो उन्होंने मेरी तरफ फेंकी और क्रिकेट खेलने निकल गये।

समाप्त


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Author

  • आलोक सिंह खालौरी

    1 जुलाई 1967 को मेरठ के एक प्रतिष्ठित परिवार में जन्म। पिता न्यायाधीश थे। लिहाजा शिक्षा बड़ी घुमंतू किस्म से पायी। पिता के तबादलों के साथ-स्कूल भी बदलता रहा। राजा बलवंत सिंह कॉलेज, आगरा से स्नातक की उपाधि लेने के पश्चात मेरठ वापसी। पिता कानूनदाँ थे तो मेरठ कॉलेज से एलएलबी की डिग्री लेकर स्वयं वकालत के रास्ते चले। पढ़ने का शौक कॉलेज के समय से ही रहा। कानून के अतिरिक्त हर विधा की किताबें पढ़ें का शौक है। पत्नी, बेटे और दो बेटियों के साथ मेरठ में ही निवास।

    उनसे alok68800@gmail.com पर सम्पर्क किया जा सकता है।

    अब तक दस से ऊपर उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। उपन्यास अमेज़न, शब्दगाथा और साहित्य विमर्श की वेबसाईट  पर उपलब्ध।

    पुस्तक लिंक: अमेज़न | शब्दगाथा | साहित्य विमर्श

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